श्रीनगर: राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) की एक विशेष अदालत ने कहा है कि 2020 में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के एक जिला अध्यक्ष और उनके परिवार के सदस्यों की सनसनीखेज तिहरी हत्या में कथित संलिप्तता के आरोप में गिरफ्तार तीन व्यक्तियों के खिलाफ केस को ‘अभियोजन की अपनी ही गवाह सूची’ ने ‘मूल रूप से कमजोर’ हो दिया. और संदेह का लाभ देते हुए आरोपियों को बरी कर दिया.
जिला एवं सत्र न्यायाधीश बांदीपोरा मीर वजाहत की अदालत ने 11 मार्च को कहा कि इस मामले में बयान देने वाले दो पुलिस अधिकारियों के विरोधाभासी बयान ‘अभियोजन की नैरेटिव का सीधा खंडन’ थे.
अदालत ने कहा कि इन दो अधिकारियों ने ‘गवाहों के बयानों में हेरफेर’ में ‘सीधे तौर पर’ जांचकर्ताओं को फंसाया.
अदालत ने कहा, ‘जब इस मामले के स्थानीय थाने में पूरे एक वर्ष तक तैनात रहे दो पुलिस अधिकारी यह पुष्टि करते हैं कि उन्हें तीनों आरोपियों के बारे में कोई जानकारी नहीं थी, तो अभियोजन द्वारा आरोपियों को कुख्यात ‘ओवर ग्राउंड वर्कर्स’ के रूप में प्रस्तुत करने की नींव स्वयं उसकी गवाह सूची के भीतर से ही कमजोर हो जाती है.’
ज्ञात हो कि ओवर ग्राउंड वर्कर्स अथवा ‘ओजीडब्ल्यू’ शब्द का उपयोग जम्मू-कश्मीर में आतंकवादियों के कथित समर्थकों के खिलाफ दर्ज पुलिस एफआईआर और आरोपपत्रों में किया जाता रहा है.
अपने आरोपपत्र में पुलिस ने कहा था कि आरोपी – अबरार गुलजार खान, मुनीर अहमद शेख और मोहम्मद वकार लोन, जो सभी बांदीपोरा के निवासी हैं – ‘जानबूझकर और इरादतन’ ओजीडब्ल्यू थे, और उन्होंने 8 जुलाई 2020 को भाजपा नेता वसीम बारी तथा उनके पिता और भाई की हत्या में सीधे शामिल चार आतंकवादियों की मदद की.
आरोपपत्र में कहा गया था कि पाकिस्तानी नागरिक अब्दुल उस्मान और सोपोर निवासी सज्जाद अहमद मीर, साथ ही बांदीपोरा के दो अन्य निवासी आबिद राशिद डार और आजाद अहमद शाह, जिन्हें प्रतिबंधित संगठन लश्कर-ए-तैयबा और तहरीक-उल-मुजाहिदीन के सदस्य के रूप में चिह्नित किया गया है, बारी की हत्या में सीधे शामिल थे, जो उस समय भाजपा के जिला अध्यक्ष थे.
हत्या के बाद हुई मुठभेड़ में उस्मान और मीर मारे गए, जबकि पुलिस का मानना है कि डार और शाह आतंकवाद में शामिल होकर फरार हो गए हैं. पुलिस ने खान, शेख और लोन पर कड़े गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) की धारा 39 के तहत मामला दर्ज किया था.
आरोपपत्र में कहा गया था कि इन तीनों ने आतंकवादियों को सुरक्षा बलों और स्थानीय नेताओं की आवाजाही की जानकारी दी और कथित तौर पर उन्हें ‘लॉजिस्टिक सहायता’ तथा ‘सुरक्षित रास्ता’ भी उपलब्ध कराया ताकि हमले को अंजाम दिया जा सके.
हालांकि, अभियोजन पक्ष के मामले में 18 कमियों का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि जांचकर्ता आरोपियों की दोषसिद्धि को कड़े आतंकवाद-रोधी कानून की धारा 39 के तहत साबित करने में विफल रहे.
अदालत ने कहा, ‘किसी आतंकवादी संगठन की गतिविधियों को आगे बढ़ाने की विशिष्ट मंशा – जिसे संसद ने धारा 39 के प्रत्येक उपखंड में स्पष्ट रूप से शामिल किया है – इस अदालत के समक्ष किसी भी विधिसम्मत, विश्वसनीय और ठोस साक्ष्य से स्थापित नहीं की गई है.’
89 पन्नों के फैसले में अदालत ने कहा कि जांचकर्ताओं द्वारा प्रस्तुत परिस्थितिजन्य साक्ष्य ‘कानूनी रूप से अपर्याप्त, प्रक्रियात्मक रूप से दोषपूर्ण, आंतरिक रूप से विरोधाभासी और विशिष्ट आपराधिक मंशा का निष्कर्ष निकालने में असमर्थ’ थे, जिससे ‘जांच प्रक्रिया की निष्पक्षता’ पर ही सवाल उठते हैं.
अदालत ने कहा कि ‘इलेक्ट्रॉनिक तौर पर दिए गए साक्ष्य स्वीकार्य नहीं थे, उनकी जब्ती को लेकर विरोधाभास था, सर्विलांस के मामले में अज्ञात हितों के टकराव की बात सामने आई, किसी खास आतंकवादी संगठनों के बारे में बताने से सरकारी वकील के दो गवाहों ने सार्वजनिक रूप से इनकार कर दिया था, सीसीटीवी पहलू के बारे में भी कुछ स्पष्ट नहीं मिला, और वे किसी ठोस प्रत्यक्ष कृत्य, जिसके आरोपियों पर आरोप लगाए गए थे, उसे स्थापित करने में पूरी तरह अपर्याप्त’ थे.
सरकारी वकील ने कोर्ट को बताया था कि खान के पास से बैन संगठन तहरीक-उल-मुजाहिदीन के छह पोस्टर, शेख के पास से पांच और लोन के पास से तीन पोस्टर, साथ ही दो मोबाइल फोन बरामद किए गए थे.
हालांकि, कम से कम एक मामले में अदालत ने पाया कि अभियोजन के गवाह यह पुष्टि नहीं कर सके कि पोस्टर कहां से बरामद किए गए थे. अदालत ने यह भी नोट किया कि बांदीपोरा के थाना प्रभारी ने एक मोबाइल फोन के बारे में परस्पर विरोधी विवरण दिए.
अदालत ने कहा कि आरोपियों से बरामदगी की प्रक्रिया ‘प्रणालीगत प्रक्रियात्मक विफलताओं’ से भरी हुई थी, जिससे यह साक्ष्य ‘निरर्थक’ हो गया और जांच ‘खामियों और साक्ष्यगत कमजोरियों की सूची’ बनकर रह गई.
अदालत ने कहा, ‘आरोपी वकार से जब्त किए गए दो फोन- एक आईफोन और ज़ायलो हैंडसेट – एक अन्य मामले के संबंध में किसी दूसरी एजेंसी द्वारा ले लिए गए थे और इस अदालत के समक्ष प्रस्तुत नहीं किए गए. उनके डेटा की कभी जांच नहीं की गई,’ और इसे एक ‘स्वतंत्र चिंता का विषय’ बताया.
अदालत ने कहा कि जांच एजेंसी ने तलाशी और जब्ती की कार्यवाही के दौरान दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 100 के तहत मजिस्ट्रेट या स्वतंत्र गवाहों को शामिल नहीं किया. अदालत ने कहा, ‘यह कोई तकनीकी कमी नहीं है जिसे नजरअंदाज किया जा सके, यह एक गंभीर साक्ष्यगत कमी है, जो बरामदगी की प्रक्रिया की विश्वसनीयता की जड़ पर प्रहार करती है.’
अदालत ने कहा कि बांदीपोरा के उस इलाके के इंचार्ज पुलिस अधिकारी से जिरह के दौरान, जहां गोलीबारी हुई थी, ‘दो ऐसी बातें सामने आईं जो अकेले तौर पर और उससे भी कहीं ज़्यादा सामूहिक तौर पर अभियोजन पक्ष के मामले को पूरी तरह से कमज़ोर कर देती हैं.’
जिरह के दौरान, पुलिस अधिकारी ने अदालत को बताया कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 161 के तहत दर्ज उनके बयान का एक हिस्सा, जो आरोपपत्र का हिस्सा था, जांचकर्ताओं द्वारा ‘गलत तरीके से दर्ज’ किया गया था, ताकि यह झूठ दिखाया जा सके कि तीनों आरोपी तहरीक-उल-मुजाहिदीन से जुड़े थे.
जांच में ‘प्रक्रियात्मक चूक’ का उल्लेख करते हुए अदालत ने कहा कि आरोपपत्र सरकार से अभियोजन की स्वीकृति प्राप्त करने से पहले ही दाखिल कर दिया गया था, जबकि यूएपीए के तहत यह अनिवार्य है.
यह स्वीकृति जम्मू-कश्मीर के गृह विभाग द्वारा 14 जनवरी 2021 को दी गई थी, जबकि आरोपपत्र 9 जनवरी 2021 को दाखिल किया गया था.
अदालत ने कहा, ‘स्वीकृति केवल एक औपचारिक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं है; यह एक महत्वपूर्ण सुरक्षा उपाय है, ताकि किसी नागरिक पर कड़े विशेष कानून को लागू करने से पहले एक जिम्मेदार सरकारी प्राधिकरण की स्वतंत्र मंजूरी सुनिश्चित हो सके.’
अदालत ने यह भी कहा कि बांदीपोरा में घटना स्थल से बरामद कारतूसों और उस्मान व मीर से बरामद हथियारों के बीच कोई बैलिस्टिक मिलान नहीं किया गया, जबकि इन दोनों को सुरक्षा बलों ने मुठभेड़ में मार गिराया था और उन पर बारी व उनके परिवार की हत्या में शामिल होने का आरोप था.
अदालत ने कहा कि आरोपियों के खिलाफ ‘कॉल डिटेल रिकॉर्ड (सीडीआर) के अलावा कोई तकनीकी साक्ष्य नहीं था’ और यह भी माना कि सीडीआर साक्ष्य ‘भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 65-बी के तहत आवश्यक प्रमाणपत्र के अभाव में’ स्वीकार्य नहीं है, जिसे जांचकर्ताओं ने प्राप्त नहीं किया था.
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