भारतीय लोकतंत्र को अब 'नारी वंदन' से आगे बढ़ना होगा. वंदन में हमेशा एक ऊंच-नीच छिपी रहती है. कोई ऊपर है, कोई नीचे, कोई हाथ जोड़ रहा है, कोई पूजित है. लोकतंत्र का संबंध वंदन से नहीं, सहभागिता से है.
प्रिय झाल-मूढ़ी, तुम राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बन गई हो. यह वही देश है जहां अक्सर मुद्दे अपनी बारी का इंतज़ार करते-करते बूढ़े हो जाते हैं, पर तुमने तो आते ही लाइन तोड़ दी, सीधे बहस और विमर्श के केंद्र में. अचानक मिले ‘राष्ट्रीय सम्मान’ का आनंद लो पर उससे भ्रमित मत हो जाना. इस देसी भक्ति-विशेष की कृपा से ऐसी ‘अल्पकालिक चर्चाएं’ हमने पहले भी देखी हैं, जहां मुद्दे नहीं, मौके चमकते हैं; और सरोकार नहीं, साउंडबाइट्स टिकते हैं.
भारत में घर की जाति नहीं होती, यह वैसा ही वाक्य है जैसे कोई कहे कि लाठी की कोई विचारधारा नहीं होती. सही है, लाठी की नहीं होती; जिस पीठ पर टूटती है, उसकी होती है. घर की जाति नहीं होती, बस देश को उसे पहचानने का पुराना संस्कार है! फिर किसी दिन संसद में कोई कह देगा कि घर की जाति नहीं होती, और सत्तापक्ष की बेंचों पर बैठे लोग ऐसे मुस्कुराएंगे जैसे उन्होंने समाजशास्त्र को अभी-अभी मात दे
लोकसभा में केंद्रीय गृह मंत्री का कहना कि 'घरों की कोई जाति नहीं होती'- सुनने में सहज कथन लगे, पर व्यवहार में वह उस सच्चाई से आंख मूंद लेने जैसा है, जिसे देश का एक बड़ा हिस्सा रोज़ जीता है. आज भी देश के अनेक हिस्सों में बस्तियां जाति आधार पर विभाजित हैं और यह फांक केवल सामाजिक व्यवहार तक सीमित नहीं है.
नरेंद्र मोदी और अमित शाह के जीवन की बड़ी उपलब्धि है कि उन्होंने साबित कर दिया कि बिहार की राजनीतिक बुद्धिमत्ता बाकी प्रदेशों से अलग नहीं है. नीतीश कुमार ने जिस बिहार के दम पर मोदी को चैलेंज करना चाहा, मोदी ने उस बिहार से ही नीतीश को बाहर कर दिया. यह सत्य है और भारत की राजनीति में हिसाब चुकाने की बड़ी घटना है.
महात्मा ज्योतिबा फुले का सारा जीवन और उनके सारे कार्य यह सिद्ध करते हैं कि शिक्षा, तर्क और समानता से ही समाज की जड़ें बदल सकती हैं. उन्होंने अपने साहित्य और सामाजिक आंदोलनों के माध्यम से यह दिखाया कि जाति और लिंग के बंधनों से मुक्त समाज ही सच्चे अर्थों में न्यायपूर्ण समाज है.
यह विधेयक औपनिवेशिक दौर में 'हिजड़ा समुदाय' पर हुए दमन की पुनरावृत्ति करता है और ट्रांसजेंडरों की दैहिक निजता व स्वायत्तता का उल्लंघन करता है. विडंबना है कि उपनिवेशवाद से मुक्ति के दावों के बीच हमारी सत्ता उसकी विकृतियों को दोहरा रही है. यह विधेयक उसका ताजा उदाहरण है.
ईरान ठीक कह रहा है कि प्रश्न युद्धविराम का नहीं, युद्ध कभी न हो, इसका है. इसकी गारंटी कौन करेगा? दुनिया में ऐसी कोई नैतिक शक्ति नहीं जो स्थायी शांति के लिए पहले लेने का साहस कर सके. कभी पूरी दुनिया में अपने नैतिक स्वर के कारण सुने जाने वाले भारत की बोलती बंद है.
विचारधारात्मक राजनीति की वकालत करते हुए उद्देश्य आधुनिक संप्रेषण को अस्वीकार करना नहीं, बल्कि उसके मूल अर्थ के उपनिवेशीकरण का प्रतिरोध करना है. राज्य और नागरिक के बीच संबंध को एक लेन-देन के रूप में नहीं, बल्कि पारस्परिक ज़िम्मेदारी पर आधारित संवाद के रूप में पुनर्परिभाषित किया जाना चाहिए. हमें स्पष्ट रूप से कहना चाहिए कि नागरिक शासन के उपभोक्ता नहीं हैं; वे उसके निर्माण में सहभागी हैं.
फ़ासीवादी या अर्ध-फ़ासीवादी राजनीति से लड़ने का पहला नियम होता है कि आप अपने मुख्य प्रतिद्वंद्वी और गौण प्रतिद्वंद्वी के बीच फ़र्क बनाए रखें. केरल में एलडीएफ को हराने की बेचैनी समझी जा सकती है; पर राहुल गांधी की भाषा रणनीतिक परिपक्वता का संकेत नहीं दे रही है. एलडीएफ को आरएसएस के बराबर ठहरा देना राजनीतिक बुद्धिमत्ता नहीं, बौद्धिक उतावलापन है.
फोटोग्राफर जूलिया बुरुलेवा के 'गुलाबी हाथी' फोटोशूट को लेकर हुआ विवाद इस कड़वे सच को सामने लाता है कि समाज में जानवरों के साथ होने वाली कई क्रूरताएं सामान्य मान ली जाती हैं, और हमारा ग़ुस्सा कुछ ख़ास घटनाओं पर ही बाहर आता है. घंटों तक ऊंट या हाथी की सवारी, पिंजरे में क़ैद पंछी, शादी-समारोहों में लगाम से बंधे लंगड़ाते, कई बार तो चोटिल घोड़ों को संवेदनशीलता की नज़र से देखा तक नहीं जाता.
आज लोकतंत्र में हाल यह हो गया है कि असहमतियों की बरबस अवहेलना कर उन्हें ख़ामोश कराने की सरकारी 'परंपरा' इतनी सुदृढ़ हो चली है कि अब गंभीर आलोचनाओं की कौन कहे, हंसी-मज़ाक के स्तर पर भी उन्हें बर्दाश्त नहीं किया जा रहा. कार्टून और एनीमेटेड वीडियो तक सेंसर किए जा रहे हैं. ऐसी टिप्पणियां, जिन्हें हंसकर टाला जा सकता है, उनके ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज कराई जा रही है.
पूंजीवाद ने गरीबों से उनकी तमाम अच्छी चीज़ें एक-एक कर छीनी है, इसमें अगला नंबर किताबों का है. कुछ समय बाद किताबें अमीरों का प्रिविलेज बन जाएंगी. वैसे ही, जैसे अब मोटा अनाज खाना, पैदल 10,000 क़दम चलना या साइकिल से दफ्तर जाना संभ्रांत तबके का शौक बना चला है.
समाचार माध्यमों में हमले कर 'दुश्मन' के संसाधनों को तहस-नहस किए जाने की ख़बरें तो भरपूर आ रही हैं, लेकिन निर्दोष नागरिकों के जान माल को पैदा हुए संकटों की बाबत खबरों का अकाल पड़ा हुआ है. न्यूज चैनलों पर युद्धों को नाटकीय संगीत और ग्राफिक्स के साथ कुछ इस तरह प्रस्तुत किया जा रहा है, जो उसे जानकारीपरक बनाने के बजाय 'मनोरंजक' बनाए दे रहा है.
पश्चिम एशिया के अनेक संघर्ष इस बात के साक्षी हैं कि त्वरित सैन्य जीत की कल्पना अक्सर दीर्घकालिक अस्थिरता में परिवर्तित हो जाती है. जब किसी समाज की पहचान, उसकी आस्था और उसकी ऐतिहासिक स्मृति दांव पर होती है, तब संघर्ष केवल भौतिक नहीं रहता; वह एक वैचारिक और नैतिक आयाम ग्रहण कर लेता है. ऐसे में 'जीत' और 'हार' के पारंपरिक मानदंड अप्रासंगिक हो जाते हैं.