नॉर्थ ईस्ट

राजस्थान पत्रिका के बाद मणिपुर के अख़बारों ने संपादकीय कॉलम ख़ाली छोड़ा

भाजपा युवा मोर्चा के कथित कार्यकर्ताओं द्वारा समाचार पत्र ‘पोकनाफाम’ की प्रतियां जलाई गई थीं. उनका आरोप था कि अख़बार में कथित तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जुड़ी अपमानजनक सामग्री प्रकाशित की गई थी.

Imphal Newspapers Naharolgi Thoudang

मणिपुर की राजधानी इम्फाल से निकलने वाले अख़बार ‘नाहरोल्गी थोउडांग’ ने सोमवार के अंक में अपनी संपादकीय खाली छोड़ दिया.

इम्फाल: भाजपा युवा मोर्चा के कथित कार्यकर्ताओं द्वारा एक अख़बार की प्रतियां जलाए जाने के विरोध में मणिपुर की राजधानी इम्फाल से प्रकाशित होने वाले प्रमुख समाचार पत्रों ने अपने अख़बारों के संपादकीय कॉलम खाली रखे.

बीते शनिवार को स्थानीय समाचार पत्र ‘पोकनाफाम’ की प्रतियों को शनिवार को नित्यापट चुथेक इलाके में स्थित भाजपा दफ्तर के बाहर कुछ अज्ञात शरारती तत्वों ने आग लगा दी थी.

आग लगाने वालों का आरोप था कि अख़बार में कथित तौर पर प्रधानमंत्री से जुड़ी अपमानजनक सामग्री दी जा रही थी.

इनका आरोप था कि इस लेख ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपमानित और मणिपुर के मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह की छवि को ख़राब किया है.

अंग्रेज़ी समाचार पत्र द टेलीग्राफ की रिपोर्ट के अनुसार, पोकनाफाम ने साप्ताहिक कॉलम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कथित तौर पर ‘मवेशी चोर’ बताया गया था. इसके अलावा वार्ताकार आरएन रवि को चोर और चुराई गई गाय के मालिक का मध्यस्थ बताया था.

अख़बार के अनुसार, यह लेख केंद्र और उग्रवादी संगठन नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल आॅफ नगालैंड (आईएम) के बीच चल रही शांति वार्ता पर राजनीतिक व्यंग्य था.

टेलीग्राफ से बातचीत में एक भाजपा कार्यकर्ता ने कहा, ‘मीडिया वह सब कुछ नहीं लिख सकता जो वह लिखना चाहता है. कुछ नैतिकता भी होनी चाहिए. प्रधानमंत्री को मवेशी चोर कहना बहुत गंभीर मसला है जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता. उन्हें सबक सिखाने के लिए प्रतियां जलाई गईं.’

अख़बार के अनुसार, बताया जा रहा है कि प्रधानमंत्री पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने से मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह काफी चिंतित थे.

Imphal Newspapers hueiyenlanpao

इम्फाल से निकलने वाले अख़बार ‘हुईयेनलानपाओ’ ने भी सोमवार के अंक में अपनी संपादकीय खाली छोड़ दिया.

वहीं समाचार एजेंसी पीटीआई से बातचीत में संगई एक्सप्रेस के संपादक ने कहा, ‘भाजपा युवा मोर्चा द्वारा इम्फाल स्थित अख़बार की प्रतियां जलाए जाने के विरोध में सोमवार के अख़बार में संपादकीय की जगह को खाली छोड़ा गया है.’

ऑल मणिपुर वर्किंग जर्नलिस्ट्स यूनियन (एएमडब्ल्यूजेयू) के अध्यक्ष वांगखेमका श्यामजई ने शनिवार को हुई घटना की निंदा करते हुए संवाददाताओं को बताया कि अख़बार को जलाया जाना भीड़ संस्कृति को बढ़ावा देने जैसा है.

उन्होंने कहा, ‘संबंधित पक्ष अगर एएमडब्ल्यूजेयू के स्तर पर मामले को सुलझाने में विफल रहते हैं तो वह अदालत में जा सकते हैं.’ श्यामजई ने आगे कहा, कि भाजपा मणिपुर प्रदेश युवा मोर्चा ने इस बारे में ‘पोकनाफाम’ समाचार पत्र के संपादक और प्रकाशकों से कोई बात नहीं की है.

मणिपुर एडिटर्स गिल्ड के अध्यक्ष ए. मोबी ने भी श्यामजई की बातों का समर्थन किया है. मोबी ने कहा, ‘अख़बार की प्रतियां जलाने के बजाए राजनीतिक दल के सदस्यों को संबंधित लोगों से बात करनी चाहिए थी.’

वहीं भाजपा के पदाधिकारी ने कहा, पोकनाफाम अख़बार में शनिवार का ‘वॉक्स पॉपुली’ नाम के कॉलम से कार्यकर्ताओं को रोष था.

नाम न बताने की शर्त पर इस पदाधिकारी ने बताया, ‘इस कॉलम में जो सामग्री प्रकाशित की गई थी उसे ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में अपमानजनक माना गया.’

हालांकि भाजपा पदाधिकारी ने इस बात की पुष्टि नहीं की कि ‘पोकनाफाम’ समाचार पत्र की प्रतियां उनकी ही पार्टी के कार्यकर्ताओं ने जलाई हैं.

उन्होंने संभावना जताई कि इस मामले को प्रेस काउंसिल आॅफ इंडिया तक ले जाया जाएगा.

इससे पहले राजस्थान के प्रमुख हिंदी दैनिक राजस्थान पत्रिका ने वसुंधरा सरकार की नीतियों के प्रति अपना विरोध दिखाते हुए राष्ट्रीय प्रेस दिवस (16 नवंबर) के मौके पर अपना संपादकीय कॉलम खाली छोड़ दिया था.

संपादकीय कॉलम को मोटे काले बॉर्डर से घेरते हुए अखबार ने लिखा था, ‘आज राष्ट्रीय प्रेस दिवस यानी स्वतंत्र और उत्तरदायित्वपूर्ण पत्रकारिता का दिन है. लेकिन राजस्थान में राज्य सरकार द्वारा बनाए काले कानून से यह खतरे में है. संपादकीय खाली छोड़कर हम लोकतंत्र के हत्यारे ‘काले कानून’ का पूर्ण मनोयोग से विरोध करते हैं.’

गौरतलब है कि राजस्थान सरकार ने दो विधेयक पेश किए थे, जिनको लेकर काफी विवाद और विरोध के बाद इसे विधानसभा की प्रवर समिति के पास भेज दिया गया, लेकिन वापस नहीं लिया गया है. ये विधेयक- राज दंड विधियां संशोधन विधेयक, 2017 और सीआरपीसी की दंड प्रक्रिया सहिंता, 2017 थे.

राजस्थान पत्रिका इसे काला कानून कहकर इसका लगातार विरोध कर रहा है.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)

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