हाईकोर्ट ने ‘द केरला स्टोरी 2’ की रिलीज़ पर पंद्रह दिनों के लिए रोक लगाई

केरल हाईकोर्ट ने 'द केरल स्टोरी 2 – गोज़ बियॉन्ड' के ख़िलाफ़ दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए फिल्म की रिलीज़ पर अंतरिम रोक लगा दी है. इस फिल्म को पहले 27 फरवरी को सिनेमाघरों में रिलीज़ किया जाना था.

(साभार: यूट्यूब/सनशाइन पिक्चर्स)

नई दिल्ली: केरल उच्च न्यायालय ने गुरुवार (26 फरवरी) को फिल्म ‘द केरला स्टोरी 2-गोज बियॉन्ड’ की रिलीज पर अंतरिम रोक लगा दी है. यह फिल्म इस शुक्रवार 27 फरवरी को सिनेमाघरों में रिलीज होनी थी.

बार एंड बेंच के अनुसार, जस्टिस बी. कुरियन थॉमस ने फिल्म की रिलीज को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर यह आदेश दिया. कोर्ट ने कहा कि पहली नज़र में ऐसा लगता है कि सेंसर बोर्ड ने फिल्म को सर्टिफिकेट देते हुए सोच-समझकर काम नहीं लिया.

इससे पहले बुधवार को हाईकोर्ट ने फिल्म निर्माताओं को निर्देश दिया था कि वे फिल्म को तब तक रिलीज न करें, जब तक कि इसे चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई और निर्णय नहीं हो जाता.

मालूम हो कि जस्टिस बी. कुरियन थॉमस इस संबंध में तीन याचिकाओं पर सुनवाई कर रहे हैं, जिनमें केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) द्वारा जारी प्रमाण पत्र को रद्द करने की मांग की गई है.

इन याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि इस फिल्म के जरिए केरल की छवि को खराब किया जा रहा है. इससे सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ सकता है. याचिकाकर्ताओं की मांग है कि फिल्म के रिलीज से पहले इसकी कोर्ट में स्क्रीनिंग होनी चाहिए. केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने भी इस फिल्म की आलोचना की है.

इस संबंध में वरिष्ठ अधिवक्ता एस श्रीकुमार ने न्यायालय को बताया कि फिल्म इस शुक्रवार, 27 फरवरी को रिलीज होने वाली है और इसके विदेशी वितरण अधिकार (Foreign distribution rights) पहले ही बेचे जा चुके हैं.

इस पर न्यायधीश ने अपनी मौखिक टिप्पणी में कहा, ‘आप इसे अभी टाल सकते हैं. आप न्यायालय को दुविधा में डाल रहे हैं. मैं सुनवाई पूरी होने तक समय दूंगा. आपके पास पर्याप्त समय है, आप बहस कर सकते हैं लेकिन बहस पूरी होने तक इस रिलीज न करें. मैं इस पर कल सुनवाई करूंगा क्योंकि मैं यह नहीं चाहता कि कल याचिकाकर्ता वापस आकर कहें कि आपने बहस पूरे होने से पहले ही फैसला सुना दिया. जब तक न्यायालय की कार्रवाई नहीं हो जाती है तब तक फिल्म के राइट्स न बेचें.’

न्यायाधीश ने कहा कि वे सभी पक्षों की बात सुनेंगे और सुनवाई पूरी होने तक फिल्म की रिलीज स्थगित की जा सकती है.

कोर्ट ने सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन से सवाल पूछा कि आपने फिल्म को UA सर्टिफिकेट दिया है न कि ‘ए’ रेटिंग, जिससे इस विषय की गंभीरता पर सवाल उठता है. फिल्म बनाने वाले खुद भी इसे तुरंत रिलीज करने के लिए बहुत उत्सुक नहीं लग रहे हैं और कोर्ट के पास इतना समय नहीं है कि वह इस मामले की पूरी तरह से गहराई से जांच कर सके.

मालूम हो कि ‘द केरला स्टोरी 2 – गोज़ बियॉन्ड’ विवादित हिंदी फिल्म ‘द केरला स्टोरी’ का सीक्वल है, जिसमें कथित तौर पर केरल की महिलाओं को इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया (आईएसआईएस) में भर्ती करने का चित्रण किया गया था.

यह याचिकाएं सीक्वल को लेकर जारी विवाद के बीच सामने आई हैं, ठीक उसी तरह जैसे पिछली फिल्म को लेकर व्यापक आलोचना का सामना करना पड़ा था, जिसमें महिलाओं के धार्मिक कट्टरपंथ को दर्शाया गया था और राज्य तथा उसके लोगों की छवि पर इसके कथित प्रभाव की बात कही गई थी.

न्यायालय में दायर तीनों याचिकाओं में फिल्म को दिए गए प्रमाणन सर्टिफिकेट को इस आधार पर चुनौती दी गई है कि यह केरल को सांप्रदायिक रंग में रंगती है और कानून-व्यवस्था की स्थिति को बिगाड़ सकती है.

याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि फिल्म का शीर्षक और प्रचार सामग्री राज्य को अनुचित रूप से कलंकित करती है और इस सद्भाव को भंग कर सकती है.

इस मामले में पहली याचिका कन्नूर निवासी श्रीदेव नंबूदरी द्वारा दायर की गई है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि सीक्वल फिल्म की प्रचार सामग्री में हिंसा भड़काने वाले विषय और संवाद शामिल हैं. दूसरी याचिका फ्रेडी वी. फ्रांसिस की है, जिसमें फिल्म की रिलीज पर प्रतिबंध लगाने और शीर्षक में ‘केरल’ शब्द के प्रयोग को चुनौती दी गई है.

वहीं, अधिवक्ता अतुल रॉय द्वारा दायर तीसरी याचिका में भी प्रमाणन को चुनौती दी गई और फिल्म के शीर्षक से ‘केरल’ शब्द हटाने के लिए फिल्म का नाम बदलने के निर्देश देने की मांग की गई है.

याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि सीबीएफसी ने 1952 के सिनेमैटोग्राफ अधिनियम की धारा 5बी के तहत आवश्यक सार्वजनिक व्यवस्था, शालीनता और नैतिकता पर फिल्म के प्रभाव का उचित आकलन नहीं किया और कहा कि फिल्म केरल के लोगों की गरिमा और प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाती है.

याचिकाकर्ताओं के अनुसार, यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और 21 (जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार) के साथ-साथ अनुच्छेद 19(1)(क) का उल्लंघन है, जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर उचित प्रतिबंध प्रदान करता है.

सुनवाई के दौरान न्यायालय ने याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाई गई चिंताओं को प्रथम दृष्टया उचित मानते हुए फिल्म देखने की इच्छा व्यक्त की, क्योंकि पहली फिल्म को ‘सच्ची घटनाओं से प्रेरित’ बताया जा रहा था और इसके शीर्षक में राज्य का नाम प्रमुखता से लिया गया, जबकि सीक्वल की कहानी का केरल से कोई वास्तविक संबंध नहीं है.

हालांकि, फिल्म के निर्माताओं ने न्यायालय से पहले यह तय करने का आग्रह किया कि क्या न्यायालय के समक्ष याचिकाएं सुनवाई योग्य हैं.

निर्माताओं ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ताओं द्वारा मांगी गई राहत दो मिनट के टीज़र के आधार पर नहीं दी जा सकती. उन्होंने कहा कि फिल्म सभी कानूनी बाधाओं को पार कर चुकी है और चूंकि सीबीएफसी ने इसकी रिलीज को मंजूरी दे दी है, इसलिए उच्च न्यायालय अपना मत नहीं दे सकता.

उन्होंने यह भी बताया कि याचिकाएं टीज़र जारी होने के 16 दिन बाद दायर की गई थीं और याचिकाकर्ता ‘केरल की जनता की सामूहिक गरिमा’ का प्रतिनिधित्व करने का दावा नहीं कर सकते.

प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान मलयाली पीड़ितों की अनुपस्थिति पर सवाल 

इस बीच ‘केरला स्टोरी 2’ के निर्माताओं से दिल्ली में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान पत्रकारों ने केरल का अपमान करने का आरोप लगाया क्योंकि मंच पर एक भी ‘मलयाली पीड़िता’ उपस्थित नहीं थी.

इस कार्यक्रम में फिल्म निर्माता विपुल अमृतलाल शाह और निर्देशक कामाख्या नारायण सिंह उपस्थित थे, जिन्होंने  30 महिलाओं का परिचय कराया, जिनके बारे में उनका दावा था कि उन्हें जबरन धर्म परिवर्तन का शिकार होना पड़ा था.

हालांकि इसमें एक भी पीड़िता केरल से नहीं थी, जिस राज्य का नाम फिल्म के शीर्षक में इस्तेमाल किया गया है.