नई दिल्ली: राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) द्वारा हाल ही में एक सर्कुलर जारी किया गया है, जिसमें दफ्तर के समय का सख्ती से पालन सुनिश्चित करने, लंच ब्रेक को नियंत्रित करने और कार्यालय समय के दौरान कर्मचारियों के कैंपस से बाहर जाने पर रोक लगाने की बात कही गई है. इस सर्कुलर ने संस्थान के कुछ फैकल्टी और कर्मचारियों के बीच चिंता पैदा कर दी है. वे इसे संस्थान के भीतर प्रशासनिक नियंत्रण और निगरानी को लगातार बढ़ाए जाने के रूप में देख रहे हैं.
8 मई को दिल्ली स्थित एनसीईआरटी मुख्यालय के सुरक्षा अनुभाग द्वारा जारी इस कार्यालय आदेश में कहा गया है कि कोई भी कर्मचारी सक्षम प्राधिकारी की पूर्व अनुमति के बिना कार्यालय समय के दौरान कैंपस से बाहर नहीं जाएगा. इसके साथ ही गेट पर तैनात सुरक्षाकर्मियों को कर्मचारियों को बिना अनुमति बाहर जाने से रोकने, आवागमन का रिकॉर्ड रखने और किसी भी उल्लंघन की सूचना तुरंत उच्च अधिकारियों को देने का निर्देश दिया गया है.
सर्कुलर में यह भी कहा गया है कि सुबह 9:15 बजे के बाद कार्यालय पहुंचने वाले कर्मचारियों की अनिवार्य रूप से छुट्टी काटी जा सकती है और यदि उनका अवकाश शेष नहीं है, तब वेतन में आनुपातिक कटौती की जाएगी. बार-बार उल्लंघन करने पर केंद्रीय सिविल सेवा (आचरण) नियमों 1964 के तहत अनुशासनात्मक कार्रवाई भी की जा सकती है.
हालांकि आदेश नई दिल्ली स्थित एनसीईआरटी मुख्यालय से जारी किया गया है, लेकिन इसे संस्थान के क्षेत्रीय शिक्षा संस्थानों और अजमेर, भोपाल, भुवनेश्वर, मैसूरु, शिलॉन्ग और नेल्लोर स्थित घटक इकाइयों को भी भेजा गया है.
बढ़ती निगरानी!
पहचान जाहिर न करने की शर्त पर द वायर हिंदी से बात करने वाले एक फैकल्टी ने आरोप लगाया कि यह सर्कुलर संस्थान के भीतर ‘बढ़ती निगरानी और प्रशासनिक प्रतिबंधों के व्यापक पैटर्न’ को दर्शाता है.
उन्होंने कहा, ‘ऐसे पत्र समय-समय पर आते रहते हैं, लेकिन भाषा और नियंत्रण के लिहाज से यह शायद सबसे सख्त पत्रों में से एक है. प्रशासन अब लगातार ‘सिक्योरिटी आर्किटेक्चर’, ‘मूवमेंट मॉनिटरिंग’ और ‘एडमिनिस्ट्रेटिव कंट्रोल’ जैसी शब्दावली का इस्तेमाल कर रहा है. आम तौर पर किसी शैक्षणिक संस्थान से इस तरह की भाषा की अपेक्षा नहीं की जाती है.’
उन्होंने आरोप लगाया कि निगरानी और पाबंदियां अब केवल कार्यालय उपस्थिति और आवागमन तक सीमित नहीं रह गई हैं. उन्होंने इसे कर्मचारियों और शिक्षकों के बीच बढ़ती ‘डर और धमकाने की संस्कृति’ बताया.
द वायर हिंदी ने कुछ अन्य कर्मचारियों से भी संपर्क किया, लेकिन वे प्रशासनिक कार्रवाई, तबादले या अनुशासनात्मक कार्यवाही के डर से सार्वजनिक रूप से बोलने से हिचकते दिखे.
एक अन्य फैकल्टी ने कहा, ‘डर यह है कि अगर घटनाओं का जिक्र गुमनाम रूप से भी किया जाए, तब भी संस्थान के भीतर लोगों की पहचान उजागर हो सकती है क्योंकि यहां सब कुछ बहुत नियंत्रित तरीके से संचालित होता है, और लगभग सब को यह पता ही है कि कौन क्या बोल सकता है.’
क्या कहा गया है सर्कुलर में
सर्कुलर में कहा गया है कि एनसीईआरटी प्रशासन ने ‘गंभीर चिंता’ के साथ यह देखा है कि अधिकारी और कर्मचारी, जिनमें संविदा और आउटसोर्स व्यवस्था के तहत कार्यरत लोग भी शामिल हैं, ‘कार्यालय समय, लंच ब्रेक एवं परिषद परिसर से बाहर जाने से संबंधित निर्धारित नियमों का बार-बार उल्लंघन कर रहे हैं.’
इसमें आगे कहा गया है कि सुरक्षा अनुभाग द्वारा की गई निगरानी में बिना पूर्व अनुमति के गेट संख्या 1, 2 और 3 से कर्मचारियों के अनधिकृत रूप से बाहर जाने के मामले सामने आए हैं.

इन गतिविधियों को संस्थान के कामकाज के लिए खतरा बताते हुए सर्कुलर में कहा गया है कि इस तरह की गतिविधियां ‘कार्यालय अनुशासन का गंभीर उल्लंघन हैं, प्रशासनिक नियंत्रण को कमजोर करती हैं तथा परिषद की सुरक्षा व्यवस्था एवं प्रवेश नियंत्रण प्रणाली के लिए संभावित खतरा उत्पन्न करती हैं.’
‘परिसर से बाहर जाने पर प्रतिबंध’ शीर्षक वाले हिस्से में कहा गया- ‘किसी भी अधिकारी/कर्मचारी को कार्यालय समय के दौरान परिषद परिसर छोड़ने की अनुमति नहीं होगी, जब तक कि उसे विभागाध्यक्ष/विभाग के प्रमुख/सेक्शन प्रमुख या सक्षम प्राधिकृत व्यक्ति से पूर्व लिखित/संचालित अनुमति प्राप्त न हो.’
आदेश में सुरक्षाकर्मियों को यह अधिकार भी दिया गया है कि वे बिना अनुमति कर्मचारियों को कैंपस से बाहर जाने से रोक सकें. साथ ही उन्हें ‘जहां आवश्यक हो, आवागमन का समुचित रिकॉर्ड बनाए रखने’ और ‘किसी भी उल्लंघन की सूचना तत्काल उच्च अधिकारियों को देने’ का निर्देश दिया गया है.
सर्कुलर में यह भी कहा गया है कि यदि कोई कर्मचारी सुबह 09:15 बजे के बाद कार्यालय आता है, तब उसकी कैजुअल लीव (सीएल) अनिवार्य रूप से काटी जाएगी; अगर यह अवकाश उपलब्ध नहीं है तो अर्जित अवकाश (Earned Leave) काटी जाएगी; यदि छुट्टी का कोई बैलेंस नहीं है, तब वेतन में आनुपातिक कटौती लागू की जाएगी.
सर्कुलर में उल्लंघन करने वालों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई का भी प्रावधान किया गया है, जिसमें औपचारिक चेतावनी, आधिकारिक रिकॉर्ड में प्रविष्टि के साथ लिखित चेतावनी और कारण बताओ नोटिस जारी करना शामिल है. इसमें कहा गया है कि बार-बार उल्लंघन करने पर सीसीएस आचरण नियमों 1964 के तहत कार्रवाई और ‘दोष की गंभीरता’ के आधार पर दंड भी दिया जा सकता है.
आदेश के अंत में कहा गया है कि नियमों का पालन न करना ‘गंभीर कदाचार’ माना जाएगा, जिसके लिए ‘बिना किसी अतिरिक्त सूचना के कड़ी प्रशासनिक एवं अनुशासनात्मक कार्रवाई’ की जाएगी.
नियंत्रण की चाह
फैकल्टी के सदस्यों ने सवाल उठाया कि ‘क्या इस तरह के सुरक्षा-केंद्रित प्रशासनिक उपाय किसी शैक्षणिक और शोध संस्थान की कार्यप्रणाली के अनुकूल हैं.’
एक फैकल्टी ने कहा, ‘यह मामला अब केवल उपस्थिति या समयपालन तक सीमित नहीं रह गया है.’ उन्होंने आगे जोड़ा, ‘बड़ी चिंता यह है कि क्या अकादमिक संस्थानों को अब शैक्षणिक स्वतंत्रता और सहयोग आधारित कार्यसंस्कृति के बजाय निगरानी और नियंत्रण के तंत्रों के जरिए संचालित किया जा रहा है.’
इस आदेश पर डिजिटल हस्ताक्षर प्रभात कुमार मिश्रा के हैं, जिन्हें दस्तावेज़ में एनसीईआरटी का मुख्य सतर्कता अधिकारी बताया गया है.
‘यह सर्कुलर विक्टोरियन है’
द वायर हिंदी से पहचान गुप्त रखने की शर्त पर बात करते हुए एनसीईआरटी के एक फैकल्टी ने इस सर्कुलर को ‘विक्टोरियन’ बताते हुए इसकी भाषा और तरीके की तुलना औपनिवेशिक दौर से की.
फैकल्टी ने कहा, ‘यह सर्कुलर विक्टोरियन है. इसकी भाषा को देखिए. इसका मकसद सिर्फ यहां काम करने वाले लोगों के बीच डर पैदा करना है.’ उन्होंने आगे कहा, ‘इस जगह का माहौल आज जितना शत्रुतापूर्ण है, उतना पहले कभी भी नहीं रहा है. अगर एनसीईआरटी के निदेशक कहीं आ जाएं, तब लोग वहां से भागने लगते हैं.’
फैकल्टी ने तर्क दिया कि यह सर्कुलर संस्थागत अनुशासन को सुधारने के बजाय अकादमिक कामकाज को प्रभावित करेगा.
उन्होंने कहा, ‘हम कॉरपोरेट कर्मचारी या फैक्ट्री वर्कर नहीं हैं. हम अकादमिक वर्ग हैं. हमें काम करने के लिए एक स्वतंत्र मानसिक वातावरण की जरूरत होती है. और अगर हमें हर समय अपने केबिन तक सीमित कर दिया जाएगा, तो हम ठीक से काम नहीं कर पाएंगे. इससे सिर्फ हमारी कार्यक्षमता प्रभावित होगी और हमारे भीतर डर पैदा होगा.’
प्रशासन द्वारा समयपालन और मूवमेंट मॉनिटरिंग (आवाजाही पर निगरानी) पर दिए जा रहे जोर पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि कई शिक्षक नियमित रूप से तय कार्यालय समय से अधिक काम करते हैं, लेकिन उसका कोई संज्ञान नहीं लिया जाता.
वह कहते हैं, ‘लगभग हर फैकल्टी सदस्य कार्यालय समय के बाद भी काम करता है. कई लोग देर शाम तक काम करते हैं और बहुत से लोग काम घर लेकर जाते हैं. अगर कोई सुबह 9:15 बजे तक दफ्तर नहीं पहुंचता है तो उसे दंडित किया जाएगा.. लेकिन हम जो अतिरिक्त घंटे काम करते हैं, उसका क्या?’
उन्होंने ने यह भी आरोप लगाया कि पिछले कुछ वर्षों में संस्थान का माहौल अधिक पाबंदियों वाला हो गया है.
उन्होंने कहा, ‘पहले लोग अलग-अलग प्रकाशनों में लेख और विचार लिखा करते थे. लेकिन नए निदेशक प्रो. दिनेश प्रसाद सकलानी की नियुक्ति के बाद फैकल्टी को लिखने की अनुमति नहीं है.’ उन्होंने आगे जोड़ा, ‘अब किसी सम्मेलन में भी शामिल होने के लिए भी कई स्तरों से अनुमति लेनी पड़ती है. इस तरह की पाबंदियां लोगों का दम घोंट रहीं हैं.’
फैकल्टी ने यह भी दावा किया कि तबादलों और ‘जबरन स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति’ का इस्तेमाल संस्थान के भीतर असहमति रखने वाली आवाजों को ख़ामोश करने के लिए किया जा रहा है.
द वायर हिंदी ने कुछ अन्य शिक्षकों से भी बात की, लेकिन उन्होंने प्रशासनिक कार्रवाई के डर का हवाला देते हुए, यहां तक कि गुमनाम रूप से भी बयान दर्ज किए जाने से इनकार कर दिया.
द वायर हिंदी द्वारा एनसीईआरटी के मुख्य सतर्कता अधिकारी प्रभात कुमार मिश्रा और निदेशक प्रो. दिनेश प्रसाद सकलानी को कुछ सवाल भेजे गए थे. हालांकि, रिपोर्ट के प्रकाशित होने तक उन्होंने जवाब नहीं दिया है.
