शिक्षक दिवस: शिक्षा और शिक्षकों का यह हाल क्यों है?

समाज में ऐसी स्थितियां पैदा कर दी गई हैं कि क्या शिक्षक, क्या छात्र और क्या अन्य काम करने वाले, सबके लिए कर्तव्यनिर्वहन कठिन हो चला है. इसके चलते उनका जो नैतिक बल पहले ज़्यादातर जगहों पर उनके काम आता था, अब नहीं आता. क्या आश्चर्य कि इसीलिए शिक्षकों-छात्रों के संबंध भी 'नैतिक' नहीं रह गए हैं, प्रोफेशनल हो गए हैं या फिर दिखावे के.

#वोटचोरी: केंद्र और राज्यों के अलग-अलग चुनाव आयोग होते तो?

संविधान सभा में संविधान के निर्माण की प्रक्रिया के दौरान उसके मसौदे में प्रस्तावित था कि केंद्र और राज्यों के 'अलग-अलग और एक दूसरे से स्वतंत्र' चुनाव आयोग हों. हालांकि डॉ. आंबेडकर का कहना था कि प्रांतों में सरकारें इस प्रकार के प्रबंध कर रही हैं कि उन लोगों को, जिनका मूल वंश, भाषा व संस्कृति उस प्रदेश के निवासियों से भिन्न है, उन्हें मतदाता सूचियों में स्थान नहीं दिया जा रहा है.

भगवतीचरण वर्मा: ‘ये पाप है क्या, ये पुण्य है क्या’ से आगे और भी है जिनका जहां

जयंती विशेष: उन्नाव ज़िले के सफीपुर क़स्बे में 1903 में 30 अगस्त को जन्मे भगवतीचरण वर्मा अपने प्रभूत साहित्य की मार्फत यह सीख दे चुके हैं कि मनुष्य को स्वयं से भागने के बजाय अपने जीवन के अनुभवों, नियति को सहजता से स्वीकार करना और उनका आनंद लेना चाहिए. क्योंकि भूत और भविष्य केवल कल्पनाएं हैं और वर्तमान ही वास्तविक है.

क्या भारत का लोकतंत्र अब ‘नियंत्रित लोकतंत्र’ में बदल गया है?

देश के संवैधानिक लोकतंत्र को देखते ही देखते नियंत्रित लोकतंत्र (कंट्रोल्ड डेमोक्रेसी) में बदल डाला गया है. अगर चुनाव स्वतंत्र व निष्पक्ष न रह जाएं तो वे लोकतंत्र की प्राणवायु नहीं रह जाते और चुनाव करा देने भर से कोई देश या उसकी सरकार लोकतांत्रिक नहीं हो जाती.

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, जिन्होंने पुरानी गुरु-शिष्य परंपरा को पोंगापंथियों से निकाल नए अर्थ दिए

जयंती विशेष: 19 अगस्त 1907 को जन्मे हजारीप्रसाद द्विवेदी ने छायावाद के बाद युग में हिंदी को स्वतंत्र देश की ज़रूरतों के अनुरूप बनाने के विभिन्न उपक्रमों में अनथक योगदान दिया. इस क्रम में उन्होंने अनेक शिष्यों की प्रतिभा को नए संस्कार व आयाम दिए, जिसे उनकी ऐसी पहचान बनी कि आचार्य द्विवेदी को अपने सृजन के साथ उनके सृजन का श्रेय भी दिया जाने लगा.

बदहाल संविधान और लाचार संसद: ये कहां आ गए हम

आज हम संविधान को ख़राब हाथों में न पड़ने देने की बाबा साहेब की उस चेतावनी की अनसुनी का नतीजा भुगत रहे हैं, और उस मोड़ तक जा पहुंचे हैं, जहां अंतरराष्ट्रीय सूचकांकों में हमारी स्वतंत्रता आंशिक हो गई है तो लोकतंत्र लंगड़ा.

वो वीरांगनाएं, जो स्वतंत्रता के लिए जो प्राण-प्रण से लड़ीं…

स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर हम ऐसी आठ महिला स्वतंत्रता सेनानियों को याद कर रहे हैं, जिन्होंने स्वतंत्रता के बहुविध संघर्ष में अपनी भरपूर चमक बिखेरी. इन्हें इस रूप में याद करना इस अर्थ में बहुत प्रासंगिक है कि आज की तारीख में न सिर्फ इनके, बल्कि प्रायः सारी महिला सेनानियों द्वारा स्वतंत्रता संघर्ष में दिए गए योगदानों को विस्मृति के गर्त में धकेल दिया गया है.

आज़ादी की लड़ाई, महात्मा गांधी और अगस्त का महीना

1920 में यही अगस्त का महीना था, जब इस देश ने महात्मा गांधी के आह्वान पर ऐतिहासिक असहयोग आंदोलन को शुरू होते और स्वतंत्रता के लिए पहला जनांदोलन बनते देखा. महात्मा का पक्ष समझने के लिए यह जानना ज़रूरी है कि इस आंदोलन से पहले और उसके बीच भी उन्होंने देशवासियों को सत्य व अहिंसा के प्रति प्रेरित और उनके अनुकूल आचरण के लिए तैयार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी.

भारत छोड़ो आंदोलन के तीन सितारे: यूसुफ मेहर अली, अरुणा आसफ अली और मातंगिनी हाज़रा

दूसरे विश्व युद्ध के दौरान आठ अगस्त, 1942 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने बंबई के ग्वालिया टैंक मैदान से महात्मा गांधी की अगुवाई में 'करो या मरो' के नारे के साथ 'भारत छोड़ो' आंदोलन शुरू किया, तो देशवासियों को ब्रिटिश सत्ता के हाथों बेहद निर्मम दमन चक्र झेलना पड़ा. आज इस आंदोलन की कोई भी चर्चा यूसुफ मेहर अली और दो वीरांगनाओं- अरुणा आसफ अली और मातंगिनी हाजरा के बिना अधूरी है.

‘लेखक को जनता और सरकार दोनों ग़ुलाम समझती हैं, वह सबकी मर्ज़ी से लिखे तो लेखक कैसा’

एक दिन एक कार्यक्रम में एक युवक ने प्रेमचंद से पूछा कि 'आप कैसे कागज़ पर और किस तरह के कलम से लिखते हैं?' प्रेमचंद ने हंसकर बताया, 'सादे कागज़ पर, ऐसे पेन से, जिसकी निब टूटी हुई न हो. मैं कलम का मज़दूर हूं भाई. ऐसे चोंचलों से कतई काम नहीं लेता कि ख़ास तरह के कलम और कागज़ हों, तभी लिखने का मूड बने.'

सांप्रदायिक बनाए गए दो मामलों में उच्च न्यायालयों के फैसलों से सबक लेंगी मोदी-योगी सरकारें?

बहराइच में ग़ाज़ी मियां की दरगाह और तब्लीग़ी जमात पर एफआईआर को लेकर क्रमशः इलाहाबाद और दिल्ली हाईकोर्ट के फैसलों के बाद कई हलकों में यह सवाल पूछा जा रहा है कि क्या केंद्र और उत्तर प्रदेश की सरकारें इनसे कुछ सबक लेकर अपने मुस्लिम विरोधी सांप्रदायिक एजेंडे से बाज़ आएंगी?

चुनाव आयोग का हाल-बेहाल, संसदीय लोकतंत्र को ख़तरा

बिहार में मतदाता सूची के 'विशेष गहन पुनरीक्षण' के मामले में चुनाव आयोग के रवैए से लगता है कि उसे स्वतंत्र व निष्पक्ष होने की तो दूर दिखने की भी परवाह नहीं रह गई है. होती तो वह चुनाव प्रक्रिया में मतदाताओं की समग्र भागीदारी की पहले से ही मुश्किल राहों की समस्याएं दूर करता, न कि उनकी भागीदारी को और कम करने वाला रवैया अपना लेता.

भाजपा की आस्थाएं इतनी ढुल-मुल और डांवाडोल क्यों रहती हैं?

इस सवाल का जवाब नहीं मिलता कि संघ परिवार तब अपने असली रूप में था, जब उसने हिन्दू राष्ट्र के प्रति अपने तमाम समर्पण के बावजूद भारतीय जनसंघ को जनता पार्टी में विलीन कराया, फिर भाजपा को 'गांधीवादी समाजवादी' बनाया या अब, जब समाजवाद के साथ धर्मनिरपेक्षता को भी संविधान की प्रस्तावना से हटाना चाहता है?

गोपालदास नीरज: ‘मैं उनका हो गया कि जिनका कोई पहरेदार नहीं था!’

पुण्यतिथि विशेष: 19 जुलाई 2018 को 'हिंदी गीतों के राजकुमार' गोपालदास नीरज इस दुनिया को अलविदा कह गए थे. नीरज को आमतौर पर प्रेम, माधुर्य व लय के कवि के तौर पर जाना जाता और कहा जाता है कि प्रेम को वे त्योहार की तरह जीते थे. अपनी इस छवि के बावजूद वे फटी कमीज़ वालों के प्रति इतनी संवेदना बचाकर रख पाए तो शायद इसलिए वे स्वयं भी उन्हीं के बीच से आए थे.

जनांदोलनों की आवाज़ कांतिमोहन ‘सोज़’: इश्क से जंग तलक जो भी किया, खूब किया…

स्मृतिशेष कांतिमोहन 'सोज' यूं तो शिक्षक के तौर पर रिटायर हुए थे, हालांकि यह उनकी पूरी पहचान नहीं बन सका. वे तो कवि/शायर, लेखक व चिंतक के तौर पर जाने गए. जन आंदोलनों से जुड़े उनके कुछ गीत तो इतने मकबूल हुए कि नारों और आंदोलन गीतों के तौर पर इस्तेमाल किए जाने लगे.

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