मालवीय नगर में लगी आग के बाद नियमों की अनदेखी पर होटल के मालिक ने कहा कि 'दिल्ली में सब चलता है!' गौर करें कि ऐसा सिर्फ दिल्ली नहीं, दूसरी जगहों पर भी चल रहा है, इसीलिए लापरवाहियों का सिलसिला अनंत है. 'चलता है' के कारण स्थिति यह है कि किसी को पता नहीं होता कि अचानक कोई आवासीय क्षेत्र व्यावसायिक क्षेत्र में कैसे बदल गया? कैसे किसी नामी अस्पताल के खुलने के बाद हर घर में होटल, रेस्तरां या
मौलाना मोहम्मद बरकतउल्लाह भोपाली भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उन अग्रणी क्रांतिकारियों में से थे, जिन्होंने देश के बाहर रहकर ब्रिटिश शासन के ख़िलाफ़ अभियान चलाया. अब उनके नाम वाले बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय का नाम बदलकर 'मां वाग्देवी भोजपाल विश्वविद्यालय' किए जाने की प्रक्रिया शुरू हो चली है, जिसे लेकर स्थानीय लोगों में नाराज़गी है.
मनरेगा केवल कागज पर लिखा कानून नहीं था, बल्कि हर गांव में लोकतंत्र का जीवंत उदाहरण बन गया. नई व्यवस्था (वीबी-ग्रामजी योजना) में काम केवल उन्हीं गांवों में उपलब्ध होगा जिन्हें केंद्र सरकार चुनेगी. इस तरह अधिकार प्राप्त नागरिक को निर्भर लाभार्थी में बदल दिया गया. लाखों मजदूरों के लिए जो पहले एक कानूनी अधिकार था, वह अब नौकरशाही की कृपा पर निर्भर हो गया.
इन बच्चों के सपनों को क्या हुआ? कुछ केमिकल फॉर्मूला रट लेना है या इक्वेशन सॉल्व करना ही इनके ख़्वाब हैं? ऊपर से या तो पेपर लीक हो जाता है या फिर कॉपी ग़लत चेक हो जाती है? क्या दे रहे हैं हम अपने बच्चों को?
एक औरत अपने परिवार और समाज की महज़ एक जायदाद है, उससे ज़्यादा कुछ नहीं है- एक ऐसी 'ट्रॉफ़ी' जो उनकी इज़्ज़त की निशानी है. इस 'इज़्ज़त' की हिफ़ाज़त के नाम पर उसकी अपनी इच्छाओं, उसकी अपनी पसंद और उसकी अपनी ख़ुशियों की बलि चढ़ाई जा सकती है. और, कभी-कभी तो उसकी जान की भी.
ट्रांस संशोधन क़ानून ट्रांस अधिकारों की सुरक्षा के नाम पर ‘वास्तविक पीड़ित’ ट्रांस लोगों की एक नई श्रेणी बनाता है. हालांकि, आलोचकों का कहना है कि यह क़ानून ट्रांस पहचान को संकीर्ण जैविक और सामाजिक-सांस्कृतिक दायरों में बांधते हुए निगरानी, अपराधीकरण और राज्य नियंत्रण को वैधता देता है.
'इतिहास को पढ़िए, उसकी आलोचना कीजिए, उससे सीखिए भी. लेकिन वर्तमान की समस्याओं का समाधान इतिहास के कब्रिस्तान में नहीं मिलेगा. बेरोज़गार युवा को नौकरी चाहिए, इतिहास का अभियुक्त नहीं. महंगाई से परेशान परिवार को राहत चाहिए, सत्तर साल पुरानी बहस नहीं.'
अगले साल देश की सबसे ज्यादा जनसंख्या और लोकसभा व विधानसभा सीटों वाले राज्य उत्तर प्रदेश में चुनाव होने हैं. भले ही तब भाजपा का उत्तर प्रदेश में पहली बार कमल खिलाने की पश्चिम बंगाल जैसी चुनौती से सामना नहीं होगा, पर चूंकि वह नरेंद्र मोदी सरकार और 18वीं लोकसभा के कार्यकाल के लगभग मध्य का समय होगा, इसलिए प्रेक्षक चुनाव नतीजों को अगले लोकसभा चुनावों के सेमीफाइनल के रूप में देखेंगे.
डिजिटल दुनिया में हमारी यादें अब सिर्फ तस्वीरों और संदेशों तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि एक विशाल ‘डेटा विरासत’ बन चुकी हैं. यह लेख बताता है कि मृत्यु के बाद हमारा डिजिटल डेटा, एआई क्लोन्स और ऑनलाइन अकाउंट्स कैसे कानूनी, नैतिक और पर्यावरणीय संकट पैदा कर रहे हैं, और ‘डिजिटल अमरता’ का सच क्या है.
पिछले बारह वर्षों से देश में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा-शासित कई राज्य सरकारों ने न केवल धर्म परिवर्तन विरोधी क़ानूनों को अधिक कठोर बनाया है, बल्कि इन क़ानूनों को एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया गया है, ताकि मुस्लिम पुरुषों और हिंदू महिलाओं के बीच होने वाली शादियों- और यहां तक कि लिव-इन संबंधों-को प्रभावी ढंग से हतोत्साहित कर उन्हें अपराध की श्रेणी में रखा जा सके.
ज़्यादातर लोगों को लगता है कि आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस इतना ताक़तवर हो जाएगा कि हमारी नौकरियां खा जाएगा, क्योंकि वह इंसान का काम इंसान से ज़्यादा तेज़ और सस्ता कर देगा. जबकि यह आधी सच्चाई है, और आधा प्रोपगैंडा है, जो एआई के असली आर्थिक ख़तरे को छिपाने में मदद करता है.
जब भी भारत के अतीत और भविष्य पर बात होगी तो नेहरू के वैचारिक खुलेपन की याद आएगी. देश को उस दिशा में बढ़ना होगा जिसकी तरफ़ नेहरू जाना चाहते थे- समावेशी और उदार भारत की तरफ़.
देश में उपभोक्ता विवादों के त्वरित निपटारे के लिए बनी व्यवस्था गंभीर संकट से गुजर रही है. आयोगों में रिक्त पद, संसाधनों की कमी और लंबी देरी ने लोगों का भरोसा कमजोर किया है. ऐसे में सवाल है कि नए कानून लाने से पहले मौजूदा तंत्र को मजबूत क्यों नहीं किया जा रहा.
सरकार ने जनता को समझाने का अद्भुत तरीका खोज लिया है. अब यदि पेट्रोल महंगा हो तो समझिए विदेश नीति मजबूत हो रही है. डीज़ल और महंगा हो जाए तो मान लीजिए भारत विश्वगुरु बनने की दिशा में निर्णायक कदम उठा चुका है.
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा है कि समान नागरिक संहिता (यूसीसी) का कोई प्रावधान आदिवासी समुदायों पर लागू नहीं होगा. हालांकि, आदिवासी संगठनों के बीच इस क़ानून को लेकर लंबे समय से आशंकाएं बनी हुई हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या केवल राजनीतिक आश्वासन पर्याप्त हैं, या आदिवासी अधिकारों की संवैधानिक और क़ानूनी सुरक्षा को लेकर स्पष्ट गारंटी की आवश्यकता है.