नई दिल्ली अब इज़रायल के साथ सैन्य, आर्थिक और वैचारिक संबंधों को भी बढ़ावा दे रहा है. यह लेख ऐतिहासिक घटनाक्रमों की पड़ताल कर बताता है कि कैसे हिंदुत्व भारत की विदेश नीति और घरेलू प्रतिक्रियाओं को नया रूप दे रहा है.
प्रशांत किशोर ने ऐसे हाई-रिस्क मॉडल का प्रयोग किया, जिसमें पूरा अभियान एक लोकप्रिय चेहरे और केंद्रीय नैरेटिव पर टिका था. यह मॉडल विज्ञापन और राजनीतिक ब्रांडिंग की दुनिया में चलता है, लेकिन ज़मीनी राजनीति में यह तभी सफल होगा जब उसके साथ मजबूत स्थानीय नेतृत्व हो.
बिहार की महिलाएं अब केवल तटस्थ वोटर नहीं, चुनाव की निर्णायक शक्ति बन चुकी हैं. अब सवाल यह है कि क्या नई सरकार उन महिलाओं के जीवन में वास्तविक परिवर्तन ला पाएगी, जिनके भरोसे वह सत्ता तक पहुंची है?
बिहार के विधानसभा चुनाव परिणाम के बाद सत्तारूढ़ गठबंधन की जीत के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त को इस तरह 'बधाइयां' दी जा रही हैं. ये रोष में दी जा रही हों, क्षोभ में या हताशा में, इनसे इतना तो पता चलता ही है कि बधाइयां देने वालों को इन नतीजों में कितना गहरा अविश्वास है. यह अविश्वास लोकतांत्रिक मूल्यहीनता बरतकर जनादेश को बरबस छीन लेने की उस 'परंपरा' की उपज है, जिसे भाजपा ने पिछले दशक भर में पोषित किया
जिन राजाओं को प्रजापालन से ज्यादा प्रजा पर नाना प्रकार के अत्याचार कर उसे सताने और धर्म, शील व सदाचार के सिर पर पाद-प्रहार के लिए जाना जाता है, एक समय उनको राजा बनने के लिए राजाधिराज, बादशाह या उनके प्रतिनिधि के बाएं पैर के अंगूठे से अपना राजतिलक कराना पड़ता था और वे खुशी-खुशी खुद को इसके लिए 'प्रस्तुत' कर देते थे. बिना इस सवाल के कि इस तरह किया गया राजतिलक राजतिलक है, अपमानतिलक?
एक ओर मोदी सरकार आदिवासियों के विकास का ढिंढोरा पीटती है, वहीं निजी कंपनियों के लिए उनके जल, जंगल, ज़मीन के दोहन का रास्ता खोल रही है. पेसा व वन अधिकार अधिनियम के प्रावधानों को निष्क्रिय करते हुए जल, जंगल, ज़मीन और खनन से संबंधित कानूनों में संशोधन किया जा रहा है. यह साफ़ है कि 'नए भारत' में आदिवासियों का अस्तित्व ख़तरे में है.
अमेरिका में जिस एक पहचान का अपराधीकरण कर दिया गया है, वह है मुसलमान पहचान. उसे पूरी तरह क़बूल करना किसी भी राजनेता के लिए आसान नहीं. लेकिन ज़ोहरान ममदानी ने यह मुश्किल काम कर दिखाया.
बिहार के दो पड़ोसी राज्यों ने महिला मुख्यमंत्री दिए हैं. उत्तर प्रदेश में मायावती और बंगाल में ममता बनर्जी. बिहार को आज तक ऐसी महिला मुख्यमंत्री क्यों नहीं मिल पाईं, जिनका विपक्षी दल सम्मान करें? दरअसल, बिहार की राजनीति पितृसत्ता और जातिवाद से पुती हुई है. जाति की आड़ में महिलाओं का मुद्दा खो गया है.
इस बरस भारत सरकार ने देश में रह रहे रोहिंग्या शरणार्थियों को जबरन देश से बाहर करने के लिये उन्हें समुद्र में फेंक दिया. इस अमानवीय कृत्य की कथा कुछ बचे रह गये रोहिंग्या मुसलमानों ने हर्ष मंदर को सुनायी. पढ़िए इस त्रासदी की आपबीती...
अक्टूबर का महीना ढेरों भारतीय विभूतियों या महापुरुषों की इस संसार में आवाजाही के सिलसिले से जुड़ा हुआ है. ऐसी सामूहिकता से कि जब भी यह महीना आता है, मन-मस्तिष्क में बरबस ऐसे भाव आने ही लगते हैं कि वे सब के सब एक साथ सामने आ खड़े हुए हैं. उनमें किसी के आगमन की बेला है तो कोई अलविदा कहने को आतुर है.
मंटो की 'टोबा टेक सिंह' और राही मासूम 'रज़ा' का 'टोपी शुक्ला' आज भी प्रासंगिक हैं क्योंकि विभाजन 1947 में खत्म हो चुका कोई अध्याय नहीं है. दक्षिण एशिया की राजनीति में यह हमेशा मौजूद रहा है. जब भी नागरिकों से 'वो यहीं के हैं' ये साबित करने के लिए कहा जाता है, जब ध्रुवीकरण का नतीजा किसी चुनावी जीत के तौर पर निकलता है, बंटवारे को दोहराया जाता है.
पिछले दो दशकों में देश भर के शैक्षणिक परिसरों में हुई हिंसा में अधिकतर एबीवीपी के सदस्य क्यों शामिल पाए जाते हैं? इस छात्र संगठन को इस सवाल से जूझना चाहिए कि विचार के परिसर में उसने हिंसा को क्यों चुना है?
इस देश की पत्रकारिता में, वह अंग्रेजी की हो, हिंदी की या किसी अन्य भारतीय भाषा की, एक समय संपादक बहुत शक्तिशाली हुआ करते थे. अब वैसे संपादक या तो हैं ही नहीं या हैं तो अधिकांश बंगला, गाड़ी आदि की चाह में इतने अशक्त हो गए हैं कि उनके होने का इसके सिवा कोई अर्थ नहीं रह गया है कि उनके रहते उनके मालिकान को अलग से पीआरओ नहीं रखना पड़ता.
कोई तो बताए कि इस तरह अंधेरों को घना करते फिरने को अभिशप्त समाज अपने आम लोगों की दीपावली शुभ होने को लेकर आश्वस्त क्योंकर हो सकता है? खासकर तब, जब उसका सुखासीन हिस्सा अपने सुख व समृद्धि के लिए दूसरों के सारे सुख-चैन छीन लेने में कतई कोई बुराई नहीं देख रहा. इसके चलते गैरबराबरी और उसके जाए उत्पीड़न व शोषण हमारे आकांक्षा व प्रतीक्षा के द्वंद्वों का खात्मा ही नहीं होने दे रहे.
भारत सरकार ने विदेशी विश्वविद्यालयों को अपने यहां आने की इजाज़त दी है. बिना स्वतंत्रता के शिक्षा और ज्ञान का सृजन असंभव है. अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों में अब जिस तरह के नियंत्रण लागू किए जा रहे हैं, उसके बाद वहां के विश्वविद्यालयों का आकर्षण ख़त्म हो रहा है. क्या भारत में इन विदेशी विश्वविद्यालयों को यह स्वतंत्रता मिलेगी?