राणा सांगा, रामजीलाल सुमन और करणी सेना कांड: उत्तर प्रदेश में यह क्या हो रहा है?

योगी आदित्यनाथ सपा के नेता रामजी लाल सुमन से नाराज़ करणी सेना के रणबांकुरों को अपना 'बंटोगे तो कटोगे' का नारा याद दिलाकर 'एक और सेफ रहने' को क्यों नहीं कह रहे? यह भी नहीं कि सुमन दलित होने के बावजूद भी हिंदू हैं और उनकी टिप्पणी घर का मामला है, जिसे आपसी सहमति से मिल-बैठकर सुलझा लेना चाहिए!

बाबासाहेब, जिन्होंने अपनी राहों के कांटे बुहारकर समाज को सुधारने का संकल्प लिया

बाबासाहेब का अर्थ होता है पिता और बाबासाहेब कहलाने की पात्रता तक की डॉ. बीआर आंबेडकर की राह अनेकानेक कांटों से गुज़रती रही थी. जाति व्यवस्था के विरुद्ध बाबासाहेब के गुस्से को इस तथ्य के आईने में ही ठीक से समझा जा सकता है कि इस व्यवस्था का शायद ही कोई अनर्थ रहा हो जो उनके जीवन और संघर्षों के आड़े न आया हो.

बीदरी कला, जो अवध में कभी अर्श पर थी, मगर अब फ़र्श पर भी नहीं!  

कलाएं अनुकूल परिस्थितियों में आसमान छूती हैं, पर प्रतिकूल परिस्थितियों में रसातल में चली जाने को अभिशप्त हैं. इसकी एक मिसाल अवध में बीदरी कला की है. इस कला में ख़ास तरह की मिश्रधातु को सांचे में ढालकर बनाई गई विभिन्न वस्तुओं पर चांदी-सोने या तांबे आदि के तार से आकर्षक डिज़ाइन उकेरे जाते हैं.

सावधान! फिर विवेक पर हमलावर हैं आस्थाएं

नरेंद्र मोदी की सत्ता के ग्यारह साल बाद आज देश में विवेक व वैज्ञानिक चेतना पर आधारित तर्क-वितर्क की राह और संकटग्रस्त हो गई है और धार्मिक आस्थाएं जरा-जरा-सी बात पर आहत व आक्रामक हुई जा रही हैं.

‘तुम कहो, कहते अगर राम जन्मभूमि है, भाई! ये पाक़ ज़मीं हमने भी तो चूमी है’

हाल के वर्षों में विघ्नसंतोषियों ने जिस तरह राम नवमी के पर्व को अपने कीचड़ सने हाथों से छूकर उस कीचड़ का कुछ हिस्सा इसकी मूल भावना को भी लगा दिया है, तो यह देखना कहीं ज़्यादा ज़रूरी लगता है कि इस दौर में अयोध्या और उसके आसपास के जिलों के शायरों की राम से जुड़ी अभिव्यक्तियां कैसी रही हैं.

बचाने वाला बड़ा होता है तो बापू को बचाने वाले बतख मियां की हेठी अंतहीन क्यों हो गई है?

चंपारण में महात्मा को जहर देकर रास्ते से हटाने की गोरे नील बागान मालिकों की साज़िश को असफल करने वाले बतख मियां विस्मृति के गर्त में ही खोए रहे. विडंबना यह कि महात्मा ने अपनी आत्मकथा लिखी तो जाने क्यों उसमें भी इरविन की उक्त साज़िश और उसे विफल करने में बतख मियां के योगदान का ज़िक्र नहीं किया. 

रमज़ान का वो आख़िरी शुक्रवार, जब हमने ग़ुलामी को कहा था- अलविदा!

1947 में 15 अगस्त को लंबे संघर्ष के बाद जब हमने अपनी सैकड़ों साल लंबी ग़ुलामी से आज़ादी पाई थी, तब उस रोज़ रमज़ान का सत्ताईसवां रोज़ा और आखिरी शुक्रवार था. ऐसे में रमज़ान, जुमातुलविदा और ईद केवल इस्लामी नहीं, हमारी स्वतंत्रता और राष्ट्रीय एकता का उत्सव भी हैं.

शहीद दिवस: भगत सिंह के अरमानों को मंज़िल तक पहुंचाने वाली राह कब की भूल चुके हम…

धर्मांध शक्तियों को न भगत सिंह के जीवन से कुछ सीखना गवारा है, न विचारों से और न शहादत से. आज की तारीख में इस सिलसिले में हम जो कुछ भी देख रहे हैं, यकीनन, वह उसी 'हम नहीं सुधरेंगे' का चरम पर पहुंच जाना है.

सत्ताधीश राजा बनकर लोकतंत्र को राजशाही में क्यों बदलना चाहते हैं?

कई जनप्रतिनिधि ख़ुद को 'द ग्रेट किंग आफ इंडिया' में बदलने के लिए, जितनी जल्दी संभव हो, पुरातन के पुनरुत्थान के अपने महत्वाकांक्षी चक्र को पूरा कर लेना और देशवासियों के नागरिक बनने की प्रक्रिया को उलटकर उन्हें प्रजा बना देना चाहते हैं. पर राजाओं का राज इतना ही अच्छा होता तो लोकतंत्र की ज़रूरत क्यों महसूस होती?

‘अपने रंगों को संभाल लो… तुम्हारे सबसे प्रिय रंग के ख़िलाफ़ साज़िश हो रही है!’

होली आती है तो उसकी हंसी-ठिठोली के बीच यह तक पता नहीं चल पाता कि दुख और पछतावा किधर चले गए. होली के अवसर पर प्रस्तुत है हिंदी साहित्य के जाने-माने लेखकों और कवियों की कविताएं, जो रंगों के इस पर्व को और बेहतर समझने में मदद करती हैं.

लखनऊ जाकर ‘दरियादिल’ कहलाए नवाब आसफउद्दौला फैजाबाद में अभी तक ‘तंगदिल’ क्यों बने हुए हैं?

अवध के नवाब आसफउद्दौला की छवियों में दो ध्रुवों का कहें या आकाश पाताल का अंतर है. लखनऊ में वे नायक हैं, जबकि फैजाबाद में खलनायक. लखनऊ ने जहां उनके वक्त में उनके प्रति खासे कृतज्ञ होकर उनकी प्रजावत्सलता, दरियादिली व दानवीरता का भरपूर बखान किया, वहीं फैजाबाद उन्हें माल व जर की हवस में अपनी हरदिलअजीज मां (बहू बेगम) का खजाना लूटने के लिए अंग्रेजों से मिलकर दल-बल से उन पर चढ़ाई कर देने व उनके दूध को लजाने

अवध के नवाबों के साथ विलासिता की छवि कैसे जुड़ी?

अवध के नवाबों की विलासिता के क़िस्से लोगों के दिल व दिमाग में इस कदर जड़ हो गए हैं कि इस बात का यक़ीन दिलाना मुश्किल है कि आसफउद्दौला (1775-1797) से पहले तक ये नवाब न सिर्फ खुद बेहद पराक्रमी थे, बल्कि अपनी फ़ौज की ताकत से भी कोई समझौता नहीं करते थे.

महाकुंभ 2025: योगी आदित्यनाथ ‘गिद्ध’ और ‘सूअर’ तक क्यों आ पहुंचे?

कुंभ में गिद्धों को लाशों और सूअरों को गंदगियों की 'सौगातें' किसकी कृपा से मिलीं? वह सरकार, जिसने भगदड़ के शिकार हुए निर्दोष श्रद्धालुओं की लाशों को देखकर भी नहीं देखा, वह क्यों ज़िम्मेदार नहीं है? क्या प्रदेश की सत्ता विपक्ष चला रहा है जो वह सारा ठीकरा उसके सिर पर फोड़कर बच निकलेगी?

बैरिकेडिंग से बेहाल अयोध्या: पाबंदियों में जकड़े अयोध्यावासी अब कराहने लगे हैं!

13 जनवरी से ही अयोध्या के राम मंदिर में आ रहे श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए मुख्य मार्गों तक पहुंचाने वाली शहर की प्रायः सारी गलियों व मार्गों पर बैरियर लगाकर बंद कर दिया गया है. बीते सप्ताह इन थोपी गई कड़ी यातायात पाबंदियों के चलते एक स्थानीय भाजपा नेता ने जान गंवा दी.

अमृतलाल नागर: जो साहित्य को कर्म और मानवता को अपना धर्म मानते थे

पुण्यतिथि विशेष: 23 फरवरी, 1990 को पद्मभूषण से सम्मानित अमृतलाल नागर इस दुनिया को अलविदा कह गए. यह कहना कठिन है कि अमृतलाल का दिल लखनऊ में धड़कता था या लखनऊ के दिल में नागर धड़कते थे. वे निरे साहित्यकार नहीं थे. उन्होंने आज़ादी की लड़ाई में भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था-साइमन कमीशन के विरोध से लेकर विदेशी कपड़ों की होली जलाने तक. उन्होंने क्रांतिकारियों तक संदेश पहुंचाने का भी काम किया था.

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