श्रीनगर: भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और हिंदू दक्षिणपंथी समूह भले ही यह दावा कर रहे हों कि श्री माता वैष्णो देवी इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल एक्सीलेंस देश की एकमात्र मुस्लिम बहुल सरकार (जम्मू-कश्मीर सरकार) से बिना किसी फंडिंग के चल रहा था, लेकिन दस्तावेज़ों से पता चलता है कि श्री माता वैष्णो देवी (एसएमवीडी) विश्वविद्यालय, जो इस संस्थान का संचालन करता है, को तब भी आधिकारिक वित्तीय सहायता मिलती रही, जब तत्कालीन राज्य का विभाजन कर उसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में बदल दिया गया.
इस विश्वविद्यालय को 2017-18 में जम्मू-कश्मीर सरकार से 10 लाख रुपये की ‘अनुदान’ राशि मिली थी. यह अनुदान 2018-19 में 50 लाख रुपये से बढ़कर 2019-20 में 5 करोड़ रुपये हो गया, जब भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त कर दिया था.
वहीं, 2019 के बाद की अवधि में जम्मू-कश्मीर के बजट संसद द्वारा अनुमोदित किए जाते थे, जब तक कि पिछले साल उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व में केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर की पहली निर्वाचित सरकार ने पद की शपथ नहीं ली थी.
विश्वविद्यालय को जम्मू-कश्मीर सरकार का अनुदान लगातार बढ़ता रहा
बजट दस्तावेजों से पता चलता है कि 2020-21 में 19.70 करोड़ रुपये से वैष्णो देवी विश्वविद्यालय को जम्मू-कश्मीर सरकार का अनुदान लगातार बढ़ता गया और 2021-22 में 21 करोड़ रुपये से बढ़कर 2022-23 में 23 करोड़ रुपये, 2023-24 में 24 करोड़ रुपये और 2024-25 में 24 करोड़ रुपये हो गया.
बजट दस्तावेज़ों से यह भी पता चला है कि चालू वित्तीय वर्ष में जम्मू-कश्मीर सरकार ने इस विश्वविद्यालय के लिए 28 करोड़ रुपये के ‘सहायता अनुदान’ को मंज़ूरी दी है.
मालूम हो कि जम्मू के रियासी ज़िले में स्थित यह चिकित्सा संस्थान, जम्मू-कश्मीर में उस समय विवाद का केंद्र बन गया है जब भाजपा ने संघ परिवार से जुड़े कुछ संगठनों द्वारा संस्थान में एमबीबीएस की 50 सीटों का कोटा केवल हिंदुओं के लिए आरक्षित करने के आह्वान का समर्थन किया.
दक्षिणपंथी समूहों ने दावा किया है कि संस्थान हिंदू भक्तों के दान से चलता है. हालांकि, आधिकारिक दस्तावेजों से पता चलता है कि इसका प्रबंधन एसएमवीडी विश्वविद्यालय द्वारा किया जाता है, जिसे 2017-18 से जम्मू-कश्मीर सरकार से 121.30 करोड़ रुपये का ‘अनुदान’ प्राप्त हुआ है.
कश्मीर विश्वविद्यालय और जम्मू विश्वविद्यालय, जो क्रमशः श्रीनगर और जम्मू में सरकारी मेडिकल कॉलेजों का प्रबंधन करते हैं, तथा कुछ अन्य शैक्षणिक संस्थानों को भी इस अवधि के दौरान जम्मू-कश्मीर सरकार से ‘सहायता अनुदान’ प्राप्त हुआ.
नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ‘सहायता अनुदान’ को ‘वित्तीय सहायता, दान या अंशदान’ के रूप में परिभाषित करते हैं, जो केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा विश्वविद्यालयों, अस्पतालों, सहकारी संस्थाओं और अन्य को ‘उनके दैनिक परिचालन व्ययों को पूरा करने के लिए’ दिया जाता है.
इन अनुदानों को तीन अलग-अलग वस्तु शीर्षकों के अंतर्गत वर्गीकृत किया गया है – ‘सामान्य सहायता अनुदान’, ‘पूंजीगत परिसंपत्तियों के सृजन के लिए अनुदान’ और ‘वेतन सहायता अनुदान’.
विश्वविद्यालय को ‘अनुदान सहायता’ प्रदान करने की प्रक्रिया 2017 में शुरू हुई थी, जब भाजपा जम्मू-कश्मीर राज्य में महबूबा मुफ़्ती के नेतृत्व वाली पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार के साथ सत्ता में थी.
मुख्यमंत्री अब्दुल्ला ने कहा- मुसलमानों पर उंगली उठाते हैं, तो इस बात को भी ध्यान रखना चाहिए
ज्ञात हो कि पिछले हफ़्ते विश्व हिंदू परिषद, राष्ट्रीय बजरंग दल और अन्य हिंदू दक्षिणपंथी संगठनों ने इस चिकित्सा संस्थान पर धावा बोल दिया था और 42 मुस्लिम छात्रों को निष्कासित करने की मांग की थी, जिनमें से ज़्यादातर कश्मीर से थे और जिनका चयन संस्थान में एमबीबीएस के लिए उनकी नीट रैंकिंग के आधार पर हुआ था.
विपक्ष के नेता सुनील शर्मा के नेतृत्व में जम्मू-कश्मीर भाजपा नेताओं ने बाद में उपराज्यपाल मनोज सिन्हा को एक ज्ञापन सौंपकर संस्थान में केवल हिंदू छात्रों के लिए सीटें आरक्षित करने की मांग की. इस कदम की केंद्र शासित प्रदेश के सभी राजनीतिक दलों ने निंदा की.
जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री अब्दुल्ला ने मंगलवार (25 नवंबर) को कहा कि शर्मा को भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार पर विश्वविद्यालय को अल्पसंख्यक संस्थान घोषित करने के लिए दबाव डालना चाहिए.
उन्होंने आगे कहा, ‘आस्था की बात ठीक है, लेकिन जब आप मेडिकल कॉलेज बना रहे थे, तब आपने इसे अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा क्यों नहीं दिया. यहां सिर्फ नीट और मेरिट देखकर दाखिला दिया जाता है, मजहब देखकर नहीं.’
सीएम अब्दुल्ला ने यह भी कहा कि जब आप मुसलमानों पर उंगली उठाते हैं और उन पर सांप्रदायिक, संकीर्णतावादी होने और दूसरों को बर्दाश्त न करने का आरोप लगाते हैं, तो इस बात को भी याद रखें.
एसएमवीडी अल्पसंख्यक संस्थान नहीं है
उल्लेखनीय है कि संविधान के अनुच्छेद 30 और सर्वोच्च न्यायालय के दिशानिर्देश देश के अल्पसंख्यकों को अपने स्वयं के शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने का अधिकार देते हैं, जहां उस विशेष समुदाय के छात्रों के लिए 50% तक सीटें आरक्षित की जा सकती हैं.
हालांकि, एसएमवीडी विश्वविद्यालय एक अल्पसंख्यक संस्थान नहीं है.
एसएमवीडी श्राइन बोर्ड के स्वामित्व वाले 34 एकड़ भूमि पर निर्मित, इस चिकित्सा संस्थान को इस वर्ष 8 सितंबर को राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग द्वारा 2025-26 शैक्षणिक सत्र के लिए 50 एमबीबीएस सीटों पर प्रवेश देने की अनुमति दी गई थी.
संस्थान की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, यह तीसरे वर्ष तक एमबीबीएस सीटों की क्षमता को 100 तक बढ़ाने की योजना बना रहा है और एक डेंटल कॉलेज और एक पैरामेडिकल कॉलेज भी स्थापित करेगा. संस्थान में वर्तमान में कार्यरत संकाय सदस्यों में कुछ मुस्लिम हैं.
भाजपा पर निशाना साधते हुए नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी) के वरिष्ठ नेता तनवीर सादिक ने कहा कि जम्मू-कश्मीर सरकार से विश्वविद्यालय को मिलने वाला अनुदान ‘स्पष्ट रूप से साबित करता है कि यह संस्थान (मेडिकल संस्थान) केवल चंदे से नहीं चल रहा है.
एनसी के मुख्य प्रवक्ता सादिक ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा, ‘और जब सार्वजनिक धन शामिल हो, तो इस केंद्र शासित प्रदेश के प्रत्येक नागरिक को वहां रहने का समान अधिकार है – चाहे वह किसी भी धर्म या पृष्ठभूमि का हो.’
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