दया दिखाना क़ानूनी और तकनीकी तौर पर बाध्यकारी नहीं है. इसके केंद्र में दीनहीन व्यक्ति नहीं बल्कि दया करने वाले ‘दीनदयालु’ लोग हैं. जिनमें ‘दीनदयालुता’ को सेलिब्रेट करने का भी भाव है. जो एक विशुद्ध सामंती प्रवृत्ति है. इसीलिए आम भाषा में भी किसी अच्छे राजा को ‘दयालु’ बताया जाता है लेकिन अच्छी सरकार, अच्छे पीएम या सीएम को ‘ज़िम्मेदार’ कहा जाता है.
आकृति, सृष्टि, आदित्य, रूपेश, सत्यम ख़ुद मज़दूर नहीं, वे भारतीय संविधान की प्रस्तावना वाले भारत के लोग हैं. भारत में अगर किसी तबके को आज़ादी, बराबरी और इंसाफ़ में कमी का अहसास हो और अगर वे आवाज़ उठाएं तो बाक़ी लोगों के कान ऐसे हों कि उनकी आवाज़ सुन सकें. सिर्फ़ सुनें नहीं, उनकी आवाज़ में अपनी आवाज़ भी मिलाएं. इसी संवैधानिक संवेदना और सहानुभूति के ज़रिए भारतीयता का निर्माण होता है.
अच्छे राजनेता और अच्छे पत्रकार के बीच संबंध प्रतिद्वंद्विता का नहीं, तनावपूर्ण सम्मान का होता है. पत्रकार पूछता है; क्योंकि वह नागरिक की ओर से खड़ा है. राजनेता जवाब देता है; क्योंकि वह राज्य की ओर से ज़िम्मेदार है. दोनों के बीच यह निरंतर रस्साकशी ही लोकतंत्र के ताक़त देती है. जिस लोकतंत्र में पत्रकार केवल जयकार करे और नेता केवल भाषण दे, वहां जनता धीरे-धीरे दर्शक बन जाती है और संसद राजशाही की दर्शक दीर्घा.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दुनिया भर में भारत का डंका बजाते-बजाते अब अचानक यह रोना भी रोने लगना पड़ेगा कि प्रेस व धार्मिक स्वतंत्रता के सूचकांक व रपटें तैयार करने वाली कई संस्थाओं व आयोगों का रवैया भारत-विरोधी और दुराग्रही है. फिर तो यह बताने की ज़रूरत भी पड़ेगी कि आपके लगातार डंका बजने के बावजूद ऐसा क्यों है?
उत्तर प्रदेश और बिहार घरेलू हिंसा और विवाहित औरतों की हत्याओं के मामले में सबसे ऊपर हैं. ध्यान रहे, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बंगाल और केरल जाकर वहां औरतों को बतलाते हैं कि वे वहां उत्तर प्रदेश जैसी ही सुरक्षा औरतों को देंगे. हिंदुत्ववादी नेता ख़ुद को हिंदू लड़कियों के रक्षक के तौर पर पेश करते हैं. लेकिन 'अपनी' लड़कियों की उनके पति या सास-ससुर से रक्षा में उनकी कोई रुचि नहीं.
2014 के बाद से भारत ने परीक्षाओं में 89 पेपर लीक देखे हैं. नवासी बार किसी ने बंद लिफाफा तोड़ा, नवासी बार किसी छात्र की वर्षों की मेहनत एक रात में बेकार हो गई. नवासी बार राज्य ने आंखें मूंद लीं- या इससे भी बुरा, जान-बूझकर दूसरी तरफ देखा, या उसे होने देते रहा.
अब कूटनीति का दायरा केवल देशों तक सीमित नहीं रहा, अब उसमें 'छवि-सुरक्षा' का नया आयाम जुड़ गया था. विदेश नीति को अनौपचारिक रूप से दो भागों में बांट दिया गया था, पहला, दुनिया के देशों से संबंध बेहतर बनाए रखना. दूसरा, दुनिया को यह विश्वास दिलाते रहना कि कोई असुविधाजनक प्रश्न वास्तव में असुविधाजनक था ही नहीं.
युद्ध से पहले जिस क्रूड ऑयल के भारतीय बाजार तक पहुंचने में 55-56 रुपये का ख़र्च आता था, अब वही 120 से 125 रुपये में पहुंच रहा है. उस समय भी भारत सरकार 55 रुपये वाले तेल को 95 से 110 रुपये प्रति लीटर के हिसाब से बेच रही थी, जिससे सरकार को 10 लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त लाभ होता था. अब जब वही तेल 125 रुपये में पहुंच रहा है, तो 10 लाख करोड़ रुपये के घाटे की
राजनीति की सबसे बड़ी भूल यह है कि वह अक्सर विजय को ही सत्य मान लेती है. जैसे चुनावी मैदान कोई जैविक जंगल हो, जहां जो बच गया वही श्रेष्ठ है, जो गिर गया वही अयोग्य. यह निष्कर्ष जल्दबाज़ी है. प्रकृति में भी जीवित रहना और नैतिक होना एक ही बात नहीं. कोई रणनीति क्षणिक रूप से सफल हो सकती है, लेकिन दीर्घकाल में विनाशकारी सिद्ध हो सकती है.
जब एक संवैधानिक लोकतंत्र के मुख्य न्यायाधीश बेरोज़गार युवाओं, आरटीआई कार्यकर्ताओं, मीडियाकर्मियों और असहमति व्यक्त करने वालों की तुलना 'कॉकरोच' और 'परजीवी' से करते हैं, तो यह केवल व्यक्तिगत आक्रोश का मामला नहीं रह जाता; यह लोकतंत्र की मूल आत्मा और उसकी बुनियादी संवैधानिक संस्कृति को आहत करने लगता है.
असमानता न सिर्फ एक नैतिक समस्या है, बल्कि आर्थिक विकास में भी बाधा है. हालांकि भारत में असमानता के कई आयाम हैं, लेकिन इनमें ख़ास चार- जाति, धर्म, लिंग और आर्थिक असमानता हैं जिनकी समालोचना की ज़रूरत है.
संविधान के अनुच्छेद 326 में सार्वभौम वयस्क मताधिकार का प्रावधान अब सर्वोच्च न्यायालय की निगाह में संवैधानिक अधिकार न होकर वैधानिक अधिकार भर रह गया है. बिहार से लेकर बंगाल तक हुए मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण गवाह हैं कि संविधान का व्याख्याता व संरक्षक होने के बावजूद यह न्यायालय इस अधिकार को, किसी और की तो क्या, चुनाव आयोग की टेढ़ी नज़र से भी नहीं बचा पा रहा है.
भारत जैसे आर्थिक असमान समाज में जब त्याग की भाषा आती है तो सबसे पहले पूछा जाना चाहिए कि त्याग कौन करेगा? वह जो पहले से ही राशन, किराया, फीस, ईएमआई के बीच फंसा है या वह जो संपत्ति को वस्त्र की तरह पहन सकता है? यह प्रश्न ईर्ष्या का नहीं, नैतिक अनुपात का है. यह द्वेष नहीं, सार्वजनिक न्याय का प्रश्न है.
भारतीय लोकतंत्र में शायद अब एक नया मौसम जोड़ देना चाहिए; गर्मी, बारिश, सर्दी और 'चुनाव-उपरांत त्याग काल'. चुनाव के दौरान नागरिक 'विकास' सुनेंगे और चुनाव के बाद 'संयम' का पाठ पढ़ेंगे.
पश्चिम बंगाल के हालिया विधानसभा चुनाव में जो हुआ, उसे लेकर कई तरह के दावे किए जा रहे हैं. कई प्रेक्षक इस सवाल पर देश के 'बंट' जाने की बात करते हुए इसे लोकंतत्र और प्रभुत्व की लड़ाई बता रहे हैं, तो वहीं कुछ इसे सत्ता विरोधी लहर कह रहे हैं. साम, दाम दंड, भेद के इर्द-गिर्द तमाम तर्क दिए जा रहे हैं. ऐसे में यूपी के एक गांव के लोगों ने इस पर क्या कहा इस लेख में पढ़ें...