शिक्षा का मक़सद सवाल करने की आज़ादी सीखना है, गुरु शिष्य परंपरा इसके उलट है

भारत में आजकल गुरु शिष्य परंपरा का जो गुणगान किया जा रहा है, उसका कारण यह है कि सत्ता अब स्वतंत्र मन और मस्तिष्क वाले नागरिक नहीं चाहती, आज्ञाकारी, सत्ता के आगे समर्पणशील जन चाहती है. शिक्षा का काम इसके प्रति लोगों को सावधान करना और उनके भीतर आलोचनात्मक नज़रिया विकसित करना है. गुरु-शिष्य परंपरा इसमें बाधक है.

कुलपति द्वारा कथाकार के अपमान को क्या केवल उन्हीं का अपमान मानना चाहिए?

अध्यापकों, लेखकों, बुद्धिजीवियों से उम्मीद की जाती है कि वे स्वायत्तता की, व्यक्ति की गरिमा की रक्षा करेंगे और सतहीपन का विरोध करेंगे. इस विरोध से समझ की सामाजिकता का निर्माण होता है. किसी एक का अपमान सामूहिक अपमान होता है. जिस सभा को इन बातों का अहसास न हो, उसे सभ्य कैसे कहा जाए?

एंजेल चकमा की मौत: क्या भारतीयता के सुरक्षा कवच के बिना भारत में जीवित रहना संभव नहीं?

हिंसा के प्रति राज्य की सहनशीलता की नीति के कारण हिंसा की संस्कृति का समाज में विस्तार कोई आश्चर्यजनक घटना नहीं है. कश्मीरी विद्यार्थियों, व्यापारियों पर हमलों पर राष्ट्रीय चुप्पी से पता चलता है कि चूंकि मान लिया गया है कि वे पूरे भारतीय नहीं हैं, उन पर हिंसा की जा सकती है. हम किसी न किसी तरह, किसी समुदाय, व्यक्तियों पर अभारतीयता का आरोप लगा सकते हैं और उन्हें मार सकते हैं.

ज्ञान की गर्दन और हिंदुत्व की तलवार

दिल्ली विश्वविद्यालय में पाठ्यक्रम निर्माण ज्ञान और हिंदुत्ववादी विचारधारा की रस्साकशी बन गया है. जेंडर, जाति, भेदभाव और विश्व इतिहास जैसे विषयों को हटाने का दबाव बढ़ रहा है. इससे अकादमिक स्वतंत्रता और सार्वजनिक विश्वविद्यालयों की बौद्धिक गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं. इसी विषय पर पढ़ें दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अपूर्वानंद का लेख.

क्रिसमस से पहले हिंसा और हमले: क्या ईसाई भारत के लोग नहीं हैं?

ईसाइयों के ख़िलाफ़ अभियान पिछले सालों में तेज़ होता चला जा रहा है. भारत की कुल जनसंख्या के मात्र 2.3% ईसाई हैं. पिछले कई दशकों से भारत की आबादी में उनका हिस्सा लगभग यही रहा है. फिर धर्मांतरण से ईसाइयों की जनसंख्या में विस्फोटक बढ़ोत्तरी का ख़तरा क्यों सबको वास्तविक जान पड़ता है?

क्या मुख्यमंत्री को किसी का चेहरा उसकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ देखने-दिखाने का अधिकार है?

नीतीश कुमार द्वारा की गई असभ्यता के पक्ष में दलीलें दी जा रही हैं कि मुख्यमंत्री को महिला विरोधी नहीं कहा जा सकता और न मुसलमान विरोधी क्योंकि इन दोनों के हित के लिए उन्होंने कई काम किए हैं. तो क्या इसका यह अर्थ समझें कि अगर आपने मेरी कोई मदद की है तो मैं आपको अपने साथ बदतमीज़ी करने का हक़ दे दूं?

ममदानी की जीत ने जनतंत्र में मैत्री की संभावना को किया बहाल

अमेरिका में जिस एक पहचान का अपराधीकरण कर दिया गया है, वह है मुसलमान पहचान. उसे पूरी तरह क़बूल करना किसी भी राजनेता के लिए आसान नहीं. लेकिन ज़ोहरान ममदानी ने यह मुश्किल काम कर दिखाया.

दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के समाजशास्त्र विभाग का साप्ताहिक कार्यक्रम रद्द हुआ: ध्वस्त होती अकादमिक परंपराएं

पिछले 11 वर्षों से देश के लगभग हर शिक्षा संस्थान में बौद्धिक गतिविधियों पर प्रशासन का नियंत्रण सख़्त होता जा रहा है. पाठ्यक्रमों के मामले में अब विभाग आज़ाद नहीं हैं. कोई गोष्ठी आयोजित नहीं की जा सकती. मात्र ‘राष्ट्रवादी’ विषयों और वक्ताओं को अब जगह दी जाती है. विश्वविद्यालय बौद्धिक मूर्च्छा में बस सांस ले रहे हैं. उनके जीवित होने का भ्रम है.

विश्वविद्यालय में संवाद होगा या हिंसा

पिछले दो दशकों में देश भर के शैक्षणिक परिसरों में हुई हिंसा में अधिकतर एबीवीपी के सदस्य क्यों शामिल पाए जाते हैं? इस छात्र संगठन को इस सवाल से जूझना चाहिए कि विचार के परिसर में उसने हिंसा को क्यों चुना है?

भारत में विदेशी विश्वविद्यालयों का आगमन: आशंका और सवाल

भारत सरकार ने विदेशी विश्वविद्यालयों को अपने यहां आने की इजाज़त दी है. बिना स्वतंत्रता के शिक्षा और ज्ञान का सृजन असंभव है. अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों में अब जिस तरह के नियंत्रण लागू किए जा रहे हैं, उसके बाद वहां के विश्वविद्यालयों का आकर्षण ख़त्म हो रहा है. क्या भारत में इन विदेशी विश्वविद्यालयों को यह स्वतंत्रता मिलेगी?

क्या भारत सैयदा हमीद की इंसानियत को समझ पायेगा?

सैयदा हमीद के मन में असम की बहुत ख़ूबसूरत यादें हैं. लेकिन आज अचानक उन्हें अहसास कराया जा रहा है कि वे औरत हैं और मुसलमान हैं. उनकी तकलीफ़ कौन महसूस करना चाहता है?

नफ़रत का कारोबारी घृणा बांटता लाल किले की बुर्जी से

हिंदू समाज में घृणा पहले भी थी लेकिन 2014 में हमने सारे संकोच को तोड़ दिया जब नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में स्वीकार किया गया. भारत घृणा और हिंसा की राह पर चल निकला. स्वाधीनता दिवस के दिन इस घृणा का मुख्य प्रवक्ता अपना पुराना, आज़माया हुआ रिकॉर्ड बजा रहा था. क्या उसे सुनकर हमें वितृष्णा होती है?

स्कूल की टंकी में कीटनाशक: क्या बच्चों से प्रेम से अधिक ताक़तवर भाव मुस्लिमों से घृणा है?

कर्नाटक की घटना दिल दहलाने वाली है. क्या हिंदू समाज घृणा में इस हद तक आत्मघाती हो चुका है कि अपने बच्चों की बलि देने को तैयार है अगर उससे मुसलमानों को और पीड़ित करने का एक बहाना मिल सके?

कश्मीर के होंठ सिल दिए गए हैं और उसकी छाती पर भारतीय राज्य का बूट है

5 अगस्त, 2019 के बाद का कश्मीर भारत के लिए आईना है. उसके बाद भारत का तेज़ गति से कश्मीरीकरण हुआ है. नागरिकों के अधिकारों का अपहरण, राज्यपालों का उपद्रव, संघीय सरकार की मनमानी.

खामोश अदालत जारी है, हिंदुत्ववादियों की भाषा बोलती है!

न्यायालय और सड़क की भीड़ में भेद मिट जाना चिंता का विषय है. यह एक नई राष्ट्रवादी स्वतःस्फूर्तता का जन्म है. नेहरू प्लेस की भीड़ संगठित नहीं थी. वे लोग बजरंग दल के सदस्य शायद नहीं थे. लेकिन जैसे ही अदालत ग़ज़ा के लिए सहानुभूति की बात सुनते ही बिफर पड़ी, यह भीड़ फ़िलिस्तीन का झंडा देखते ही भड़क उठी.

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