गोपालकृष्ण गोखले: महात्मा गांधी के राजनीतिक गुरु, लासानी थी जिनकी स्वीकार्यता

जयंती विशेष: अपने समय के अग्रणी नरमपंथी राष्ट्रवादी राजनीतिज्ञ, बुद्धिजीवी, विचारक और समाज सुधारक गोपालकृष्ण गोखले उम्र की नाइंसाफी के कारण अपने 38वें वसंत में ही इस संसार को अलविदा कह गए थे. लेकिन अंतिम सांस लेने से पहले सामाजिक आर्थिक सुधारों व स्वतंत्रता संघर्ष के अभियानों में अपने पल-पल का सदुपयोग किया.

कार्ल मार्क्स, जिन्होंने मनुष्य की मुक्तिकामना को नया आयाम दिया

कार्ल मार्क्स ने न सिर्फ नई राह दिखाई बल्कि उसे प्रशस्त भी किया, तो उसके प्रति ज्यादा नहीं तो थोड़ा कृतज्ञ होना तो उन सबके लिए सामाजिक फ़र्ज़ है, जिन्होंने प्रतिकूल समकालीन परिदृश्य में भी बेहतर दुनिया बनाने के अपने सपनों से न समझौते किए हैं और न उन्हें मरने दिया है.

अंग्रेजों ने वाजिद अली शाह को अपदस्थ किया तो लखनऊ में क्यों नहीं गिरा था एक बूंद भी ख़ून?

तत्कालीन इतिहास के कई ज्ञात तथ्य बताते हैं कि वाजिद अली शाह ने किसी भी तरह के खून-खराबे, टकराव या प्रतिरोध के बगैर कंपनी के हाथों अपने राज्य का अपहरण और अपना निर्वासन सिर झुकाकर स्वीकार कर लिया तो इसके पीछे प्रतिकूल परिस्थितियों का दबाव तो था ही, उन्हें विरासत में मिली वे मजबूरियां भी थीं, जिनके बारे में कहा जाता है कि उनके राग-रंग व विलासिता में डूबे रहने के कारण वे लगातार बढ़ती गई थीं.

सरकार के आतंकवाद से निपटने के दावे: लड़ने कम, लड़ने का भ्रम रचते हुए ज़्यादा

पहलगाम हमले के बाद नरेंद्र मोदी सरकार का जैसा रवैया दिखा है, उसके मद्देनज़र इस सरकार से बस यही कहने का मन होता है कि वह, बरा-ये-मेहरबानी, आतंकवाद से इस तरह न लड़े. ख़ासकर विभाजनकारी हिंदू-मुस्लिम सोच के साथ तो कतई नहीं क्योंकि इसके अपने जोखिम हैं, जो और बड़े भी हो सकते हैं.

शलभ श्रीराम सिंह: तबाह की गई दिलों की ख़ूबसूरती…गोलियों से खेले गए मज़हब और ज़बान के खेल

हिंदी में युयुत्सावाद के प्रवर्तक और बगावत के बोहेमियन कवि के रूप में विख्यात रहे स्मृतिशेष शलभ श्रीराम सिंह के सृजन की खूबसूरती यह है कि विडंबनाओं और नकारात्मकताओं के बीच भी वे किसी नकारात्मकता का आह्वान नहीं करते और समूचे भारतीय समाज व राजनीति में आमूलचूल क्रांति का स्वप्न देखते हैं.

अमेरिका हमेशा ‘चित भी मेरी, पट भी मेरी…’ के फेर में क्यों रहता है?

डोनाल्ड ट्रंप अमेरिकी हितों की रक्षा के लिए मनमाने टैरिफ की राह पकड़कर जिस तरह 'युद्वम देहि' के उद्घोष पर आमादा हैं, उसे महज अहमकाना हरकत समझना ग़लत होगा. वे जो कर रहे हैं, वह उस परंपरा की नई कड़ी है, जहां अमेरिका अपने स्वार्थों के मद्देनज़र बार-बार अपनी नीतियां बदलता रहा है.

राणा सांगा, रामजीलाल सुमन और करणी सेना कांड: उत्तर प्रदेश में यह क्या हो रहा है?

योगी आदित्यनाथ सपा के नेता रामजी लाल सुमन से नाराज़ करणी सेना के रणबांकुरों को अपना 'बंटोगे तो कटोगे' का नारा याद दिलाकर 'एक और सेफ रहने' को क्यों नहीं कह रहे? यह भी नहीं कि सुमन दलित होने के बावजूद भी हिंदू हैं और उनकी टिप्पणी घर का मामला है, जिसे आपसी सहमति से मिल-बैठकर सुलझा लेना चाहिए!

बाबासाहेब, जिन्होंने अपनी राहों के कांटे बुहारकर समाज को सुधारने का संकल्प लिया

बाबासाहेब का अर्थ होता है पिता और बाबासाहेब कहलाने की पात्रता तक की डॉ. बीआर आंबेडकर की राह अनेकानेक कांटों से गुज़रती रही थी. जाति व्यवस्था के विरुद्ध बाबासाहेब के गुस्से को इस तथ्य के आईने में ही ठीक से समझा जा सकता है कि इस व्यवस्था का शायद ही कोई अनर्थ रहा हो जो उनके जीवन और संघर्षों के आड़े न आया हो.

बीदरी कला, जो अवध में कभी अर्श पर थी, मगर अब फ़र्श पर भी नहीं!  

कलाएं अनुकूल परिस्थितियों में आसमान छूती हैं, पर प्रतिकूल परिस्थितियों में रसातल में चली जाने को अभिशप्त हैं. इसकी एक मिसाल अवध में बीदरी कला की है. इस कला में ख़ास तरह की मिश्रधातु को सांचे में ढालकर बनाई गई विभिन्न वस्तुओं पर चांदी-सोने या तांबे आदि के तार से आकर्षक डिज़ाइन उकेरे जाते हैं.

सावधान! फिर विवेक पर हमलावर हैं आस्थाएं

नरेंद्र मोदी की सत्ता के ग्यारह साल बाद आज देश में विवेक व वैज्ञानिक चेतना पर आधारित तर्क-वितर्क की राह और संकटग्रस्त हो गई है और धार्मिक आस्थाएं जरा-जरा-सी बात पर आहत व आक्रामक हुई जा रही हैं.

‘तुम कहो, कहते अगर राम जन्मभूमि है, भाई! ये पाक़ ज़मीं हमने भी तो चूमी है’

हाल के वर्षों में विघ्नसंतोषियों ने जिस तरह राम नवमी के पर्व को अपने कीचड़ सने हाथों से छूकर उस कीचड़ का कुछ हिस्सा इसकी मूल भावना को भी लगा दिया है, तो यह देखना कहीं ज़्यादा ज़रूरी लगता है कि इस दौर में अयोध्या और उसके आसपास के जिलों के शायरों की राम से जुड़ी अभिव्यक्तियां कैसी रही हैं.

बचाने वाला बड़ा होता है तो बापू को बचाने वाले बतख मियां की हेठी अंतहीन क्यों हो गई है?

चंपारण में महात्मा को जहर देकर रास्ते से हटाने की गोरे नील बागान मालिकों की साज़िश को असफल करने वाले बतख मियां विस्मृति के गर्त में ही खोए रहे. विडंबना यह कि महात्मा ने अपनी आत्मकथा लिखी तो जाने क्यों उसमें भी इरविन की उक्त साज़िश और उसे विफल करने में बतख मियां के योगदान का ज़िक्र नहीं किया. 

रमज़ान का वो आख़िरी शुक्रवार, जब हमने ग़ुलामी को कहा था- अलविदा!

1947 में 15 अगस्त को लंबे संघर्ष के बाद जब हमने अपनी सैकड़ों साल लंबी ग़ुलामी से आज़ादी पाई थी, तब उस रोज़ रमज़ान का सत्ताईसवां रोज़ा और आखिरी शुक्रवार था. ऐसे में रमज़ान, जुमातुलविदा और ईद केवल इस्लामी नहीं, हमारी स्वतंत्रता और राष्ट्रीय एकता का उत्सव भी हैं.

शहीद दिवस: भगत सिंह के अरमानों को मंज़िल तक पहुंचाने वाली राह कब की भूल चुके हम…

धर्मांध शक्तियों को न भगत सिंह के जीवन से कुछ सीखना गवारा है, न विचारों से और न शहादत से. आज की तारीख में इस सिलसिले में हम जो कुछ भी देख रहे हैं, यकीनन, वह उसी 'हम नहीं सुधरेंगे' का चरम पर पहुंच जाना है.

सत्ताधीश राजा बनकर लोकतंत्र को राजशाही में क्यों बदलना चाहते हैं?

कई जनप्रतिनिधि ख़ुद को 'द ग्रेट किंग आफ इंडिया' में बदलने के लिए, जितनी जल्दी संभव हो, पुरातन के पुनरुत्थान के अपने महत्वाकांक्षी चक्र को पूरा कर लेना और देशवासियों के नागरिक बनने की प्रक्रिया को उलटकर उन्हें प्रजा बना देना चाहते हैं. पर राजाओं का राज इतना ही अच्छा होता तो लोकतंत्र की ज़रूरत क्यों महसूस होती?

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