अली ख़ान महमूदाबाद की पोस्ट को लेकर न एसआईटी, न ही हरियाणा पुलिस अदालत के सामने ऐसा कोई सबूत रख पाए, जिससे उन दो एफआईआर को सही ठहराया जा सके. सुप्रीम कोर्ट ने प्रोफेसर को 'विवेकपूर्ण' रहने के लिए कहा मगर हरियाणा सरकार के लिए कोई चेतावनी नहीं है. उसकी इसी 'उदारता' के चलते सरकारें सत्ता की आलोचना करने वालों के ख़िलाफ़ झूठे और दुर्भावनापूर्ण मामले दर्ज कर क़ानून का दुरुपयोग जारी रख सकती हैं.
उत्तम नगर में जो हो रहा है, होने दिया जा रहा है या किया जा रहा है, वह सिर्फ़ ग़लत नहीं, अपराध है. मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत का प्रचार अपराध है. नफ़रत के उस प्रचार की इजाज़त देना उस जुर्म में शरीक़ होना है. समाज के हर तबके को सुरक्षा देना, उसका अहसास दिलाना सरकार की ज़िम्मेदारी है. वह क्यों मुसलमानों की सुरक्षा के लिए ख़ुद को जवाबदेह नहीं मानती?
राज्यसभा सांसद मनोज कुमार झा ने लेखक राही मासूम रज़ा की पुण्यतिथि पर उन्हें याद करते हुए यह भावपूर्ण पत्र लिखा है. इसमें रज़ा की साहित्यिक विरासत, उनकी मानवीय दृष्टि और आज के समय में उनके शब्दों की प्रासंगिकता पर आत्मीयता से विचार किया गया है.
तरुण की हत्या के बाद दिल्ली में और दिल्ली के बाहर मुसलमानों के ख़िलाफ़ हिंसा की घटनाएं बढ़ गई हैं. सरकार और पुलिस ने कहीं चेतावनी नहीं दी है कि ऐसी हिंसा बर्दाश्त नहीं की जाएगी. झूठी खबर और दुष्प्रचार के लिए भी किसी पर कार्रवाई नहीं की गई है. मीडिया और सरकार चाहती है कि हिंदुओं के भीतर मुसलमानों के खिलाफ घृणा बढ़े, गहरी हो. उनकी साझेदारी की जगहें कम होती जाएं, ख़त्म हो जाएं. लेकिन हम, विशेषकर वे
नरेंद्र मोदी सरकार अपनी तीसरी पारी में भी विपक्ष को लेकर न सहज हो पाई है, न उससे लोकतांत्रिक ढंग से बरतना सीख पाई है. सीख पाती तो उसके उठाए सवालों का समुचित जवाब देती, न कि उन्हें उठाने का बुरा मानकर उसके नेता तक पर हमलावर हो जाती.
रायसीना डायलॉग में अमेरिकी डिप्टी सेक्रेटरी क्रिस्टोफ़र लैंडौ का बयान वैश्विक शक्ति-राजनीति की वास्तविकता उजागर करता है. अंतरराष्ट्रीय संबंध स्थायी मित्रता नहीं, बल्कि हितों पर आधारित होते हैं. ऐसे में भारत के लिए चुनौती यह है कि वह भावनात्मक राष्ट्रवाद से आगे बढ़कर विज्ञान, तकनीक और आत्मनिर्भर नीति के सहारे अपनी वैश्विक भूमिका तय करे.
कुछ हलकों में ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई की हत्या को पितृसत्ता पर प्रहार और नारीवादी जीत बताया जा रहा है, लेकिन बाहरी सैन्य हिंसा को महिला मुक्ति से जोड़ना भ्रामक है. नारीवाद सामाजिक बदलाव, संस्थागत सुधार और भीतर से उभरने वाले संघर्ष पर आधारित है, न कि युद्ध और भू-राजनीतिक शक्ति पर.
बिहार में एक ऐसा आख्यान गढ़ा जा रहा है जिसमें नाटक का केंद्रीय पात्र मंच पर तो उपस्थित है, पर अपनी ही कहानी कहने में असमर्थ. महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे के उदय के साथ जो राजनीतिक नाटक सामने आया था, इसी राजनीति का एक प्रारूप था. बिहार में जो घट रहा है, वह उस कथा की पुनरावृत्ति कम और एक नई व्याख्या अधिक प्रतीत होता है.
आज भारत-ईरान संबंधों की चर्चा प्रायः तेल और रणनीति के संदर्भ में होती है. परंतु सदियों पहले गुजरात के व्यापारी हॉर्मुज़ और बंदर अब्बास तक जाते थे. मसाले, वस्त्र, नील और रत्न पश्चिम की ओर जाते; घोड़े और धातुएं पूर्व की ओर आतीं. समुद्र सीमा नहीं था. वह सेतु था. आज का चाबहार पोर्ट उसी प्राचीन समुद्री तर्क का आधुनिक रूप है. एक ऐसा मार्ग जो भूगोल को राजनीति से ऊपर उठाने की कोशिश करता है.
2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों के छह साल बाद अगर पीछे मुड़कर देखा जाए, तो यह सांप्रदायिक नरसंहार सबसे अलग है. केंद्र और प्रदेश सरकारों ने अपने नागरिकों को हिंसा से बचाने, उनकी ज़िंदगी फिर से पटरी पर लाने और न्याय दिलाने में मदद करने की अपनी ज़िम्मेदारियों से ख़ुद को अलग कर लिया.
इलाहाबाद विश्वविद्यालय में 8 सितंबर, 2025 के नोटिस के बाद परिसर में किसी भी छात्र गतिविधि के लिए पूर्व अनुमति अनिवार्य कर दी गई है. ‘सक्षम प्राधिकारी’ की अस्पष्टता और स्थान निर्धारण के अभाव ने स्थिति को अघोषित प्रतिबंध में बदल दिया है, जिससे अभिव्यक्ति और छात्र राजनीति दोनों प्रभावित हो रही हैं.
समकालीन स्त्री लेखन स्पष्ट करता है कि स्त्री अस्मिता कोई तैयार परिभाषा नहीं, बल्कि एक सतत निर्माण की प्रक्रिया है. यह संघर्षों से गुज़रती है, सपनों से दिशा पाती है और अपने सरोकारों के माध्यम से समाज में हस्तक्षेप करती है. यह साहित्य किसी अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचने का दावा नहीं करता, बल्कि प्रश्नों को खुला छोड़ता है- ताकि संवाद बना रहे.
बजट सत्र में विपक्ष के लगातार सवालों के बाद मोदी सरकार अपनी भरपूर तल्ख़ी के बावजूद नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी पर ठीक से आक्रामक तक नहीं हो पा रही: विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव लाने का मंसूबा बांधा, जो टूट गया, क्योंकि सरकार को अचानक याद आया कि अभी तो उन्होंने लोकसभा की विशेषाधिकार हनन समिति ही नहीं बनाई, प्रस्ताव लाए तो भला उसे भेजेंगे कहां?
सरकार ने कहा है कि राष्ट्रगान से पहले अनिवार्य तौर पर हमेशा राष्ट्रीय गीत- वंदे मातरम, को पूरे छह छंदों के साथ गाना होगा. यह दावा करना कि वंदे मातरम का दर्जा बढ़ाया जा रहा है, असल में राष्ट्रगान को नीचा दिखाने का एक तरीका है.
यूजीसी के आंकड़ों में जाति-आधारित भेदभाव बढ़ने की बात सामने आई है, लेकिन उच्च शिक्षा में विकलांग या शारीरिक तौर पर अक्षम छात्रों की अदृश्यता पर चर्चा अब भी सीमित है. शारीरिक अक्षम व्यक्तियों की आर्थिक निर्भरता कोई व्यक्तिगत विफलता नहीं, बल्कि संस्थागत असमानता का परिणाम है. जब उच्च शिक्षा तक पहुंच सीमित होगी, तो कौशल, नेटवर्क और अवसर भी सीमित ही रहेंगे.