स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर हम ऐसी आठ महिला स्वतंत्रता सेनानियों को याद कर रहे हैं, जिन्होंने स्वतंत्रता के बहुविध संघर्ष में अपनी भरपूर चमक बिखेरी. इन्हें इस रूप में याद करना इस अर्थ में बहुत प्रासंगिक है कि आज की तारीख में न सिर्फ इनके, बल्कि प्रायः सारी महिला सेनानियों द्वारा स्वतंत्रता संघर्ष में दिए गए योगदानों को विस्मृति के गर्त में धकेल दिया गया है.
1920 में यही अगस्त का महीना था, जब इस देश ने महात्मा गांधी के आह्वान पर ऐतिहासिक असहयोग आंदोलन को शुरू होते और स्वतंत्रता के लिए पहला जनांदोलन बनते देखा. महात्मा का पक्ष समझने के लिए यह जानना ज़रूरी है कि इस आंदोलन से पहले और उसके बीच भी उन्होंने देशवासियों को सत्य व अहिंसा के प्रति प्रेरित और उनके अनुकूल आचरण के लिए तैयार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी.
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान आठ अगस्त, 1942 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने बंबई के ग्वालिया टैंक मैदान से महात्मा गांधी की अगुवाई में 'करो या मरो' के नारे के साथ 'भारत छोड़ो' आंदोलन शुरू किया, तो देशवासियों को ब्रिटिश सत्ता के हाथों बेहद निर्मम दमन चक्र झेलना पड़ा. आज इस आंदोलन की कोई भी चर्चा यूसुफ मेहर अली और दो वीरांगनाओं- अरुणा आसफ अली और मातंगिनी हाजरा के बिना अधूरी है.
एक दिन एक कार्यक्रम में एक युवक ने प्रेमचंद से पूछा कि 'आप कैसे कागज़ पर और किस तरह के कलम से लिखते हैं?' प्रेमचंद ने हंसकर बताया, 'सादे कागज़ पर, ऐसे पेन से, जिसकी निब टूटी हुई न हो. मैं कलम का मज़दूर हूं भाई. ऐसे चोंचलों से कतई काम नहीं लेता कि ख़ास तरह के कलम और कागज़ हों, तभी लिखने का मूड बने.'
बहराइच में ग़ाज़ी मियां की दरगाह और तब्लीग़ी जमात पर एफआईआर को लेकर क्रमशः इलाहाबाद और दिल्ली हाईकोर्ट के फैसलों के बाद कई हलकों में यह सवाल पूछा जा रहा है कि क्या केंद्र और उत्तर प्रदेश की सरकारें इनसे कुछ सबक लेकर अपने मुस्लिम विरोधी सांप्रदायिक एजेंडे से बाज़ आएंगी?
बिहार में मतदाता सूची के 'विशेष गहन पुनरीक्षण' के मामले में चुनाव आयोग के रवैए से लगता है कि उसे स्वतंत्र व निष्पक्ष होने की तो दूर दिखने की भी परवाह नहीं रह गई है. होती तो वह चुनाव प्रक्रिया में मतदाताओं की समग्र भागीदारी की पहले से ही मुश्किल राहों की समस्याएं दूर करता, न कि उनकी भागीदारी को और कम करने वाला रवैया अपना लेता.
इस सवाल का जवाब नहीं मिलता कि संघ परिवार तब अपने असली रूप में था, जब उसने हिन्दू राष्ट्र के प्रति अपने तमाम समर्पण के बावजूद भारतीय जनसंघ को जनता पार्टी में विलीन कराया, फिर भाजपा को 'गांधीवादी समाजवादी' बनाया या अब, जब समाजवाद के साथ धर्मनिरपेक्षता को भी संविधान की प्रस्तावना से हटाना चाहता है?
पुण्यतिथि विशेष: 19 जुलाई 2018 को 'हिंदी गीतों के राजकुमार' गोपालदास नीरज इस दुनिया को अलविदा कह गए थे. नीरज को आमतौर पर प्रेम, माधुर्य व लय के कवि के तौर पर जाना जाता और कहा जाता है कि प्रेम को वे त्योहार की तरह जीते थे. अपनी इस छवि के बावजूद वे फटी कमीज़ वालों के प्रति इतनी संवेदना बचाकर रख पाए तो शायद इसलिए वे स्वयं भी उन्हीं के बीच से आए थे.
स्मृतिशेष कांतिमोहन 'सोज' यूं तो शिक्षक के तौर पर रिटायर हुए थे, हालांकि यह उनकी पूरी पहचान नहीं बन सका. वे तो कवि/शायर, लेखक व चिंतक के तौर पर जाने गए. जन आंदोलनों से जुड़े उनके कुछ गीत तो इतने मकबूल हुए कि नारों और आंदोलन गीतों के तौर पर इस्तेमाल किए जाने लगे.
ज्योति बसु की दृढ़ मान्यता थी कि कितने ही उतार-चढ़ाव आते रहें, एक ऐसा दिन अवश्य आएगा, जब शोषणरहित समाज की स्थापना संभव हो जाएगी. उनकी जयंती पर उन्हें याद कर रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार कृष्ण प्रताप सिंह.
केदारनाथ सिंह अपने अंतिम दिनों में इस बात को लेकर निराश थे कि अकादमिक संस्थानों के तौर पर विश्वविद्यालयों व कॉलेजों की जो प्रतिष्ठा व भूमिका थी, जिसके चलते परिवर्तनकामी लोग उनकी ओर बड़ी उम्मीद की निगाह से देखते थे, वह अब ख़त्म होती जा रही है. उनके जन्मदिन पर उन्हें याद कर रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार कृष्ण प्रताप सिंह.
'दूसरे भगवान' कहलाने वाले चिकित्सकों को याद करते हुए आज हम यह देखने को अभिशप्त हैं कि निजी और सार्वजनिक दोनों क्षेत्रों की स्वास्थ्य सेवाएं अंधाधुंध मुनाफे के प्रति समर्पित हो चली हैं, जिसके चलते न सिर्फ डॉक्टरी पेशे की नैतिकताएं बल्कि हिप्पोक्रेटिक ओथ भी ख़तरे में है.
नागार्जुन प्रायः कहा करते थे कि उन्होंने कवि या कथाकार के रूप में अपनी जनता से जो कुछ भी पाया है, अपने सृजन की मार्फत उसे कुछ बढ़ाकर लौटाना उनकी सबसे जरूरी प्रतिबद्धता है, जिसे वे जनकवि के रूप में जनसाधारण की आवाज़ बनकर ही निभा सकते हैं.
इस वक़्त हमारा देश किसी घोषणा के बगैर ही पूर्ण-विकसित अधिनायकवाद की छाया में जिस आपातकाल का अनुभव कर रहा है, उसकी तुलना में क्या 1975 का आपातकाल लगभग अनुभवहीन अभ्यास नहीं था?
फ़ैज़ाबाद शहर में कपड़ा व्यवसायी के बेटे के तौर पर जन्मे कुंदनलाल गुप्त (जो छुटपन में ही क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़ गए थे) जैसे उस आंदोलन की यही ज़रूरत पूरी करने के लिए बने थे. शिखर पर पहुंचने की चाह से परे, किसी भी व्यक्तिगत उपलब्धि या मान से सर्वथा निर्लिप्त, किसी भी तरह के बलिदान व योगदान के लिए प्रस्तुत और किसी भी प्रतिफल की आकांक्षा से सर्वथा मुक्त.