स्वतंत्रता की 79वीं वर्षगांठ के अवसर पर द वायर हिंदी ‘आज़ादी के मायने’ नाम से एक श्रृंखला शुरू कर रहा है, जहां हम समकालीन लेखकों-विचारकों के लिए आज़ादी क्या है, इस बारे में उनके विचारों से रूबरू होंगे. एक तरह से यह श्रृंखला स्वतंत्रता को आज के संदर्भो में, उसके रोज़ाना के अर्थों में समझने का, उसके मायनों से वाक़िफ़ होने का अवसर है. प्रस्तुत है दूसरी क़िस्त.
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‘हमें पंद्रह अगस्त 1947 को स्वतंत्रता प्राप्त हुई थी.’ ऊपर से पढ़ने पर यह सीधा-सरल वाक्य है. इसमें दो ऐसे शब्द हैं जिन्हें आसान समझ लिया जाता है पर वे दरअसल वैसे हैं नहीं. पहला, इस वाक्य में ‘हम’ कौन हैं? दूसरा, इसी वाक्य में ‘स्वतंत्रता’ का क्या अर्थ है?
यह सच है कि भारत को, पूरे भारत को राजनीतिक स्वतंत्रता उस दिन मिल गई थी. पर यह देखना आवश्यक है कि पहले वाक्य के ‘हम’ का आशय हर तरह के लोग होना था, हर समुदाय या संप्रदाय के लोग, कथित ऊंची जातियों, कथित नीची जातियों, अन्य संप्रदायों के, अन्यान्य धर्मों के पुरुष, स्त्रियां, बच्चे, बूढ़े, शारीरिक अक्षम, किन्नर, विषम लैंगिक, समलैंगिक, ग्रामीण, नागर, आदिवासी आदि, आदि.
क्या इनमें से हर तरह के लोगों को स्वतंत्रता मिल पायी है?
अगर नहीं तो फिर उस पहले वाक्य में ‘हम’ क्या कर रहा है या उस ‘हम’ में कौन सम्मिलित हैं? क्या पंद्रह अगस्त 1947 के बाद ‘हम’ का यह दायरा निरंतर फैलता गया है या वह फैलते-फैलते सिकुड़ना शुरू हो गया है? या कभी फैला ही नहीं है? यह सब कुछ ऐसे सवाल हैं जिनके जवाब देश के हर सदस्य को खुद ढूंढने होंगे. उन्हें यह भी सोचना होगा कि अगर वह अपने को स्वतंत्र नहीं पा रहे हैं तो ऐसा क्यों हैं? वे कौन-सी शक्तियां या उनके आभास हैं जो उन्हें स्वतंत्र नहीं होने देते?
यहां आकर यह समझ लेना शायद बेहतर होगा कि अगर किसी देश का एक भी जन-समूह या संप्रदाय स्वतंत्र नहीं है, वह दूसरे सभी समूहों या संप्रदायों की स्वतंत्रता में दरार उत्पन्न कर देता है. इसका आशय है कि या तो पूरा का पूरा देश स्वतंत्र होता है या फिर सारा ही देश अपने अन्यान्य समुदाय/संप्रदायों के साथ थोड़ा-बहुत ही स्वतंत्र हो पाता है. उसका जितना हिस्सा स्वतंत्र नहीं हो पाता, उतने में दूसरों के प्रति सन्देह घर कर जाते हैं.
दूसरे शब्दों में या तो ‘हम’ पूरे के पूरे ‘हम’ स्वतंत्र होते हैं और होते चले जाते हैं या फिर किसी भी समुदाय/संप्रदाय की स्वतंत्रता पर डाका डाल कर बाकी के ‘हम’ की स्वतंत्रता को नष्ट करने की तैयारी होने लगती है. इस तरह देखने पर क्या कोई कह सकता है कि यह समूचा देश स्वतंत्र हो गया है या कम-से-कम उस ओर निरंतर आगे बढ़ रहा है. ऐसा कहने के लिए अब आपको या तो थोड़ा बहुत अंधा होना होगा या बे-वाकिफ़.
जब तक भी पूरा समाज या देश या ‘हम’ के सभी सदस्य स्वतंत्र नहीं होते, तो जो भी स्वतंत्र हो गए होते हैं, वे अपने घरों के चारों ओर तरह-तरह के, दृश्य या अदृश्य दीवारें उठाकर अपने को सुरक्षित करने का प्रयास करते हैं और इस तरह अपने को कम-स्वतंत्र (यानी परतंत्र) लोगों से दूर रखने का प्रयत्न करते हैं. विडम्बना यह है कि इन छिपे या ढंके-मुंदें ‘स्वतंत्रों’ के घरों की रक्षा का भार ‘कम-स्वतंत्रों’ में से ही कुछ को निभाना पड़ता है.
क्या आपने अर्थशास्त्री रघुराम राजन को यह कहते नहीं सुना है कि हमारे देश में सबसे अधिक नौकरियां, फटीचर नौकरियां निजी सुरक्षा कर्मियों यानी ‘सिक्योरिटी गार्ड्स’ को मिली हुई हैं. स्वतंत्र लोगों के घरों के समूह (जिसे ‘एनक्लेव’ भी कहा जाता है) की रक्षा करता ‘कम-स्वतंत्र’ या ‘नाम मात्र’ को स्वतंत्र सुरक्षाकर्मी किया करता है ताकि इनकी दीवारों के बाहर रह रहे ‘कम-स्वतंत्र’ लोगों के झुंड इन स्वतंत्र लोगों के सहज जीवन प्रवाह में बाधा न डाल दें.
जैसे-जैसे ‘स्वतंत्र’ और ‘कम-स्वतंत्र’ लोगों के बीच का अंतराल बढ़ता जाएगा, इन एनक्लेवों की दीवारें ऊंची होती जाएंगी पर साथ ही उनके फाटकों पर अपने ही तरह के लोगों से उनकी रक्षा करते सुरक्षा कर्मियों की जान को ख़तरा बढ़ता जाएगा. अगर देश की राजनीतिक व्यवस्थाएं इतनी अधिक पक्षपाती होती जाती हैं तो फिर करुणा पर आधारित हमारे संविधान के प्रयोजन का क्या अर्थ रह जाता है.
अब उस भोले-से पहले वाक्य के एक और शब्द ‘स्वतंत्र’ के आशय को समझने का प्रयास करें. इस शब्द के दो हिस्से हैं: स्व और तंत्र. ‘स्व’ का आशय है ‘खुद’, अपना आप, और तंत्र का अर्थ है व्यवस्था, रहने का ढंग और राज करने का ढंग. इस तरह स्वतंत्र का अर्थ होता है, अपने ढंग की व्यवस्था बनाना या अपने ढंग की राज्य व्यवस्था बनाना और उस पर अपना अधिकार होना.
इस देश में जो और जैसी राज्य व्यवस्था अंग्रेज 1947 में छोड़ गए थे, उस पर कुछ स्वतंत्र भारतीयों का अधिकार अवश्य हो गया पर वे अपनी तरह की राज्य व्यवस्था बनाने में कमोबेश निरंतर विफल ही रहे हैं. औपनिवेशिक भारत में अंग्रेजों ने वही राज्य सत्ता स्थापित की थी जो वे इंग्लैण्ड में स्थापित कर चुके थे. इसे इस तरह भी कह सकते हैं कि अंग्रेजों ने भारत में भारतीय समाज के स्वभाव के अनुरूप राज्य सत्ता स्थापित करने की जगह, एक ऐसी राज्य सत्ता स्थापित की थी जो भारतीयों के लिए अजनबी थी. लेकिन वैसी राज्य व्यवस्था में अंग्रेजों को भारत में तरह-तरह की लूट जारी रखने की कहीं अधिक गुंजाईश देती थी.
1931 में लंदन के गोल-मेज़ सम्मेलन में गांधी ने एक मार्मिक तथ्य सामने रखा था. उन्होंने कहा था कि अंग्रेजों और भारतीयों के राज करने के ढंग बिल्कुल अलग हैं. लाखों गांवों के देश भारत को अंग्रेजी ढंग की राज्य व्यवस्था से संचालित नहीं किया जा सकता. उन्होंने प्रस्तावित किया था कि हर गांव के प्रतिनिधि ही केंद्रीय या प्रांतीय विधान सभाओं के प्रतिनिधियों का चुनाव करेंगे. उन्होंने आगे यह जोड़ा था कि भारत में राज करने की पद्धति का 1931 के पहले कई जगह प्रयोग किया गया था और वह प्रयोग सफल भी रहा था. इस प्रयोग में गांवों और शहरों में सार्वजनिक निर्णय लेने का अधिकार पंचायतों को दिया गया था.
गांधी के इस वक्तव्य से यह स्पष्ट हो जाता है कि वे स्वतंत्रता प्राप्ति के पहले, देश के कोने-कोने की कांग्रेस समितियों की सक्रियता के विषय में कह रहे थे. कांग्रेस के सहारे देश में स्थानीय स्तर से आरंभ की गई शासन पद्धति ही गांधी जी का सबसे बड़ा प्रयोग था. यह एक तरह की विकेंद्रीकृत शासन पद्धति थी. इसी की हिमायत और इसी का सैद्धान्तिक आधार गांधी ने अपनी महान पुस्तक ‘हिन्द स्वराज’ में दिया था.
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद इस तरह की विकेंद्रीकृत राज व्यवस्था भारत में बन नहीं पायी. लेकिन तब भी स्वतंत्रता प्राप्ति के कुछ दशकों बाद तक ग्रामीण और मोहल्ले के स्तर की कांग्रेस समितियों के पास पर्याप्त अधिकार हुआ करते थे. वे कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व को प्रश्नांकित कर सकती थीं, उनके निर्णयों में कुछ बदलाव निश्चय ही ला सकती थीं. लेकिन यह व्यवस्था धीरे-धीरे कमज़ोर होती गई. आपातकाल के दौरान और उसके बाद के दौर में यह अपेक्षाकृत कमज़ोर विकेंद्रीकृत व्यवस्था पूरी तरह समाप्त हो गई.
यह भारत के अपने नागरिकों को स्वतंत्र करते रहने की प्रक्रिया का दुखद क्षण था. यह उम्मीद भले ही बनी रही कि कभी गांधी की कल्पना की विकेंद्रीकृत राज्य सत्ता शायद बन सके. लेकिन बाद की सभी सरकारों ने इस ओर बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया. इसी कारण गांव और शहरों के साधारण नागरिक प्रादेशिक या राष्ट्रीय स्तर के निर्णयों की उन प्रक्रियाओं से भी बाहर होते चले गए जो उनके दैनंदिन जीवन को प्रभावित करने वाली थीं. (ऐसे हर निर्णय को राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर न्यायसंगत ठहराने का स्वांग अब तक देशवासियों को समझ जाना चाहिए था.)
लेकिन इन वर्षों में भी समाज और राज्य सत्ता के बीच के अंतराल को किसी हद तक आलोकित करने का प्रयास बुद्धिजीवी और पत्रकार करते रहे. दरअसल बुद्धिजीवी का जन्म ही समाज और कल्याणकारी राज्य सत्ता के बीच के उस अंतराल में होता है जिसे न तो समाज पाट पाता है और जिसे बनाए रखने में ही राज्य सत्ता अपनी शक्ति का अनुभव करती है. इस अंतराल में बुद्धिजीवी और पत्रकारों के सक्रिय होने से यह संभावना बनी रहती है कि एक दिन समाज, सत्ता की ओर बढ़ते-बढ़ते उसे पूरी तरह विकेंद्रित कर लेगा.
लेकिन यह उम्मीद भी पिछले 10-12 वर्षों में पूरी तरह ख़त्म हो गई है. यह वह समय है जब ‘हम’ सिकुड़ते-सिकुड़ते देश के एक या दो प्रतिशत सेठों में सिमट गया है और साथ ही स्वतंत्रता उन नागरिकों को भी प्राप्त है जो किन्हीं विशेष राजनीतिक दल के सदस्य हैं. बुद्धिजीवी और पत्रकारों पर जिस तरह के दबाव इन वर्षों में काम कर रहे हैं, उनके चलते वे राज सत्ता और व्यापक समाज के बीच के अंतराल को आलोकित करने का अपना धर्म निभा ही नहीं सकते.
राज सत्ता के लिए समाज मानो है ही नहीं और समाज के लिए राज सत्ता एक ऐसा रहस्य बन गई है जिसके विषय में सोचकर आपको चेक लेखक फ्रांज़ काफ़्का के उपन्यासों की याद हो आती है. उनके उपन्यास ‘कासल’ में भूमि पर्यवेक्षक की नौकरी पाये के. नाम के चरित्र को उपन्यास के अंत तक यह पता नहीं चल पाता कि उसे किसने नौकरी पर रखा है, कौन उसका अधिकारी है और वह किसके लिए काम कर रहा है.
आधुनिक समय में किसी भी देश की स्वतंत्रता को बनाए रखने में बुद्धिजीवियों और पत्रकारों आदि की बहुत बड़ी भूमिका हुआ करती है. ये लोग समाज की ओर से राज्य सत्ता को प्रश्नांकित करते हैं. उस पर साधारण लोगों की समस्याओं को सुलझाने के लिए दबाव डालते हैं. राज्य सत्ता को उन पर ध्यान देना पड़ता है. यही वे लोग हैं जो राज्य सत्ता के राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय व्यवहारों को भी निरंतर प्रश्नांकित करते हैं. इनकी भूमिका लेखकों या कलाकारों से अलग होती हैं. लेखक और कलाकार समाज में नैतिक बोध को सक्रिय बनाए रखने में आधारभूत भूमिका निभाते हैं.

साहित्य और कलाएं आज नहीं, हमेशा से ही किसी भी समाज का धर्म या नैतिक बोध बनाए रखने में ही अपना औचित्य हासिल करती हैं. साहित्य और कलाएं ही ‘सामाजिकों’ को उनकी ‘एकवचनात्मकता’ का बोध कराती हैं और इस तरह उन्हें एक-सा होने से रोककर कॉरपोरेट पूंजीवाद और राष्ट्रवादी शासकों का प्रतिरोध देती है लेकिन बुद्धिजीवियों और पत्रकारों की भूमिका इनसे अलग होती है. वे समाज की ओर से राज्य सत्ता पर न्यायसंगत होने का दबाव डालते हैं.
दरअसल पत्रकारिता न्याय की गुहार ही है. इसके पालतू हो जाने पर समाज में न्याय की संभावना बेहद कम होती चली जाती है. राज्य सत्ता समाज के सदस्यों से चाहे जैसा बर्ताव क्यों न करे, कोई उस पर प्रश्न नहीं उठा पाता और इस तरह समाज में न्याय की उम्मीद भी क्षीण होती जाती है. इसी रास्ते उस समाज की स्वतंत्रता भी क्षीण हो जाती है. क्योंकि न्याय पाने का अधिकार ही स्वतंत्रता का मर्म है.
भारत का आज का समय एक बेहद केंद्रीकृत राज्य सत्ता का समय हो गया है. यह सिर्फ़ भारतीय समाज के लिए ही चुनौती नहीं है बल्कि सत्ता के निरंकुश होते चले जाकर अपने समाज को ही ख़त्म कर लेने की संभावना की आहट भी है.
कहां तो यह देश 15 अगस्त 1947 में विकेंद्रीकृत राज्य व्यवस्था को बनाने निकला था क्योंकि वही इस देश में हर नागरिक की स्वतंत्रता की गारंटी थी और कहां इस देश के समाज ने अपनी लापरवाही और अंधेपन से एक ऐसी राज्य सत्ता को उत्पन्न का दिया है जो अतिकेंद्रीकृत है और इसलिए वह चाहे न चाहे उसके होते नागरिक अपनी स्वतंत्रता खोकर ही रहेंगे.
मुझे सबसे अधिक पीड़ा तब होती है जब मैं देखता हूं कि देश के अधिकांश नागरिक गांधी के स्वप्न और इस देश के राजनीतिक अतीत को पूरी तरह भूल चुके हैं. उन्हें याद ही नहीं है कि स्वतंत्रता आंदोलन में इस देश के नागरिकों ने एक ऐसी शासन व्यवस्था स्थापित करने का संकल्प लिया था (और उसके लिए कई प्रयोग भी किए थे) जो हर नागरिक को पूरी तरह स्वतंत्र बना सकती और जो इस सभ्यता की अपनी थाती भी थी. उन्होंने वास्तविक अर्थों में स्वतंत्र होने का सपना देखा था. पर आज वह संकल्प और वह थाती देश से कोसों दूर जान पड़ती है. मानो वह कभी थी ही नहीं. लेकिन उसके अलावा भारतीय नागरिकों को पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त करने का कोई दूसरा रास्ता भी नहीं है.
समूची दुनिया के अधिकांश देश आधुनिक केंद्रीकृत राज सत्ता की विफलता की दास्तान हो गए हैं. कॉरपोरेट पूंजीवाद अपने हित में राज सत्ताओं को अधिक-से-अधिक केंद्रीकृत बनाता चला जा रहा है. राज सत्ता का मानो नागरिकों से वोट लेने के अलावा कोई संबंध ही नहीं बचा है. उनके जीवन से संबंधित सारे निर्णय देशों की राजधानियों में नागरिकों से बिना किसी बातचीत के ले लिये जाते हैं और उन्हें नागरिकों पर थोपकर उनकी ज़िन्दगी को दुश्वार कर दिया जाता है.
स्वतंत्रता नागरिकों के जीवन से पलायन करते-करते केवल देश के झंडों और राष्ट्रगानों में मानो संकुचित होकर रह गई.
डोनॉल्ड ट्रंप और उसके फौजी सलाहकार सफ़ेद इमारत के किसी कमरे में बैठकर निर्णय लेते हैं और ईरान पर हज़ारों की संख्या में बम बरसकर वहां के लोगों की जानें लेने लगते हैं. इस सब में अमेरिकी नागरिकों की लगभग कोई भूमिका नहीं होती, यही कुछ रूस का राष्ट्रपति पुतिन करता है. वह कई साल से यूक्रेन पर बम गिराता जा रहा है पर यह सब करने के लिए उसे अपने देश के नागरिकों की सहमति की कोई ज़रूरत नहीं पड़ती और इसीलिए यूक्रेन के रूस पर पलटवार में जब रूसी नागरिक मारे जाते हैं तो न वे और न उनके परिजन यह जान पाते हैं कि उन्हें क्यूं मारा गया है, उन्हें किस चीज़ की सजा मिली है?
निष्क्रिय, कल्पनाहीन नागरिकता के हिस्से में स्वतंत्रता कभी नहीं आती. भारत और तमाम दूसरे देशों के नागरिकों को अपनी प्रतीकात्मक स्वतंत्रता के स्थान पर वास्तविक स्वतंत्रता पाने के लिए उसी तरह की सक्रियता लानी होगी जो स्वतंत्रता संग्राम में आई थी. इस सक्रियता की उपस्थिति कई जगह दिखायी दे रही है. कई जगह यह अनुभव होता है कि लोग अपनी नकली स्वतंत्रता से थक गए हैं और अपनी वास्तविक स्वतंत्रता पाने उठ खड़े होने का प्रयास कर रहे हैपर बात यहां ख़त्म नहीं होती.
अब स्वतंत्रता की चोरी का एक नया साधन विकसित हो गया है: ‘बनावटी मानस’ ‘आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस’. इस साधन में यह सामर्थ्य है कि यह हमारी-आपकी तरफ से सोच सकता था. यह बिना किसी दिखावे के वही करेगा जो हर तानाशाह चाहता है: आप अपनी तरह से न सोच पाएं. मनुष्यता के स्वातंत्र्य-बोध और इस बनावटी मानस के बीच की मुठभेड़ में कौन बचा रहता है, इसी पर स्वतंत्रता की नियति टिकी है.
मनुष्य अपनी तरह से सोचने और सर्जन करने की स्वतंत्रता को बचा पायेगा या नहीं, इसी के इंतज़ार में विंगस में खड़े तानाशाहों की मुस्कुराहटें ठहरी हुई हैं.
(उदयन वाजपेयी कवि-कथाकार और विचारक हैं.)
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