कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: हालांकि आदिकवि वाल्मीकि को माना जाता है, वैदिक ऋषि, जिनमें कई ऋषिकाएं और संभवतः आदिवासी ऋषि भी शामिल हैं, हमारे आदिकवि हैं. ऋग्वेद हमारा प्रथम काव्यग्रंथ है. ऋग्वेद के प्रथम मंडल के 112 सूक्तों का मुकुन्द लाठ द्वारा किया गया हिंदी अनुवाद इसी सप्ताह प्रकाशित हुआ है.
9 अगस्त, 1945 को नागासाकी पर अमेरिका ने परमाणु बम गिराया, उसके तीन दिन पहले हिरोशिमा पर भी ऐसा ही हमला हुआ था. अज्ञेय की कविता ‘हिरोशिमा’ इस त्रासदी का साक्ष्य है.
पुस्तक समीक्षा: शाहू पटोले की ‘दलित किचेंस ऑफ मराठवाड़ा’ भूख, जाति और भोजन के जटिल रिश्तों का मार्मिक बयान है. यह बताती है कि कैसे दलित समाज ने संसाधनों के अभाव में भी अपनी खाद्य संस्कृति बचाई, और भोजन को हथियार बनाकर किए गए जातिगत शोषण का साहसपूर्वक सामना किया.
कुछ कवि सचमुच पूरे विश्व के होते हैं. शेक्सपियर के जन्म स्थान के एक शांत स्थल पर रबींद्रनाथ टैगोर की मूर्ति को देखकर मुझे लगा कि गुरुदेव को भी यह जगह पसंद आती. बंगनामा की तीसवीं क़िस्त.
हिंदी की वैचारिकी अमूमन प्रेमचंद और तुलसीदास के बीच एक द्वैध स्थापित करती है, दोनों मूर्धन्यों को दो विपरीत किनारों पर ठहरा देती है. लेकिन क्या वाक़ई ऐसा था? प्रेमचंद उन्हें हिंदी का सर्वश्रेष्ठ कवि कहते थे. अगर तुलसीदास के प्रति प्रेमचंद के दृष्टिकोण को देखें तो स्थिति शायद कहीं जटिल नज़र आती है. पढ़िए कवि-गद्यकार व्योमेश शुक्ल का प्रेमचंद पर एक और मारक लेख.
पुस्तक अंश: 5 अगस्त 2019 को केंद्र सरकार के ऐतिहासिक फैसले के बाद जम्मू-कश्मीर के हालात पर केंद्रित रोहिण कुमार की पुस्तक ‘लाल चौक’ का एक अंश.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: कृष्ण बलदेव वैद इस 27 जुलाई को 98 बरसके हो गए होते. वे अपने ढंग के अप्रतिम लेखक थे. उनके भीतर बेबाकी और आत्म की निर्मम चीरफाड़ थी, और उसके साथ परम वेध्यता व अपने लिखे-जिए पर भरोसा भी.
विचार देखी जा रही वस्तु या घटना के अवयवों को चुनने में हमारी सहायता करते हैं. विचारधारा इसे और भी सरलीकृत कर देती है. वह क्या देखना है, यह चुनकर हमें दे देती है. यह खंडित दृष्टि है और इस खंडित दृष्टि से देखने के लिए मनुष्य अभिशप्त है. आशुतोष दुबे का कवि-कर्म इसका विकल्प प्रस्तुत करता है. पढ़िए अम्बर पाण्डेय का सारगर्भित लेख.
मिथिलेश प्रियदर्शी की पुरस्कृत संग्रह की कहानियों की मुख्य विषयवस्तु हिंसा है. राज्य की हिंसा, राज्य द्वारा प्रायोजित हिंसा, क्रांतिकारी हिंसा, विचारधारात्मक हिंसा, सामाजिक हिंसा, व्यक्तिगत हिंसा और अंतर्वैयक्तिक हिंसा के कई संस्करण इन कहानियों में हत्या और अपराध की गहरी, आस्तित्विक छानबीन की प्रक्रिया में आते हैं.
जवाहर लाल नेहरू और डॉ. कैलाशनाथ काट्जू के बीच परस्पर सम्मान का रिश्ता था. मोतीलाल नेहरू की मृत्यु के बाद उनकी राजनैतिक विरासत जवाहर लाल को और वकालत की विरासत काट्जू को हस्तांतरित हुई थी. सारंगढ़ के गिरिविलास पैलेस में काट्जू के लिखे अनेक पत्र संरक्षित हैं.
जयंती विशेष: प्रेमचंद की दृष्टि में साहित्य की कई परिभाषाओं में सबसे सार्थक परिभाषा यह थी कि साहित्य जीवन की आलोचना है. उन्होंने अपने कथा-संसार के लिए पात्र गढ़े नहीं हैं, बल्कि जीवन से उठा कर अपने रचनात्मक संसार में प्रस्तुत किया है.
बनारस में प्रेमचंद के अनेक संस्मरण हैं. कहीं वे नेहरू से बौद्धिक विमर्श कर रहे हैं, तो कहीं उन्हें महादेव का स्वरूप मान कर पूजा जा रहा है. उनकी जयंती पर पढ़ें इन रंगों और दृश्यों से रचा गया काशी के प्रतिनिधि स्वर व्योमेश शुक्ल का यह लेख.
एक दिन एक कार्यक्रम में एक युवक ने प्रेमचंद से पूछा कि 'आप कैसे कागज़ पर और किस तरह के कलम से लिखते हैं?' प्रेमचंद ने हंसकर बताया, 'सादे कागज़ पर, ऐसे पेन से, जिसकी निब टूटी हुई न हो. मैं कलम का मज़दूर हूं भाई. ऐसे चोंचलों से कतई काम नहीं लेता कि ख़ास तरह के कलम और कागज़ हों, तभी लिखने का मूड बने.'
नागरीप्रचारिणी सभा को हाल ही प्रेमचंद की दो कालजयी कहानियों, ‘पंच परमेश्वर’ और ‘ईश्वरीय न्याय’, की दुर्लभ पांडुलिपियां मिली हैं. ये हस्तलेख ‘सरस्वती’ पत्रिका में प्रकाशन के लिए भेजे गए थे. यह खोज हिंदी साहित्य के अभिलेखागार का एक महत्वपूर्ण हासिल है.
मोदी युग का हिंदुत्व सिनेमा एक नया अवतार है. नाज़ी युग के सिनेमा की तरह, हिंदुत्व फ़िल्में न केवल अपनी कट्टरता को पूरी तरह से उजागर करती हैं, बल्कि उसका भौंडा प्रदर्शन भी करती हैं.