नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में प्रस्तावित बीना ओपनकास्ट कोयला खनन परियोजना के विस्तार को लेकर विवाद गहराता जा रहा है. प्रभावित ग्रामीण इस विस्तार का विरोध कर रहे हैं. उनका कहना है कि पहले से चल रही खदान से ही क्षेत्र के जमीन, पानी और हवा दूषित हो चुके हैं, ऐसे में विस्तार संकट को और बढ़ाएगा.
लेकिन केंद्र सरकार के अधीन आने वाली कोल इंडिया लिमिटेड की सहायक कंपनी नॉर्दर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (एनसीएल) के इस विस्तार का काम तेजी से आगे बढ़ रहा है.
17 मार्च (मंगलवार) को पर्यावरणीय मंजूरी के लिए जरूरी लोक सुनवाई का आयोजन बीना स्टेडियम (सोनभद्र) में किया गया, जिसमें 400 से ज्यादा लोग शामिल हुए.
सरकार की तरफ से एडीएम रमेश चंद्र और उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी आरके सिंह मौजूद रहे. द वायर हिंदी से बातचीत में चंदूआर गांव के प्रभावित ग्रामीण दीनदयाल भारती ने कहा, ‘हम नहीं चाहते कि इस खदान का विस्तार हो. पहले ही हमारा पानी गंदा हो चुका है. हवा गंदा हो चुका है. खदानों के विस्फोट से हमारे घर दरक रहे हैं.’

दीनदयाल ने एडीएम रमेश चंद्र को 300 ग्रामीणों के हस्ताक्षर वाला ‘सुझाव और आपत्ति पत्र’ दिया है. हालांकि, अधिकारी ने उन्हें कोई रिसीविंग (पावती) देने से इनकार कर दिया.
‘सुझाव और आपत्ति पत्र’ में क्या है?
ग्रामीणों द्वारा सौंपा गया ‘सुझाव और आपत्ति पत्र’ केवल औपचारिक आपत्तियों का दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि यह प्रस्तावित बीना ओपनकास्ट परियोजना के विस्तार को लेकर स्थानीय समुदाय की गहरी आशंकाओं, अविश्वास और अनुभवजन्य शिकायतों का एक संगठित बयान है.
पत्र की शुरुआत ही इस बुनियादी सवाल से होती है कि जब पूरी पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) रिपोर्ट सार्वजनिक पटल – जैसे राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की वेबसाइट या ‘परिवेश’ पोर्टल – पर उपलब्ध नहीं है, तो लोक सुनवाई किस आधार पर कराई जा रही है. यह आपत्ति सीधे तौर पर सार्वजनिक परामर्श की पारदर्शिता और वैधानिकता पर प्रश्न खड़ा करती है.
पत्र में बार-बार 2022 में दी गई पर्यावरणीय मंजूरी (ईसी) की शर्तों का हवाला देते हुए पूछा गया है कि उन शर्तों का पालन जमीन पर हुआ भी है या नहीं. उदाहरण के तौर पर, सोलर लाइट लगाने, ग्रामीण इलाकों में पेयजल की पाइपलाइन और आरओ सिस्टम स्थापित करने, सड़कों के निर्माण और चौड़ीकरण जैसे वादों की वर्तमान स्थिति पर स्पष्ट जवाब मांगा गया है. इससे यह संकेत मिलता है कि ग्रामीणों का अनुभव यह रहा है कि पूर्व में किए गए वादे अधूरे हैं, इसलिए वे नए विस्तार पर भरोसा नहीं कर पा रहे हैं.
रोजगार और मुआवजे का मुद्दा भी पत्र के केंद्र में है. ग्रामीणों ने यह जानना चाहा है कि प्रस्तावित विस्तार से कितने लोगों को स्थायी और संविदा रोजगार मिलेगा और उनमें से कितने स्थानीय या विस्थापित परिवारों से होंगे. साथ ही, भूमि अधिग्रहण के बदले दिए जाने वाले मुआवजे की स्थिति, उसमें विभिन्न सामाजिक वर्गों के बीच संभावित अंतर, और पुनर्वास की वास्तविक व्यवस्था पर भी सवाल उठाए गए हैं. यह हिस्सा बताता है कि परियोजना को लेकर आर्थिक लाभ के दावों पर भी समुदाय के भीतर संदेह है.
पत्र में स्वास्थ्य और सुरक्षा से जुड़ी चिंताएं भी प्रमुखता से सामने आती हैं. 24 घंटे हेल्पलाइन, एम्बुलेंस सुविधा, और ब्लास्टिंग से होने वाले नुकसान की रोकथाम जैसे मुद्दों पर भी जवाब मांगा गया है. खास तौर पर विस्फोट के कारण घरों में दरार आने और संरचनात्मक नुकसान की आशंका को लेकर ग्रामीणों ने न्यूनतम दूरी, मुआवजे और राहत के प्रावधानों पर स्पष्टता की मांग की है. यह उन प्रत्यक्ष अनुभवों से जुड़ा है, जिनका जिक्र ग्रामीण पहले से कर रहे हैं.

पर्यावरणीय पहलुओं में, अतिरिक्त वन भूमि के उपयोग, जैव विविधता पर प्रभाव और भूमि उपयोग में बदलाव के सामाजिक-आर्थिक असर को लेकर गंभीर प्रश्न उठाए गए हैं. पत्र में यह विरोधाभास भी रेखांकित किया गया है कि एक ओर ईआईए सारांश में क्षेत्र में संकटग्रस्त प्रजातियों की अनुपस्थिति का दावा किया गया है, वहीं दूसरी ओर भूमि उपयोग परिवर्तन के ‘प्रतिकूल प्रभाव’ स्वीकार किए गए हैं.
ग्रामीण यह जानना चाहते हैं कि इन प्रभावों को कम करने के लिए ठोस योजना क्या है और क्या इसके लिए कोई आधारभूत अध्ययन वास्तव में किया गया था.
इसके अलावा, समग्र प्रभाव के आकलन, जलविज्ञान और भू-जल पर अध्ययन, तथा परियोजना क्षेत्र के भीतर स्थित स्कूलों के पुनर्वास जैसे मुद्दों को लेकर भी जानकारी की कमी पर सवाल उठाए गए हैं. खासतौर पर स्कूलों के स्थानांतरण और बच्चों पर उसके असर को लेकर कोई स्पष्ट योजना सार्वजनिक नहीं होने पर चिंता जताई गई है.
कुल मिलाकर, ‘सुझाव और आपत्ति पत्र’ यह दर्शाता है कि स्थानीय समुदाय केवल पर्यावरणीय जोखिमों को लेकर ही नहीं, बल्कि प्रक्रियात्मक पारदर्शिता, पूर्व वादों के अनुपालन, और अपने सामाजिक-आर्थिक भविष्य को लेकर भी आशंकित है. यह दस्तावेज़ इस बात की ओर इशारा करता है कि लोक सुनवाई महज़ एक औपचारिक प्रक्रिया बनकर रह जाने का खतरा है, जहां समुदाय की बुनियादी जिज्ञासाओं और आपत्तियों का संतोषजनक समाधान अभी तक सामने नहीं आया है.
इस पूरे मामले पर सरकार का पक्ष जानने के लिए द वायर ने उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी आरके सिंह को सवाल भेजे हैं, जिनका जवाब आने पर रिपोर्ट में जोड़ा जाएगा.
क्या है परियोजना?
यह मामला नॉर्दर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (एनसीएल) की बीना ओपनकास्ट कोयला खनन परियोजना के विस्तार से जुड़ा है. यह परियोजना तहसील-दुद्धी, जिला-सोनभद्र (उत्तर प्रदेश) में स्थित है और इसका संचालन सिंगरौली (मध्य प्रदेश) कोलफील्ड क्षेत्र में होता है.
प्रस्ताव के अनुसार परियोजना का क्षेत्रफल 1790.377 हेक्टेयर से बढ़ाकर 2079.221 हेक्टेयर किया जाना है. उत्पादन क्षमता 10.5 मिलियन टन प्रति वर्ष से बढ़ाकर 17.5 मिलियन टन प्रति वर्ष करने की योजना है.
इस विस्तार का असर आसपास के कई गांवों पर पड़ने की आशंका जताई जा रही है. इनमें मिश्रा, कोहरौल, चंदूआर, बड़वानी, भैरवा, जमशीला और बांसी जैसे गांव शामिल हैं.
पहले 26 फरवरी को होनी थी लोक सुनवाई
उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय कार्यालय सोनभद्र की ओर से जारी सार्वजनिक सूचना के अनुसार, इस परियोजना की लोक सुनवाई 26 फरवरी, 2026, सुबह 11 बजे, बीना स्टेडियम, तहसील दुद्धी, सोनभद्र पर आयोजित की जानी थी. लेकिन एक दिन पहले सुनवाई टाल दी गई.
25 फरवरी को अचानक ग्रामीणों को सूचना मिली कि लोक सुनवाई स्थगित कर दी गई है. गांव में एक नोटिस चिपकाया गया, जिसमें सुनवाई टलने की जानकारी दी गई थी. लेकिन ग्रामीणों के अनुसार, नोटिस पर किसी अधिकारी के हस्ताक्षर नहीं थे.

यह नहीं बताया गया कि सुनवाई क्यों टाली गई. न ही कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण दिया गया. ग्रामीणों का कहना है कि इस तरह की सूचना से पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल खड़े होते हैं.
