नई दिल्ली: संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय ने गुरुवार (2 अप्रैल) को ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक विधेयक, 2026 को बिना पर्याप्त परामर्श के जल्दबाजी में पारित किए जाने पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि इन संशोधनों से भारत में ट्रांसजेंडर लोगों के अधिकारों को छिने जाने का खतरा है, जो उन्होंने मुश्किल से पाए थे.
रिपोर्ट के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय संस्था ने सोशल मीडिया मंच एक पोस्ट में कहा, ‘पर्याप्त हितधारकों से परामर्श किए बिना ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 को जल्दबाजी में पारित किए जाने पर हमें खेद है. ये संशोधन ट्रांसजेंडर लोगों द्वारा बड़ी मुश्किल से पाए गए अधिकारों को नुकसान पहुंचाने का खतरा पैदा करते हैं, क्योंकि ये संशोधन स्व-पहचान की जगह अनिवार्य चिकित्सा सत्यापन लागू करते हैं.’
यह देखते हुए कि भारत ट्रांसजेंडर और लैंगिक विविधता वाले लोगों के अधिकारों के लिए अग्रणी रहा है, संयुक्त राष्ट्र ने कहा कि इस विधेयक से निजता के अधिकार पर दूरगामी असर पड़ेगा और ट्रांसजेंडरों के हाशिये पर जाने का खतरा है.’
#India: We regret fast passage of Transgender Persons (Protection of Rights) Amendment Bill, 2026, without adequate stakeholder consultation. The amendments risk setting back hard-won rights of transgender people, replacing self-identification with mandatory medical verification…
— UN Human Rights (@UNHumanRights) April 2, 2026
उल्लेखनीय है कि यह बयान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा बीते 30 मार्च को इस विधेयक को मंजूरी देने के कुछ दिनों बाद आया है. इस विधेयक के खिलाफ देशभर में व्यापक विरोध प्रदर्शन और निंदा देखने को मिली थी.
कानून मंत्रालय की राजपत्र अधिसूचना के अनुसार, संशोधित विधेयक – जो अब एक अधिनियम है – लगभग तुरंत प्रभाव से लागू हो गया है.
इससे पहले 31 मार्च को एमनेस्टी इंटरनेशनल ने राष्ट्रपति द्वारा विधेयक को मंजूरी देने की निंदा करते हुए कहा था कि यह ‘ट्रांसजेंडर और लैंगिक विविधता वाले लोगों को स्वयं की पहचान करने के अधिकार से वंचित करता है’ और ‘भारत में मानवाधिकारों के लिए एक गंभीर झटका है’.
संगठन के भारत प्रमुख आकार पटेल ने कहा, ‘यह प्रतिगामी कानून सुरक्षा उपायों को कमजोर करता है और ट्रांसजेंडर लोगों के जीवन में राज्य के हस्तक्षेप को बढ़ाता है.’
इसी बीच, राजस्थान उच्च न्यायालय ने राज्य में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए क्षैतिज आरक्षण से संबंधित एक अलग मामले की सुनवाई करते हुए इस बात पर जोर दिया कि अपने लिंग की पहचान स्वयं करने का अधिकार एक ‘स्वाभाविक अधिकार’ है, और चेतावनी दी कि मोदी सरकार का विधेयक इसे ‘एक आकस्मिक, राज्य के नियंत्रण वाले विशेषाधिकार’ में तब्दील करने का जोखिम पैदा करता है.
गौरतलब है कि संसद के दोनों सदनों लोकसभा और राज्यसभा से न्यूनतम चर्चा के बाद इस विधेयक को ध्वनि मत से पारित कर दिया गया था. इस दौरान विपक्ष ने सरकार की जल्दबाजी की आलोचना की थी, साथ ही विधेयक को एक चयन समिति को भेजने की मांग भी रखी थी, जिसे खारिज कर दिया गया.
विपक्षी सांसदों ने इस विधेयक की आलोचना करते हुए कहा था कि यह 2014 के राष्ट्रीय कानूनी सेवा प्राधिकरण (नालसा) फैसले और 2019 के ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकार संरक्षण) अधिनियम के तहत प्रदत्त आत्मनिर्णय के अधिकार को छीन लेता है.
मालूम हो कि 2026 का यह अधिनियम ट्रांसजेंडर शब्द को पुनर्परिभाषित करने का प्रयास करता है, जिसके अनुसार ट्रांसजेंडर का अर्थ है ‘एक व्यक्ति जिसकी सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान किन्नर, हिजड़ा, अरावनी और जोगता या हिजड़ा जैसी हो’, या विशिष्ट ‘अंतरलिंगी (इंटरसेक्स) भिन्नताओं’ वाला व्यक्ति, या ‘एक व्यक्ति जिसमें जन्म से ही लिंग विशेषताओं में जन्मजात भिन्नता हो’, जो पुरुष या महिला विकास की तुलना में ‘प्राथमिक यौन विशेषताओं, बाहरी जननांगों, गुणसूत्र पैटर्न, जननांग विकास, अंतर्जात हार्मोन उत्पादन या प्रतिक्रिया या ऐसी अन्य चिकित्सीय स्थितियों’ से संबंधित हो.
इसमें विवादास्पद रूप से यह अनिवार्य किया गया है कि एक ट्रांसजेंडर की परिभाषा में ऐसे व्यक्ति शामिल नहीं होंगे, और न ही कभी शामिल किए जाएंगे जो ‘अलग-अलग यौन झुकाव (सेक्सुअल ओरिएंटेशन) और खुद अपनी यौन पहचान (जेंडर आइडेंटिटी) निर्धारित करते’ हैं.
