उत्तर प्रदेश: विधानसभा चुनाव से पहले की सुगबुगाहट क्या कह रही है?

अगले साल देश की सबसे ज्यादा जनसंख्या और लोकसभा व विधानसभा सीटों वाले राज्य उत्तर प्रदेश में चुनाव होने हैं. भले ही तब भाजपा का उत्तर प्रदेश में पहली बार कमल खिलाने की पश्चिम बंगाल जैसी चुनौती से सामना नहीं होगा, पर चूंकि वह नरेंद्र मोदी सरकार और 18वीं लोकसभा के कार्यकाल के लगभग मध्य का समय होगा, इसलिए प्रेक्षक चुनाव नतीजों को अगले लोकसभा चुनावों के सेमीफाइनल के रूप में देखेंगे.

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(फोटो साभार: फेसबुक/@MYogiAdityanath)

भारतीय जनता पार्टी द्वारा पश्चिम बंगाल में पहली बार कमल खिलाने की अपनी महत्वाकांक्षा पूरी करने के लिए चुनाव तो चुनाव, चुनाव आयोग समेत कई संवैधानिक व वैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता की बलि चढ़ा देने के बाद इस बाबत शायद ही किसी को कोई संदेह रह गया हो कि अगले साल देश की सबसे ज्यादा जनसंख्या और लोकसभा व विधानसभा सीटों वाले राज्य उत्तर प्रदेश में अपनी ‘नई’ पताका फहराने के लिए वह कितनी हदों से गुजर और कितने नए अंदेशे पैदा कर उसे कितने और प्रश्नों के हवाले कर सकती है.

बहरहाल, हम जानते हैं कि जैसे इस साल असम, केरल, तमिलनाडु और केंद्र शासित पुडुचेरी के साथ पश्चिम बंगाल विधानसभा के चुनाव हुए, अगले साल मार्च में उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और हिंसा से ग्रस्त मणिपुर के साथ उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव होंगे. भले ही तब भाजपा का उत्तर प्रदेश में पहली बार कमल खिलाने की पश्चिम बंगाल जैसी चुनौती से सामना नहीं होगा, चूंकि वह नरेंद्र मोदी सरकार और 18वीं लोकसभा के कार्यकाल के लगभग मध्य का समय होगा, इसलिए प्रेक्षक चुनाव नतीजों को अगले लोकसभा चुनावों के सेमीफाइनल के रूप में देखेंगे.

ऐसे में यह मानने के कारण हैं कि भाजपा ऐसी किसी भी ‘शिथिलता’ का जोखिम कतई नहीं उठाएगी, जिससे खराब नतीजों की बिना पर लोकसभा चुनाव की उसकी संभावनाओं को ग्रहण लगाने वाला कोई नैरेटिव गढ़ा या प्रचारित किया जा सके.

हां, चुनाव जीतने के लिए उस पर कितने भी नीचे जा गिरने का नैरेटिव चस्पां कर दिया जाए, उसको कोई फर्क नहीं पड़ने वाला क्योंकि अब उसके समर्थक उसकी इस तरह की गिरावटों को उसकी बढ़ती शक्ति व सामर्थ्य के रूप में देखने लगे हैं.

कहां गई लोकलाज?

उत्तर प्रदेश के संदर्भ में इसे इस तरह देख व समझ सकते हैं कि समाजवादी नेता डॉ. राममनोहर लोहिया (जिनका वह गृह राज्य है) प्रायः कहा करते थे कि लोकतंत्र में लोकलाज की इतनी बड़ी भूमिका होती है कि उसके बगैर वह लोकतंत्र ही नहीं रह जाता. लेकिन आज भाजपा के लोकलाजविहीन नेताओं से लेकर कार्यकर्ताओं तक सभी छाती ठोंककर कह रहे हैं कि अब चिंता की क्या बात है, जैसे पश्चिम बंगाल जीत लिया, उत्तर प्रदेश भी जीत लेंगे. पश्चिम बंगाल सबको छकाकर जीता तो उत्तर प्रदेश चुटकियां बजाकर जीत लेंगे.

गौरतलब है कि वे ऐसा तब कह रहे हैं, जब पश्चिम बंगाल के विपरीत ‘असुविधाजनक’ मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से कटवाकर नतीजे अपने पक्ष में कर लेने का विकल्प उत्तर प्रदेश में उनके पास रह ही नहीं गया है. क्योंकि पश्चिम बंगाल में मतदाता सूचियों का जो विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) विधानसभा चुनाव के साथ-साथ चल रहा था, उत्तर प्रदेश में चुनाव की घोषणा से पहले ही निपट गया है.

हां, उसमें हुई ‘गड़बड़ियों’ को लेकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का लहजा उतना ही शिकायती रहा है, जितना पश्चिम बंगाल में हुई गड़बड़ियों को लेकर वहां की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का.

हां, केंद्रीय बलों की पश्चिम बंगाल जैसी कहें या मनमाफिक तैनाती का विकल्प यूपी में भी खुला है, लेकिन उसमें भी एक मुश्किल है. यह कि इससे वे तोहमतें जो पश्चिम बंगाल में इस तैनाती का आधार मजबूत करने के लिए ममता की सरकार पर लगाई गई थीं, योगी सरकार पर लगने लग जाएंगी. यह इस लिहाज से बहुत नुकसानदेह होगा कि पश्चिम बंगाल में जो एंटी-इनकम्बेंसी ममता बनर्जी के साथ थी, यूपी में योगी आदित्यनाथ के साथ है. फर्क सिर्फ इतना है कि ममता की एंटी-इनकम्बेंसी पंद्रह साल की थी, जबकि योगी की दस साल की ही है.

यहां स्थिति के इस पहलू को भी याद रखना होगा कि उत्तर प्रदेश की मुख्य विपक्षी पार्टी सपा के सुप्रीमो अखिलेश यादव कई बार कह चुके हैं कि चुनाव आयोग की मिलीभगत से पुलिस व सुरक्षाबलों का दुरुपयोग करके अपने ‘विरोधी’ मतदाताओं को मतदान से जबरन रोककर जीत हासिल करने की भाजपाई हिकमत का पश्चिम बंगाल से पहले उत्तर प्रदेश विधानसभा के उपचुनावों में ही ‘ट्रायल’ हुआ था. यह ट्रायल पूरी तरह सफल रहने के बाद निश्चिंत होकर उसका पश्चिम बंगाल में प्रयोग किया गया.

अकारण नहीं कि ऐसे में कई जानकार चुटकी लेने के अंदाज में खुलकर कह रहे हैं कि भाजपा के लिए चुनाव आयोग के इस्तेमाल का रास्ता अपनाना ही ‘सबसे निरापद और मुफीद’ है. कारण? एक तो वह न सिर्फ मतदान प्रक्रिया के बीच बल्कि मतगणना तक जारी रह सकता है.

दूसरे, उसके जरिए योगी सरकार आदर्श चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन में आरोपित होने के किसी भी अंदेशे से परेशान हुए बगैर किसी भी वक्त मनपसंद मतदाताओं के खाते में नकदी भेजकर उनको अपने पक्ष में करने की राह पकड़ सकती है. बिहार व असम जैसे राज्यों में भाजपा व उसके गठबंधन के मुंह पहले से इसका खून लगा हुआ है.

‘हिंदुत्व’ काम आएगा?

लेकिन जहां तक भाजपा के हिंदुत्व के एजेंडे की बात है, अयोध्या में नवनिर्मित राम मंदिर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के बाद हुए गत लोकसभा चुनाव में उसे भुनाने की अनेक कोशिशों के बावजूद फैजाबाद (जिसमें अयोध्या स्थित है) समेत लोकसभा की प्रदेश की आधी से ज्यादा सीटें हार जाने का पार्टी के लिए एक बड़ा संकेत यह है कि अब हिंदुत्व वोट नहीं भी दिला सकता.

वैसे भी 2014 के लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनाव (जिनमें नरेंद्र मोदी की लहर और अखिलेश सरकार के प्रति एंटी-इनकम्बेंसी के कारण भाजपा का भरपूर जलवा दिखा था) के बाद इस प्रदेश में चुनाव दर चुनाव उसकी जीती सीटें घटती ही गई हैं.

गत लोकसभा चुनाव में तो वह क़रारी हार की शिकार हो गई और गत विधानसभा चुनाव में भले ही अपनी प्रदेश सरकार बचा ले गई थी, उसके गठबंधन की सीटें 2017 की 325 के मुकाबले घटकर 273 हो गई थीं. गत लोकसभा चुनाव में वह प्रदेश की 80 में आधी से ज्यादा सीटें हारकर सिर्फ 33 जीत पाई थी, जबकि 2014 के लोकसभा चुनाव में उसके गठबंधन ने जो 73 सीटें जीती थीं, 2019 में वे भी घटकर 62 हो गई थीं.

यानी अब हिंदुत्व का कार्ड बहुत भरोसेमंद नहीं रह गया है क्योंकि कभी काम आता है और कभी दूसरे मुद्दों व समीकरणों के समक्ष ढेर हो जाता है. तिस पर अब उसे कई तरह के अंतर्विरोधों और असंतोषों का सामना भी करना पड़ रहा है.

फिर भी एक आकलन यह है कि ‘धर्मयुद्ध’ हुआ यानी किसी तरह हिंदुत्व का एजेंडा चल गया तो भाजपा फिर से यूपी फतह कर सकती है. लेकिन लड़ाई दूसरे मुद्दों तक जाकर (भाजपा के ही शब्दों में कहें तो) ‘जातियुद्ध’ में बदल गई (जिसकी इस प्रदेश में परंपरा रही है) तो नतीजे भाजपा को ‘मिले मुलायम कांशीराम’ के दौर की याद दिलाने वाले भी हो सकते हैं.

‘राम’ से मुकाबला!

यहां एक प्रेक्षक की यह बात भी काबिल-ए-गौर है कि राहुल, अखिलेश व मायावती ने राहुल के आर, अखिलेश के ए और मायावती के एम को मिलाकर ‘राम’ का रूप धारण कर लिया तो अभी मजबूत दिख रही भाजपा का विजयरथ दल-दल में फंस जाएगा.

चर्चा है कि राहुल ने इस ‘राम’ के लिए कोशिशें शुरू कर रखी हैं, लेकिन अभी बात इसकी राह की बाधाएं दूर करने तक ही पहुंची है और कांग्रेस के एससी-एसटी विभाग के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेंद्र पाल गौतम व प्रदेश अध्यक्ष सांसद तनुज पुनिया की मायावती से मिलने की कोशिश विफल होने से उसको झटका भी लगा है.

दूसरी ओर मायावती पहले ही घोषणा कर चुकी हैं कि वे किसी भी दल से गठबंधन नहीं करेंगी और उनकी पार्टी अकेली ही चुनाव मैदान में जाएगी.

लेकिन यह लगभग तय है कि सत्ता की दावेदार दोनों बड़ी पार्टियां (भाजपा और सपा) गठबंधन की राह पर ही चलेंगी और चाहेंगी कि उनके गठबंधन का सामाजिक आधार प्रतिद्वंद्वी के गठबंधन के सामाजिक आधार से हर हाल में बड़ा हो. स्वाभाविक ही उसे ‘बड़ा’ करने में सीमित प्रभाव वाले छोटे-छोटे दल अपने लिए अवसर तलाशेंगे और अपनी भूमिका को बड़ी और महत्वपूर्ण बनाना चाहेंगे.

फिलहाल, गत लोकसभा चुनाव की अपनी जीत के आईने में सपा अपने पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) के नारे और इंडिया (दूसरे शब्दों में कहें तो सपा-कांग्रेस) गठबंधन को हवा का रुख मोड़ देने वाले अजेय सामाजिक समीकरण के रूप में देख रही है.

इधर नई जमीन तोड़ने में लगे उसके सुप्रीमो अखिलेश लगातार यह संदेश देने का प्रयास कर रहे हैं कि वे पार्टी के पुराने एमवाई (मुस्लिम-यादव) समीकरण को बहुत पीछे छोड़ आए हैं और उसको महिलाओं समेत सामाजिक न्याय के आकांक्षी सभी तबकों की उम्मीदों की केंद्र बनाने में लगे हैं.

उनके मुताबिक गठबंधन में ‘जीत की योग्यता’ ही सीटों के बंटवारे व उम्मीदवारों के चयन का सबसे बड़ा आधार होगी और उसमें अहंकार के लिए कोई जगह नहीं होगी. पश्चिमी और मध्य उत्तर प्रदेश की कुछ सीटों पर कांग्रेस के उम्मीदवार सपा के चुनाव चिह्न पर भी लड़ सकते हैं.

सपा का अभियान

अखिलेश ने अपना चुनाव अभियान कोई दो महीना पहले 29 मार्च को ही गौतमबुद्धनगर जिले के दादरी में हुई समाजवादी समानता भाईचारा रैली से शुरू कर चुके हैं. उस रैली में उन्होंने कहा था कि ‘पीड़ा ही वह धागा है, जो पीडीए के लोगों को एक सूत्र में बांधता है.’

इससे सप्ताह भर पहले 22 मार्च को लखनऊ में सपा के मुख्यालय में 26 महिलाओं (जिनमें ज्यादातर पीडीए की ही थीं) को मूर्ति देवी-मालती देवी सम्मान दिए जाने को भी महिलाओं में पार्टी की जमीन तलाशने की मुहिम के रूप में ही देखा जा रहा है.

दूसरी ओर, भाजपा जहां एक ओर अपनी जीत को लेकर आश्वस्त दिखने की कोशिश कर रही है, वहीं नए समीकरणों को भी साध रही है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पिछले दिनों अपने मंत्रिमंडल के विस्तार में अन्य पिछड़े वर्ग के तीन और दलित जातियों के दो मंत्री बनाए तो सपा ने उसे अपने पीडीए के दबाव में लिया गया फैसला माना. फिर यह कहकर उसकी खूब आलोचना की कि उसमें योगी की मर्जी तो चली ही नहीं और उन्होंने ‘ऊपर’ के आदेश का यंत्रवत पालन भर किया.

सपाइयों को यह भी शिकायत है कि नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार महिलाओं व के विरुद्ध अपराधों की संख्या के लिहाज से उत्तर प्रदेश अभी भी देश में पहले स्थान पर बना हुआ है, जबकि योगी सरकार द्वारा कानून के बजाय बुल्डोजर व एनकाउंटर ‘इंसाफ प्रदाता’ बना दिए गए हैं.

अखिलेश यादव का आरोप है कि प्रदेश में सबसे ज्यादा फेंक एनकाउंटर और बुलडोजर कार्रवाइयां पीडीए यानी पिछड़ों, दलितों व अल्पसंख्यकों के खिलाफ ही हो रही हैं. फिर भी मीडिया में ‘जंगलराज’ की चर्चा कहीं नहीं हो रही, जबकि उनकी सरकार के दौरान उसको बदनाम करने के लिए खूब जंगलराज-जंगलराज किया जाता था.

सपाई यह भी कहते हैं: अखबारों में पुलिस के रिपोर्ट न लिखने और दलितों-वंचितों व अल्पसंख्यकों की न सुनने की खबरें तो कभी-कभार दिख जाती हैं, लेकिन उनको लेकर उनका स्वर आलोचनात्मक नहीं होता. हो भी कैसे, बुलडोजर राज में उस लोकतंत्र को, जिसमें अपनी आवाज उठाना जुर्म नहीं हुआ करता था, जैसे लंबी छुट्टी पर भेज दिया गया है और सबकी हिम्मत पस्त कर दी गई है.

दावे-प्रति दावे

गत लोकसभा चुनाव के बाद से ही सपा दावा करती आई है कि हारी हुई भाजपा प्रदेश में अपने मिशन-2027 को लेकर योगी के भरोसे नहीं रहने वाली. मोदी और योगी के कथित अंतर्द्वंद्वों के बहाने भी सपा इस संभावना को बड़ी करती रहती है कि भाजपा विधानसभा चुनाव से पहले कभी भी योगी को चलता कर सकती है.

इसी के मद्देनजर गत 23 अप्रैल को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने लखनऊ में साफ किया कि भाजपा आगामी विधानसभा चुनाव योगी के नेतृत्व में ही लड़ेगी और वे ही ‘मुख्यमंत्री का चेहरा’ भी होंगे क्योंकि उन्होंने उत्तर प्रदेश को उत्तम प्रदेश बना दिया है.

फिर भी प्रदेश में नुक्कड़ों की चर्चाओं में इस मुद्दे को लेकर दो राय है. पहली यह कि भाजपा के लिए योगी को हटाना कभी आसान नहीं था और अभी भी नहीं है. दूसरी राय यह कि भाजपा उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य का ‘मुख्यमंत्री पद की प्रतीक्षा का धैर्य’ जवाब देने का जोखिम नहीं उठा सकती और एक दिन उसे, जैसा कि गत लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद मौर्य कह चुके हैं, संगठन को सरकार से बड़ा सिद्ध ही करना पड़ेगा क्योंकि ‘संगठन से बड़ा कोई नहीं होता’.

बहरहाल, अभी, बकौल मीर तकी मीर: इब्तिदा-ए-इश्क है रोता है क्या, आगे-आगे देखिए होता है क्या!

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)