रामचरण मल्लाह और मल्लाहों को अनुसूचित जाति में शामिल करने का सौ साल पुराना संघर्ष

रामचरण मल्लाह एक प्रशिक्षित वकील के रूप में 20वीं सदी के शुरुआती दौर में लखनऊ में निषाद और मल्लाह जातियों की एक प्रमुख आवाज़ बनकर उभरे. 1925 में उन्होंने निषाद/मल्लाह समुदाय में राजनीतिक जागरूकता लाने के उद्देश्य से ‘अखिल भारतीय निषाद महासभा’ की स्थापना की थी.

सांप्रदायिक बनाए गए दो मामलों में उच्च न्यायालयों के फैसलों से सबक लेंगी मोदी-योगी सरकारें?

बहराइच में ग़ाज़ी मियां की दरगाह और तब्लीग़ी जमात पर एफआईआर को लेकर क्रमशः इलाहाबाद और दिल्ली हाईकोर्ट के फैसलों के बाद कई हलकों में यह सवाल पूछा जा रहा है कि क्या केंद्र और उत्तर प्रदेश की सरकारें इनसे कुछ सबक लेकर अपने मुस्लिम विरोधी सांप्रदायिक एजेंडे से बाज़ आएंगी?

साझी आत्मा, साझा भविष्य: भारत और नेपाल की कथा

भारत और नेपाल ने साथ तप किया, साथ सीखा और साथ आगे बढ़े. आज जब सीमाएं दीवारों में बदल रही हैं और राष्ट्रवाद रिश्तों की स्मृति को धुंधला कर रहा है, तब यह साझा संघर्ष हमें याद दिलाता है कि भारत और नेपाल दो राष्ट्र नहीं हैं. वे एक ही अधूरी कथा के दो पात्र हैं.

‘ज्ञान का दीपक’ जलाना किस समाज में अपराध हो सकता है?

क्या यह कहना वाजिब होगा कि शिक्षा के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को बदलने की जो कोशिशें हाल में परवान चढ़ी हैं, उसे चुनौती देते हुए कुछ अध्यापक प्रतिरोध का व्याकरण विकसित कर रहे हैं?

उपराष्ट्रपति का इस्तीफ़ा लोकतंत्र पर धब्बा, लेकिन अब राजस्थान की राजनीति क्या करवट लेगी?

जगदीप धनखड़ राजस्थानी किसान हैं, जो कई बार ज़मीन और फ़सल की हिफ़ाज़त के लिए झुक जाता है. लेकिन जब उसे लगता है कि पानी सिर से गुज़र रहा है तो वह पटखनी देने में देर नहीं लगाता. उसकी वह पटखनी किसी विद्रोही से भी अधिक ख़तरनाक़ होती है.

चुनाव आयोग का हाल-बेहाल, संसदीय लोकतंत्र को ख़तरा

बिहार में मतदाता सूची के 'विशेष गहन पुनरीक्षण' के मामले में चुनाव आयोग के रवैए से लगता है कि उसे स्वतंत्र व निष्पक्ष होने की तो दूर दिखने की भी परवाह नहीं रह गई है. होती तो वह चुनाव प्रक्रिया में मतदाताओं की समग्र भागीदारी की पहले से ही मुश्किल राहों की समस्याएं दूर करता, न कि उनकी भागीदारी को और कम करने वाला रवैया अपना लेता.

वोटर लिस्ट रिविज़न: बिहार सिर्फ़ पहली प्रयोगशाला है, आपका नंबर भी आने वाला है

जो बिहार में हो रहा है वो आज तक भारतीय लोकतंत्र में कभी नहीं हुआ. आपने भले ही पिछले बीस साल में दसियों चुनाव में वोट दिया हो, अब नए सिरे से साबित करना होगा कि आप भारत के नागरिक हैं. आपकी नागरिकता का फैसला कोई गुमनाम सरकारी कर्मचारी करेगा, एक ऐसी जांच प्रक्रिया से जिसके बारे में किसी को कुछ पता नहीं है.

हिंदी थोपना संघवाद के ख़िलाफ़, सहज संवाद से आगे बढ़ेगी भाषा

भाजपा के हिंदी प्रेम से हिंदी का काफी नुकसान हुआ है. विभिन्न राज्यों में हिंदी को थोपने के ख़िलाफ़ चलने वाले आंदोलन दरअसल हिंदी भाषा के ख़िलाफ़ नहीं हैं. ये विरोध उस प्रवृत्ति की मुख़ालफ़त करते हैं जो संघवाद की धारणा की अवहेलना करके देश पर एक भाषा थोपना चाहती है.

बिहार वोटर लिस्ट संशोधन: जनता को बेवक़ूफ़ मानता है क्या चुनाव आयोग?

बिहार में वोटर लिस्ट के संशोधन के बारे में सुबह अख़बार में चुनाव आयोग का विज्ञापन छपता है, शाम को आयोग उसका खंडन कर देता है. वो संस्था जो बीस साल पहले तक देश की सबसे भरोसेमंद संस्था मानी जाती थी, वो आज चुटकुला बन गई है.

बिहार में शिक्षा व्यवस्था को ज़रूरत कायापलट की

बिहार सरकार को शिक्षा बजट में पूंजीगत व्यय के अनुपात को बढ़ाना चाहिए. यह व्यय सरकारी स्कूलों में बुनियादी ढांचे की कमियों को दूर करने के लिए किया जा सकता है.

राजनीतिक इच्छाशक्ति से स्वास्थ्य सेवाओं में भ्रष्टाचार का निवारण संभव

डॉक्टर और दवाई की कंपनियों के गठजोड़ के कारण मरीज़ों को चिकित्सा सेवा के लिए बहुत अधिक ख़र्च वहन करना पड़ता है. मरीज़ दवा के लिए भुगतान करता है, लेकिन दवा के चुनाव पर उसका कोई नियंत्रण नहीं होता है.

बुनियादी स्वास्थ्य सेवा व्यवस्था के अभाव में निजी क्षेत्र की लूट और शोषण का शिकार नागरिक

जब मरीज़ों की भलाई से अधिक लाभ को प्राथमिकता दी जाती है, तब स्वास्थ्य सेवा का क्षेत्र किसी भी तरह से धन पाने का व्यवसाय बन जाता है. इसी कारण सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र का अपेक्षाकृत नेक व सेवा-उन्मुख पेशा पहले बाज़ार-आधारित वस्तु में बदला, और फिर कॉरपोरेट आधारित मुनाफ़ाख़ोरी उद्योग में बदल गया . 

दरकते लोकतंत्र: करनी होगी एक बेहतर संस्करण की खोज

लोकतंत्र दुनिया भर में लुढ़क रहा है. तकनीक की नई शैलियां विकसित हो रही हैं. इससे पहले कि सर्वसत्तावाद हावी हो जाए, हमें बहुत तेज़ी से लोकतंत्र का नया संस्करण खोजना होगा जो मानव जीवन और मनुष्येत्तर जगत दोनों को समाहित कर सके. साहित्यिक सिद्धांतकार और भाषाविद गणेश देवी का लेख.

त्रिभाषा सूत्र: भाषा कैसे सिखाई जाये, हर प्रदेश को अपना तरीका चुनने की आज़ादी हो

इन दिनों भाजपा की संघीय सरकार त्रिभाषा सूत्र को लेकर बहुत गंभीर दिखाई दे रही है. उसकी चिंता यह है कि बच्चे अधिक से अधिक भाषा सीख पाएं. लेकिन किसी भी शोध से सिद्ध नहीं हुआ है कि तीन भाषाएं पहले दर्जे से ही सिखाई जानी चाहिए.

मतदाता सूची पुनरीक्षण: मुख्य चुनाव आयुक्त ने क्या बताया

ड्राफ्ट मतदाता सूची के बाद सूची में शामिल मतदाताओं के नामों पर दावे और आपतियों का एक सिलसिला मतदाताओं के बीच चल सकता है जो कि बिहार में चुनाव के लिए शायद मतदाताओं के बीच ध्रुवीकरण और बिखराव का मुख्य जरिया और मुद्दा बन सकता है.

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