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‘बलात्कार पीड़िताओं की चिकित्सा जांच में दिशा-निर्देशों का पालन नहीं किया जाता’

बलात्कार के मामलों में 2013 के संशोधन के बाद होने वाली कार्यवाही में बहुत हद तक सुधार हुआ है लेकिन अब भी पीड़ित को उत्पीड़न सहना पड़ता है.

Partners of law in development Rape survivors

ग़ैर सरकारी संगठन पार्टनर्स फॉर लॉ इन डेवलपमेंट की कार्यकारी निदेशक मधु मेहरा, दिल्ली हाईकोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता रेबेका जॉन, जेएनयू की शिक्षक प्रतीक्षा बक्शी और नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के शिक्षक मृणाल सतीश. (फोटो: सृष्टि श्रीवास्तव)

नई दिल्ली: बलात्कार पीड़िताओं की चिकित्सा जांच स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा निर्धारित दिशा-निर्देशों के अनुरूप नहीं की जाती है. एक अध्ययन में यह दावा किया गया है कि इस प्रकार की चिकित्सा जांच करने के लिए स्वास्थ्य कर्मियों को समुचित प्रशिक्षण प्रदान करने की जरूरत है.

यह अध्ययन कानून और न्याय मंत्रालय के न्याय विभाग और संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) की सहायता से गैर सरकारी संगठन पार्टनर्स फॉर लॉ इन डेवलपमेंट (पीएलडी) ने किया है.

इस अध्ययन में यह भी पाया गया कि कुछ बलात्कार पीड़िताओं को प्राथमिकी दर्ज कराने में पुलिस के हाथों उत्पीड़न और अवरोध का अनुभव भी करना पड़ा.

अध्ययन के मुताबिक प्राथिमिकी की प्रति तुरंत उपलब्ध नहीं कराई जाती है और अक्सर पीड़िताओं को इसकी प्रति हासिल करने के लिए पुलिस का चक्कर लगाना पड़ता है. हालांकि बाद में प्राथिमिकी की एक प्रति पीड़ितों को भेज दी जाती है.

अध्ययन में कहा गया है कि ये स्वास्थ्य जांच स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा निर्धारित दिशा-निर्देशों में अनुरूप नहीं की जाती है. औपचारिक तौर पर बलात्कार पीड़िताओं से स्वास्थ्य जांच की सहमति नहीं ली जाती है और अक्सर ही इसके लिए बाद में उनके हस्ताक्षर अथवा अंगूठे के निशान ले लिए जाते हैं.

अध्ययन रिपोर्ट में बलात्कार पीड़िता के केवल उन्हीं कपड़ों को फोरेंसिक जांच के लिए भेजने की अनुशंसा की गई है, जोकि उस अपराध से जुड़े हों.
इसके अलावा बलात्कार पीड़िता अथवा उसके गवाह एवं उसके रिश्तेदारों को सुरक्षा प्रदान करने की जरूरत पर जोर दिया गया है.

मुकदमे के दौरान अदालत में लगे कैमरा के माध्यम से अभियोजन पक्ष को अदालत में आरोपी की धमकी से बचाया जाता है. अध्ययन में जिन मामलों को शामिल किया गया है, वे परिचितों द्वारा बलात्कार से संबंधित हैं. रिपोर्ट के अनुसार भारत और दुनिया भर में होने वाले बलात्कार के अधिकतर मामले इसी श्रेणी में आते हैं.

साल 2013 के बाद बलात्कार और यौन हिंसा के कानून में किए गए संशोधनों के अमल में लाने की जांच के लिए किए गए इस अध्ययन में बलात्कार के मामलों में क़ानूनी प्रक्रिया के अंदर लैंगिक संवेदनशीलता की जांच की गई.

शोधकर्ता अपने अध्ययन में ये देखना चाहते थे कि क़ानून को पीड़ित केंद्रित बनाने के लिए लिए गए संशोधन के बाद क़ानूनी प्रक्रिया कितनी पीड़ित अनुकूल हुई है.

बलात्कार के मामलों में 2013 के आपराधिक संशोधन अधिनियम के साथ बलात्कार और यौन हिंसा के मामलों में की जाने वाली कार्यवाई में बहुत हद तक सुधार हुआ है लेकिन अभी भी बहुत बड़े स्तर पर समाज में पीड़ित को शर्मसार किया जाता है और किसी भी प्रकार का सहयोग और परामर्श नहीं दिया जाता है.

पीएलडी ने दिल्ली में चार फास्ट ट्रैक अदालतों में बलात्कार के 16 मामलों का परीक्षण किया. सभी पीडितों की उम्र 18 से 50 साल के अंदर थी जिनमें से ज़्यादातर 20 से 30 साल की थीं. रिपोर्ट में पीड़ितों का साक्षात्कार, मामले के रिकॉर्ड की जांच साथ ही तुलनात्मक और घरेलू कानून का परीक्षण कर इस रिपोर्ट को जारी किया गया है.

अध्ययन की शुरुआत साल 2014 के फ़रवरी महीने में कुछ सवालों के साथ की गई थी जिनमें से पहला सवाल था कि क्या साल 2013 में बलात्कार और यौन हिंसा को लेकर आपराधिक संशोधन अधिनियम के आने के साथ असल में बदलाव हुआ है? क्या स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के दिशा निर्देशों का पालन किया जा रहा है?

यौन हिंसा से पीड़ित लोगों की चिकित्सा और कानूनी देखभाल के लिए लाए गए प्रोटकॉल में भी कितना अंतर आया है? पीड़ितों के लिए निश्चित किए गए भुगतान को अदा करने में क्या कोई बदलाव आया है? विशेष अदालत के माध्यम से शीघ्र ही शीघ्र बलात्कार के मामलों का निपटाने के दृष्टिकोण में कितना फ़र्क़ आया है?

रिपोर्ट जारी करने के समय पैनल में पीएलडी की कार्यकारी निदेशक मधु मेहरा, दिल्ली हाईकोर्ट की वरिष्ठ वक़ील रेबेका जॉन, नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के शिक्षक मृणाल सतीश और जेएनयू की शिक्षक प्रतीक्षा बक्शी मौजूद थीं. समारोह का विषय ‘पीड़ित केंद्रित प्रतिक्रियाएं और बलात्कार के मुक़दमें में पीड़ित अनुकूल क़ानूनी प्रक्रिया’ रखा गया था.

मधु मेहरा ने रिपोर्ट की जानकारी देते हुए बताया कि 16 महिलाओं का साक्षात्कार उनकी सहमति और सहजता को ध्यान में रखते हुए किया गया है. जिन 16 महिलाओं के मामलों की जांच की जा रही थी उनमें से लगभग सभी महिलाएं बहुत ज़्यादा पढ़ी-लिखी नहीं थी और न ही आर्थिक रूप से सवतंत्र थीं. बहुत सारी महिलाएं ऐसी भी थीं जो अन्य कारणों से भी अपने परिवार पर निर्भर थीं.

मधु मेहरा बताती हैं कि, ‘बहुत सारे मामलों में देखा गया कि बलात्कार कोई एक बार होने वाली घटना नहीं थी बल्कि उसी व्यक्ति ने बार बार पीड़िता का बलात्कार किया है. कुछ मामलों में बहुत सारे लोगों ने पीड़िता का सामूहिक बलात्कार किया. बहुत सारे मामलों में ये भी पाया गया है कि बलात्कार करने वाला व्यक्ति पीड़िता की जान पहचान का ही था. कुछ मामले परिवार के ढांचे के अंदर के थे.’

प्रतीक्षा के अनुसार, ‘बलात्कार के सभी मामलों में अगर कोई सामान कारण हो सकता है तो वो है ‘ताक़त’. अक्सर ही देखा गया है कि चाहे परिवार हो, दफ़्तर हो, सड़क हो, हमेशा ही ताक़तवर ओहदे पर रहने वाला व्यक्ति ही शोषण या ऐसी हिंसा करता है. किताबी क़ानून और ज़मीनी रूप से उसके क्रियान्वयन में ज़मीन आसमान का अंतर हैं. क़ानूनी प्रक्रिया में महिला की पहचान धीरे-धीरे बदल जाती है जब वो शिकायत दर्ज करने पुलिस स्टेशन जाती है तो उसे ‘फरियादी’ की तरह देखा जाता है. उसके साथ हुआ ‘हादसा’ बयान बन जाता है, उसके कपड़े ‘सबूत’ बन जाते हैं आर वो महिला ‘पीड़िता’ बन जाती है.’

प्रतीक्षा ने बताया ‘हमारी व्यवस्था कुछ ऐसी है कि जब कोई महिला बलात्कार की शिकायत के लिए जाती है तो अस्पताल हो या पुलिस स्टेशन, महिला के कपड़े रख लिए जाते हैं और उसके बदले में उसे दूसरे कपड़े नहीं उपलब्ध कराए जाते, बहुत सारे देशों में महिला को दूसरे कपड़े दिए जाने का प्रावधान है पर हमारे देश में शायद ये उम्मीद की जाती है कि महिला शिकायत करने जाए तो एक जोड़ी कपड़ा अपने साथ रख कर ले जाए.’

मेडिको-फॉरेंसिक जांच को स्वास्थ्य और परिवार कल्याण के दिशा-निर्देशों के अनुसार नहीं किया जाता है. ऐसा भी कई मामलों में देखा गया है कि पीड़िता की सहमति और सूचना के बिना उनकी आंतरिक जांच कराई जाती है. मेडिकल जांच क़ानूनी कार्यवाई का हिस्सा हैं लेकिन अक्सर ही महिला के यौन संबंधों का इतिहास और हाइमेन (झिल्ली) के आधार पर रिपोर्ट लिखी जाती है.

हाईकोर्ट में वरिष्ठ वक़ील रेबेका एम. जॉन कहती हैं, ‘अगर हमारा मकसद ये है कि पीड़िता को आरोपी द्वारा डराया धमकाया न जा सके, और न ही कसी अन्य कारणों से उसका मनोबल प्रभावित हो और इसके लिए कोर्ट में प्रक्रिया के दौरान आरोपी और पीड़िता के बीच एक हरा पर्दा लगाया जाता है. जब कोर्ट के बाहर आरोपी और पीड़िता को एक ही कमरे में इंतज़ार कराया जाता है, बहुत सारे मामलों में जहां परिवार के ही किसी सदस्य पर बलात्कार का आरोप हो वहां तो महिला पर किसी भी तरह से दबाव बनाया जा सकता है, तो कोर्ट के अंदर कार्यवाही के समय एक हर परदा लगाने का क्या मतलब हुआ. क्या ऐसा करने से हम पीड़िता को डराए-धमकाए जाने से बचा पाएंगे.’

ऐसे अनगिनत मामले हैं जहां पुलिस ने ही एफआईआर करने में ढिलाई की है और पीड़िता का मनोबल तोड़ने की कोशिश की गई है. एफआईआर की कापी तुरंत पीड़िता को नहीं उपलब्ध कराई जाती है. ऐसे कई मामले हैं जिनमें पीड़िता और उसके परिवार को क़ानूनी कार्यवाही में बहुत जगह रिश्वत भी देनी पड़ी है.’

रेबेका ने बताया बहुत सारे मामलों में पीड़िता की चिकित्सा जांच में चिकित्सा परीक्षा स्वास्थ्य और परिवार कल्याण के दिशा-निर्देशों का पालन नहीं किया गया है. पीड़िता को अस्पताल में काफी परेशानी हुई है.

रेबेका कहती हैं, ‘जब एक 50 वर्षीय महिला बलात्कार की शिकायत लेकर आई तो ये तर्क दिया गया कि इस उम्र में उनका बलात्कार कोई क्यों करेगा. एक दूसरा मामला जिसमें पीड़िता से सवाल किया गया कि क्या संभोग के समय आप अपनी आंखों से रोई थीं?’

मृणाल सतीश के अनुसार, ‘हो सकता है 2013 के संशोधन के बाद कुछ बदलाव आया है, पर हमें ज़रूरत है जागरूकता फैलाने की क्योंकि बहुत सारे मामलों में पहले ही ये मान लिया जाता है कि बलात्कार की शिकायतें झूठी हैं और पीड़िता पर शक किया जाता है. अस्पताल और पुलिस प्रशासन को ट्रेन करना ज़रूरी हो गया है कि वो पीड़िता के साथ किस तरह से व्यवहार करें. बहुत सारे लोगों को अपने अधिकार के बारे में नहीं पता होता. हमें एक मज़बूत समर्थन प्रणाली और पीड़िता को पूरा भुगतान उपलब्ध करने के लिए और स्तर पर बदलाव करने पड़ेंगे.’

रेबेका ने बताया कि कार्यवाही में किस तरह से भाषा भी एक बड़ी समस्या बन कर सामने आती है, जैसे किसी एक मामले में महिला को बलात्कार की तिथि अदालत को समझाना मुश्किल हो गया, वो महिला आठ मार्च हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों में ही नहीं समझा पाई तो उस महिला को समझाने के लिए तीसरे महीने का आंठवां दिन… इस तरह से वक़ील ने समझाया. पर महिला के ख़ुद स्पष्ट रूप से न बोल पाने के कारण उसके बयान पर विश्वास नहीं किया जा सकता है.

रेबेका ने बताया कि अदालतों में इतने सारे मामलों के कारण वो बहुत दबाव में हैं और किसी भी मामले को निपटाने में बहुत समय लग जाता है. पुलिस को चार्जशीट बनाने में ही 90 दिन लगते हैं.दो महीने का समय एक मामले के लिए बहुत कम है.

अंत में रेबेका ने कहा, ‘तीन सालों में हमारी क़ानूनी व्यवस्था और कोर्ट में कुछ बदलाव ज़रूर आया है. कुछ हद तक हमारे कोर्ट रूम संवेदनशील हुए हैं. 2013 के बाद में बने स्पेशल कोर्टरूम, जो अलग तरह से निर्मित होते हैं और पीड़िता के लिए एक अलग कमरे की व्यवस्था होती है, जिससे उसको अदालत में सहजता महसूस हो. इन सब से बहुत हद तक सहायता भी मिली है. कुछ मामलों में जज भी बहुत संवेदनशील हैं, पर ये थोड़ा सा बदलाव दिल्ली में आया है. हम पूरे देश की स्थिति का अंदाज़ा भी नहीं लगा सकते.’