क्या भारत में हेट क्राइम के मामलों में न्यायिक विवेक अपराध की प्रकृति से ज़्यादा आरोपी की पहचान से प्रभावित होता है? हर्ष मंदर का तर्क है कि भारतीय न्याय व्यवस्था और राज्य की प्रतिक्रिया में मुस्लिम और हिंदू पहचान वाले आरोपियों के प्रति अलग-अलग मानदंड दिखाई देते हैं.
बांकीपुर सरकारी कर्मचारियों, मध्यवर्गीय परिवारों, पुराने पटना के प्रतिष्ठित मोहल्लों और परंपरागत भाजपा समर्थक उच्च जातीय समूहों वाली सीट है. यहां जीतने का अर्थ केवल विरोधी दलों के वोट बटोरना नहीं, भाजपा के सुरक्षित सामाजिक खाते में सेंध लगाना है.
बीते दिनों अयोध्या में ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के पहुंचने पर सपा के नेता सभा-समारोहों में उत्साह से भाग लेते दिखे, उससे पहले पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने लखनऊ में शंकराचार्य से मिलने के बाद एक्स पर 'जो सनातन है, वही समाजवाद है' लिखा था. ये सब घटनाक्रम मिलकर इस धारणा को बल दे रहे हैं कि आगामी चुनाव से पहले अखिलेश भाजपा द्वारा बनाई पार्टी की 'हिंदूविरोधी' छवि बदल देना चाहते हैं.
भाजपा सरकारें श्रावण मास का स्वागत पूरे-पूरे पृष्ठों के विज्ञापनों के माध्यम से करती हैं. मानो अब आसमान के रंग से नहीं, इन्हीं विज्ञापनों से लोगों को सावन के आने की सूचना मिलेगी. कभी कृष्ण ने कहा था, उठो, पार्थ, गांडीव संभालो! अब सरकारें कहती हैं, श्रावण आ गया है. हे हिंदुओ, जागो, कांवड़ उठाओ.
एक अध्ययन के अनुसार नरेंद्र मोदी के बारह साल के सत्ताकाल में तक़रीबन दो सौ सांसदों और विधायकों ने दूसरी पार्टियों को छोड़कर भाजपा में दलबदल किया. हर चार दलबदलू सांसदों-विधायकों में से तीन से ज़्यादा को भाजपा ने अपनी गोद में बिठाया और आधे-पौने ही उसके बजाय कहीं और गए. भाजपा में शामिल हुए 68 प्रतिशत सांसद-विधायक पहले कांग्रेसी हुआ करते थे.
यदि कोई वयस्क, ख़ास तौर पर महिला यह तय ही न कर सके कि वह किसका हाथ थामना चाहती है और किसका हाथ छोड़ना, तो व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संवैधानिक वादा खोखला रह जाता है. सच्ची स्वतंत्रता में ग़लती करने की स्वतंत्रता भी शामिल होती है, आप अपनी ग़लतियों से सीखते हैं, आगे बढ़ते हैं. 'सुरक्षा' के नाम पर उनसे निर्णय लेने का अधिकार छीनना, अक्सर उन संभावित ग़लतियों से कहीं अधिक नुकसान पहुंचा देता है, जो वे स्वयं कर सकते
प्यारे आंदोलन, तुम्हें हर बार किसी न किसी की कहानी बन जाना है. उसका दर्द, उसकी उम्मीद, उसका गुस्सा, उसकी ज़िद, सब कुछ अपना बना लेना है. कभी किसान बनकर खड़े हो जाते हो, कभी आदिवासी. कभी छात्र बन जाते हो, कभी औरत. पार्टियां विपक्ष में रहते हुए तुम्हें लोकतंत्र की सबसे सुंदर तस्वीर बताती हैं, फिर वही सरकार में आते ही तुम पर लट्ठ भांज देती है.
कॉमरेड नौशाद की पूछताछ और भी लंबी चली. उनसे उनके विश्वविद्यालय, जामिया मिल्लिया इस्लामिया से संबंध, जेएनयू, उत्तर प्रदेश से बिहार आने का कारण, परिवार, मित्र और राजनीतिक गतिविधियों तक के बारे में लगातार पूछा जाता रहा. ऐसा प्रतीत हो रहा था कि उनके विचारों या गतिविधियों से अधिक उनकी पहचान जांच के केंद्र में थी. यह केवल राजनीतिक पूछताछ नहीं रह गई थी; इसमें धार्मिक पूर्वाग्रह की परछाई साफ़ दिखाई दे रही थी.
सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष समेत तमाम भाजपा समर्थक अचानक 'जेंडर-विरोधी अपशब्दों और गालियों' को लेकर बहुत संवेदनशील हो गए हैं. असल में युवाओं की 'ग़लत' भाषा की आलोचना की आड़ में यह नरेंद्र मोदी की छवि बचाने का प्रयास है.
क्या सभी लोगों को हर समय मूर्ख बनाया जा सकता है? क्या करोड़ों की आबादी वाले इस देश के लोग हमेशा मुर्दा बने रहेंगे? ऐसा नहीं हो सकता. कॉकरोच एक नई शुरुआत करते हुए निकल पड़े हैं.
पेपर लीक में श्रम, आयु, विश्वास और सामाजिक गतिशीलता की संभावना चुराई जाती है. जिस युवक ने तीन वर्ष पढ़ाई की, वह तीन वर्ष ग़रीब भी हुआ, तीन वर्ष अधिक आश्रित हुआ और तीन वर्ष अधिक अपमानित हुआ. वह राज्य से अपने चुराए हुए वर्षों का हिसाब मांग रहा है. वे सरकार से सवाल पूछ रहा है कि हमारे जीवन के जो वर्ष तुमने अपनी अक्षमता, भ्रष्टाचार और उदासीनता में नष्ट किए, उन्हें कौन लौटाएगा?
नरेंद्र मोदी सरकार का अब तक का रिकॉर्ड गवाह है कि वह किसी भी असहमति या आंदोलन से संवाद में तब तक यक़ीन नहीं करती, जब तक पानी सिर से ऊपर न जाने लगे. तब तक अड़ियल व अहंकारी रवैया अपनाए रखकर वह स्थितियों को और जटिल बनाती रहती है. सोमवार को भाजपा के अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा की कॉकरोच जनता पार्टी के नेताओं से जो बातचीत हुई है, उसे इसी रूप में देखा जा सकता है.
सरकार ने अपने इस एक कदम से ख़ुद को उन लोगों की निगाह में हमेशा के लिए गिरा लिया है जो अब तक उसे समय देने को तैयार थे. उनके सामने यह सवाल तो रहेगा ही कि सोनम वांगचुक कोई सरकार का इस्तीफ़ा तो नहीं मांग रहे थे. वे एक निकम्मे शिक्षा मंत्री की जवाबदेही तय करने की बात कर रहे थे. उस पर विचार करना तो दूर, उसकी मांग करने वाले वांगचुक के साथ ही ज़ुल्म किया गया.
17 जुलाई 2022 को गिरफ्तार किए गए पत्रकार रूपेश कुमार सिंह की कैद के चार वर्ष पूरे हो गए हैं, इस दौरान उन्होंने जेल के भीतर कथित भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के खिलाफ आवाज उठाई, उच्च शिक्षा जारी रखी और सहबंदियों के बीच सकारात्मक बदलाव की पहल की. परिवार को अब भी उनकी रिहाई का इंतजार है.
औपनिवेशिक शासन के ख़िलाफ़ आज़ादी के संघर्ष के दौरान जामिया को 'एक-एक पत्थर और एक-एक कुर्बानी' से खड़ा किया गया था. आज वही संस्थान भीतर से चुपचाप इस तरह बदला जा रहा है कि उसकी लोकतांत्रिक, बहुलतावादी और आलोचनात्मक विरासत धीरे-धीरे कमज़ोर पड़ती जा रही है.