नॉर्थ ईस्ट डायरी: ‘विदेशी’ घोषित, दो साल डिटेंशन केंद्र में रही महिला को भारतीय नागरिकता मिली

इस हफ्ते नॉर्थ ईस्ट डायरी में असम, मणिपुर, मिज़ोरम और नगालैंड के प्रमुख समाचार.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

नई दिल्ली: असम की एक महिला, जिन्हें फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल (एफटी) ने ‘विदेशी’ घोषित कर दिया था, जिसके बाद उन्हें दो साल से ज़्यादा समय तक डिटेंशन कैंप में रखा गया, उन्हें बीते सप्ताह नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के तहत भारतीय नागरिकता दी गई है.

न्यू इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, 5 फरवरी, 2019 को दिए एक निर्णय में सिलचर में फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल नंबर 6 ने 1966 में बांग्लादेश के सिलहट ज़िले (तब पूर्वी पाकिस्तान, अब बांग्लादेश) में जन्मीं दीपाली दास (60) को एक अवैध प्रवासी माना था. एफटी का कहना था कि वे 25 मार्च, 1971 के बाद भारत में आई थी, और इसलिए उसे भारत में रहने का कोई अधिकार नहीं और उन्हें डिपोर्ट किया जा सकता था.

ट्रिब्यूनल ने पुलिस को उनके आवागमन पर रोक लगाने और कानून के मुताबिक ज़रूरी कार्रवाई करने का निर्देश देते हुए उनका नाम वोटर लिस्ट से हटाने का भी आदेश दिया. ये निर्देश एक पुलिसकर्मी के ‘रेफरेंस’ के बाद दिए गए, जिसमें कहा गया था कि वह 25 मार्च, 1971 के बाद भारत में आई थी, और अपनी भारतीय नागरिकता साबित करने के लिए उचित दस्तावेज दिखाने में नाकाम रही थीं.

उक्त फैसले के बाद दीपाली दास को 10 मई, 2019 से 17 मई, 2021 तक सिलचर के डिटेंशन कैंप में हिरासत में रखा गया.

अख़बार के मुताबिक, यह पहला ऐसा ज्ञात मामला है जिसमें किसी व्यक्ति को ‘विदेशी’ घोषित किए जाने और डिटेंशन कैंप में समय बिताने के बाद सीएए के तहत भारतीय नागरिकता दी गई है.

बताया गया है कि महिला ने नेचुरलाइज़ेशन सर्टिफिकेट के लिए आवेदन किया था, और सरकार ने अधिनियम में बताई गई शर्तों को पूरा करने के बाद उन्हें नागरिकता दे दी.

असम के सेंसस ऑपरेशन डायरेक्टरेट के डायरेक्टर बिस्वजीत पेगु द्वारा जारी नेचुरलाइज़ेशन सर्टिफिकेट में कहा गया था कि महिला को ‘सभी राजनीतिक और दूसरे अधिकार, शक्तियां मिलेंगी जिसका अधिकार एक भारतीय नागरिक को मिलता है.’

महिला के वकील धर्मानंद देब का कहना है, ‘उनका मामला न सिर्फ़ अलग है बल्कि ऐतिहासिक भी है, क्योंकि विदेशी घोषित होने और हिरासत में रहने के बावजूद, उन्हें अब सीएए के तहत भारतीय नागरिकता दी गई है.’

मणिपुर: निधन के दो हफ़्ते बाद भी भाजपा विधायक को नहीं दफ़नाया गया

भाजपा विधायक वुंगज़ागिन वाल्टे का पार्थिव शरीर मंगलवार, 24 फरवरी, 2026 को मणिपुर के चूड़ाचांदपुर में उनके घर लाया गया. (फोटो: पीटीआई)

मई 2023 में मणिपुर की राजधानी इंफाल में भीड़ द्वारा किए गए एक हमले में गंभीर रूप से घायल हुए भाजपा विधायक वुंगज़ागिन वाल्टे का 21 फरवरी को निधन हो गया था. हालांकि, उनके शव को अब तक नहीं दफनाया गया है.

वाल्टे के बेटे जोसेफ वाल्टे ने द हिंदू को बताया कि उनके शव को चूड़ाचांदपुर जिला अस्पताल के मुर्दाघर में सुरक्षित रखा गया है.

ज्ञात हो कि वाल्टे परिवार और ज़ोमी जनजाति के नेताओं ने वाल्टे का अंतिम संस्कार करने से पहले कई मांगें पूरी किए जाने को कहा था. इन मांगों पर ज़ोर देने के लिए ज़ोमी कोऑर्डिनेशन कमेटी बनाई गई है, जिसमें उन पर हुए हमले की जांच नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (एनआईए) से करवाने और राज्य में जारी संघर्ष का राजनीतिक हल निकालना शामिल है.

इस कमेटी ने दिवंगत विधायक के सम्मान में एक महीने के शोक की घोषणा की है.

वहीं एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने कहा कि विधायाक का अंतिम संस्कार करने के लिए परिवार और समुदाय के लोगों को मनाने की कोशिश की जा रही है, और उनकी मांगों पर विचार किया जा रहा है.

बीते सोमवार (2 मार्च) को मणिपुर के उपमुख्यमंत्री लोसी दिखो ने चूड़ाचांदपुर में वाल्टे के परिवार से मुलाकात की थी. दिखो के साथ हुई बैठक में कमेटी ने दोहराया था कि वाल्टे पर हमले के लिए ज़िम्मेदार लोगों की जांच की जाए, उन पर केस चलाया जाए और उन्हें सज़ा दी जाए.

कमेटी ने एक बयान में कहा, ‘हिंसक हमलों से होने वाली मौतों के मामलों की जांच में तेज़ी लाने की ज़रूरत पर चर्चा हुई. शांति के लिए आगे क्या कदम उठाने हैं और सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशन्स फ्रेमवर्क के तहत सभी समुदायों को मंज़ूर तरीके से राजनीतिक समाधान निकालने पर चर्चा हुई.’

उपमुख्यमंत्री ने कमेटी से कहा कि सरकार वाल्टे को इंसाफ दिलाने के लिए प्रतिबद्ध है.

इससे पहले वाल्टे के परिवार ने कहा था कि जब तक ज़ोमी समुदाय की लंबे समय से चली आ रही अलग जिला बनाने की मांग सरकार द्वारा स्वीकार नहीं की जाती, तब तक उनका अंतिम संस्कार नहीं किया जाएगा.

तीन बार विधायक रहे ज़ोमी समुदाय से संबंध रखने वाले वाल्टे 4 मई 2023 को इंफाल में भीड़ द्वारा किए गए हमले में गंभीर रूप से घायल हो गए थे. यह हमला मेईतेई और कुकी-ज़ो समुदायों के बीच हिंसा भड़कने के एक दिन बाद हुआ था. वह इन चोटों से कभी उबर नहीं सके और 21 फरवरी को हरियाणा के एक अस्पताल में उनका निधन हो गया.

उल्लेखनीय है इलाज के दौरान वाल्टे ने 13 सितंबर 2025 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र लिखा था, जिसमें कहा था कि घर लौटते समय मेईतेई मिलिशिया (अरमबाई तेंग्गोल) ने उन पर क्रूर हमला किया. इस हमले में उन्हें गंभीर चोटें आईं, जिससे वे लकवाग्रस्त और शारीरिक तौर पर अक्षम हो गए. इतनी गंभीर घटना के बावजूद कोई विशेष जांच (सीबीआई/एनआईए) शुरू नहीं की गई और समुदाय हाशिये पर बना हुआ है.

ज्ञात हो कि 3 मई 2023 को जातीय हिंसा भड़कने के अगले दिन इंफाल में तत्कालीन मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह के कार्यालय से लौटते समय उन पर भीड़ ने हमला किया था. हमले में उनके कुकी-जो ड्राइवर की हत्या कर दी गई थी, जबकि उनके मेईतेई सुरक्षा अधिकारी को छोड़ दिया गया था. इस मामले में अब तक किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई है.

असम: विपक्ष ने चुनाव के लिए 4 पार्टियों का गठबंधन बनाया, अखिल गोगोई का रायजोर दल शामिल नहीं

असम के सिवसागर से विधायक अखिल गोगोई. (फोटो साभार:फेसबुक/@AkhilGogoiRD)

असम में कांग्रेस की अगुवाई में चार विपक्षी पार्टियों ने ऐलान किया कि वे आने वाले विधानसभा चुनाव के लिए मिलकर प्रचार करेंगी, ताकि अपना गठबंधन पक्का किया जा सके. हालांकि कुछ अन्य दल, जो इस बातचीत का हिस्सा रहे थे, इस संयुक्त घोषणा में शामिल नहीं हुए.

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, शुक्रवार को यह घोषणा असम कांग्रेस अध्यक्ष गौरव गोगोई, असम जातीय परिषद के प्रेसिडेंट लुरिनज्योति गोगोई, ऑल पार्टी हिल लीडर्स कॉन्फ्रेंस के प्रमुख जोन्स इंगटी कथार और माकपा केप्रदेश सचिव सुप्रकाश तालुकदार ने मिलकर की.

गौरतलब है कि इसमें रायजोर दल और उसके प्रमुख अखिल गोगोई, जो लंबे समय से इस संभावित गठबंधन के बारे में बातचीत कर रहे थे, शामिल नहीं हुए. बताया गया है कि सीट शेयरिंग के सवाल पर रायजोर दल और कांग्रेस सहमत नहीं हुए हैं. हालांकि, घोषणा करने वाले चारों नेताओं ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि गठबंधन में और पार्टियां शामिल होंगी.

यह घोषणा करते हुए गौरव गोगोई ने कहा कि चुनाव के लिए ज़्यादा समय नहीं बचा है, और पार्टियां जल्द ही जॉइंट कैंपेन प्रोग्राम शुरू करेंगी.

इस समूह ने अभी तक सीट शेयरिंग व्यवस्था की घोषणा नहीं की है. हालांकि, 126 सीटों वाली विधानसभा के लिए कांग्रेस पहले ही 42 उम्मीदवारों की पहली लिस्ट जारी कर चुकी है.

उधर, रायजोर दल भी 11 प्रत्याशियों की पहली सूची जारी कर चुका है. पार्टी नेताओं ने इस बारे में टिप्पणी करने से मना कर दिया कि शुक्रवार की संयुक्त घोषणा के लिए रायजोर दल तैयार क्यों नहीं था.

उल्लेखनीय है कि असम कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष भूपेन बोरा के नेतृत्व में मार्च 2023 से ही विपक्षी गठबंधन बनाने की कोशिशें हो रही हैं. हालांकि बोरा पिछले महीने ही पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल हो चुके हैं. इस संयुक्त विपक्षी गठबंधन में एक समय पर 16 दल शामिल थे, जिनमें राष्ट्रीय पार्टियों की राज्य इकाइयों के साथ-साथ भाजपा और उसके सहयोगियों का विरोध करने वाली क्षेत्रीय पार्टियां भी शामिल थीं.

मणिपुर: जातीय हिंसा के पीड़ितों के लिए न्याय की मांग को लेकर मार्च निकाला गया

मणिपुर के चूड़ाचांदपुर शहर में भाजपा विधायक वुंगज़ागिन वाल्टे और ज़ो समुदाय के दूसरे लोगों, जो राज्य में हुए जातीय हिंसा के शिकार बने, की मौत के विरोध में सेंट्रल विलेज डिफेंस फोर्स (सीवीडीएफ) ने शुक्रवार (6 मार्च) को एक रोड मार्च निकाला.

2023 में जातीय हिंसा के शुरुआती दौर में भीड़ के हमले में घायल हुए वाल्टे की 21 फरवरी को गुरुग्राम के एक प्राइवेट हॉस्पिटल में मौत हो गई.

सीवीडीएफ के एक नेता ने दावा किया कि सैकड़ों सीवीडीएफ वॉलंटियर्स और आम लोगों ने हिंसा में मारे गए और बेघर हुए लोगों के लिए इंसाफ की मांग को लेकर मार्च में हिस्सा लिया.

ज्ञात हो कि यह राज्य 3 मई, 2023 से जातीय हिंसा देख रहा है, जब पहाड़ी जिलों में आदिवासी एकजुटता मार्च निकाला गया था, जो ज़्यादातर मेइतेई समुदाय को अनुसूचित जाति का दर्जा देने की मांग के विरोध में निकाला गया था. तब से, कुकी और मेइतेई दोनों समुदायों के सदस्यों के साथ-साथ सुरक्षाकर्मियों सहित कम से कम 260 लोग हिंसा में मारे गए हैं, और  हज़ारों लोग बेघर हो चुके हैं.

मिजोरम: यूजीसी-नेट क्वालीफाई न किए कॉलेज शिक्षकों की नियुक्ति नहीं करेगी सरकार

मिजोरम के उच्च और तकनीकी शिक्षा मंत्री वनलालथलाना ने शुक्रवार को घोषणा की है कि सरकार अब उन कॉलेज शिक्षकों को नौकरी पर नहीं रखेगी जो यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (यूजीसी) द्वारा तय अहर्ता मानदंडों को पूरा नहीं करते हैं.

बजट सत्र के दौरान एक सवाल का जवाब देते हुए वनलालथलाना ने कहा कि सरकार उन लोगों को नौकरी पर नहीं रखेगी जिन्होंने नेशनल एलिजिबिलिटी टेस्ट (नेट) पास नहीं किया है, जो यूजीसी द्वारा तय एक ज़रूरी शर्त है.

मंत्री ने कहा कि हालांकि यह फैसला मुश्किल था, लेकिन उनकी नियुक्तियां आधिकारिक तौर पर मार्च के आखिर में खत्म हो जाएंगी. मंत्री ने शिक्षकों का बचाव करते हुए यह भी जोड़ा कि उन्हें इस स्थिति के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहिए.

उन्होंने बताया कि जब उन्हें शुरू में भर्ती किया गया था, तो नौकरी के विज्ञापन में नेट को आवश्यक अहर्ता के तौर पर सूची में नहीं रखा गया था, और सरकार ने उनकी भर्ती होने के बाद ही इस क्वालिफिकेशन को ज़रूरी बनाया.

उन्होंने यह भी कहा कि सरकार राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान (रूसा) योजना के तहत भर्ती किए गए अध्यापकों को नियमित करने की दिशा में काम कर रही है.

नगालैंड: विधानसभा ने आपत्तियों के बीच ‘वंदे मातरम’ पर गृह मंत्रालय के निर्देश को चयन समिति को भेजा

नगालैंड विधानसभा ने मंगलवार (3 मार्च) को गृह मंत्रालय के उस आदेश, जिसमें आधिकारिक अवसरों पर वंदे मातरम गाना या बजाना अनिवार्य किया गया है, को इसकी राज्य में लागू होने की संभावना की जांच के लिए सदन की एक चयन समिति को भेज दिया.

द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, यह निर्णय विधानसभा अध्यक्ष शारिंगैन लॉन्गकुमेर ने उस समय घोषित किया, जब 2 मार्च को राज्यपाल के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के विधायकों को छोड़कर लगभग सभी दलों के सदस्यों ने राष्ट्रीय गान जन गण मन से पहले वंदे मातरम् बजाने या गाने को लेकर आपत्ति जताई थी.

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 28 जनवरी को दस पन्नों का एक निर्देश जारी किया था. इसमें कहा गया था कि वंदे मातरम के छह छंदों वाला, तीन मिनट दस सेकेंड का संस्करण आधिकारिक अवसरों पर बजाया या गाया जाना अनिवार्य होगा. इसमें भारतीय ध्वज फहराने के समय, कार्यक्रमों में राष्ट्रपति के आगमन पर, उनके भाषणों से पहले और बाद में, राष्ट्र के नाम उनके संबोधन के पहले और बाद में, तथा राज्यपालों के आगमन और भाषणों से पहले और बाद में इसे बजाने या गाने की बात कही गई है.

नगालैंड विधानसभा. (फाइल फोटो: नगालैंड DIPR)

इस निर्देश के बाद सोमवार (2 फरवरी) को बजट सत्र के पहले दिन नगालैंड विधानसभा में पहली बार राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम बजाया गया. हालांकि, कई विधायकों ने राष्ट्रीय गीत के बजाए जाने और गाए जाने पर नाराज़गी जताई. उनका कहना था कि ईसाई बहुल राज्य नगालैंड के लिए इस गीत को गाना ‘अनुचित’ है.

धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा की शुरुआत करते हुए नगा पीपुल्स फ्रंट के विधायक कुझोलुज़ो नीनु ने कहा कि राज्य विधानसभा की कार्यवाही में वंदे मातरम् को शामिल करना ‘पूरी तरह अनावश्यक’ है. उन्होंने कहा कि ईसाई बहुल राज्य के लिए यह उचित नहीं है.

कई अन्य विधायकों ने भी इस निर्देश के खिलाफ इसी तरह के विचार व्यक्त किए.

बहस का जवाब देते हुए नगालैंड के मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो ने सुझाव दिया कि राष्ट्रीय गीत के उपयोग की समीक्षा के लिए राज्य विधानसभा की एक चयन समिति गठित की जाए. उन्होंने इस मुद्दे को संवेदनशील और राष्ट्रीय महत्व का बताया.

मालूम हो कि चयन समिति विधानसभा की एक अस्थायी समिति होती है, जिसे किसी विशेष विधेयक या विषय की जांच करने के लिए बनाया जाता है और अपनी रिपोर्ट या सिफारिशें पेश करने के बाद इसे भंग कर दिया जाता है.

मुख्यमंत्री की टिप्पणी के बाद विधानसभा अध्यक्ष लॉन्गकुमेर ने सदस्यों की भावनाओं को स्वीकार करते हुए इस मामले को चयन समिति को भेजने का निर्णय लिया.

इससे पहले पूर्वोत्तर के प्रभावशाली छात्र संगठन नगा स्टूडेंट्स फेडरेशन (एनएसएफ) ने कड़ा विरोध किया है.