नई दिल्ली: अरावली पर्वत श्रृंख्ला के महत्व को देश के सामने रखने और इसके संरक्षण की मांग के लिए गठित ‘अरावली विरासत जन अभियान’ के बैनर तले पर्यावरणविदों सहित नागरिक समाज के लोगों ने गुरुवार (22 जनवरी) को घोषणा की है कि वे अरावली पहाड़ियों और क्षेत्र में रहने वाले स्थानीय समुदायों पर मंडरा रहे खतरों को उजागर करने के लिए चार राज्यों से गुजरते हुए 700 किलोमीटर की पदयात्रा करेंगे.
गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली में फैली अरावली की पहाड़िया हाल ही में चर्चा में रही है, क्योंकि नागरिकों ने चिंता जताई है कि यदि अरावली की नई परिभाषा लागू की जाती है तो पर्वतमाला के बड़े हिस्से खनन के लिए खोल दिए जाएंगे.
मालूम हो कि सर्वोच्च न्यायालय ने 20 नवंबर को एक आदेश में इस विवादास्पद नई परिभाषा को स्वीकार कर लिया था, लेकिन बाद में व्यापक विरोध प्रदर्शनों, विशेष रूप से राजस्थान में, के बाद इस आदेश पर रोक लगा दी है.
‘अरावली संरक्षण यात्रा’
अरावली पहाड़ियों को बचाने की मुहिम के तहत पर्यावरणविदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, जल संरक्षण विशेषज्ञों, नागरिक समाज के लोगों की भागीदारी वाली इस पदयात्रा को ‘अरावली संरक्षण यात्रा’ नाम दिया गया है और यह गुजरात के अरावली जिले से 24 जनवरी को शुरू होगी.
इस संबंध में अरावली विरासत जन अभियान के सदस्यों ने नई दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित कर इसकी जानकारी देते हुए कहा कि यह पदयात्रा गुजरात के तीन जिलों, राजस्थान के 27 जिलों, हरियाणा के सात जिलों से होते हुए दिल्ली पहुंचेगी. सदस्यों ने बताया कि यह पदयात्रा 700 किलोमीटर की दूरी तय करेगी और इसे पूरा करने में 40 दिनों से अधिक का समय लगेगा.
अरावली विरासत जन अभियान की सदस्य नीलम अहलूवालिया ने अपने बयान में कहा कि यह पदयात्रा प्रत्येक जिले में अरावली पर्वतमाला पर निर्भर ग्रामीण समुदायों से संपर्क स्थापित करेगी और उत्तर पश्चिम भारत की स्वच्छ हवा और पानी की जीवनरेखा मानी जाने वाली अरावली पहाड़ियों की सुंदरता और इसके विनाश को प्रदर्शित करेगी.
उन्होंने आगे कहा, ‘देश एक और गणतंत्र दिवस मनाने की तैयारी कर रहा है, ऐसे में हम नागरिकों के तौर पर आर्टिकल 51ए(जी) के तहत अपना कर्तव्य पूरा करने के लिए काम करते हैं. भारतीय संविधान के अनुसार, जिसमें हर नागरिक को प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा करने और उसे बेहतर बनाने का अधिकार है. ‘
नीलम के अनुसार, ‘पिछले कुछ दशकों से अरावली पर्वतमाला वनों की कटाई, लाइसेंस प्राप्त और अवैध खनन, एक के बाद एक पहाड़ियों को समतल करके विकसित की जा रही रियल एस्टेट परियोजनाओं और अपशिष्ट डंपिंग के कारण बुरी तरह प्रभावित हुई है, जिससे हमारे जलस्रोत प्रदूषित हो रहे हैं. अरावली पर्वतमाला को सख्त संरक्षण की आवश्यकता है, न कि उन निरर्थक परिभाषाओं की जो अधिकांश क्षेत्रों को कानूनी संरक्षण और तथाकथित ‘सतत खनन योजनाओं’ से बाहर कर देती हैं.’
‘स्पष्टीकरण आवश्यक’
वहीं, राजस्थान के सीकर जिले के पर्यावरण कार्यकर्ता कैलाश मीना ने कहा, ‘अरावली संरक्षण यात्रा’ के माध्यम से हम यह बताना चाहते हैं कि खनन में कुछ भी सतत नहीं है, यह एक ऐसा काम है जिससे समाज और पर्यावरण पर बुरा असर पड़ता है
उन्होंने कहा, ‘अरावली पहाड़ियों में तथाकथित ‘लाइसेंस प्राप्त और विनियमित खनन’ सभी नियमों का उल्लंघन करता है और भारी विनाश का कारण बना है. पिछले 40 वर्षों में खनन ने कई पहाड़ियों को पूरी तरह से नष्ट कर दिया है और इसके साथ ही कई पशु चरागाह क्षेत्रों को भी तबाह कर दिया है.’
इसी सिलसिले में जल संरक्षण कार्यकर्ता राजेंद्र सिंह ने कहा कि यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि खनन के लिए प्रतिबंधित की जाने वाली भूमि किसी भी जलसंभर या जलग्रहण प्रणाली, आर्द्रभूमि, स्थानीय या मौसमी रूप से प्रवासी वन्यजीवों के पारिस्थितिक आवास, पारिस्थितिक या आवास संपर्क, वन या पुनर्जनन योग्य वनस्पति प्रणालियों, कटाव, पुनर्भरण या स्थिरता से संबंधित भू-आकृतिक संरचनाओं, जलवायु, हवा या धूल को नियंत्रित करने वाली संरचनाओं का हिस्सा न हो.
उन्होंने आगे कहा, ‘जब तक ऐसी भूमिकाओं का अभाव स्पष्ट रूप से सिद्ध नहीं हो जाता, तब तक परिभाषाओं के वर्गीकरण या तथाकथित ‘सतत या विनियमित खनन’ के दावों से पर्यावरण संरक्षण को कमजोर नहीं किया जा सकता… ऐसे समय में जब हम इक्वाडोर, कोलंबिया, न्यूजीलैंड, बांग्लादेश जैसे कई देशों की अदालतों को ऐतिहासिक फैसले सुनाते और कानून के माध्यम से यह मान्यता देते हुए देख रहे हैं कि प्रकृति और विशिष्ट पारिस्थितिक तंत्रों के कानूनी अधिकार और पहचान हैं, जिससे उन्हें संरक्षित किया जा सकता है; हम भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय से भारत के सबसे पुराने पर्वतीय पारिस्थितिक तंत्र के रूप में अरावली पहाड़ियों के अधिकारों को मान्यता देने की अपेक्षा करते हैं.’
राजेंद्र सिंह के अनुसार, अरावली विरासत जन अभियान की एक मांग यह भी है कि अरावली पर्वत श्रृंख्ला को ‘महत्वपूर्ण पारिस्थितिक क्षेत्र’ घोषित किया जाए, क्योंकि यह उत्तर पश्चिम भारत में रहने वाले लाखों लोगों के लिए पारिस्थितिक तंत्र सेवाएं प्रदान करती है और जैव विविधता का एक महत्वपूर्ण भंडार है.
‘हम अपने ‘जीवित देवता’ को नष्ट नहीं होने देंगे’
प्रेस वार्ता के दौरान आदिवासी एकता परिषद की युवा नेता कुसुम रावत ने कहा, ‘अरावली संरक्षण यात्रा’ के माध्यम से हम यह दिखाना चाहते हैं कि आदिवासी लोगों का जीवन पहाड़ों और उनके जंगलों से किस प्रकार गहराई से जुड़ा हुआ है.’
उल्लेखनीय है कि कुसुम रावत, जो दक्षिणी राजस्थान और गुजरात की अरावली पहाड़ियों में रहने वाले भील आदिवासी समुदाय से संबंध रखती हैं, ने कहा कि उनके जैसे कई आदिवासी समुदाय अरावली की गोद में रहते हैं और भोजन, ईंधन, औषधीय जड़ी-बूटियों और बांस और तेंदू के पत्तों जैसे कच्चे माल के लिए जंगल पर निर्भर हैं, जिन्हें इकट्ठा करके बेचा जाता है.
कुसुम बताती हैं, ‘पहाड़ी ढलानें बकरियों और भेड़ों के लिए चरागाह प्रदान करती हैं, जबकि वर्षा आधारित सीढ़ीदार खेत बाजरा और दालों की खेती के लिए उपयुक्त हैं. मौसमी नदियां और जल निकाय पीने का पानी उपलब्ध कराते हैं और छोटे पैमाने पर मछली पकड़ने का काम करते हैं. आदिवासी सांस्कृतिक पहचान, आजीविका और जीवन निर्वाह सीधे अरावली पहाड़ियों, जंगलों और इसके प्राकृतिक संसाधनों के स्वास्थ्य पर निर्भर करता है.’
वे आगे कहती हैं, ‘हमें अरावली पर्वतों और जंगलों से जीवन मिलता है और हम उन्हें जीवित देवताओं के रूप में पूजते हैं. खनन और भवन एवं रिसॉर्ट निर्माण जैसी विनाशकारी गतिविधियों के लिए प्रकृति को नष्ट करना ‘प्रगति’ नहीं है. हम अपने पहाड़ों, नदियों, जंगलों – अपने जीवित देवताओं – को नष्ट नहीं होने देंगे.’
सदस्यों ने सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर चिंता जताई
इस दौरान अरावली विरासत जन अभियान के सदस्यों ने 21 जनवरी को अरावली पर्वत श्रृंख्ला की नई परिभाषा से संबंधित सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई पर भी चिंता व्यक्त की. संगठन के सदस्यों ने इस मुद्दे से संबंधित कोई और याचिका अदालत द्वारा स्वीकार नहीं करने के फैसले को निराशाजनक बताया.
इस संबंध में नीलम अहलूवालिया ने कहा कि अदालत केवल न्यायालय द्वारा नियुक्त एमिकस क्यूरी और बिहार के एक सांसद का प्रतिनिधित्व करने वाले वकील कपिल सिबल की ही बात सुनना चाहता है, जिन्होंने अरावली की नई परिभाषा के मुद्दे पर अपनी राय रखी थी.
उन्होंने सवाल उठाया, ‘अरावली के विनाश से प्रभावित लोगों और अरावली क्षेत्र में काम करने वाले संरक्षणवादियों द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में स्वतः संज्ञान लेते हुए दायर की गई हस्तक्षेप याचिकाओं को पीठ ने औपचारिक रूप से स्वीकार क्यों नहीं किया? स्वतः संज्ञान मामले में केवल एक हस्तक्षेप आवेदन स्वीकार करने का क्या औचित्य है?’
संगठन के सदस्यों की मांग है कि सर्वोच्च न्यायालय 20 नवंबर 2025 के अपने फैसले को पूरी तरह से रद्द करे और पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की अध्यक्षता वाली समिति द्वारा दी गई अरावली की प्रतिगामी नई परिभाषा को निरस्त करे.
नीलम के मुताबिक, विशेषज्ञों के अलावा न्यायालय द्वारा नियुक्त नई ‘उच्चाधिकार समिति’ में खनन से प्रभावित समुदायों के प्रवक्ताओं को भी शामिल किया जाना चाहिए और यह निर्देश दिया जाना चाहिए कि चारों राज्यों में फैली संपूर्ण अरावली पर्वत श्रृंख्ला का एक स्वतंत्र और व्यापक सामाजिक एवं पर्यावरणीय प्रभाव अध्ययन किया जाए ताकि खनन, अचल संपत्ति, अतिक्रमण, अपशिष्ट डंपिंग और जलाने से पहाड़ियों, जंगलों, नदियों, भूजल, कृषि और संबंधित गतिविधियों को हुए नुकसान का पता लगाया जा सके.
उन्होंने आगे कहा कि अरावली के सभी जिलों में लोगों के स्वास्थ्य और आजीविका को हुए नुकसान का आकलन अवश्य किया जाना चाहिए. इसके लिए जवाबदेही तय की जानी चाहिए. साथ ही पश्चिमी घाट की तरह अरावली पारिस्थितिकी तंत्र को भी पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ईएसए) घोषित किया जाना चाहिए.
