नई दिल्ली: विदेश मंत्रालय ने शनिवार (16 मई) को सिंधु जल संधि को लेकर पाकिस्तान के साथ विवादों पर मध्यस्थता न्यायालय द्वारा घोषित नवीनतम फैसले को खारिज कर दिया और इसे ‘अमान्य और शून्य’ करार दिया है.
रिपोर्ट के मुताबिक, विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने एक बयान में कहा, ‘अवैध रूप से गठित तथाकथित मध्यस्थता न्यायालय (सीओए) द्वारा 15 मई को जारी फैसला अधिकतम जल संचयन से जुड़ा है और यह सिंधु जल संधि की व्याख्या से संबंधित पहले के फैसले का पूरक है. भारत इस फैसले को उसी तरह खारिज करता है, जैसे पहले के सभी निर्णयों को खारिज किया गया था.’
बयान में आगे कहा गया, ‘भारत ने इस तथाकथित मध्यस्थता न्यायालय को कभी मान्यता नहीं दी है. इसके द्वारा जारी कोई भी कार्यवाही, फैसला या निर्णय मान्य नहीं है.’
भारत ने यह भी दोहराया कि सिंधु जल संधि को स्थगित रखने का उसका फैसला अब भी लागू है.
उल्लेखनीय है कि पिछले साल अगस्त में भारत ने हेग स्थित मध्यस्थता न्यायालय के उस फैसले को भी खारिज कर दिया था, जिसमें कोर्ट ने सिंधु, झेलम और चिनाब नदियों का पानी पाकिस्तान के बेरोकटोक इस्तेमाल के लिए ‘बहने देने’ का निर्देश दिया था—सिवाय कुछ विशेष रूप से परिभाषित परिस्थितियों के—और साथ ही इस्लामाबाद को ‘भारत-विरोधी बयानबाजी’ के खिलाफ चेतावनी भी दी थी.
गौरतलब है कि पिछले साल अप्रैल में पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने घोषणा की थी कि वह 1960 की संधि को ‘तत्काल प्रभाव से स्थगित’ कर रहा है, जब तक कि पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद के लिए अपना समर्थन ‘विश्वसनीय और अपरिवर्तनीय’ रूप से समाप्त नहीं कर देता.
इसके जवाब में पाकिस्तान ने कहा था कि संधि में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो एकतरफा निलंबन की अनुमति देता हो.
बता दें कि हेग स्थित ट्रिब्यूनल की स्थापना विश्व बैंक ने 2016 में पाकिस्तान के अनुरोध पर की थी, हालांकि भारत ने इसके बजाय मामले को किसी तटस्थ विशेषज्ञ के पास भेजने की दलील दी थी.
विश्व बैंक, जिसकी संधि के तहत एक प्रक्रियात्मक भूमिका है, ने शुरू में दोनों प्रक्रियाओं को रोक दिया था, लेकिन 2022 में उसने रोक हटा दी और भारत की आपत्तियों के बावजूद उन्हें एक साथ चलने की अनुमति दे दी.
पहलगाम आतंकी हमले के दो महीने बाद जून में सीओए ने एक प्रक्रियागत फैसला जारी किया था, जिसमें कहा गया था कि संधि को ‘स्थगित’ रखने के भारत के फैसले से ट्रिब्यूनल के अधिकार क्षेत्र पर कोई असर नहीं पड़ेगा.
इसके अलावा पिछले साल अगस्त में भी सीओए ने यह फैसला दिया था कि सिंधु जल संधि के मुख्य हिस्सों की व्याख्या किस तरह की जानी चाहिए; साथ ही पाकिस्तान को आवंटित नदियों पर जलविद्युत परियोजनाओं के डिज़ाइन और संचालन के संबंध में भारत के लिए सीमाएं भी तय की थीं.
