पेपर लीक से पोर्टल फेल तक: क्यों गहराता जा रहा है देश की परीक्षा व्यवस्था पर भरोसे का संकट

नीट-यूजी प्रश्नपत्रों की सुरक्षा के लिए वायुसेना की मदद लेने पर विचार से लेकर एसएससी परीक्षा रद्द होने और यूजीसी-नेट आवेदन में तकनीकी खामियों तक, हालिया घटनाएं बताती हैं कि देश की परीक्षा प्रणाली गंभीर चुनौतियों से जूझ रही है. इसका सबसे बड़ा खामियाजा लाखों अभ्यर्थियों को भुगतना पड़ रहा है.

(फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: देश में प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर भरोसे का संकट लगातार गहराता जा रहा है. कभी प्रश्नपत्र लीक होने पर परीक्षा रद्द हो रही है, कभी परीक्षा केंद्रों पर अव्यवस्था के कारण अभ्यर्थियों को वापस लौटना पड़ रहा है, तो कभी तकनीकी खामियों के चलते छात्र आवेदन तक नहीं कर पा रहे हैं.

हालात ऐसे हैं कि अब सरकार मेडिकल प्रवेश परीक्षा नीट-यूजी के प्रश्नपत्रों को सुरक्षित ढंग से पहुंचाने के लिए भारतीय वायुसेना की मदद लेने पर विचार कर रही है. ऐसी ख़बरें भी हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस परीक्षा की निगरानी करेंगे.

नीट-यूजी 2026 की परीक्षा रद्द होने और प्रश्नपत्र लीक के आरोपों के बाद केंद्र सरकार ने परीक्षा सुरक्षा व्यवस्था की व्यापक समीक्षा शुरू की है. ख़बरों के मुताबिक, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में हुई एक उच्चस्तरीय बैठक में यह प्रस्ताव सामने आया कि 21 जून को होने वाली पुनर्परीक्षा के प्रश्नपत्रों को देशभर के परीक्षा केंद्रों तक पहुंचाने के लिए भारतीय वायुसेना के विमानों का इस्तेमाल किया जाए.

अब तक प्रश्नपत्रों के परिवहन की जिम्मेदारी डाक व्यवस्था और नागरिक प्रशासन के माध्यम से पूरी की जाती रही है, लेकिन जांच में सामने आए संभावित ‘लूप होल्स’ के बाद सरकार अधिक कड़े इंतजामों पर विचार कर रही है.

यह प्रस्ताव केवल एक प्रशासनिक बदलाव नहीं है, बल्कि उस गहरे संकट की ओर भी संकेत करता है जिसमें देश की परीक्षा प्रणाली फंसती दिखाई दे रही है. विशेषज्ञों का एक वर्ग इसे नागरिक तंत्र पर घटते भरोसे के रूप में भी देख रहा है. सवाल यह उठ रहा है कि यदि परीक्षा के प्रश्नपत्रों को सुरक्षित रखने के लिए सेना की मदद की जरूरत पड़ रही है, तो आखिर पुलिस, परीक्षा एजेंसियों और प्रशासनिक संस्थाओं की भूमिका कितनी प्रभावी रह गई है.

गड़बड़ियों का सिलसिला

नीट का मामला अभी चर्चा में है, लेकिन यह अकेला उदाहरण नहीं है. पिछले कुछ वर्षों में देश भर में पेपर लीक, परीक्षा रद्द होने, परिणामों में गड़बड़ी और भर्ती प्रक्रियाओं में देरी की घटनाएं लगातार सामने आती रही हैं.

बीते दिनों उत्तर प्रदेश के कानपुर में कर्मचारी चयन आयोग (एसएससी) की जीडी कांस्टेबल भर्ती परीक्षा के दौरान जो हुआ, उसने परीक्षा प्रबंधन की तैयारियों पर सवाल खड़े कर दिए. एक परीक्षा केंद्र की क्षमता जहां 399 अभ्यर्थियों की थी, वहीं प्रत्येक पाली के लिए लगभग 819 उम्मीदवारों को प्रवेश पत्र जारी कर दिए गए.

परीक्षा शुरू होने से पहले ही भारी अव्यवस्था फैल गई. स्थिति इतनी बिगड़ गई कि दोनों पालियों की परीक्षा रद्द करनी पड़ी. दूर-दराज़ जिलों से पहुंचे अभ्यर्थियों को बिना परीक्षा दिए वापस लौटना पड़ा. कई उम्मीदवारों ने यात्रा खर्च और समय की बर्बादी को लेकर नाराजगी जताई.

इसी बीच विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (यूजीसी-नेट) को लेकर भी अभ्यर्थियों की परेशानियां सामने आई हैं. जून 2026 में होने वाली परीक्षा के लिए आवेदन की अंतिम तिथि बढ़ाए जाने के बावजूद कई छात्र तकनीकी समस्याओं के कारण आवेदन नहीं कर सके.

छात्रों का कहना है कि डिजिलॉकर सत्यापन और पोर्टल की तकनीकी खामियों के चलते वे समय रहते फॉर्म जमा नहीं कर पाए. कई छात्रों ने यूजीसी से आवेदन पोर्टल दोबारा खोलने की मांग की है. उनका तर्क है कि परीक्षा उनके अकादमिक और पेशेवर भविष्य से जुड़ी हुई है और केवल तकनीकी बाधाओं के कारण उन्हें अवसर से वंचित नहीं किया जाना चाहिए.

इन घटनाओं को अलग-अलग मामलों के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन इन्हें जोड़कर देखें तो एक बड़ी तस्वीर उभरती है. यह तस्वीर उस परीक्षा व्यवस्था की है, जिस पर हर साल करोड़ों छात्र अपने भविष्य की उम्मीदें टिका देते हैं.

किसी परीक्षा का प्रश्नपत्र लीक होना केवल एक प्रशासनिक विफलता नहीं होता; यह उन लाखों छात्रों के विश्वास को चोट पहुंचाता है जिन्होंने महीनों या वर्षों तक तैयारी की होती है. इसी तरह परीक्षा केंद्रों पर अव्यवस्था या आवेदन प्रक्रिया में तकनीकी गड़बड़ियां भी युवाओं में असुरक्षा और निराशा की भावना पैदा करती हैं.

सरकार लगातार परीक्षा सुरक्षा को मजबूत करने के दावे कर रही है. केंद्रीय एजेंसियों, राज्य पुलिस नेटवर्क और विभिन्न मंत्रालयों के बीच समन्वय बढ़ाने की बात भी कही जा रही है. लेकिन हालिया घटनाएं बताती हैं कि चुनौती केवल प्रश्नपत्रों की सुरक्षा तक सीमित नहीं है. परीक्षा प्रणाली का हर चरण, आवेदन से लेकर परीक्षा संचालन और परिणाम तक, विश्वसनीय और पारदर्शी होना चाहिए.

भारत में प्रतियोगी परीक्षाएं केवल चयन प्रक्रिया नहीं हैं; वे सामाजिक गतिशीलता का एक महत्वपूर्ण माध्यम हैं. लाखों युवा इन्हें बेहतर जीवन और रोजगार के अवसरों का रास्ता मानते हैं. ऐसे में हर पेपर लीक, हर रद्द परीक्षा और हर तकनीकी गड़बड़ी केवल एक प्रशासनिक समस्या नहीं, बल्कि युवाओं के भरोसे पर पड़ने वाली चोट भी है.

नीट के प्रश्नपत्रों को वायुसेना के हवाले करने का प्रस्ताव इसी संकट की गंभीरता को रेखांकित करता है. असली चुनौती यह नहीं है कि प्रश्नपत्र कितनी सुरक्षित उड़ान से पहुंचते हैं, बल्कि यह है कि क्या परीक्षा प्रणाली इतनी विश्वसनीय बन पाएगी कि छात्रों को अपने भविष्य के लिए किसी असाधारण सुरक्षा व्यवस्था पर निर्भर न रहना पड़े.