देश, इस बरस: विकसित भारत में बदहाल रेलवे

2025 में विभिन्न दुर्घटनाएं हुईं और रेलवे भी इससे अछूता नहीं रहा. भारत जैसे देश में रेलवे सिर्फ एक परिवहन व्यवस्था नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक जीवन की धुरी है. उसकी बदहाली महज़ एक व्यवस्था की नाकामी नहीं, बल्कि आम जनता के विश्वास और अधिकारों पर चोट है.

ट्रेनों में अत्यधिक भीड़ आज सबसे गंभीर समस्या है. (फोटो: पीटीआई)

2025 के पूरे होने के साथ हम पीछे लौटकर देख रहे हैं कि देश, समाज और नागरिकों के जीवन ने इस साल ने क्या बदला. इस श्रृंखला का यह पहला भाग भारतीय रेलवे की दशा के बारे में.

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नई दिल्ली: रविवार और सोमवार (28 और 29 दिसंबर) की दरमियानी रात टाटानगर-एर्नाकुलम एक्सप्रेस आंध्र प्रदेश में दुर्घटनाग्रस्त हुई. देर रात करीब 12:45 बजे विशाखापत्तनम से करीब 66 किलोमीटर दूर यलमंचिली रेलवे स्टेशन के पास इस ट्रेन के दो एसी कोच जलकर राख हो गए और एक 70 वर्षीय मुसाफिर की जान चली गई.

बताया गया है कि दोनों प्रभावित कोचों (B1 और M2) में कुल 158 यात्री सवार थे. आग फैलने से पहले ही शोर मचने और ट्रेन रुकने के कारण ज्यादातर यात्री समय रहते खिड़कियों और दरवाजों से बाहर निकलने में सफल रहे. रेलवे ने इस मामले की उच्च स्तरीय जांच के आदेश दिए हैं. वहीं प्रारंभिक जांच और ख़बरों में दुर्घटना की वजह ब्रेक बाइंडिंग/ओवरहीटिंग, लिनेन स्टोरेज में आग लगने जैसे विभिन्न कारक बताए जा रहे हैं. साथ ही शॉर्ट सर्किट की आशंका भी जताई गई है.

दुर्भाग्यपूर्ण है कि किसी रेलगाड़ी के कोच में आग लगने की यह इस साल की अकेली घटना नहीं है.

बीते नवंबर में ही मध्य प्रदेश के इटारसी रेलवे स्टेशन पर रीवा-भोपाल सुपरफास्ट एक्सप्रेस (22146)के इंजन में धुआं उठने लगा था. सुबह करीब 6 बजे हुई हड़कंप मच गया था. हालांकि कोई हताहत नहीं हुआ. स्थानीय अख़बारों की मानें, तो उस समय रेलवे के किसी अधिकारी ने इस पर बात करने से इनकार कर दिया था.

उससे पहले अक्टूबर में पंजाब के अमृतसर से बिहार के सहरसा जा रही गरीबरथ ट्रेन (12204) में पंजाब के सरहिंद स्टेशन के पास आग लगने की खबर सामने आई थी गई थी. बताया गया था कि एसी बोगी में यह आग शॉर्ट सर्किट के कारण लगी थी. इस दुर्घटना में कोई हताहत नहीं हुआ था लेकिन कुछ यात्रियों को मामूली चोटें आई थीं.

भारत जैसे देश में जहां हर व्यक्ति के पास उसके घर के पास ही उसकी आजीविका कमाने की सहूलियत नहीं है, वहां भारतीय रेल देश की जीवनरेखा सरीखी है. कितने ही देशवासी रोज़ अपने काम की जगह पहुंचने-लौटने के लिए रेल सेवा पर ही निर्भर हैं. करोड़ों लोगों की रोज़मर्रा की आवाजाही, व्यापार, रोजगार और आर्थिक विकास रेल सेवा पर ही टिका है, लेकिन इसकी दुखद वास्तविकता यह है कि आज भारतीय रेलवे कई समस्याओं से जूझ रहा है, जिन्होंने इसे बदहाल, अव्यवस्थित और यात्रियों के लिए असुरक्षित बना दिया है, ऐसा कहना गलत नहीं होगा.

व्यापक जनसंख्या, बढ़ती मांग और व्यवस्थागत लापरवाहियों के बीच रेलवे की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है. इस साल कई बार ऐसे उदाहरण सामने आए जो दिखाते हैं कि भारत में सार्वजनिक परिवहन की व्यवस्थाएं, खासकर भारतीय रेलवे ऐसी तमाम समस्याओं से जूझ रहा है

सबसे गंभीर मुद्दा है सुरक्षा

बार-बार होने वाली रेल दुर्घटनाएं सिग्नलिंग सिस्टम की खामियों, ट्रैक मेंटेनेंस में लापरवाही और पुराने इंफ़्रास्ट्रक्चर के बोझ की गवाही दे रही हैं. कई मामलों में जांच के बाद यह सामने आता है कि दुर्घटनाएं तकनीकी गड़बड़ियों, मानवीय भूल और सिस्टम की ढिलाई का परिणाम होती हैं.

2023 में ओडिशा में हुआ ट्रेन हादसा. (फोटो साभार: ट्विटर)

22 जनवरी 2025 को महाराष्ट्र में जलगांव के पास हुई ट्रेन दुर्घटना में कम से कम 13 लोगों की मौत हो गई थी और 15 से अधिक लोग घायल हुए थे. यह दुर्घटना आग लगने की अफवाह के कारण हुई थी, जिससे यात्री ट्रेन से कूद गए और दूसरी ट्रैक से आ रही ट्रेन के चपेट में आ गए.

15 फरवरी 2025 को नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर ट्रेन की देरी और कुंभ के लिए जा रही भीड़ के अचानक उमड़ने से फुटब्रिज पर भगदड़ मच गई, जिससे कई लोग नीचे गिर गए. इस दुर्घटना में कम से कम 18 लोग मारे गए और कई लोग घायल हुए थे.

30 मार्च 2025 को ओडिशा के कटक जिले में बेंगलुरु-कामाख्या सुपरफास्ट एक्सप्रेस के करीब 11 डिब्बे पटरी से उतर गए थे. हालांकि इस दुर्घटना में जानमाल का कोई नुकसान नहीं हुआ था.

4 नवंबर 2025 को छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में एक पैसेंजर ट्रेन ने मालगाड़ी को टक्कर मारी थी, जिसमें कम से कम 12 लोग मारे गए थे और 20 से अधिक घायल हुए थे.

जांच रिपोर्ट में सामने आया कि लोको पायलट ट्रेन चलाने के लिए फिट नहीं था, क्योंकि उन्हें बेसिक सुरक्षा नियमों की जानकारी नहीं थी. इस हादसे में उनकी भी मौत हो गई थी.

रिपोर्ट के अनुसार, यह दुर्घटना प्रशिक्षण की कमी,  सुरक्षा ज्ञान की कमी, नियमों का पालन न करने और जिम्मेदार अधिकारियों की लापरवाही की वजह से हुई थी.

हाल ही में 20 दिसबंर को असम के लुमडिंग में सैरांग-नई दिल्ली राजधानी एक्सप्रेस ने जंगल में हाथियों के झुंड को टक्कर मारी, जिसमें आठ हाथी मारे गए. इंजन और पांच डिब्बे पटरी से उतर गए.

यह हादसा रेलवे लाइनों के आसपास वन्यजीवों की सुरक्षा और निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है.

सुविधाओं की कमी और घटती गुणवत्ता

भारतीय रेल विभिन्न राज्यों में रोजगार के लिए जाने वाले छोटे, मध्यम परिवारों और प्रवासी श्रमिकों के रोज़मर्रा के जीवन का सहारा है. लेकिन हाल के वर्षों में यात्रियों की बढ़ती संख्या, अधोसंरचना पर दबाव और प्रबंधन की चुनौतियों ने रेल यात्राओं की गुणवत्ता पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़े कर दिए हैं.

रेलवे स्टेशनों पर गंदगी, साफ-सफाई की कमी, टूटे-फूटे प्लेटफॉर्म, गंदे कोच, खराब टॉयलेट और पर्याप्त बैठने की व्यवस्था न होना आम बात हो गई है. कई लंबे रूटों पर पानी की समस्या, कोचों का जर्जर होना और भीड़भाड़ की वजह से यात्रियों का सफर कठिन हो जाता है. साफ़-सुथरा और आधुनिक रेलवे का सपना अभी अधिकांश यात्रियों के लिए सपना ही बना हुआ है.

ट्रेनों में अत्यधिक भीड़ आज सबसे गंभीर समस्या है. जनरल और स्लीपर डिब्बों में सीमित क्षमता की तुलना में कहीं अधिक यात्री सफर करते हैं. रिज़र्वेशन के बावजूद गलियारे और दरवाज़े तक भरे रहते हैं. इससे यात्रियों के बैठने, चलने-फिरने, शौचालय का उपयोग और सुरक्षा व्यवस्था प्रभावित होती है. त्योहारों के मौसम में स्थिति और भी बदतर हो जाती है.

ओवरक्राउडिंग के कारण भी हादसों का खतरा बढ़ा है.

9 जून 2025 की सुबह मुंबई के मुंब्रा के पास एक लोकल ट्रेन से तेरह यात्री गिर गए थे, जिनमें से पांच की मौत हो गई. वजह बताई गई कि ट्रेन में सवार कुछ यात्रियों के बैग बगल की पटरी पर गुज़र रही दूसरी ट्रेन के बैग से टकरा गया था, जिससे लगे झटके के चलते वे सभी गिर गए.

दरवाज़ों पर लटककर यात्रा करना, बिना टिकट यात्रियों की मौजूदगी, चोरी-जेबकतरी और अन्य आपराधिक घटनाएं भी चिंता का विषय बनी हुई हैं. यह न केवल यात्रियों की सुरक्षा, बल्कि रेल प्रशासन के लिए भी चुनौती है.

हालांकि ‘वंदे भारत’ ट्रेनों की संख्या बढ़ी है लेकिन उसका किराया ज़्यादा होने की वजह से आम लोग, प्रवासी मज़दूर और छोटी-मोटी नौकरियां करने वाले उसका वहन नहीं कर पा रहे हैं. और मांग के अनुरूप सामान्य यात्री ट्रेनों को नहीं बढ़ाया जा रहा है.

रेलवे लगातार जनरल और स्लीपर कोचों की संख्या घटा रही है. कुछ ट्रेनों में स्लीपर क्लास के कोच जो पहले 12-13 हुआ करते थे, जिन्हें अब 9-10 कर दिया गया, जिससे सामान्य वर्ग के लोग काफी परेशान हैं.

कई जगह अभी भी पुराने कोच चल रहे हैं, जिनमें सीटों की खराब स्थिति, टूटे चार्जिंग पॉइंट, पंखे-लाइट की खराबी जैसी समस्याएं आम हैं. एसी कोचों में भी तापमान नियंत्रण और तकनीकी खराबियों की शिकायतें सामने आती रहती हैं.

इस बीच, केंद्र सरकार ने यात्रियों की लगातार बढ़ती मांग को देखते हुए अगले पांच वर्षों में प्रमुख शहरों के कोचिंग टर्मिनलों का विस्तार करने और रेल सेक्शनों तथा परिचालन क्षमता को योजनाबद्ध तरीके से बढ़ाने की बात की है. सरकार के अनुसार, इस योजना का लक्ष्य वर्ष 2030 तक देश के 48 बड़े शहरों में वर्तमान और अनुमानित यात्रा मांग को पूरा करना है.

सेवा गुणवत्ता और समयपालन में गिरावट

ट्रेनों की निर्धारित समय से देरी अब एक आम बात हो चुकी है. ट्रैक क्षमता कम होने, रखरखाव का अभाव, मालगाड़ियों और पैसेंजर गाड़ियों के बीच तालमेल की कमी और प्रशासनिक कमजोरियों के कारण ट्रेनें घंटों लेट चलती हैं.

कई बार ट्रेनों के रद्द या पुनर्निर्धारित होने की सूचना समय पर नहीं मिल पाती, जिससे यात्रियों को परेशानी होती है. इससे लोगों को आर्थिक नुकसान होता है और रेलवे की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो जाते हैं.

ट्रेनों में देरी और कैंसिलेशन की वजह से पटना रेलवे स्टेशन पर यात्रियों की भीड़. (फोटो: पीटीआई)

इसके अलावा विकलांग, बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे जैसी संवेदनशील श्रेणियों के यात्रियों के लिए पर्याप्त सुविधाएं हर जगह उपलब्ध नहीं हैं. व्हीलचेयर, रैम्प, सुलभ शौचालय, सुरक्षित पेयजल और प्राथमिक चिकित्सा जैसी बुनियादी जरूरतों का प्रबंधन हर ट्रेन में समान रूप से नहीं हो जाता.

भारतीय रेलवे ने वरिष्ठ नागरिकों को मिलने वाली रियायतें वापस ले लीं. ज्ञात हो कि 60 वर्ष से अधिक आयु के पुरुष और ट्रांसजेंडर तथा 58 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं को 20 मार्च, 2020 से पहले सभी वर्गों के ट्रेन टिकटों पर क्रमशः 40% और 50% की छूट मिला करती थी. कोविड महामारी की शुरुआत के बाद रेल मंत्रालय ने इसे वापस ले लिया.

कई ट्रेनों में पैंट्री सेवाएं खराब हैं और खानपान की गुणवत्ता भी भरोसे के लायक नहीं रह गई.

राजनीतिक हस्तक्षेप और नीतिगत असंतुलन

रेलवे लंबे समय से राजनीतिगत निर्णयों का शिकार रहा है. नए रूट, नई ट्रेनों की घोषणा अक्सर जरूरत से ज्यादा राजनीतिक लाभ के लिए की जाती है, जबकि असली ज़रूरत – मेंटेनेंस, सुरक्षा सुधार, तकनीकी उन्नयन और स्टाफ की कमी दूर करने – पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता. इससे सिस्टम पर दबाव बढ़ता है और सेवा गुणवत्ता गिरती चली जाती है.

(फोटो: pmindia.gov.in)

सरकार ने 2019 से अब तक 164 से ज़्यादा वंदे भारत ट्रेनें लॉन्च की है, जिसका किराया प्रवासी मजदूर और आम लोग वहन नहीं कर सकते. इन ट्रेनों के उद्घाटन के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं.

2025 में पूर्वोत्तर रेलवे के वाराणसी डिवीजन ने चार ट्रेनों के उद्घाटन कार्यक्रम पर 3 करोड़ 37 लाख 93 हजार 351 रुपये खर्च किए थे. जबकि 15 फरवरी 2019 को पीएम मोदी ने पहली वंदे भारत (दिल्ली से वाराणसी) को हरी झंडी दिखाई थी. उस उद्घाटन कार्यक्रम पर सरकार ने 52 लाख रुपये खर्च किया था.

2025–26 के बजट भाषण में घोषणा की गई है अगले दो-तीन सालों में 100 नई वंदे भारत ट्रेनें, 100 अमृत भारत और 50 नमो भारत ट्रेनें लॉन्च की जाएंगी.

निजीकरण और व्यावसायीकरण की बहस

हाल के वर्षों में रेलवे में निजी भागीदारी बढ़ाने की चर्चा तेज़ हुई है. निजीकरण के समर्थक कहते हैं कि इससे आधुनिक सुविधाएं, तेज़ सेवाएं और बेहतर प्रबंधन आएगा. विरोधियों का तर्क है कि इससे गरीब और सामान्य यात्रियों पर आर्थिक बोझ बढ़ेगा और रेलवे का सामाजिक चरित्र कमजोर पड़ जाएगा. स्पष्ट नीति और संतुलित दृष्टिकोण के बिना यह मुद्दा रेलवे को और उलझा देता है.

पिछले पांच सालों में रेलवे का बजट दो गुना से अधिक बढ़ा है. 2025-26 के बजट में रेलवे मंत्रालय के लिए 2.65 लाख करोड़ रुपये आवंटित किए गए, जो अब तक का सबसे बड़ा धनराशि है.

इसी तरह 2023-24 के दौरान भारतीय रेल की कमाई 2,56,093 करोड़ रुपये रही, जबकि राजस्व व्यय 2,52,834 करोड़ रुपये रहा. 2023-24 में शुद्ध लाभ 3,260 करोड़ रुपये का रहा था.

कर्मचारियों की कमी और काम का बोझ

कई विभागों में रिक्त पद लंबे समय से भरे नहीं गए हैं. इससे मौजूदा कर्मचारियों पर अत्यधिक काम का दबाव पड़ रहा है, जिसके कारण गलतियां बढ़ती हैं, जवाबदेही घटती है और सिस्टम और असुरक्षित हो जाता है.

बता दें कि जून 2023 तक रेलवे में लगभग 2.74 लाख पद खाली थे, जिनमें से 1.7 लाख से अधिक पद सुरक्षा श्रेणी से संबंधित थे. सरकार के अनुसार, 2024-2025 में भारतीय रेलवे में 1,20,579 रिक्तियों के लिए भर्ती प्रक्रिया चल रही है.

केंद्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने लोकसभा में बताया था कि जनवरी 2024 से दिसंबर 2024 के बीच 10 केंद्रीयकृत भर्ती अधिसूचनाएं (सीईएन) जारी की गईं, जिनमें 92,116 रिक्तियां शामिल थीं.

जून 2025 में एक संसदीय समिति को सौंपे गए रेल मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 1,42,814 स्वीकृत लोको पायलट पदों में से केवल 1,07,928 ही वर्तमान में कार्यरत हैं.

इसी प्रकार, माल ढोने वाली ट्रेनों के गार्ड्स (गुड्स ट्रेन मैनेजर्स) के 22,082 स्वीकृत पदों में से सिर्फ 12,345 पद भरे हुए हैं. स्टेशन मास्टर्स और स्टेशन सुपरिंटेंडेंट सहित सभी श्रेणियों में कुल स्वीकृत पद 2,06,495 हैं, जबकि वास्तविक कार्यरत कर्मचारियों की संख्या 1,59,219 है.

रेलवे की बदहाली को दूर करने के लिए गंभीर राजनीतिक इच्छा शक्ति और दीर्घकालिक नीति की आवश्यकता है. रेलवे सिर्फ एक परिवहन व्यवस्था नहीं, बल्कि भारत के सामाजिक-आर्थिक जीवन की धुरी है. उसकी बदहाली सिर्फ एक व्यवस्था की नाकामी नहीं, बल्कि आम जनता के विश्वास और अधिकारों पर चोट है.