पिछले तीन वर्षों से लोकपाल की वार्षिक रिपोर्ट संसद के पटल पर नहीं रखी गई हैं. वर्तमान लोकपाल के लगातार निवेदन के बावजूद राष्ट्रपति ने उन्हें मिलने का समय नहीं दिया. अंततः वार्षिक रिपोर्ट को डाक से भेजा गया, और शीतकालीन सत्र के पहले ही राष्ट्रपति कार्यालय ने इसे स्वीकार भी किया. लेकिन फिर भी यह संसद में पेश नहीं की गई. क्या पारदर्शिता की कमी, भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ बनी यह संस्था ही अब जवाबदेही तलाश रही है?
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: श्रीकांत वर्मा गहरे क्षोभ, बेबाक नाराज़ी, अदम्य असंतोष और आत्मप्रताड़न के भी कवि हैं. पर साथ-साथ वे जीवन में अब भी बच पाई कोमलता, लालित्य, सुंदरता, प्रेम और करुणा के भी कवि रहे हैं.
बांकुड़ा कई साम्राज्यों के अधीन रहा, अंग्रेज़ों ने भी यहां शासन किया और राजस्व भी बटोरा लेकिन ग्रामीण समाज तथा रीति रिवाज़ों पर कोई छाप नहीं छोड़ पाए. यहां के वासियों के जीवन पर ऋतुओं, कृषि चक्र, चैतन्य महाप्रभु और वैष्णव पंथ, तथा स्थानीय देवी-देवताओं का प्रभाव बना रहा.
भारत में आजकल गुरु शिष्य परंपरा का जो गुणगान किया जा रहा है, उसका कारण यह है कि सत्ता अब स्वतंत्र मन और मस्तिष्क वाले नागरिक नहीं चाहती, आज्ञाकारी, सत्ता के आगे समर्पणशील जन चाहती है. शिक्षा का काम इसके प्रति लोगों को सावधान करना और उनके भीतर आलोचनात्मक नज़रिया विकसित करना है. गुरु-शिष्य परंपरा इसमें बाधक है.
लोकतंत्र केवल तब नहीं ढहते जब चुनावों में धांधली होती है; वे तब भी क्षीण होते हैं जब आज्ञाकारिता भागीदारी का स्थान ले लेती है, जब मतभेद को अवैध ठहराया जाता है, और जब सत्ता से प्रश्न पूछना ख़तरे के रूप में पेश किया जाता है, ज़िम्मेदारी के रूप में नहीं.
योगी आदित्यनाथ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया बयानों व आयोजनों के ज़रिये ‘अखंड भारत’ की अवधारणा को नए सिरे से सार्वजनिक किया जा रहा है. इतिहासकार इसे तथ्यहीन और राजनीतिक नारा बताते हैं, जो हिंदुत्व की वैचारिक परियोजना, इतिहास की पुनर्व्याख्या और धार्मिक राष्ट्रवाद से गहराई से जुड़ा है.
कोई व्यक्ति जब एक लोकतांत्रिक परिवेश में बोलता है, वह यह शर्त कैसे लगा सकता कि उसे सुना ही जाए. आप बोलिए, मगर सुनने का अधिकार श्रोताओं के पास सुरक्षित रहता है: यह अधिकार संवैधानिक है. न सुनना भी इक तरह की अभिव्यक्ति ही है. मनोज रूपड़ा भी कुलपति के विषय से भटके हुए भाषण को न सुनकर अपनी अभिव्यक्ति के अधिकार का ही उपयोग कर रहे थे.
एनआईए के प्रभावित करने वाले दोषसिद्धि आंकड़ों को लेकर कई आरोपियों, उनके वकीलों और यहां तक कि एजेंसी से जुड़े रहे एक व्यक्ति ने द वायर से बात की और बताया कि क्यों एनआईए के इतने सारे मामले आरोपियों के कबूलनामों के साथ उन्हें दोषी मान लिए जाने के साथ ख़त्म होते हैं.
राही मासूम रिज़ा बीसवीं सदी में उर्दू के ज़हीनतरीन लिखने वालों में थे. अगले बरस उनकी जन्म-शती मनाई जाएगी. इक्कीसवीं सदी के शुरू में किए गए एक से अधिक सर्वेक्षणों में उनके 'आधा गाँव' को बीसवीं सदी के हिंदुस्तान के दस बेहतरीन उपन्यासों शुमार किया गया. इस विस्तृत लेख में जानिए रिज़ा साहब की ज़िंदगी की झलक और इस किताब के सामने आने की कहानी.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: जिस ‘महाजनी सभ्यता’ का प्रेमचंद ने विरोध किया था उस सभ्यता ने हमारे लोकतंत्र पर, कम से कम शासनतंत्र पर, कब्ज़ा कर लिया है. जिस साहित्य को प्रेमचंद ने कभी देशभक्ति और राजनीति के ‘आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सचाई’ कहा था, उस साहित्य का एक बड़ा हिस्सा राजनीति का पिछलगुआ होता जा रहा है.
अंतरराष्ट्रीय हिंदी दिवस पर देश के प्रमुख साहित्यकारों से बातचीत के ज़रिये यह पड़ताल की गई कि वर्तमान में हिंदी की स्थिति क्या है, अनुवाद की भूमिका कितनी निर्णायक है और हिंदी किस हद तक वैश्विक भाषा के रूप में उभर पाई है. उनके विचार हिंदी की चुनौतियों और संभावनाओं की स्पष्ट तस्वीर पेश करते हैं.
पुस्तक समीक्षा: ‘मंच प्रवेश: अलकाज़ी/पद्मसी परिवार की यादें’ रंगमंच के सत्ता से टकराने की भी कथा है, जिसे इब्राहीम अलक़ाज़ी के बेटे और एलेक पद्मसी के भांजे फ़ैसल अलक़ाज़ी ने लिखा है. अमितेश कुमार द्वारा अनूदित और राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित इस पुस्तक को भारतीय रंगमंच और सत्ता के रिश्तों के आलोचनात्मक इतिहास के रूप में पढ़ा जा सकता है.
कोलकाता में पॉलिटिकल कंसल्टेंसी फर्म आई-पैक के प्रमुख प्रतीक जैन के घर ईडी की छापेमारी के दौरान पहुंची सीएम ममता बनर्जी ने आरोप लगाया केंद्रीय एजेंसी उनकी पार्टी से संबंधित हार्ड डिस्क, आतंरिक दस्तावेज़ और संवेदनशील डेटा ज़ब्त करने की कोशिश कर रही थी, जिसे वे अपने साथ ले आईं. हालांकि, ईडी का आरोप है कि बनर्जी ने पीएमएलए के तहत चल रही जांच और कार्रवाई में बाधा डाली.
आज जो कहानी गढ़ी जा रही है, वह एक ख़तरनाक भ्रम पर टिकी है. सत्ताधारी पार्टी भाजपा और उसके वैचारिक संरक्षक आरएसएस को 'राष्ट्र' के बराबर रखकर, मीडिया सरकार को आलोचना से बचाने की कोशिश कर रहा है. यह एक धोखा है. आरएसएस एक ग़ैर-सरकारी संगठन है, भाजपा राजनीतिक दल है. नरेंद्र मोदी संविधान के एक निर्वाचित सेवक हैं. इनमें से कोई भी 'देश' नहीं है.
‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद भारत सरकार ने 32 देशों में सात बहुदलीय प्रतिनिधिमंडल भेजने पर 13 करोड़ रुपये से अधिक ख़र्च किए. लेकिन सवाल यह है कि क्या इस महंगे कूटनीतिक अभियान से भारत को कोई ठोस अंतरराष्ट्रीय समर्थन या रणनीतिक लाभ मिला?