न्यायपालिका पर जूते से प्रहार: आस्था की आड़ में संविधान पर आघात

किसी इंसान पर जूता फेंकना तिरस्कार का चरम है. चमड़े का वह प्रहार किसी व्यक्ति पर नहीं, बल्कि समानता के उस विचार पर लक्षित था, जो संविधान की आत्मा है. ऐसा लगा जैसे मनु का भूत राष्ट्र को फुसफुसाकर याद दिला रहा हो कि जातिगत पदानुक्रम आज भी जीवित है, भले ही आकाश धर्मनिरपेक्षता के रंग में रंगा हो.

भारत में एआई का उदय: अवसर, डर और नेतृत्व की परीक्षा

आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस भारत के युवाओं, किसानों और पेशेवरों के जीवन को गहराई से बदल रही है. क्या भारत तकनीक की इस क्रांति को अवसर में बदलेगा, या असमानता और बेरोज़गारी के नए दौर में फंस जाएगा?

चिकित्सा जगत में साफ़ लिखावट को लेकर पर्याप्त जागरूकता और सतर्कता क्यों नहीं है?

हाल में पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट में डॉक्टरों की लिखावट का मामला किसी मरीज़ ने नहीं उठाया. रेप, धोखाधड़ी के आरोपों से जुड़े एक मामले की सुनवाई में जज साहब ने इसका स्वत: संज्ञान-सा लिया, जब वे सरकारी डॉक्टर द्वारा लिखी पीड़िता की मेडिको-लीगल रिपोर्ट का एक शब्द भी नहीं समझ पाए. ये लापरवाही है या संवेदनहीनता?

आखिरकार पूर्व न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने हिंदुत्व के प्रति अपनी निष्ठा साबित कर दी…

डीवाई चंद्रचूड़ का तर्क कि सैकड़ों वर्ष पहले बाबरी मस्जिद का निर्माण 'अपवित्र कृत्य' था, आरएसएस और भाजपा के हिंदुत्व के प्रति उनकी अडिग निष्ठा को दर्शाता है.

बिहार चुनाव: क्या पटना में कार्यसमिति की बैठक कांग्रेस को नई ऊर्जा दे पाएगी?

बिहार में कई पिछड़ी जातियां हैं, जिनकी जनसंख्या अच्छी ख़ासी है लेकिन उन्हें उचित राजनीतिक प्रतिनिधित्व नहीं मिला है. ये समुदाय अनुसूचित जाति का दर्जा और आरक्षण पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. कांग्रेस इस दलित केंद्रित राजनीति का धुरी बनना चाहती है. उसने रविदास समुदाय के नेता को प्रदेश अध्यक्ष भी बनाया है. लेकिन क्या वह इन बिखरी जातियों को एकजुट कर पाएगी?

बिहार से इलाहाबाद तक: बांसुरी-यात्रा के कुछ बिखरे पन्ने, कुछ कसकते स्वर

बांसुरी के निर्माता का जीवन बांसुरी की धुन की तरह मनमोहक नहीं है. वह एक कठोर और कसकती धड़कन है. इस स्वर-यात्रा को नम और नरम निगाह से देख रहे हैं, बिहार में आशुतोष कुमार पाण्डेय और उत्तर प्रदेश में रमाशंकर सिंह.

लोक में राम: भिन्न छबियों का अनूठा मिथक

'राम' शब्द ऋग्वेद में एक राजा के नाम की तरह आया है. राम को रां से भी जोड़ा जाता है, जिसका अर्थ 'लाल' है. इसी से रंज या गुस्से में लाल होना निकलता है या 'जियो मेरे लाल' जहां लाल का अर्थ पुत्र है. छत्तीसगढ़ी में लाल के लिए समानार्थी शब्द 'रंगहा' है. संभव है कि यह खून के रंग के कारण समानार्थी हुआ हो, जैसे अपने पुत्र-पुत्री वंशजों को 'अपना खून' कहा जाता है.

किस तरह आदिवासी देवता महिषासुर को हिंदू संस्कृति ने अपना शिकार बनाया

जब असुर इस देश की एक प्रजाति है तो उनकी हार या उनके नायकों की हत्या का उत्सव मनाना किस तरह की मानसिकता का परिचायक है? जेएनयू में महिषासुर शहादत दिवस मनाने वाले दलित, पिछड़े, आदिवासी छात्रों का कहना है कि जब कैंपस में दुर्गापूजा, सरस्वती पूजा आदि हिंदू अनुष्ठान हो सकते हैं तो बहुजन अपने नायक महिषासुर की पूजा क्यों नहीं कर सकते?

राशनकार्ड के ई-केवाईसी में हो रही देरी: झारखंड में लाखों पर मंडराता भुखमरी का ख़तरा

झारखंड में ई-केवाईसी की आड़ में राशनकार्ड धारकों के खाद्य सुरक्षा से वंचित होने का ख़तरा बढ़ रहा है. यह स्थिति राज्य में भूख और कुपोषण की समस्या को विकराल कर सकती है. केंद्र सरकार ने 41 लाख अयोग्य कार्डधारकों की सूची राज्य को भेजी है. राज्य में 4 अगस्त तक 2.5 लाख कार्ड रद्द भी हो चुके हैं, लेकिन प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल बने हुए हैं.

शिक्षा के भगवाकरण को लेकर इतनी हड़बड़ी क्यों है?

शिक्षा का भगवाकरण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार की सबसे महत्वाकांक्षी और पुरानी परियोजनाओं में से एक है. वह जानता है कि इस बहुधर्मी, बहुभाषी देश को हिंदू राष्ट्र के सांचे में ढालने का लक्ष्य तब तक पूरा नहीं हो सकता, जब तक देशवासियों, खासकर युवाओं, के दिलो-दिमाग और सोच-सरोकारों पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित न कर ले.

क्या सुशीला कार्की नेपाल की अधूरी क्रांति को नयी उम्मीद दे पायेंगी?

सुशीला कार्की का कार्यकाल छोटा है, पर उनका असर स्थायी हो सकता है. अगर वे निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव करा पाती हैं, तो यह पूरे नेपाल की जीत होगी. क्या उनका कार्यकाल साबित कर पायेगा कि अधूरी क्रांतियों की इस लंबी यात्रा में उम्मीद की लौ अब भी जल रही है?

हिंदी दिवस: हिंदी की धरती पर भी उसकी जड़ों में क्यों पड़ रहा मट्ठा?

आज़ादी के दो साल बाद 1949 में 14 सितंबर को संविधान सभा में एक वोट के बहुमत से हिंदी को देश की राजभाषा घोषित किया गया था. चूंकि यह आज़ादी की लड़ाई में उसके योगदान के पुरस्कार जैसा था, इसलिए इससे उसके प्रेमियों की, जिनमें अनेक गैरहिंदीभाषी भी शामिल थे, खुशी का पारावार नहीं रह गया था.

नेपाल की अधूरी क्रांतियां: इतिहास, हिंसा और भविष्य की खोज

नेपाल के प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली का इस्तीफ़ा केवल एक राजनीतिक घटना नहीं है. यह दशकों से जमा हुई निराशा और अधूरी उम्मीदों का परिणाम है. नेपाल में वर्तमान हिंसा और अस्थिरता को समझने के लिए हमें पिछले कई दशकों की अधूरी क्रांतियों, संघर्षों और उनकी असफलताओं पर ध्यान देना होगा.

नेपाल में हिंसा, देश एक बार फिर अस्थिरता की राह पर

नेपाल में सोशल मीडिया बैन, बेरोज़गारी और भ्रष्टाचार के खिलाफ़ भड़के विरोध के बाद प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली को इस्तीफ़ा देना पड़ा है. राजधानी काठमांडू समेत कई शहर आग और हिंसा में डूबे हैं. प्रदर्शनकारियों ने नेताओं के घरों को निशाना बनाया है. यह असंतोष नेपाल की लोकतांत्रिक यात्रा की गहरी दरारों को उजागर करता है.

संकर्षण ठाकुर: बिहार का चितेरा अपनी कलम लेकर चला गया…

संकर्षण ठाकुर का जाना सिर्फ़ एक व्यक्ति का जाना नहीं, बल्कि उन शब्दों का मौन हो जाना है जो समाज की गंध और सच्चाई को पकड़ते थे. पटना की मिट्टी से निकले इस पत्रकार ने कश्मीर से बिहार तक कथाओं को दर्ज किया. उनका लेखन पत्रकारिता के लिए अमिट धरोहर है.

1 3 4 5 6 7 51