2020 के दिल्ली सांप्रदायिक नरसंहार के पीड़ितों के साथ विश्वासघात

उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों के पांच साल बाद सामाजिक विभाजन कम नहीं हुआ है, न ही हिंसा के शिकार हुए पीड़ितों को उचित मुआवज़ा मिला. न्याय तो आज भी दूर की कौड़ी है.

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दिल्ली दंगों के दौरान खजुरी खास एक्सटेंशन में जलाए गए घर में एक दंपति. (फाइल फोटो: पीटीआई)

‘मेरे भाई को ज़िंदा जला दिया गया था. इस बात को पांच साल बीत चुके हैं. पहले, उन्होंने उसे गोलियों से भून दिया. फिर उन्होंने उसे लाठियों से पीटा. और अंत में, उन्होंने उसे आग के हवाले कर दिया.’

26 फ़रवरी को कारवां-ए-मोहब्बत द्वारा दिल्ली में आयोजित एक एकजुटता सभा में बोलते हुए सलीम कस्सार ने कहा. उत्तर-पूर्वी दिल्ली के मज़दूर वर्ग के इलाक़े में हुए सांप्रदायिक नरसंहार की पांचवीं वर्षगांठ के मौक़े पर यह सभा आयोजित की गई थी, जिस हिंसा की शुरुआत 23 फ़रवरी, 2020 से हुई थी.

उन्होंने आगे कहा, ‘मैं यह सब कुछ पड़ोस की एक इमारत की तीसरी मंज़िल पर बैठकर देख रहा था.’ उन्होंने दुख जताया, ‘मैं बेबस था. मैं अपने भाई की जान बचाने के लिए कुछ नहीं कर सका.’

‘मेरा घर, मेरी फ़ैक्ट्री, सब कुछ लूट लिया गया. भीड़ ने इन इमारतों पर पेट्रोल फेंका और आग लगा दी. उन्होंने हमारी गाड़ियों को भी जला दिया. हमारा सारा सामान जलकर राख हो गया. हम अपनी जान बचाने के लिए पुलिस को बुलाते रहे, लेकिन कोई नहीं आया.’

‘हम सिर्फ़ अपने हिंदू पड़ोसी अभिषेक की वजह से बच पाए. मैं उन्हें सलाम करता हूं. हम उनके आभारी हैं. उन्होंने मेरे माथे पर तिलक लगाया ताकि देखने से मैं हिंदू जैसा दिखूं. वे हमारे परिवार के सभी नौ सदस्यों को अपने घर ले गए.’

‘कुछ दिनों बाद, जब हिंसा कम हो गई, तो मैं पड़ोसियों के साथ पुलिस स्टेशन गया. मैंने उन्हें बताया कि मैंने भीड़ को मेरे भाई को ज़िंदा जलाते देखा. मैं जानना चाहता था कि वह ज़िंदा है या मर गया, और अगर वह मर गया है, तो मुझे उसका शव चाहिए. पुलिस ने मुझे आश्वासन दिया कि वे जांच करेंगे. उन्होंने मुझे उस जगह से फ़ोन किया जहां मैंने अपने भाई को जलते हुए देखा था. उन्होंने बताया कि उन्हें उसका शव नहीं मिला. उन्हें सिर्फ़ एक पैर मिला.’

उन्होंने मुझसे पूछा, ‘क्या तुम उसके पैर को पहचान सकते हो?’ मैंने उनसे कहा कि ‘हम बचपन से साथ रहे हैं, मुझे यक़ीन है कि मैं उसके पैर को पहचान लूंगा’. उस रात मैं जीटीबी अस्पताल के शवगृह में गया, जहां उन्होंने मुझे प्लास्टिक में लिपटा हुआ पैर दिखाया. मैंने उनसे कहा, ‘यह मेरा भाई है’. मुझे यक़ीन था. मैं अपने भाई के इस आख़िरी अवशेष को वापस पाने के लिए हर दूसरे दिन अस्पताल जाता था. आख़िरकार, डीएनए टेस्ट के बाद इसकी पुष्टि हुई कि वह पैर वास्तव में मेरे भाई का था. एक साल बाद मुझे उसका पैर मिला.

जब सलीम कस्सार ने अपनी पीड़ा और निराशा भरी कहानी सुनाई तो खचाखच भरे हॉल में बहुत कम ऐसी आंखें थीं जो नम नहीं हुई थीं.

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कारवां-ए-मोहब्बत की एकजुटता बैठक में अन्य लोगों ने भी अपनी बात रखी. इनमें से एक मुमताज़ बेगम थीं, जो सुबक रही थीं, ठीक से बोल नहीं पा रही थीं. उनके पति ने अपने छोटे से घर की खिड़की से बाहर झांका ही था कि तभी उन्हें भीड़ की भयानक दहाड़ सुनाई दी. उसी समय किसी ने उनके चेहरे पर कोई तरल पदार्थ फेंका. जो तेज़ाब निकला. डॉक्टरों ने दो साल तक उनका इलाज किया, लेकिन वे उनकी आंखों की रौशनी वापस नहीं ला सके. तेज़ाब की वजह से वे पूरी तरह अंधे हो गए थे. हमले से पहले वे एक छोटी सी किराने की दुकान चलाते थे. अब परिवार पूरी तरह से बेसहारा हो गया है.

रिहाना बेगम ने उन कटु सामाजिक विभाजनों के बारे में बताया जिसकी वजह से उनका इलाक़ा अलग-अलग टुकड़ों में बंट गया है. उन्होंने कहा, ‘पांच साल पहले हुई हिंसा अभी भी ख़त्म नहीं हुई है. हिंसा जारी है. जिस इलाक़े में मैं रहती हूं, वहां लोग आज भी हमारे साथ ऐसा व्यवहार करते हैं, जैसे हमने किसी की हत्या कर दी हो, किसी को लूट लिया हो. दंगों के बाद जब हम घर लौटे, तो लोग हमें ऐसे देखते थे, जैसे हमने उनके घरों को लूट लिया हो. जब अयोध्या में मंदिर का उद्घाटन हुआ तो स्थिति और भी बुरी हो गई. फिर वे सड़कों पर नारे लगाने लगे जिससे हम बहुत डर गए. आज भी हम इसका सामना कर रहे हैं.’

2020 की हिंसा में शिव विहार की एक जली हुई फैक्ट्री. (फाइल फोटो: पीटीआई)

लेकिन कस्सार जैसे कई लोगों ने हिंदू पड़ोसियों द्वारा उनकी जान बचाने की बात भी कही. शहज़ाद असग़र ज़ैदी की इलेक्ट्रिकल्स की दुकान थी. उनकी पांच बेटियां हैं, कोई बेटा नहीं, लेकिन दुकान से उन्हें अच्छी कमाई हो जाती थी. दंगे वाले दिन, एक हिंदू पड़ोसी ने उन्हें बताया कि भीड़ ने उनकी दुकान में आग लगा दी है. वह असहाय होकर दूर से देखते रहे. एक दिन बाद मलबे में से कुछ महत्वपूर्ण दस्तावेज़ों की तलाश करने के लिए वो दुकान पर गए. वहां एक आदमी ने उन पर चाकू से हमला करने की कोशिश की. लेकिन एक हिंदू दौड़कर उनके बीच खड़ा हो गया और कहा कि वह शहज़ाद को नुक़सान नहीं पहुंचने देगा. ‘जिस आदमी ने मुझे मारने की कोशिश की वह हिंदू था. जिसने मुझे बचाया वह भी हिंदू था. मैं क्या कहूं?’

इसके बाद जो सिलसिला शुरू हुआ, ज़ैदी उसे न्याय और मुआवज़े के लिए अपना ‘दूसरा युद्ध’ बताते हैं. उनकी दुकान को लूटने और जलाने के लिए किसी को भी दंडित नहीं किया गया. हालांकि उनका नुक़सान पांच या छह लाख रुपये का था, लेकिन सरकार के दरवाज़े पर लगातार दस्तक देने के बाद मुआवज़ा के तौर पर उन्हें केवल 5000 रुपये दिया गया.

मौजपुर चौक पर सेकेंड हैंड कपड़ों की दो मंज़िला दुकान चलाने वाले रफ़ीक़ का हाथ पांच साल बाद भी ख़ाली है. उन्होंने बताया कि 23 फ़रवरी को भाजपा नेता कपिल मिश्रा के नफ़रत भरे भाषण के तुरंत बाद लूटपाट, आगज़नी और पथराव शुरू हो गया था. वे बड़ी मुश्किल से अपनी जान बचाकर भागे. संकरी गलियों से भागते हुए वे किसी तरह घर पहुंचे. चार दिन बाद उनके पड़ोसियों ने बताया कि गैस सिलेंडर फोड़कर उनकी दुकान जला दी गई. फिर भी उन्हें कोई मुआवज़ा नहीं दिया गया.

मोहम्मद शहज़ाद के पास एक ‘धर्मकांटा’ था, जिससे ट्रकों जैसे भारी वाहनों का वज़न किया जाता है. उन्होंने 15 से 20 कर्मचारियों को काम पर रखा था, जिनमें से अधिकांश हिंदू थे. एक हिंदू कर्मचारी ने घबराकर उन्हें फ़ोन किया कि नारे लगाने वाली ग़ुस्साई भीड़ इकट्ठा हो गई है, और तौलने वाले कांटा को आग लगा रही है. शहज़ाद ने पुलिस को फ़ोन किया. दूसरी तरफ़ मौजूद व्यक्ति ने उन्हें आश्वासन दिया कि वे जल्दी ही अपनी फ़ोर्स भेज देंगे. फिर उसने शहज़ाद का नाम पूछा.

यह स्पष्ट हो गया कि फ़ोन करने वाला मुसलमान था. भीड़ को तितर-बितर करने या आग बुझाने के लिए कोई पुलिस बल समय से नहीं पहुंचा. उनके कर्मचारियों ने बाद में उन्हें बताया कि जब पुलिस पहुंची, तो बहुत कुछ तबाह हो चुका था, लेकिन उन्होंने भीड़ को तोड़फोड़ और आगज़नी करने के लिए प्रोत्साहित किया. भीड़ ने तौलने वाले कांटे के आसपास खड़ी उनकी गाड़ियों में भी आग लगा दी, और एक कर्मचारी को लगभग मार डाला.

जब ये हो रहा था तब शहज़ाद अपने परिवार के साथ घर में छिपा हुआ था. वहां भी एक बड़ी भीड़ जमा हो गई, और इतने पत्थर और ईंटें फेंकी कि जल्द ही फ़र्श दिखाई देना बंद हो गया, इसके बाद उन्होंने कई हफ़्तों तक पुलिस का पीछा किया, लेकिन उन्होंने अपराधियों को गिरफ़्तार नहीं किया. बल्कि पुलिस उन्हें ही धमकाती रही.

शहज़ाद ने बताया कि उनके पिता एक ग़रीब मज़दूर थे और कम उम्र में ही उनकी मृत्यु हो गई. उन्होंने अपने व्यवसाय को खड़ा करने के लिए बहुत संघर्ष किया. अब सब कुछ बर्बाद हो चुका है. उन्हें करोड़ों का नुक़सान हो चुका है. उन्हें जो मुआवज़ा मिला है, वह सिर्फ़ 12,500 रुपये है.

फ़ैज़ान की उम्र महज़ 14 साल थी, जब सांप्रदायिक हिंसा के दौरान अचानक आई एक गोली ने उसकी ज़िंदगी बदल दी. बचपन में ही उसकी मां की मौत हो गई थी. उसके पिता ने उसे और उसके भाई को छोड़ दिया था. उनकी दादी ने ही उनका पालन-पोषण किया. हिंसा के दूसरे दिन उसकी दादी ने उसे अपनी गली में किराने की दुकान से कुछ खाना ख़रीदकर लाने के लिए भेजा. तभी एक उग्र भीड़ मोहल्ले में घुस आई. फ़ैज़ान डर के मारे भागा, लेकिन एक गोली आकर उसे लगी और वह गिर गया. पड़ोसी उसकी दादी को ख़बर देने के लिए दौड़े. ये ख़बर सुनकर उसकी दादी बेहोश हो गई. पड़ोसी उसे लेकर क्लीनिक गए. उसकी पीठ पर लगी गोली के गहरे घाव से ख़ून बह रहा था. क्लीनिक के डॉक्टर ने घाव पर पट्टी बांधी, मगर साथ ही यह भी कहा कि अगर उसकी जान बचानी है तो उसे तुरंत अस्पताल ले जाना होगा. लेकिन यह असंभव लग रहा था; हर जगह भीड़ थी, पत्थरबाज़ी हो रही थी, इमारतों में आग लग रही थी. किसी भी वाहन, किसी भी एंबुलेंस को आगे जाने की इजाज़त नहीं थी.

एक दयालु पत्रकार निकिता जैन ने उसकी जान बचाई. उसके पड़ोसियों की मदद से उन्होंने उसे एक लकड़ी की गाड़ी पर लिटाया और चादर से ढक दिया. भीड़ के बीच से होते हुए वे उस गाड़ी को पुलिस की जीप तक ले गए. वहां पत्रकार ने पुलिसवालों से अस्पताल ले जाने की विनती की. शुरू में पुलिस ने आनाकानी की, लेकिन आख़िरकार मान गए, लेकिन जब वे उसे अस्पताल ले जा रहे थे, तब भी फ़ैज़ान को याद है कि पुलिस ने उनका मज़ाक़ उड़ाया. उन्होंने कहा, ‘बाहर जाओ और फिर से आंदोलन करो. तुम्हारे साथ यही होगा. तुम्हें वही मिला है जिसके तुम हक़दार हो.’

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1961 में जबलपुर में स्वतंत्रता के बाद हुए पहले बड़े दंगे के बाद से ही बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक हिंसा के पीड़ितों को न्याय और क्षतिपूर्ति मुआवज़ा दिलाने में, बहुत कम अपवादों को छोड़कर, भारतीय सरकारों का रिकॉर्ड बुरी तरह से दाग़दार है. लेकिन इन शर्मनाक मानकों के अनुसार भी उत्तर-पूर्वी दिल्ली का सांप्रदायिक नरसंहार एकदम अलग है.

सबसे पहली बात, हिंसा राष्ट्रीय राजधानी में हुई, जहां से देश की और दिल्ली की सरकारों का शासन चलता है. दिल्ली सभी सशस्त्र बलों और अधिकांश अर्धसैनिक बलों का राष्ट्रीय मुख्यालय है. अगर इच्छाशक्ति होती, तो शहर के श्रमिक वर्ग के एक इलाक़े में शुरू हुई बहुत छोटी झड़प को कुछ ही घंटों में नियंत्रित किया जा सकता था. मगर यह छह दिनों तक निर्बाध तरीक़े से जारी रहा, यह न केवल राज्य की विफलता को दर्शाता है. बल्कि यह अपराधियों और राज्य की मिलीभगत का सबूत है. हिंसा केवल इसलिए इतने लंबे समय तक जारी रही क्योंकि राज्य इसे जारी रखना चाहता था.

भाजपा के प्रमुख नेताओं द्वारा नफ़रत भरे भाषणों के बावजूद, और दिल्ली उच्च न्यायालय में हमारे हस्तक्षेप और कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश मुरलीधर द्वारा कड़ी फटकार के बावजूद, पुलिस ने उनमें से किसी के ख़िलाफ़ भी मुक़दमा दर्ज करने से इनकार कर दिया. ‘देश के ग़द्दारों’ को गोली मारने का आह्वान करने वालों में से एक को केंद्रीय कैबिनेट मंत्री बना दिया गया. पांच साल बाद एक दूसरे को दिल्ली सरकार में मंत्री बनाया गया वो भी क़ानून और न्याय मंत्री.

हिंसा को रोकने या नियंत्रित करने में विफल रहने के बाद, राज्य का अगला ज़रूरी कर्तव्य उन लोगों को बचाना था, जिनके जान, माल और घर को दंगाई भीड़ ने निशाना बनाया था.  मगर पुलिस ने उन 13,000 फ़ोन कॉल को अनसुना कर दिया जो उसे की गईं. हमने नागरिकों के लिए एक नियंत्रण कक्ष स्थापित करने के लिए वालंटियर की मांग की. कुछ ही घंटों में 40 से ज़्यादा युवा मेरे दफ़्तर में जमा हो गए और पांच दिनों तक वहां से नहीं निकले. मैंने शशिकांत सेंथिल से अनुरोध किया, जिन्होंने हाल ही में आईएएस से इस्तीफ़ा दिया था और अब लोकसभा सांसद हैं, कि वे नागरिक नियंत्रण कक्ष का नेतृत्व करें.

(फाइल फोटो: पीटीआई)

राज्य सरकार ने 2002 में गुजरात सरकार द्वारा की गई शर्मानाक हरकत का अनुसरण करते हुए राहत शिविर स्थापित करने के लिए शुरू में कोई क़दम नहीं उठाया. जब इसकी व्यापक आलोचना हुई, तो दिल्ली सरकार ने नौ बेघर आश्रय स्थलों को राहत शिविर के रूप में नामित किया. यह हिंसा से बेघर हुए हज़ारों लोगों के लिए एक क्रूर अपमान से अधिक कुछ नहीं था. बेघर आश्रय स्थल ख़ाली टिन शेड हैं जिनमें बेघर लोगों को अस्वास्थ्यकर और असम्मानजनक स्थितियों में विशेष रूप से सर्दियों के महीनों में पैक किया जाता है.

सांप्रदायिक हिंसा से विस्थापित हज़ारों लोगों के लिए ये सुरक्षा और उपचार के स्थान कैसे हो सकते हैं? राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में इतने सारे संसाधन थे कि उन्हें अनुकरणीय राहत शिविरों की तरह आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता था, जैसे; स्टेडियम और कॉलेज की इमारतें. मगर सरकार ने सांप्रदायिक हिंसा से पीड़ित लोगों को प्रभावी राहत देने का कोई विकल्प नहीं चुना.

कारवां-ए-मोहब्बत की रिपोर्ट में वर्णित मुआवज़े की कहानी, जिसका शीर्षक है ‘The Absent State: Denial of Reparation & Recompense to the Survivors of the 2020 Delhi Pogrom’ (‘अनुपस्थित राज्य: 2020 के दिल्ली दंगे के पीड़ितों को मुआवज़ा और प्रतिपूर्ति से वंचित करना’) – और भी निराशाजनक है. केंद्र सरकार ने मुआवज़ा योजना की घोषणा नहीं की और पांच साल में हिंसा के पीड़ितों को एक रुपया भी नहीं दिया.

राज्य सरकार ने बेहतर शुरुआत की, लेकिन यह केवल कुछ हफ़्तों तक ही चला. इसने कम से कम एक मुआवज़ा योजना की घोषणा तो की, हालांकि 1984 के सिख विरोधी दंगे की तुलना में बहुत सीमित पैमाने पर. राज्य सरकार के अधिकारियों ने प्रभावी रूप से मृत्यु मुआवज़ा और अनुग्रह राशि वितरित की.

लेकिन जल्द ही, मार्च में ही, दिल्ली की राज्य सरकार ने मुआवज़े का आकलन और वितरण करने के लिए एक अलग एजेंसी स्थापित करने के वास्ते दिल्ली उच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया. यह समझ से परे और अक्षम्य था, क्योंकि सांप्रदायिक और जातिगत हिंसा से प्रभावित लोगों का बचाव, राहत, मुआवज़ा और पुनर्वास राज्य का एक मौलिक कर्तव्य है, जो वास्तव में हिंसा से पीड़ित लोगों के जीवन के संवैधानिक मौलिक अधिकार से निकला है. इस कर्तव्य को किसी बाहरी निकाय को सौंपने का कोई औचित्य नहीं था.

इस कार्य के लिए उच्च न्यायालय द्वारा आयोग नियुक्त हुआ, जो वास्तव में एक बहुत ही अलग, बल्कि विपरीत उद्देश्य के लिए स्थापित किया गया था. इसका उद्देश्य सार्वजनिक संपत्तियों को हुए नुक़सान का आकलन करना था, जिसकी वसूली दंगाइयों से की जानी थी. सांप्रदायिक हिंसा के पीड़ितों को उचित मुआवज़ा देने की इस भारी ज़िम्मेदारी के साथ, आयोग ने अपना काम शुरू करने में ही सात महीने लगा दिए. फिर इसने पीड़ितों को हुए नुक़सान और क्षति का आकलन करने के लिए बेतरतीब ढंग से निजी मूल्यांकनकर्ताओं को नियुक्त किया.

इन निजी मूल्यांकनकर्ताओं द्वारा अपनाई जाने वाली प्रक्रिया और मानदंडों को सार्वजनिक नहीं किया गया. न तो मूल्यांकनकर्ताओं और न ही आयोग ने उन लोगों की बात सुनी, जिन्हें नुक़सान हुआ था. उन्होंने आमतौर पर अपने आकलन का कोई कारण नहीं बताया. और आकलन के ख़िलाफ़ एक भी अपील का प्रावधान नहीं था. यह सब प्राकृतिक न्याय के सभी सिद्धांतों के ख़िलाफ़ है.

हिंसा के पीड़ितों के मौलिक अधिकारों पर हमला यहीं ख़त्म नहीं हुआ. आयोग ने, जिन छोटी-छोटी याचिकाओं का निपटारा किया है, उनमें मुआवज़े के स्तर तय किए गए हैं जो वास्तविक नुक़सान का एक छोटा सा हिस्सा है. लेकिन आयोग ने कहा कि उसके पास तय की गई मुआवज़े की छोटी सी रक़म को भी वितरित करने के लिए कोई धन नहीं है. 2020 और उसके बाद के सभी वर्षों के लिए राज्य सरकार के बजट की जांच से पता चलता है कि मुआवज़े के भुगतान के लिए बजट में कुछ नहीं लिखा गया था और अलग से बजट भी निर्धारित नहीं किया गया था.

दिल्ली सरकार के लगभग 75,000 करोड़ रुपये के कुल बजट में, मुआवज़े का उदार प्रावधान भी इसकी कुल राशि के 1-2% से अधिक नहीं होंगे. ज़ाहिर है, 2020 के दिल्ली सांप्रदायिक हिंसा के पीड़ित बचे लोगों को मुआवज़ा देने से इनकार करना ऐसी चूक नहीं थी जो धन की कमी के कारण हुई हो.

2020 की दिल्ली सांप्रदायिक हिंसा के बाद, पुलिस ने 758 एफ़आईआर दर्ज की, जिनमें से एक में दावा किया गया कि नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करने वाले और राहत कार्य में सक्रिय लोग वास्तव में साज़िशकर्ता थे जिन्होंने सांप्रदायिक नरसंहार की योजना बनाई थी.

पिछले अप्रैल में उच्च न्यायालय को दिए गए एक बयान में, पुलिस ने बताया कि 289 मामलों में अभी भी जांच चल रही है. 296 मामलों अदालत में लंबित हैं, और 173 मामलों को अदालत ने ख़ारिज कर दिया है.

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मोहम्मद शहज़ाद का करोड़ों रुपये का तौलने वाला कांटा जल गया, लेकिन उन्हें केवल 12,500 रुपये का मुआवज़ा दिया गया. शहज़ाद ने कहा, ‘कई बार मुझे आश्चर्य होता है कि मैं यहां क्यों पैदा हुआ. यहां ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे आप न्याय कह सकें. मेरा क्या दोष है कि मुझे इतना कुछ सहना पड़ा?’

या सलीम कस्सार, जिसने एक भीड़ को अपने भाई को गोली मारते और फिर जलाते हुए देखा. उसका कारख़ाना और घर जला दिया गया, वह अपने बच्चों को खिलाने और पढ़ाने के लिए संघर्ष कर रहा है. उसने कहा, ‘जीवन बहुत कठिन है. लेकिन मुझे पैसे नहीं चाहिए. मुझे अपने भाई के लिए न्याय चाहिए, उस क्रूरता का प्रतिफल चाहिए जिस क्रूरता के साथ उसे मारा गया.’

उसने धीमे से कहा, ‘अगर मुझे न्याय नहीं मिला, तो मैं अपनी जान ले लूंगा.’

लेकिन क्या किसी ने उन्हें सुना?

क्या किसी को उनकी परवाह है?

(लेखक मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं.)

(इस लेख के लिए मिले शोध सहयोग के लिए स्वाति ड्रैक और सैयद रुबेल हैदर ज़ैदी का आभार)

(मूल अंग्रेज़ी से ज़फ़र इक़बाल द्वारा अनूदित. ज़फ़र भागलपुर में हैंडलूम बुनकरों की कोलिका नामक संस्था से जुड़े हैं.)