नई दिल्ली: केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने बुधवार (29 जुलाई) को राज्यसभा में एक प्रश्न के लिखित जवाब में कहा कि देश में अब एक भी ज़िला वामपंथी उग्रवाद (लेफ्ट विंग एक्स्ट्रीमिज़्म-एलडब्ल्यूई) प्रभावित नहीं है. उन्होंने कहा कि लगभग छह दशक तक चली हिंसा के बाद देश उस समस्या से मुक्त हो गया है, जिसे कभी आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़े खतरों में से एक माना जाता था.
राय ने कहा, ‘फिलहाल देश का कोई भी ज़िला एलडब्ल्यूई प्रभावित श्रेणी में नहीं आता. अप्रैल 2018 में नक्सल प्रभावित ज़िलों की संख्या 126 से घटकर 90 हुई, जुलाई 2021 में 70, अप्रैल 2024 में 38, दिसंबर 2025 में आठ और मार्च-अप्रैल 2026 तक यह संख्या शून्य हो गई.’
उन्होंने बताया कि वर्तमान में 37 ज़िलों को ‘लीगेसी एंड थ्रस्ट डिस्ट्रिक्ट’ की श्रेणी में रखा गया है. ये अब एलडब्ल्यूई प्रभावित नहीं हैं, लेकिन सुरक्षा और विकास संबंधी उपायों को मज़बूत करने के लिए कुछ समय तक विशेष सहायता जारी रखी जाएगी.
हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, राय ने कहा कि एक ज़िले को ‘डिस्ट्रिक्ट ऑफ कंसर्न’ की श्रेणी में रखा गया है, जहां नक्सली हिंसा पर पूरी तरह काबू पा लिया गया है और उनके संगठनात्मक ढांचे को भी पूरी तरह ध्वस्त कर दिया गया है.
गृह मंत्रालय के रिकॉर्ड के अनुसार, यह इकलौता ज़िला झारखंड का पश्चिमी सिंहभूम है.
बस्तर समेत छत्तीसगढ़ के अन्य ज़िले भी सूची से हटे
वरिष्ठ माओवादी नेताओं के बड़ी संख्या में मारे जाने और आत्मसमर्पण करने के बाद कभी माओवादियों का मज़बूत गढ़ माना जाने वाला बस्तर समेत छत्तीसगढ़ के अन्य ज़िलों को भी सूची से हटा दिया गया है. बस्तर के सुकमा, बीजापुर और नारायणपुर जैसे संवेदनशील ज़िले भी अब ‘डिस्ट्रिक्ट ऑफ कंसर्न’ की श्रेणी में नहीं हैं.
मंत्री द्वारा साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार, 2021 में नक्सली हिंसा की 486 घटनाएं दर्ज हुई थीं, जिनमें 107 नागरिक और 32 सुरक्षा कर्मियों की मौत हुई थी. वहीं, 21 जुलाई 2026 तक इस वर्ष नक्सली हिंसा की 33 घटनाएं दर्ज हुई हैं, जिनमें 6 नागरिक और 5 सुरक्षा कर्मियों की मौत हुई है.
अख़बार के मुताबिक, देश में नक्सली हिंसा की स्थिति से जुड़े एक प्रश्न के जवाब में नित्यानंद राय ने कहा, ‘करीब छह दशक की हिंसा के बाद देश एलडब्ल्यूई से मुक्त हो गया है, जिसे कभी भारत की आंतरिक सुरक्षा के सबसे बड़े खतरों में से एक माना जाता था.’
उन्होंने कहा कि भले ही ये ज़िले अब एलडब्ल्यूई से मुक्त हो चुके हैं, लेकिन दोबारा ऐसी स्थिति पैदा न हो, इसके लिए कुछ समय तक सुरक्षा निगरानी और विकास कार्य जारी रहेंगे. मंत्री ने बताया कि एलडब्ल्यूई मुक्त क्षेत्रों में सुरक्षा बलों के एक-तिहाई शिविरों को ‘जन सुविधा केंद्र’ में बदला जा रहा है.
उन्होंने कहा, ‘इन केंद्रों के माध्यम से स्थानीय समुदायों को आजीविका संवर्धन, कौशल विकास, सरकारी योजनाओं तक पहुंच, डिजिटल सेवाएं, स्वास्थ्य सुविधाएं तथा सांस्कृतिक और खेल गतिविधियों जैसी सेवाएं उपलब्ध कराई जाएंगी.’
गृह मंत्रालय के अनुसार, उसने छत्तीसगढ़ के पहले एलडब्ल्यूई प्रभावित रहे सात ज़िलों में एक स्वतंत्र एजेंसी के माध्यम से सर्वे कराया है, जिसका उद्देश्य विभिन्न सरकारी कल्याणकारी योजनाओं की पहुंच, विकास कार्यों की स्थिति और आजीविका की संभावनाओं का आकलन करना है.
राय ने बताया कि इस सर्वे में शिक्षा, स्वास्थ्य और प्राथमिक स्कूलों, आंगनवाड़ी केंद्रों तथा माध्यमिक स्वास्थ्य सुविधाओं जैसी बुनियादी सेवाओं की उपलब्धता से जुड़ी जानकारी जुटाई गई है. उन्होंने कहा कि इससे केंद्र और राज्य सरकारों को विकास संबंधी खाइयों को पाटने और स्थानीय लोगों की आजीविका सुनिश्चित करने में मदद मिल रही है.
हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में मध्य भारत के आदिवासी बहुल इलाकों में जैसे-जैसे माओवादी आंदोलन कमजोर होकर सिमटता गया, वैसे-वैसे महाराष्ट्र के गढ़चिरौली, छत्तीसगढ़ के बस्तर और ओडिशा में खनन, नई परियोजनाओं और औद्योगिक गतिविधियों में तेज़ी आई है. वहीं, इसकी दूसरी तस्वीर यह है कि बड़ी संख्या में स्थानीय लोग इन कथित विकास परियोजनाओं का लगातार विरोध भी कर रहे हैं.
हाल ही में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की अधिकार प्राप्त समिति ने छत्तीसगढ़ और ओडिशा में कोयला, लौह अयस्क खनन परियोजनाओं के लिए 1,954.35 हेक्टेयर वन भूमि के डायवर्जन (गैर-वन उपयोग में परिवर्तन) को सैद्धांतिक (स्टेज-1) मंजूरी दे दी है.
बीते जून महीने में छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य के जंगलों में स्थित केते एक्सटेंशन इंटीग्रेटेड कोयला ब्लॉक में खनन के लिए केंद्र सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने पर्यावरणीय मंजूरी (ईसी) दे दी थी.
आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार, परियोजना के लिए 1,742.6 हेक्टेयर वन भूमि का डायवर्जन किया जाएगा. 4.48 लाख पेड़ों की कटाई का प्रस्ताव है, हालांकि इसे कोयले की जरूरत के अनुसार चरणबद्ध तरीके से किया जाएगा.
