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कृष्ण प्रताप सिंह

Allahabad: A man stand next to an out-of-service Automated Teller Machine (ATM) in Allahabad on Wednesday. PTI Photo (PTI4_18_2018_000120B)

नकदी संकट: आग लगी तो कुंओं की खुदाई शुरू की गई

नोटबंदी से पहले तक तो जनता ये कल्पना भी नहीं करती थी कि कभी उसे बैंकों में जमा अपना ही धन पाने में इतनी समस्याएं पेश आएंगी और सरकार के झूठे आश्वासन जले पर नमक छिड़कते नज़र आएंगे.

अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ (जन्म 15 अप्रैल 1865 - 16 मार्च 1947, फोटो: विकिपीडिया)

आपको पता है, ‘हरिऔध’ का घर और स्मृतियां दोनों खंडहर हो गई हैं

अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ के पट्टीदारों ने उनकी विरासत को लंबे अरसे तक झगड़े में फंसाकर उन्हें जैसी ‘श्रद्धांजलि’ दी, वैसी किसी दुश्मन को भी न मिले.

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जब चुनाव हार गए थे बाबा साहब भीमराव आंबेडकर

जन्मदिन विशेष: भारत के जिस संविधान का भीमराव आंबेडकर को निर्माता कहा जाता है उसके लागू होने के बाद 1952 में हुए देश के पहले लोकसभा चुनाव में वे बुरी तरह हार गए थे.

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आंबेडकर: संविधान अच्छे हाथों में रहा तो अच्छा, बुरे हाथों में गया तो ख़राब साबित होगा

जन्मदिन विशेष: आज हम अपनी राजनीति में नियमों, नीतियों, सिद्धांतों, नैतिकताओं, उसूलों व चरित्र के जिन संकटों से दो-चार हैं, उनके अंदेशे भीमराव आंबेडकर ने तभी भांप लिए थे.

Ghaziabad: A bike set on fire by a group of protesters during 'Bharat Bandh' call given by Dalit organisations against the alleged dilution of Scheduled Castes / Scheduled Tribes Act, in Ghaziabad on Monday. PTI Photo (PTI4_2_2018_000026B)

सरकार! दलितों में अंदेशे तो आपने ही पैदा किए

दलितों का ग़ुस्सा इस बिना पर है कि वे समझते हैं कि लंबे संघर्ष के बाद उन्हें जो संवैधानिक व क़ानूनी अधिकार मिले हैं, सत्तारूढ़ भाजपा व उसका मातृसंगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ उन्हें छीनना चाहते हैं.

(फोटो साभार: विकिमीडिया कॉमन्स)

सत्यभक्त: हिंदी नवजागरण के अलबेले सेनानी

जन्मदिन विशेष: डाॅ. रामविलास शर्मा ने लिखा है कि अगर भारत में किसी एक व्यक्ति को कम्युनिस्ट पार्टी का संस्थापक होने का श्रेय दिया जा सकता है तो वह सत्यभक्त ही हैं.

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बद्री विशाल पित्ती: हैदराबाद की पांचवीं मीनार

जन्मदिन विशेष: कार्ल मार्क्स और मार्क्सवाद के संदर्भ में जो महत्व फ्रेडरिक एंगेल्स का है, डाॅ. राममनोहर लोहिया और समाजवाद के लिए वही महत्व बद्री विशाल पित्ती का है.

डॉ. राम मनोहर लोहिया. (जन्म: 23 मार्च 1910 - अवसान: 12 अक्टूबर 1967)

राम मनोहर लोहिया: सच्चे लोकतंत्र की शक्ति सरकारों के उलट-पुलट में बसती है

जन्मदिन विशेष: लोहिया कहते थे कि किसी शख़्सियत का जन्मदिन मनाने या उसकी मूर्ति लगाने से, उसके निधन के 300 साल बाद तक परहेज रखना चाहिए ताकि इतिहास निरपेक्ष होकर यह फैसला कर पाए कि वह इसकी हक़दार थी या नहीं.

The Prime Minister, Shri Narendra Modi interacting with the Beti Bachao Beti Padhao beneficiaries, in Jhunjhunu, Rajasthan on March 08, 2018.

प्रधानमंत्री जी! आपकी सरकार पितृसत्ता का ज़हर क्यों फैला रही है?

राजस्थान के झुंझुनू में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बेटियों को लेकर जो कुछ भी कहा, उससे कई सवाल खड़े होते हैं.

India-Left Wikimedia Commons

वामपंथ से इतनी घृणा क्यों?

सुब्रमण्यम स्वामी ने पूछा कि ‘विदेशी आतंकवादी’ लेनिन की मूर्ति देश में कहीं भी क्यों होनी चाहिए? काश कोई उन्हें बताता कि लेनिन तब से भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन की प्रेरणा हैं, जब स्वामी की पार्टी के पुरखे अंग्रेज़ों का हुक्का भरने में मगन थे.

नज़ीर अकबराबादी.

नज़ीर अकबराबादी: होली की बहारों का बेनज़ीर शायर

फिराक़ गोरखपुरी लिखते हैं कि नज़ीर दुनिया के रंग में रंगे हुए महाकवि थे. वे दुनिया में और दुनिया उनमें रहती थी, जो उनकी कविताओं में हंसती-बोलती, जीती-जागती त्योहार मनाती नज़र आती है.

चंद्रशेखर आज़ाद. (फोटो साभार: www.hindgrapha.com)

आज़ाद के शहीद हो जाने के बाद भी उनकी मां को उनके लौट आने का विश्वास था

शहादत दिवस पर विशेष: चंद्रशेखर आज़ाद की मां ने मन्नत मानकर दो उंगलियों में धागा बांध रखा था. कहती थीं कि आज़ाद के आने के बाद ही धागा खोलेंगी.

Narendra Modi Reuters

सब कुछ बदलने का वादा करके आए मोदी ने भ्रष्ट आर्थिक नीतियों को ही आगे बढ़ाया

आज जब दुनिया में नाना प्रकार के खोट उजागर होने के बाद भूमंडलीकरण की ख़राब ​नीतियों पर पुनर्विचार किया जा रहा है, हमारे यहां उन्हीं को गले लगाए रखकर सौ-सौ जूते खाने और तमाशा देखने पर ज़ोर है.

Narendra-Modi_PTI

‘एक देश, एक चुनाव’ लोकतंत्र का गला घोंट देगा

आज चुनावों के विकास में बाधक होने का तर्क स्वीकार कर लिया गया तो क्या कल समूचे लोकतंत्र को ही विकास विरोधी ठहराने वाले आगे नहीं आ जाएंगे!

(प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स)

क्यों कश्मीर में सेना और नागरिकों को आमने-सामने खड़ा किया जा रहा है?

कश्मीर के हालात अब न सैनिकों के लिए अच्छे रह गए हैं, न वहां की जनता के लिए. दोनों के मन में एक-दूसरे के प्रति संदेह का पहाड़ खड़ाकर कर दिया गया है जो रास्ता छोड़ने को तैयार नहीं.

New Delhi: Union Finance Minister Arun Jaitley along with MoS Finance ministers Shiv Pratap Shukla, P Radhakrishnan and Economic Affairs Secretary Shaktikanta Das leaves the North Block to present the Union Budget at Parliament, in New Delhi on Thursday.  Finance Secretary Hasmukh Adhia and Chief Economic Advisor Arvind Subramanian are also seen. PTI Photo by Manvender Vashist (PTI2_1_2018_000009B)

आम बजट: बड़े-बड़े बदलावों के वादे अंततः वादे ही क्यों रह गए?

प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि यह किसानों, गरीबों व वंचितों का बजट है तो उन्हें याद दिलाना होगा कि उन्होंने पिछले बजट को ‘सबके सपनों का बजट’ बताया था.

Sant Ravidas Wikipedia

‘जब सभ कर दोउ हाथ पग दोउ नैन दोउ कान, रविदास पृथक कइसे भये हिंदू औ मूसलमान’

संत कवियों की लंबी परंपरा में एक रविदास ही ऐसे हैं जो श्रम को ईश्वर बताकर ऐसे राज्य की कल्पना करते हैं, जो भारतीय संविधान के समता, स्वतंत्रता, न्याय व बंधुत्व पर आधारित अवधारणा के अनुरूप है.

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ. (फोटो: पीटीआई)

अब तो अटल बिहारी जैसा कोई प्रधानमंत्री भी नहीं है, जो योगी को राजधर्म की याद दिलाए

कासगंज में जिन अल्पसंख्यकों ने तिरंगा फहराने के लिए सड़क पर कुर्सियां बिछा रखी थीं, वे अचानक वंदे मातरम् का विरोध और पाकिस्तान का समर्थन क्यों करने लगेंगे?

Mahatma-Gandhi-HD-Wallpapers

बापू ने अयोध्या में कहा था, हिंसा कायरता का लक्षण और तलवारें कमज़ोरों का हथियार हैं

साल 1921 में गांधीजी ने फ़ैज़ाबाद में निकले जुलूस में देखा कि ख़िलाफ़त आंदोलन के अनुयायी हाथों में नंगी तलवारें लिए उनके स्वागत में खड़े हैं. जिसकी उन्होंने सार्वजनिक तौर पर आलोचना की थी.

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‘कहानी लेखन में गिरावट का दौर है, अच्छा साहित्य आंदोलनों से निकलकर सामने आता है’

शुक्रवार 12 जनवरी को हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकार दूधनाथ सिंह का निधन हो गया. जीवन और साहित्य के विभिन्न पहलुओं पर उनसे हुई एक पुरानी बातचीत.

(फोटो: पीटीआई)

जीएसटी व नोटबंदी के दुष्प्रभावों को नकारना नुकसानदेह साबित होगा

उत्तराखंड सरकार के कृषि मंत्री सुबोध उनियाल के ‘जनता दरबार’ मेें नोटबंदी व जीएसटी के कहर से पीड़ित एक ट्रांसपोर्ट व्यवसायी ने ज़हर खाकर आत्महत्या कर ली.

प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो: पीटीआई)

उत्तर प्रदेश: कंबल गरीब को और मुंह कैमरे की ओर!

उत्तर प्रदेश में विधायक सरकारी खजाने से गरीबों को कंबलों के साथ सरकारी स्कूलों के छात्रों को जूते-मोजे और स्वेटर भी बांट रहे हैं. मगर इस अदा से जैसे उनकी बड़ी अनुकंपा कि जनवरी में बांट दे रहे हैं वरना मार्च-अप्रैल में बांटते तो कोई क्या कर लेता?

इस्लामाबाद स्थित विदेश मंत्रालय के कार्यालय में कुलभूषण जाधव के साथ उनकी मां और पत्नी. (फोटो साभार: ट्विटर/@ForeignOfficePk)

सवाल पाक की बदसलूकी का ही नहीं, आपकी रहबरी का भी है

क्या कारण है कि विदेश मंत्री सुषमा स्वराज नहीं बता पा रहीं कि वे और उनका मंत्रालय जाधव की मां व पत्नी को पाकिस्तान के मानवीय मुलाकात के झांसे से बचाने में क्यों विफल रहे?

Bechan Sharma Pandey

पांडेय बेचन शर्मा: वह ‘युग’ भले ही प्रेमचंद का था, लेकिन लोक में ‘उग्र’ की ही धाक थी

जन्मदिन विशेष: जब कलावादी आलोचकों ने ‘उग्र’ की कहानियों को अश्लील, घासलेटी और कलाविहीन कहा, तब उनका जवाब था कि अगर सत्य को ज्यों का त्यों चित्रित कर देने में कोई कला हो सकती है तो मेरी इन कहानियों में भी कला है

पंडित बनारसी दास चतुर्वेदी (24 दिसंबर 1892 ​​​​​​​​​​​​​​- 02 May 1985). (फोटो साभार: अमेजॉन इंडिया)

बनारसीदास चतुर्वेदी, जिन्हें हिंदी के लोगों ने भुला दिया

जयंती विशेष: हिंदी के लोग अब आम तौर पर लेखक और पत्रकार पंडित बनारसीदास चतुर्वेदी को न याद करते हैं, न ही उनकी पत्रिका ‘विशाल भारत’ को. यहां तक कि उनकी जयंती और पुण्यतिथि पर भी उन्हें याद नहीं किया जाता.

शहीद अशफ़ाक उल्ला खां, रामप्रसाद बिस्मिल और रौशन सिंह. (फोटो साभार: विकिपीडिया)

वतन पे मरने वालों के परिवारों का क्या यही बाक़ी निशां होगा?

अशफ़ाक़ उल्ला ख़ां, रामप्रसाद बिस्मिल और रौशन सिंह के शहादत दिवस (19 दिसंबर) पर उनकी मांओं और परिवार के दुर्दशा की कहानी.

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क्या गुजरात में मोदी की चमक फीकी पड़ गई ​है?

गुजरात में अपनी कमज़ोरियों के कारण कांग्रेस भले ही बाज़ी नहीं पलट पायी, लेकिन मतदाताओं ने पिछली बार से डेढ़ दर्जन ज़्यादा सीटें देकर साफ कर दिया है कि वे ‘अपने’ प्रधानमंत्री के ‘कांग्रेसमुक्त भारत’ के आह्वान को कान नहीं दे रहे.

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गुजरात चुनाव से धर्मनिरपेक्षता क्यों गायब हो गई है?

पूरे विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा और कांग्रेस के बीच ख़ुद को असली और प्रतिद्वंद्वी को नकली हिंदू सिद्ध करने की प्रतियोगिता-सी चल पड़ी.

The congested Hanuman Garhi (seen in the backdrop) crossing where atleast 20 kar sevaks were shot dead in October–November 1990. (Photo: Reuters)

अयोध्या में सामाजिक मूल्यों के ध्वंस का सिलसिला अब भी जारी है

भूमंडलीकरण की बाज़ारोन्मुख आंधी में कट्टरता और सांप्रदायिकता अयोध्या के बाज़ार की अभिन्न अंग बनीं तो अभी तक बनी ही हुई हैं.

फाइल फोटो: पीटीआई

विहिप ने अयोध्या को रणक्षेत्र बनाया तो ‘हिंदू’ हुई हिंदी पत्रकारिता

मुख्यधारा की पत्रकारिता तो शुरुआती दिनों से ही राम जन्मभूमि आंदोलन का अपने व्यावसायिक हितों के लिए इस्तेमाल करती और ख़ुद भी इस्तेमाल होती रही.

UP Civic Polls Photo FB BJP4UP copy

निकाय चुनाव परिणाम को मोदी की नीतियों और विकास की जीत बताना महज़ सियासी ज़रूरत है

मेयरों के चुनाव में भाजपा की सफलता को मोदी-योगी के चमत्कारों से जोड़ने वालों को यह भी बताना चाहिए कि किसके चमत्कार से पार्टी निर्दलीयों से भी पीछे रही?

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रविशंकर जी! और भी ग़म हैं अयोध्या में राम मंदिर-बाबरी मस्जिद के सिवा…

माहौल का असर है या कुछ और कि श्री श्री रविशंकर को अयोध्या में कोई भी गंभीरता से नहीें ले रहा. लेकिन श्री श्री का सौभाग्य कि वे मीडिया की भरपूर सुर्ख़ियां बटोर रहे हैं.

(फोटो: पीटीआई)

राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद के स्वामित्व संबंधी विवाद में विहिप की क्या भूमिका है?

विधि विशेषज्ञों की मानें तो अब जो स्थिति है, उसमें चाहे विवाद कोर्ट के बाहर सुलझ जाए या फैसला हिंदुओं के पक्ष में आ जाए, मंदिर निर्माण में विहिप की कोई भूमिका मुमकिन नहीं है.

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अयोध्या में नए खेल की तैयारी कर रहा संघ परिवार

संघ परिवार के संगठन इन दिनों अयोध्या में ख़ुद को राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद के सद्भावपूर्ण हल का सबसे बड़ा पैरोकार सिद्ध करने में लगे हैं.

Ayodhya Diwali

अयोध्या: एक दिन की चांदनी फिर अंधेरी रात

आज अयोध्या सीता जैसी ही अकेली है. वह नहीं समझ पा रही कि इस उदासी का गिला किससे और कैसे करे? बुधवार की जगर-मगर देखने तो सैकड़ों न्यूज़ चैनल दौड़ पड़े थे, अब उसकी उदासी को खोज-ख़बर लेने वाला कोई नहीं है.

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क्या योगी सरकार दीयों से ज़्यादा अयोध्यावासियों का दिल जलाना चाहती है?

सही मायने में अयोध्या और यहां रहने वाले लोगों की फ़िक्र किसी को नहीं है. 1,71,000 दीयों वाली सरकारी दीपावली मनाकर योगी सरकार सिर्फ़ अपने एजेंडे को आगे बढ़ा रही है.

Yogi Adityanath PTI

सावधान, वे फिर अयोध्या लौट आए हैं!

नई बात यह है कि इस बार वे ‘मंदिर वहीं बनाएंगे’ के नारे लगाते अयोध्या नहीं लौटे हैं. सरयू तट पर भगवान राम की भव्य प्रतिमा लगाने और भव्य देव दीपावली मनाने आए हैं.

साभार: competitionzenith.blogspot.in

जब जेपी के जीवित रहते हुए संसद ने उन्हें श्रद्धांजलि दे दी थी…

जन्मदिन विशेष: गैरकांग्रेसवाद का सिद्धांत भले ही डाॅ. राममनोहर लोहिया ने दिया था लेकिन उसकी बिना पर कांग्रेस की केंद्र की सत्ता से पहली बेदखली 1977 में लोकनायक जयप्रकाश नारायण के तत्वावधान में ही संभव हुई.