केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा- हिरासत में सोनम वांगचुक पूरी तरह स्वस्थ

जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की पत्नी की याचिका पर सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि वांगचुक ‘फिट' हैं और उन्हें हिरासत से रिहा करने का कोई मेडिकल कारण नहीं है. बीते सप्ताह शीर्ष अदालत ने उनकी सेहत ठीक न होने के आधार पर केंद्र से उनकी आगे की हिरासत ज़रूरी है या नहीं विचार करने के लिए कहा था.

सोनम वांगचुक. (फ़ाइल फोटोः पीटीआई)

नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने बुधवार (11 फरवरी) को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान बताया कि जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की सेहत ठीक है.

वांगचुक की हिरासत को उनकी पत्नी डॉ. गीतांजलि जे. आंगमो ने हीबियस कॉर्पस याचिका के ज़रिये चुनौती दी है. याचिका में उनकी रिहाई की मांग इस आधार पर की गई है कि उनकी हिरासत संविधान के तहत अवैध और मनमानी है, साथ ही मेडिकल कारण भी बताए गए हैं.

केंद्र सरकार ने जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पीबी वराले की पीठ को बताया कि वांगचुक ‘फिट, स्वस्थ और तंदुरुस्त’ हैं और उन्हें हिरासत से रिहा करने का कोई मेडिकल कारण नहीं है.

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि जेल मैनुअल के अनुसार हिरासत में लिए जाने के बाद से वांगचुक की 28 बार मेडिकल जांच हो चुकी है और उनकी सेहत में कोई चिंताजनक बात नहीं पाई गई है.

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, मेहता ने बताया कि कुछ मामूली समस्याएं, जैसे पाचन से जुड़ी परेशानी ज़रूर दर्ज की गई थीं, लेकिन उसे दूर कर दिया गया है और वे कोई गंभीर चिंता का विषय नहीं हैं. उन्होंने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट के स्वास्थ्य के आधार पर हिरासत की समीक्षा करने के अनुरोध पर केंद्र सरकार ने पूरी गंभीरता से विचार किया, लेकिन उस अनुरोध को आगे बढ़ाया नहीं जा सका.

इससे पहले 4 फरवरी को हुई सुनवाई में जस्टिस कुमार और वराले की पीठ ने कहा था कि वांगचुक की सेहत ठीक नहीं है और केंद्र सरकार को यह विचार करना चाहिए कि उनकी आगे की हिरासत ज़रूरी है या नहीं. उस समय वांगचुक की ओर से अदालत को बताया गया था कि वे गंभीर पाचन संबंधी समस्याओं से जूझ रहे हैं और उन्हें किसी विशेषज्ञ डॉक्टर की देखरेख की ज़रूरत है. तब अदालत ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज से पूछा था कि क्या केंद्र सरकार वांगचुक की निवारक हिरासत जारी रखने पर पुनर्विचार कर सकती है.

सोनम वांगचुक को 26 सितंबर, 2025 को राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए) के तहत हिरासत में लिया गया था. यह कार्रवाई लद्दाख के लेह में राज्य का दर्जा और संवैधानिक सुरक्षा की मांग को लेकर हुए प्रदर्शनों के हिंसक होने के बाद की गई थी. इन झड़पों में चार लोगों की मौत हुई थी और दर्जनों घायल हुए थे. वांगचुक शिक्षा में नवाचार और जलवायु परिवर्तन अभियानों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जाने जाते हैं.

उनकी हिरासत पर दुनिया भर के मानवाधिकार संगठनों का ध्यान खींचा है और उनकी गिरफ़्तारी की परिस्थितियों की समीक्षा की मांग की है.

उनकी रिहाई की मांग वाली याचिका पर शीर्ष अदालत में कई बार सुनवाई हो चुकी है. यह प्रक्रिया अक्टूबर 2025 के अंत से चल रही है, जब अदालत ने आंगमो की याचिका पर लद्दाख प्रशासन और केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया था. मौजूदा कार्यवाही उसी हैबियस कॉर्पस याचिका के तहत हो रही है, जो 3 अक्टूबर 2025 को – लद्दाख में हुए प्रदर्शनों और वांगचुक की हिरासत के एक सप्ताह के भीतर दायर की गई थी.

बुधवार को सरकार के प्रतिनिधियों ने अदालत में दलील दी कि वांगचुक की सेहत किसी विशेष रियायत या रिहाई की मांग नहीं करती और उनकी हिरासत के कारण अब भी वैध हैं. उन्होंने अदालत से कहा कि स्वास्थ्य के आधार पर उनकी जल्द रिहाई पर विचार न किया जाए.

हालांकि, वांगचुक की कानूनी टीम ने बंदी जीवन और पहले से मौजूद चिकित्सीय समस्याओं के चलते उनकी सेहत को होने वाले संभावित ख़तरों का हवाला देते हुए रिहाई की मांग की.

उन्होंने ज़ोर दिया कि निवारक हिरासत किसी बंदी के स्वास्थ्य से समझौता नहीं कर सकती और उचित चिकित्सा सुविधा तक पहुंच सुनिश्चित की जानी चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं, लेकिन बुधवार को याचिका पर कोई आदेश पारित नहीं किया गया.