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नगालैंड: शांति समझौते के मसौदे पर दस्तखत के पांच साल बाद उठी वार्ताकार बदलने की मांग

बाग़ी नगा संगठनों और केंद्र सरकार के बीच चल रही शांति वार्ता के वार्ताकार आरएन रवि नगालैंड के राज्यपाल भी हैं. संगठनों के प्रतिनिधि एनएससीएन-आईएम ने कहा है कि वे इस प्रक्रिया में बाधा पैदा कर रहे हैं, इसलिए वार्ता आगे बढ़ाने के लिए नया वार्ताकार नियुक्त किया जाना चाहिए.

गृहमंत्री अमित शाह, आरएन रवि और टी. मुइवाह.

गृहमंत्री अमित शाह, आरएन रवि और टी. मुईवाह.

नई दिल्ली: नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड-इसाक मुईवाह (एनएससीएन-आईएम) ने मंगलवार को शांति वार्ता के लिए वार्ताकार आरएन रवि पर निशाना साधा था और शांति वार्ता को आगे बढ़ाने के लिए नए वार्ताकार को नियुक्त किए जाने की मांग की.

इस नगा समूह ने एक बयान में कहा था कि केंद्र सरकार को शांति वार्ता आगे बढ़ाने के लिए नए वार्ताकार को नियुक्त करना चाहिए.

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, मंगलवार को एनएससीएन-आईएम ने उन पर नगा राजनीतिक मुद्दों के अंतिम समाधान में बाधक बनने का आरोप लगाया है.

संगठन की ओर से जारी बयान  कहा गया कि नगा मुद्दों पर रवि के तीखे हमलों की बदौलत शांति समझौते की प्रक्रिया तनावपूर्ण स्थिति में पहुंच गई है.

इससे पहले द वायर  की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि संगठन की ओर से इस तरह वार्ताकार को बदलने की मांग उठ सकती है. दिल्ली और नगालैंड के कई सूत्रों और साथ ही नागरिक संगठनों के नेताओं ने भी इस बात की पुष्टि की थी.

गृह मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने गोपनीयता की शर्त पर कहा था कि एनएससीएन-आईएम वार्ताकार बदलना चाहता है, लेकिन मंत्रालय इस बात को स्वीकार करेगा, इसकी संभावना कम है. अभी कुछ तय नहीं है, लेकिन प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए और लोगों (फैसीलिटेटर्स) को शामिल किया जा सकता है.

गौरतलब है कि उत्तर पूर्व के सभी उग्रवादी संगठनों का अगुवा माने जाने वाला एनएससीएन-आईएम अनाधिकारिक तौर पर सरकार से साल 1994 से शांति प्रक्रिया को लेकर बात कर रहा है.

सरकार और संगठन के बीच औपचारिक वार्ता वर्ष 1997 से शुरू हुई. नई दिल्ली और नगालैंड में बातचीत शुरू होने से पहले दुनिया के अलग-अलग देशों में दोनों के बीच बैठकें हुई थीं.

18 साल चली 80 दौर की बातचीत के बाद अगस्त 2015 में भारत सरकार ने एनएससीएन-आईएम के साथ अंतिम समाधान की तलाश के लिए रूपरेखा समझौते (फ्रेमवर्क एग्रीमेंट) पर हस्ताक्षर किए गए.

एनएससीएन-आईएम के महासचिव थुलिंगलेंग मुइवा और वार्ताकार (अब नगालैंड के राज्यपाल) आरएन रवि ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति में तीन अगस्त, 2015 को इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे.

तीन साल पहले केंद्र ने एक समझौते (डीड ऑफ कमिटमेंट) पर हस्ताक्षर कर आधिकारिक रूप से छह नगा राष्ट्रीय राजनीतिक समूहों (एनएनपीजी) के साथ बातचीत का दायरा बढ़ाया था.

अक्टूबर 2019 में आधिकारिक तौर पर इन समूहों के साथ हो रही शांति वार्ता खत्म हो चुकी है, लेकिन नगालैंड के दशकों पुराने सियासी संकट के लिए हुए अंतिम समझौते का आना अभी बाकी है.

एनएससीएन-आईएम की वार्ताकार को बदलने की मांग ऐसे समय में आई है जब अगले सप्ताह नई दिल्ली में फाइनल समझौते को लेकर बैठकें होने वाली हैं, जिसमें उनके साथ-साथ एनएनपीजी के नेताओं के भी शामिल होने की उम्मीद है.

समूह ने अपने मंगलवार के बयान में कहा, ‘लगातार छह प्रधानमंत्रियों से होकर गुजरने वाली 23 साल की राजनीतिक वार्ता की सारी मेहनत की वार्ताकार की धोखाधड़ी के कारण व्यर्थ हो रही है और यह वार्ताकार कुछ नहीं, बस एक बोझ बन गए हैं.’

आरएन रवि को बीते साल जुलाई में नगालैंड का राज्यपाल बनाया गया था. संगठन का कहना है कि उनके इस पद पर आने के बाद किए गए फैसलों से उनको लेकर ‘भरोसे में भारी कमी’ हुई है.

संगठन ने यह भी कहा कि ‘रवि ने उनके बीच बने पुल को आग लगा दी है और अब किसी एक बिंदु पर मिलने की बात पर विचार भी नहीं किया जा सकता है.

ज्ञात हो कि बीते जून में राज्यपाल आरएन रवि ने बागी नगा संगठनों को ‘हथियारबंद’ और ‘अंडरग्राउंड समूह’ कहते हुए मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो को एक पत्र लिखकर राज्य की कानून-व्यवस्था पर चिंता जाहिर की थी.

समूहों ने उनके इस तरह के शब्द इस्तेमाल करने पर नाराजगी जाहिर की थी. बीते कुछ समय में आरएन रवि को लेकर एनएससीएन-आईएम ने अपनी असहजता कई बार जाहिर की है.

एनएससीएन-आईएम नेतृत्व इस समय दिल्ली में है और पिछले कुछ दिनों में आधिकारिक स्तर की दो दौर की वार्ता हुई है. इससे पहले फ्रेमवर्क समझौते पर दस्तखत होने के पांच साल पूरे होने पर संगठन द्वारा एक बयान जारी किया गया था.

इस बयान में एनएससीएन-आईएम ने ‘ऐतिहासिक फ्रेमवर्क एग्रीमेंट साइन करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कुशल नेतृत्व की सराहना की थी, लेकिन एग्रीमेंट को संभालने के ‘भ्रामक तरीके’ के लिए आरएन रवि की तीखी आलोचना भी की गई थी.

इसमें कहा गया था कि ‘वे धोखेबाजी से वार्ताकार के दायरे से बाहर जाकर नगाओं को विभाजित करने की कोशिश में लिप्त होकर इस समझौते की नींव ही कमजोर कर रहे हैं.’

उन्होंने आरोप लगाया कि रवि की गलत हरकतों ने शांति वार्ता के लिए पक्षों के बीच तनावपूर्ण स्थिति पैदा कर दी और स्थिति अब एक कठिन बिंदु तक पहुंच रही है.

2015 के समझौते की रूपरेखा का जिक्र करते हुए समूह ने कहा कि समझौता भारत सरकार द्वारा नगा के अनूठे इतिहास और नगा मुद्दे के अंतिम समाधान के आधार पर था.

बता दें कि इससे पहले पिछले साल अक्टूबर में आरएन रवि ने एनएससीएन-आईएम द्वारा अलग झंडे और संविधान की मांग को भी खारिज कर दिया था.

सभी नगा जनजातीय समूहों के शीर्ष संगठन ‘नगा होहो’ ने दावा किया था कि एनएससीएन-आईएम ने समझौते पर हस्ताक्षर के आधार पर अलग झंडा और संविधान की मांग की थी.

जल्द पूरी हो शांति प्रक्रिया: नगा होहो

अब ‘नगा होहो’ के एक प्रतिनिधिमंडल ने बुधवार को केंद्र से एनएससीएन-आईएम के साथ चल रही शांति प्रक्रिया का जल्द समापन करने और नगालैंड में दशकों पुराने हिंसक आंदोलन का समाधान निकालने का आग्रह किया.

नगा होहो की नौ सदस्यीय टीम ने केंद्रीय पूर्वोतर क्षेत्र विकास राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह से मुलाकात की और उन्हें एनएससीएन-आईएम तथा केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के बीच शांति वार्ता की धीमी प्रगति के बारे में अवगत कराया.

सूत्रों ने बताया कि नगा होहो ने सिंह को बताया कि सभी सिद्धांतों और ढांचे पर सहमति व्यक्त की जानी चाहिए और उन्हें एकतरफा नहीं बदला जाना चाहिए.

सूत्रों के अनुसार प्रतिनिधिमंडल ने सिंह को बताया कि भारत सरकार और एनएससीएन-आईएम के बीच 2015 फ्रेमवर्क समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे लेकिन कोई ठोस समाधान नहीं निकल रहा है और न ही राजनीतिक चर्चा में कोई प्रगति हुई है.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)