हिंदुत्व की ओर बढ़ता जामिया: एक विश्वविद्यालय की बदलती पहचान

औपनिवेशिक शासन के ख़िलाफ़ आज़ादी के संघर्ष के दौरान जामिया को 'एक-एक पत्थर और एक-एक कुर्बानी' से खड़ा किया गया था. आज वही संस्थान भीतर से चुपचाप इस तरह बदला जा रहा है कि उसकी लोकतांत्रिक, बहुलतावादी और आलोचनात्मक विरासत धीरे-धीरे कमज़ोर पड़ती जा रही है.

अयोध्या: चढ़ावा चोरी से आगे सवाल और भी हैं…

राम मंदिर में जिस तरह का भ्रष्टाचार हुआ है, उसको कोई भी नाम क्यों न दिया जाए, वह अपराध की श्रेणी में ही आएगा,और चूंकि भ्रष्टाचार समेत सारे अपराध, वे किसी भी स्थान या किसी भी प्रकृति वाले संस्थान में क्यों न किए गए हों, राज्य के विरुद्ध किए गए माने जाते हैं, इसलिए ऐसा नहीं हो सकते कि उनके विरुद्ध सिर्फ वहीं आवाज़ उठाए, जिसने कभी कोई अपराध न किया हो.

राम मंदिर की कथित लूट: संघ की ‘चरित्र निर्माण’ की राजनीति कठघरे में है

राष्ट्रीयकृत बैंकों के अधिकारियों की निगरानी और सीसीटीवी कैमरों की पूरी मौजूदगी में राम मंदिर में हुई यह 'डकैती' एक ऐसा अवसर बन गई है, जिसने 'संघ परिवार' की भीतर गहरी सड़ांध को उजागर कर दिया है, जो लोग स्वयं को राष्ट्र का चरित्र-निर्माता बताते रहे, वे जनता के सामने बेनकाब हो गए हैं. उनके उपदेशों और व्यवहार के बीच की गहरी खाई अब साफ़ दिखाई देने लगी है.

मक्का मस्जिद विस्फोट केस: ग़लत तरीके से मुस्लिम युवाओं को फंसाए जाने और उससे निकलने का संघर्ष

दिसंबर 2011 में आंध्र प्रदेश सरकार ने घोषणा की थी कि वह उन 70 युवा मुस्लिम पुरुषों को मुआवज़ा देगी, जिन्हें 2007 के मक्का मस्जिद धमाका मामले में ग़लत तरीक़े से फंसाया गया, पुलिस हिरासत में जिन्हें यातनाएं दी गईं, और आख़िरकार अदालत ने जिन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया. बाद में सीबीआई और राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने 10 आरोपियों के ख़िलाफ़ चार्जशीट दायर की, जो सभी अभिनव भारत संगठन के सदस्य थे.

चढ़ावा चोरी के बहाने ‘चोरों’ की कहानियां

चढ़ावा चोरी के प्रसंग में उपज आए ज्ञानीजन बताते हैं कि उनके शास्त्र में चोरी को चोरी की तरह न कर पाने और हेराफेरी या सीनाज़ोरी पर उतर आने वाले चोरों को कतई ‘कलाकार’ नहीं माना जाता. तब माना जाता है, जब वे देखते-देखते अपने शिकार की आंखों से काजल निकाल लें और आंखवाले को भनक तक न लगे. कहते हैं कि चढ़ावा चोरों ने भी कुछ ऐसा ही चमत्कार करने की सोची थी, मगर विफल रह गए.

जब सिनेमा इतिहास को फिर से लिखने लगे: इतिहास लेखन की एक चेतावनी

इतिहास लेखन सिखाता है कि इतिहास कभी बंद ग्रंथ नहीं होता. वह अतीत और वर्तमान, प्रमाण और व्याख्या, स्मृति और अर्थ के बीच चलने वाला निरंतर संवाद है. जब यह संवाद एकालाप में बदल जाता है, तब इतिहास भी क्षीण होता है और समाज भी. सिनेमा अतीत को प्रकाशित कर सकता है, बशर्ते वह विनम्रता के साथ स्वयं को अंतिम सत्य नहीं, बल्कि एक बड़े और जटिल संवाद का सहभागी माने.

ट्रंप का इतिहास या इतिहास पर कब्ज़ा? ह्वाइट हाउस की दीवारों पर गढ़ा जा रहा है सत्ता का निजी आख्यान

हर आधुनिक नेता जानता है कि इतिहास केवल अतीत नहीं है. इसलिए सत्ता केवल क़ानून नहीं बदलती; वह पाठ्यपुस्तकें बदलती है, स्मारक बनाती और गिराती है, संग्रहालयों की भाषा बदलती है, राष्ट्रीय नायकों की सूची संशोधित करती है और खलनायकों की पहचान तय करती है. ह्वाइट हाउस के वेस्ट विंग को राष्ट्रपति निवास से जोड़ने वाले एक गलियारे में ट्रंप की लगाई प्रदर्शनी उसी वैश्विक प्रवृत्ति का अमेरिकी संस्करण है.

चंपत राय व अनिल मिश्र के इस्तीफ़े: बिना नैतिकता का नैतिक आधार!

संघ परिवार न हिंदू नैतिकता को मानने को तैयार हैं, न संवैधानिक नैतिकता को और अगर कोई भारतीय नैतिकता है तो उसे वह सर्वाधिक दरकिनार करता है. इसीलिए ख़ुद को समस्त हिंदुओं का रहनुमा और संरक्षक बताने के बावजूद वह 'उसके' भव्य और दिव्य राम मंदिर की दानराशि की ईमानदारी से रखवाली नहीं कर पाया.

लाल दास के सवाल: अयोध्या के भूले-बिसरे पुजारी की कहानी और एक अनसुलझी हत्या

लाल दास का महत्व केवल उनकी हत्या में नहीं है. उनका महत्व इस बात में है कि वे एक वैकल्पिक सोच का प्रतिनिधित्व करते थे. वे मानते थे कि धार्मिक आस्था के साथ जवाबदेही भी जरूरी है. आज जब अयोध्या फिर से जवाबदेही और पारदर्शिता से जुड़े सवालों के बीच चर्चा में है, तब लाल दास की कहानी हमें याद दिलाती है कि ऐसे सवाल नए नहीं हैं.

क्या जवाहरलाल नेहरू 1947 से 1952 तक ‘निर्वाचित प्रधानमंत्री’ नहीं थे?

अंतरराष्ट्रीय इतिहासकार, संवैधानिक विशेषज्ञ और वैश्विक संस्थाएं नेहरू को 15 अगस्त, 1947 से ही भारत का पूर्ण रूप से वैध प्रधानमंत्री मानती हैं. इसी दौरान नेहरू ने संयुक्त राष्ट्र में भारत का प्रतिनिधित्व किया, कई वैश्विक संधियां कीं और 1952 से पहले ही दुनिया में भारत की विदेश नीति की मजबूत नींव रखी. काश, इन सबके आलोक में ये भक्त समझ पाते कि नेहरू के 1947 से 1952 तक के कार्यकाल को नकारना या उसकी हेठी करना देश के बुनियादी

क्या हिंदुत्व द्वारा दहशतगर्दी फैलाने का कोई प्रोजेक्ट देश में मौजूद है?

21वीं सदी के पहले दशक में कई ऐसे आतंकी हमले हुए जिनमें मुस्लिम धार्मिक या सांस्कृतिक सभाओं या आम नागरिकों को निशाना बनाकर धमाके किए गए. पुलिस ने शुरू में मुस्लिम पुरुषों पर आरोप लगाए और उन्हें जेल में डाल दिया, लेकिन समय के साथ- कभी-कभी तो दशकों बाद- इन्हें बरी और रिहा किया गया. इसके बाद नई जांच शुरू हुई, जिसमें 'हिंदुत्व' संगठनों के सदस्यों के ख़िलाफ़ आरोप दायर किए गए.

हिंदुत्व का प्रभुत्व: किसके पास बची है अपना आराध्य चुनने की आज़ादी?

मीडिया यह मानकर चलता है कि हिंदू धर्म से अलग विश्वास जताने वाला व्यक्ति अवश्य किसी बड़ी साज़िश का हिस्सा होगा और निस्संदेह स्वयं निर्णय लेने में सक्षम नहीं होगा. वह व्यक्ति वोट दे सकता है, विवाह कर सकता है, संतान उत्पन्न कर सकता है; क़ानून उसे इन सबके लिए वयस्क मानता है. लेकिन वह स्वयं अपना ईश्वर या ख़ुदा नहीं चुन सकता.

तृणमूल का संकट केवल दलबदल नहीं, एक राजनीतिक मॉडल के पतन की कहानी है

अदालतें उसके विधायकों को बचा सकती हैं, चुनाव आयोग उसका चुनाव-चिह्न बचा सकता है और लोकसभा अध्यक्ष उसके सांसदों की सीटें तय कर सकते हैं. लेकिन तृणमूल को उसका खोया हुआ नैतिक भूगोल केवल बंगाल की जनता लौटा सकती है.

अयोध्या: राम मंदिर के चढ़ावे के गबन का विवाद आगे कौन-सा मोड़ लेगा?

अयोध्या के चढ़ावे के गबन मामले में कई प्रतिप्रश्न अभी तक अनुत्तरित हैं. यह कि अगर कोई उल्लेखनीय बात सामने नहीं आई तो ट्रस्ट ने प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार से जांच के लिए एसआईटी क्यों गठित करवाई? ऐसी एसआईटी, जिसके सदस्यों की ही निष्पक्षता पर गंभीर संदेह हैं. विरोधी तो कह रहे हैं कि इस एसआईटी जांच के पीछे ट्रस्ट की मंशा सच सामने लाने की नहीं, सीबीआई या ईडी की जांच से बचने की है.

अयोध्या के राम मंदिर में चोरी: क्या अब फल देने लगा है घृणा का बीज?

सत्य धर्म संवाद के संयोजक स्वामी राघवेंद्र का तर्क है कि राम मंदिर के चढ़ावे से करोड़ों रुपये की कथित चोरी कोई अलग घटना नहीं, बल्कि उस राजनीतिक प्रक्रिया का परिणाम है जिसकी शुरुआत अयोध्या आंदोलन से हुई थी. उनका यह आलेख मंदिर, राजनीति, चंदा प्रबंधन और जवाबदेही से जुड़े सवालों को सामने रखता है.

1 2 3 57