देश में इस समय दो चीज़ें सबसे तेज़ दौड़ रही हैं- पेट्रोल-डीज़ल के दाम और सरकार के विज्ञापन. फर्क बस इतना है कि पेट्रोल जनता की जेब जलाकर ऊपर जा रहा है और विज्ञापन जनता की आंखों में विकास का धुआं छोड़कर. बाकी दोनों का लक्ष्य एक ही है जनता को यह समझाना कि कष्ट ही राष्ट्रनिर्माण का असली ईंधन है. जितना अधिक दर्द, उतना अधिक विकास. अब तो हालत यह है कि यदि जेब में पैसे बच जाएं तो आदमी को खुद पर संदेह होने लगता है कि कहीं वह राष्ट्रहित में पर्याप्त योगदान दे पाने में असमर्थ तो नहीं है.
मीडिया के हमारे प्रतिष्ठित साथी भी इस समय कठिन तपस्या में लीन हैं. वे टीवी स्क्रीन पर ऐसे बैठे रहते हैं जैसे राष्ट्र ने उन्हें ‘सत्य छिपाने’ का संवैधानिक दायित्व सौंप दिया हो. पेट्रोल सौ पार कर जाए, डीज़ल डेढ़ सौ की ओर प्रस्थान कर दे, सब्ज़ियों के दाम ऐसे उछलें जैसे उन्हें एशियाई खेलों में भाग लेना हो मगर एंकर महोदय की चिंता इस बात पर केंद्रित रहती है कि विपक्ष ने राष्ट्रगान के दौरान कितनी देर ताली बजाई और कौन-सा नेता चुपचाप विदेश क्यों चला गया.
उन्हें सब मालूम है कि पेट्रोल/डीजल की कीमत वृद्धि सिर्फ गाड़ी तक सीमित नहीं रह जाता. वह धीरे-धीरे आलू, टमाटर, दाल, दूध, स्कूल फीस, सिलेंडर और किराये में प्रविष्ट हो जाता है. मगर इस विषय पर उनका मौन इतना पवित्र हो चुका है कि ऋषि-मुनि भी उसे देखकर सन्यास पर पुनर्विचार करने लगें. कभी-कभी तो लगता है कि न्यूज़ चैनलों के स्टूडियो अब पत्रकारिता के केंद्र नहीं, सरकारी योग शिविर हैं, जहां ‘महंगाई प्राणायाम’ सिखाया जाता है; महंगाई को देखो, महसूस करो, उससे पीड़ित हो जाओ, मगर प्रश्न मत पूछो.
गांवों में पहले किसान आसमान देखकर खेती का अनुमान लगाते थे. अब पेट्रोल का भाव देखकर तय करते हैं कि इस महीने दाल बनेगी या केवल राष्ट्रभक्ति से पेट भरना होगा. शहर का मध्यम वर्ग तो और भी आध्यात्मिक हो चुका है. वह पेट्रोल पंप पर गाड़ी कम और आत्मसम्मान ज्यादा भरवाने जाता है. आदमी अब लीटर नहीं पूछता, पहले यह पूछता है कि ‘भाई साहब, इतने में आदमी बच जाएगा न?’
पेट्रोल पंप भी अब किसी प्रतियोगी परीक्षा केंद्र जैसे लगने लगे हैं. आदमी भीतर उम्मीद लेकर जाता है और बाहर आकर जीवन का कठोर यथार्थ समझता है. पहले लोग टंकी फुल करवाते थे, अब ‘दो सौ का डाल दो’ कहते समय आवाज़ धीमी कर लेते हैं ताकि पीछे खड़ा दूसरा व्यक्ति उनकी आर्थिक स्थिति पर हंस न दे या फिर उनकी देशभक्ति पर संदेह न कर बैठे. अब तो पेट्रोल भरवाने के बाद लोग मशीन की ओर उसी भय से देखते हैं जैसे अस्पताल में मरीज अपनी मेडिकल रिपोर्ट देखता है.
सरकार ने भी जनता को समझाने का अद्भुत तरीका खोज लिया है. अब यदि पेट्रोल महंगा हो तो समझिए विदेश नीति मजबूत हो रही है. डीज़ल और महंगा हो जाए तो मान लीजिए भारत विश्वगुरु बनने की दिशा में निर्णायक कदम उठा चुका है. और यदि गैस सिलेंडर की कीमत इतनी हो जाए कि रसोई में चूल्हा जलाना विलासिता लगने लगे, तो इसे ‘आत्मनिर्भर भारत’ की ऐतिहासिक उपलब्धि माना जाएगा. आखिर आत्मनिर्भर वही होता है जो बिना खाना खाए भी जीवित रहने की क्षमता विकसित कर ले.
इधर जनता राशन का हिसाब लगा रही है और उधर सरकार विदेशी नेताओं के फोन कॉल के विज्ञापन छपवा रही है. जैसे देश की सबसे बड़ी उपलब्धि यही हो कि व्हाइट हाउस से घंटी बजी और दिल्ली में सरकारी बैंड पार्टी निकल पड़ी कि सुनो- सुनो अमरीका वाला अपने वाले का बड़का फैन है. जल्द ही सूचना विभाग शायद यह विज्ञापन जारी करे-
‘प्रिय नागरिकों, पेट्रोल महंगा अवश्य हुआ है, किंतु गर्व कीजिए कि अपने वाले की चर्चा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हो रही है. कुछ देशों के पास प्राकृतिक संसाधन हैं, कुछ के पास लोकतंत्र; हमारे पास महंगा वाला नेता है और उसके विज्ञापन हैं.’
सरकार का विज्ञापन विभाग इस देश की उन अद्भुत संस्थाओं में है जो वास्तविकता से नहीं, उसकी रंगीन फोटो-कॉपी से काम चलाती हैं. देश में बेरोज़गारी हो सकती है, महंगाई हो सकती है, नौजवान प्रतियोगी परीक्षाओं और उम्र सीमा के बीच फंसकर बूढ़े हो सकते हैं, मगर सरकारी विज्ञापन में हर नागरिक ऐसा चमकता दिखेगा जैसे राष्ट्र ने उसे अभी-अभी ‘सर्वश्रेष्ठ संतुष्ट प्राणी’ पुरस्कार दिया हो.
किसान विज्ञापन में ऐसे मुस्कुराता है मानो खेत में फसल नहीं, सीधे स्विस बैंक का लॉकर उग आया हो. उसकी धोती पर मिट्टी कम और समृद्धि अधिक दिखाई जाती है. वह ट्रैक्टर पर हाथ रखकर ऐसी आत्मीय मुस्कान देता है जैसे डीज़ल के दाम नहीं बढ़े हों, बल्कि सरकार हर सुबह उसके खेत में मुफ्त इत्र का छिड़काव कर रही हो. वास्तविक किसान उधर डीज़ल खरीदने से पहले कैलकुलेटर देखता है और इधर विज्ञापन में वही किसान ड्रोन तकनीक से भविष्य की खेती कर रहा होता है.
गृहिणी गैस सिलेंडर को ऐसे निहारती दिखाई जाती है जैसे वह रसोई का सामान नहीं, परिवार का सबसे संस्कारी सदस्य हो. सिलेंडर घर में आते ही बच्चों का मनोबल बढ़ जाता है, पड़ोसी देशों की चिंता गहरा जाती है और पृष्ठभूमि में बांसुरी बजने लगती है. वास्तविक जीवन में वही सिलेंडर बुक करवाते समय परिवार का बजट शहीद हो जाता है, मगर विज्ञापन में वह आत्मनिर्भरता का ‘लाल कमल’ बनकर कमाल का दमकता रहता है.
मीडिया के हमारे प्रतिष्ठित साथी भी बड़ी गंभीर मुद्रा में स्क्रीन पर बैठते हैं. चेहरे पर वही भाव जैसे अभी-अभी उन्होंने राष्ट्रहित में न्यूटन का चौथा नियम खोज निकाला हो- ‘पेट्रोल का हर बढ़ता दाम देशभक्ति में परिवर्तित होता है.’ फिर बड़ी शांति से बताया जाता है कि अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियाँ कठिन हैं, वैश्विक संकट है, तेल बाज़ार अस्थिर है, चंद्रमा की दिशा ठीक नहीं है और मंगल का गोचर भी शायद विपक्षी मानसिकता से प्रभावित है.
मध्यवर्ग की हालत सबसे दिलचस्प है. वह हर महीने बजट बनाता है और हर महीने बजट उससे बदला ले लेता है. पहले लोग बैंक बैलेंस देखकर भविष्य की योजना बनाते थे, अब पेट्रोल पंप पर मीटर देखकर जीवन-दर्शन बदल लेते हैं. आदमी पांच सौ रुपये का पेट्रोल भरवाकर उसी श्रद्धा से गाड़ी स्टार्ट करता है जैसे किसी मंदिर में विशेष दर्शन का टिकट कटवाया हो.
और सच पूछिए तो इस देश में महंगाई अब अस्थायी समस्या नहीं रही. उसे सांस्कृतिक विरासत घोषित कर देना चाहिए. जैसे पुराने किले, ऐतिहासिक स्मारक और चुनावी वादे संरक्षित किए जाते हैं, वैसे ही महंगाई को भी राष्ट्रीय धरोहर का दर्जा मिलना चाहिए. आने वाली पीढ़ियों को इतिहास की किताबों में पढ़ाया जाएगा कि एक दौर ऐसा था जब लोग पेट्रोल नहीं खरीदते थे, बल्कि अपनी औकात की मासिक जांच करवाते थे.
संभव है आगे चलकर शोधार्थी यह निष्कर्ष निकालें कि इक्कीसवीं सदी के भारत में नागरिक दो चीज़ों से सबसे अधिक प्रेरित होता था; राष्ट्रवाद और रसोई गैस की कीमत. दोनों में समानता यह थी कि दोनों पर सवाल पूछना सामाजिक जोखिम माना जाता था. और तब शायद इतिहास यह दर्ज करेगा कि इस देश की सबसे बड़ी उपलब्धि चंद्रयान नहीं थी, बल्कि यह थी कि जनता लगातार महंगाई झेलते हुए भी सरकारी विज्ञापनों में मुस्कुराना नहीं भूली.
(लेखक राष्ट्रीय जनता दल के राज्यसभा सदस्य हैं.)
(मूल रूप से एक्स पर प्रकाशित)
