असम में विधानसभा चुनाव से पहले एसआईआर नहीं, सिर्फ विशेष पुनरीक्षण होगा: चुनाव आयोग

27 अक्टूबर को 12 राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में एसआईआर की घोषणा करते हुए आयोग ने असम को इस प्रक्रिया से अलग रखा था. अब आयोग ने असम के लिए मतदाता सूचियों के विशेष पुनरीक्षण (एसआर) की घोषणा की है, जो एसआईआर से भिन्न है.

(प्रतीकात्मक फोटो: पीआईबी)

नई दिल्ली: भारतीय निर्वाचन आयोग ने सोमवार (17 नवंबर) को असम के लिए मतदाता सूचियों के विशेष पुनरीक्षण (एसआर) की घोषणा की. इसके लिए 1 जनवरी, 2026 को अर्हता तिथि (qualifying date) घोषित की गई है.

भारत के अन्य राज्यों से अलग चुनाव आयोग द्वारा असम विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूचियों को अपडेट करने के लिए आधिकारिक तौर पर एक अलग योजना निर्धारित की गई है.

इस योजना के तहत बूथ स्तरीय अधिकारियों द्वारा घर-घर जाकर सत्यापन सहित पुनरीक्षण-पूर्व गतिविधियां 22 नवंबर से 20 दिसंबर, 2025 तक चलेंगी. एकीकृत मसौदा मतदाता सूची 27 दिसंबर को प्रकाशित की जाएगी, जबकि अंतिम सूची 10 फरवरी, 2026 को प्रकाशित होगी, जिससे मई से पहले होने वाले राज्य चुनावों के लिए मतदाता सूचियां तैयार होंगी.

चुनाव आयोग के निर्णय से यह पुष्टि होती है कि असम को विशेष गहन संशोधन (एसआईआर)- जो एक अधिक व्यापक प्रक्रिया है – से नहीं गुजरना पड़ेगा, जो अन्य राज्यों में लागू की जा रही है. दोनों प्रकार के संशोधनों के बीच का अंतर महत्वपूर्ण है.

एसआईआर मतदाता सूची का एक व्यापक भौतिक ऑडिट है जिसका मुख्य उद्देश्य अयोग्य प्रविष्टियों को हटाना है. इस पद्धति में घर-घर जाकर अनिवार्य गणना शामिल है, जहां बूथ स्तर के अधिकारियों को प्रत्येक मौजूदा मतदाता का भौतिक सत्यापन करने का काम सौंपा जाता है. इस प्रक्रिया में प्रमाण का भार प्रभावी रूप से मतदाता पर आ जाता है, जिसका नाम सत्यापन न होने पर सूची से हटाया जा सकता है.

एसआर समावेशन पर केंद्रित है

एसआईआर के उलट, विशेष पुनरीक्षण या एसआर, जो नियमित विशेष सारांश पुनरीक्षण (एसएसआर) के अधिक समान है, मुख्य रूप से समावेशन पर केंद्रित है. यह जनता द्वारा स्वेच्छा से नए मतदाताओं को जोड़ने के लिए आवेदन (प्रपत्र 6), किसी प्रविष्टि पर आपत्ति (प्रपत्र 7), या सुधार का अनुरोध (प्रपत्र 8) दाखिल करने पर निर्भर करता है.

इस प्रणाली के तहत किसी मौजूदा मतदाता का नाम सूची में तब तक बना रहता है जब तक कि उसके विरुद्ध कोई विशिष्ट आपत्ति दर्ज न की जाए.

मालूम हो कि राष्ट्रव्यापी एसआईआर प्रक्रिया को वर्तमान में विपक्षी दलों और एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) जैसे नागरिक समाज समूहों द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई है. यह कानूनी चुनौती चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र पर केंद्रित है, जहां याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि एसआईआर द्वारा दस्तावेज़ों की मांग एक नागरिक सत्यापन प्रक्रिया जैसी है, और उनका मानना ​​है कि यह शक्ति केंद्र सरकार के पास सुरक्षित है.

उल्लेखनीय है कि बिहार में एसआईआर के पहले चरण, जिसके परिणामस्वरूप मतदाता सूची से 68 लाख से ज़्यादा नाम हटा दिए गए, ने इन दावों को और पुख्ता कर दिया है.

बिहार में हुई इस प्रक्रिया के बाद तमिलनाडु में सत्तारूढ़ दल द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके) के प्रवक्ता सर्वनन अन्नादुरई ने सवाल उठाते हुए पूछा था, ‘चुनाव आयोग नागरिकता के मानदंड क्यों लाने की कोशिश कर रहा है? क्या चुनाव आयोग नागरिकता खोजने वाली इकाई है?’

असम को एसआईआर से बाहर करने की घोषणा सबसे पहले 27 अक्टूबर को की गई थी. मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 6ए के तहत राज्य की विशिष्ट कानूनी स्थिति और चल रही राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) प्रक्रिया का हवाला दिया था, जिसके बारे में उन्होंने कहा था कि यह ‘लगभग पूरी होने वाली है.’

मालूम हो कि असम का संदर्भ उसके अपने एनआरसी से प्रभावित है, जो सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में 31 अगस्त, 2019 को 1,600 करोड़ रुपये से अधिक की लागत से अंतिम रूप दिया गया था. असम समझौते की 24 मार्च, 1971 की कट-ऑफ तिथि पर आधारित इस प्रक्रिया में 3.3 करोड़ आवेदकों में से लगभग 19 लाख को बाहर रखा गया था.

हालांकि, इस सूची को भारत के महापंजीयक द्वारा औपचारिक रूप से अधिसूचित नहीं किया गया है.

वहीं, भाजपा के नेतृत्व वाली राज्य सरकार ने 2019 की सूची को स्वीकार नहीं किया है, और मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा बार-बार बांग्लादेश की सीमा से लगे जिलों में 20% और अन्य जिलों में 10% नामों के पुनर्सत्यापन की मांग कर रहे हैं.

चुनाव आयोग के पहले के फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए असम में विपक्ष के नेता देवव्रत सैकिया ने कहा कि एनआरसी प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है.

असम और पश्चिम बंगाल में नागरिकता के मुद्दे पर भाजपा का रुख अलग

उल्लेखनीय है कि चुनाव आयोग का यह फैसला एक जटिल राजनीतिक पृष्ठभूमि के बीच आया है, जहां सत्तारूढ़ भाजपा असम और पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल में नागरिकता के मुद्दे पर अलग-अलग रुख अपना रही है. बंगाल में भी अगले साल विधानसभा चुनाव होने वाले हैं.

पश्चिम बंगाल में पार्टी के मंच ने गैर-मुस्लिम बंगाली प्रवासियों के लिए नागरिकता प्रक्रिया में तेज़ी लाने का समर्थन किया है, जबकि असम में बंगाली भाषियों के प्रवासन को लेकर स्थानीय संवेदनशीलता के कारण यह मुद्दा ज़्यादा विवादास्पद है.

ज्ञात हो कि असम में इस मुद्दे पर हुए विरोध प्रदर्शनों ने 2019-2020 में सीएए/एनआरसी आंदोलन के दौरान राज्य को पूरी तरह ठप कर दिया था.

ऐसे में एसआर का यह विकल्प चुनाव आयोग को असम के लिए विशिष्ट दो महत्वपूर्ण मुद्दों से निपटने में मदद करता है: यह एनआरसी की कानूनी स्थिति अनिश्चित रहने तक बड़े पैमाने पर सत्यापन प्रक्रिया से बचता है. इसके साथ ही यह 2026 के चुनाव के लिए मतदाता सूचियों को अंतिम रूप देने का एक तेज़, कम जटिल रास्ता प्रदान करता है.

गौरतलब है कि असम के लिए घोषित एसआर एक मानक वार्षिक प्रक्रिया बनी हुई है, जो 18 वर्ष की आयु पूरी करने वाले नए नागरिकों को नामांकित करने तथा सुधार और विलोपन के लिए नियमित आवेदनों पर ध्यान केंद्रित करती है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)