बम्बई ट्रेन धमाकों के बाद गिरफ़्तार हुए मुसलमान युवक की कथा: ‘पुलिस की यातना आजीवन याद रहेगी’

उस पत्नी के बारे में सोचिए जो अपने पति के लौटने का 19 साल तक इंतज़ार करती है. उस बेटी के बारे में सोचिए जो अपने पिता के जेल जाने के बाद पैदा हुई. उसने कभी अपने पिता का चेहरा नहीं देखा. वह पढ़ाई करके डॉक्टर या इंजीनियर बन सकती थी. लेकिन उसके पिता के जेल में होने के कारण, यह संभव नहीं था.

आतंक के झूठे आरोपों में अरसे तक जेल में बंद रिहा हुए मुस्लिम: लेकिन उनका खोया जीवन कौन लौटाएगा?

एक वक्त देश में कई आतंकी हमले हुए थे. हर हमले के बाद कुछ अपवादों को छोड़कर, मुस्लिम पुरुषों पर जघन्य आरोप लगाये गये और उन्हें सालों तक जेल में रखा गया. उनके परिवार ग़रीबी और अपमान में जीते रहे. और फिर ये मामले निराधार साबित होने लगे. अदालतों ने आरोपियों को निर्दोष घोषित कर दिया. लेकिन उनका खोया जीवन कौन लौटाएगा?

सिलिकोसिस: खान के मजदूरों को धीमे-धीमे कुतरती बीमारी

सिलिकोसिस बीमारी पत्थर की खदानों और ईंट के भट्ठों से निकलने वाले धूल के कणों से होती है, जिससे फेफड़े बुरी तरह प्रभावित होते हैं. इससे मजदूरों की कार्यक्षमता के साथ उनकी उम्र भी घटती जा रही है, लेकिन उनके लिये मास्क भी मयस्सर नहीं.

प्रिय द वायर हिंदी, मैं प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद से असहमत हूं…

करीब साल भर पहले प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद ने 'द वायर हिंदी' में 'कविता में जनतंत्र' नामक एक श्रृंखला प्रकाशित की थी. युवा लेखक विभांशु कल्ला प्रस्तावित करते हैं कि अपूर्वानंद ने भारत पर मंडराते जनतांत्रिक संकट और उसके लक्षणों की पहचान तो की, लेकिन उनके आग्रह इस संकट की उत्पत्ति और विकास को समझने में बाधा बन गये.

#वोटचोरी: केंद्र और राज्यों के अलग-अलग चुनाव आयोग होते तो?

संविधान सभा में संविधान के निर्माण की प्रक्रिया के दौरान उसके मसौदे में प्रस्तावित था कि केंद्र और राज्यों के 'अलग-अलग और एक दूसरे से स्वतंत्र' चुनाव आयोग हों. हालांकि डॉ. आंबेडकर का कहना था कि प्रांतों में सरकारें इस प्रकार के प्रबंध कर रही हैं कि उन लोगों को, जिनका मूल वंश, भाषा व संस्कृति उस प्रदेश के निवासियों से भिन्न है, उन्हें मतदाता सूचियों में स्थान नहीं दिया जा रहा है.

भारतीय भाषाएं: एक विराट सागर में समाहित होती नदियां

औपनिवेशक नज़रिए को हमारा भाषायी परिदृश्य विचित्र प्रतीत होता है. वे नहीं समझ पाते कि हमारे यहां एक बोली के ही कई क्षेत्रीय रूप हैं. यहां बोलियां और भाषाएं एक दूसरे से जुड़ी हुई भी हैं और कभी अलग भी हो जाती हैं. जैसे, असमिया बांग्ला की एक बोली भी है और भिन्न भाषा भी है.

क्या भारत सैयदा हमीद की इंसानियत को समझ पायेगा?

सैयदा हमीद के मन में असम की बहुत ख़ूबसूरत यादें हैं. लेकिन आज अचानक उन्हें अहसास कराया जा रहा है कि वे औरत हैं और मुसलमान हैं. उनकी तकलीफ़ कौन महसूस करना चाहता है?

सावधान, कंपनियां आपका डेटा इकठ्ठा कर रही हैं…

अगर डेटा का स्वामित्व नागरिक के पास नहीं हुआ, अगर आपसे जुड़ी सूचनाओं पर आपका संवैधानिक अधिकार नहीं हुआ, सत्ता बेरोक-टोक दखल देती जायेगी और हम ऐसे समाज में पहुंच जाएंगे, जहां आज़ादी केवल डेटाबेस में दर्ज होगी. एक क्लिक से आपका अस्तित्व मिट जाएगा.

क्या भारत का लोकतंत्र अब ‘नियंत्रित लोकतंत्र’ में बदल गया है?

देश के संवैधानिक लोकतंत्र को देखते ही देखते नियंत्रित लोकतंत्र (कंट्रोल्ड डेमोक्रेसी) में बदल डाला गया है. अगर चुनाव स्वतंत्र व निष्पक्ष न रह जाएं तो वे लोकतंत्र की प्राणवायु नहीं रह जाते और चुनाव करा देने भर से कोई देश या उसकी सरकार लोकतांत्रिक नहीं हो जाती.

महाराष्ट्र: ठाकरे भाइयों का मिलन उद्धव के लिए ख़तरा तो नहीं?

जिसे पूरा महाराष्ट्र दो भाइयों का मिलन समझ रहा है, क्या वह उद्धव ठाकरे के लिए एक ट्रैप है? राज ठाकरे भाजपा के नजदीक रहे हैं. पिछले लोकसभा चुनाव में उन्होंने भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए को समर्थन का ऐलान किया था. क्या भाइयों के मिलन की यह कहानी भाजपा ने लिखी है?

वही पुराना विभाजनकारी राग, स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री का भाषण छोड़ गया निराश

अपने देश में जातीय-राष्ट्रवादी नेता और वैश्विक मंच पर उदार राजनेता की दोहरी भूमिका निभाना नरेंद्र मोदी के लिए संभव नहीं है. जब प्रधानमंत्री देश के बाहर मूल्यों के पैरोकार के रूप में खुद को प्रस्तुत करते हैं, जबकि घर में संस्थानों की स्वायत्तता पर अंकुश लगाते हैं, तो वैश्विक नेता इस विरोधाभास को न सिर्फ़ पहचानते हैं बल्कि उसे भारत के विरुद्ध इस्तेमाल भी करते हैं.

बदहाल संविधान और लाचार संसद: ये कहां आ गए हम

आज हम संविधान को ख़राब हाथों में न पड़ने देने की बाबा साहेब की उस चेतावनी की अनसुनी का नतीजा भुगत रहे हैं, और उस मोड़ तक जा पहुंचे हैं, जहां अंतरराष्ट्रीय सूचकांकों में हमारी स्वतंत्रता आंशिक हो गई है तो लोकतंत्र लंगड़ा.

ओबीसी जातियों का वर्गीकरण: आज भी अनुत्तरित हैं मंडल आयोग के सदस्य एलआर नायक के प्रश्न

राष्ट्रीय स्तर पर ईबीसी की विशेष मान्यता के शुरुआती अधिवक्ता एल.आर. नायक मंडल आयोग के सदस्य थे. 1980 में उन्होंने मंडल आयोग की सिफारिशों से असहमति जाहिर की थी, जिसमें उन्होंने सभी ओबीसी जातियों को एक ही सजातीय समूह मानने के ख़तरों के बारे में चेतावनी दी थी.

नफ़रत का कारोबारी घृणा बांटता लाल किले की बुर्जी से

हिंदू समाज में घृणा पहले भी थी लेकिन 2014 में हमने सारे संकोच को तोड़ दिया जब नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में स्वीकार किया गया. भारत घृणा और हिंसा की राह पर चल निकला. स्वाधीनता दिवस के दिन इस घृणा का मुख्य प्रवक्ता अपना पुराना, आज़माया हुआ रिकॉर्ड बजा रहा था. क्या उसे सुनकर हमें वितृष्णा होती है?

भारत का विभाजन: वर्तमान के भीतर सिसकता अतीत

भारत का विभाजन भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास की सबसे पीड़ादायक और अविस्मरणीय घटनाओं में से एक है. इसका कोई सटीक विवरण नहीं मिलता कि उस त्रासदी में कितने लोग मारे गए, कितनों का घर उजड़ गया, कितनों की लाशें नदियों में बह गई, कितने दुधमुंहे बच्चों ने अपने माता-पिता को खोया और कितनों का घर लूट लिया गया.

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