‘घर की जाति नहीं होती’ वही कह सकते हैं, जिनके नाम के चलते घर शक की निगाह से नहीं देखे गए

भारत में घर की जाति नहीं होती, यह वैसा ही वाक्य है जैसे कोई कहे कि लाठी की कोई विचारधारा नहीं होती. सही है, लाठी की नहीं होती; जिस पीठ पर टूटती है, उसकी होती है. घर की जाति नहीं होती, बस देश को उसे पहचानने का पुराना संस्कार है! फिर किसी दिन संसद में कोई कह देगा कि घर की जाति नहीं होती, और सत्तापक्ष की बेंचों पर बैठे लोग ऐसे मुस्कुराएंगे जैसे उन्होंने समाजशास्त्र को अभी-अभी मात दे दी हो.

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कुछ घरों के उजड़ने पर अख़बार लिखते हैं ‘विरासत चली गई,’ कुछ के उजड़ने पर लिखा जाता है ‘अवैध कब्ज़ा हटाया गया.’ यानी भाषा भी घरों के साथ अलग व्यवहार करती है. ईंट तो एक है, शब्द अलग हैं. (फोटो: पीटीआई)

बीते दिनों गृह मंत्री के हवाले से यह बात अब देश को मालूम हुई कि घरों की कोई जाति नहीं होती. धन्य है यह ज्ञान! सदियों से लोग व्यर्थ ही जाति, बस्ती, टोले, मोहल्ले, छूत-अछूत, दलित बस्ती, मुस्लिम इलाका, पिछड़ा मोहल्ला, ठाकुरों का गांव, ब्राह्मणों का चौक, वाल्मीकि बस्ती, चमारों का डेरा, बुनकरों का मोहल्ला जैसी चीज़ों में अपना समय नष्ट करते रहे. असल में यह सब भ्रम था.

घर तो घर है. ईंट की भी कोई जाति नहीं, सीमेंट का कोई गोत्र नहीं, छत का कोई प्रवर नहीं. बस उसमें रहने वालों की जाति होती है, उनके लिए खुलने वाले दरवाज़ों का गोत्कीर हुआ करता है, उन पर पड़ने वाली निगाह की उपजाति होती है और उन पर चलने वाले बुलडोज़र की पसंद का उच्च वर्ण होता है. घर तो बेचारा जातिविहीन क्षणभंगुर चीज़ है. 

यह वैसा ही वाक्य है जैसे कोई कहे कि लाठी की कोई विचारधारा नहीं होती. सही है, लाठी की नहीं होती; जिस पीठ पर टूटती है, उसकी होती है. जैसे बंदूक की कोई जाति नहीं होती. किसी कट्टे का कोई गोत्र नहीं होता. किसी तमंचे का क्या प्रवर होगा? आग की कोई जाति नहीं होती; मगर किसकी दुकान जलती है और किसकी बीमा-राशि बढ़ती है, उसका हिसाब समाज रखता है. भूख की कोई जाति नहीं होती; मगर कौन भूखा सोता है, कौन प्रोटीन चार्ट बनाता है और कौन पोषण पर सेमिनार करता है, इसकी जाति, वर्ग और मज़हब सबको पता रहते हैं.

उसी तरह घर की भी कोई जाति नहीं होती. यह बात वे लोग बड़ी सहजता से कहते हैं जिनके घर कभी अपने नाम के कारण शक की निगाह से नहीं देखे गए.

घर में रहने के लिए चाहिए जाति!

मैं साल 2004 में श्रीगंगानगर के गांव से जयपुर आया था और हमारे यहां जाति-वाति पूछना तो जैसे किसी को अपमानित करने जैसा था. मैंने जयपुर शहर में 14 घरों का दरवाज़ा किराए के लिए खटखटाया; लेकिन हर जगह पहला प्रश्न: आपका नाम? नाम बताया तो प्रतिप्रश्न कि पिता का नाम? बच्चों का नाम?

लेकिन जब इन हालात में कुछ स्पष्ट नहीं होता तो उन्हें लगता कि मकान किराया लेने वाला कोई दलित ही होगा, तब ही तो जाति छुपा रहा है. मैंने समझाने की कोशिश की, मैं तो शराब पीता, न मैं मांसाहारी और न ही मैं मनुष्यों में भेद करने वाला, तो हर किसी ने मना कर दिया. अंतत: मुझे एक गुप्ता साहब ने मकान दिया और बोले, आप तो शक्ल से भी शरीफ़ लगते हो और नाम से भी.

भारत में घर की जाति नहीं होती, बस इतना होता है कि कुछ घर शहर के बीचोंबीच उगते हैं और कुछ घर शहर की शर्म की तरह बाहर फेंक दिए जाते हैं. मेरे गांव में सभी तरह की दलित जातियों के लोग गांव से एकदम बाहर रहते थे. भीतर प्रतिष्ठित घरों में रहने वाले सब लोग उन्हीं घरों की एक बूढ़ी महिला (दाई) की हथेलियों पर ही पहली बार इस लोक में प्रकट हुए थे. लेकिन होश में आते ही उस महिला की जाति उनके लिए लंबी दूरियों का बोध करवाती थी. यह सब शहर में भी वैसा का वैसा रहता है.

कुछ घरों तक नाली, पानी, सड़क, स्कूल, अस्पताल और सम्मान पहुंचता है; कुछ घरों तक केवल चुनावी जीप, सर्वे का काग़ज़ और प्रशासनिक डांट. कुछ घरों के बाहर पेड़ लगते हैं, कुछ के बाहर पुलिस की जीप रुकती है.

कुछ घरों के लिए नगर-नियोजन होता है, कुछ घरों के लिए उजाड़-नियोजन. अधिकतर बुलडोज़र यहीं आकर अपना पराक्रम दिखाते हैं. अवैध नामक शब्द हमारे शब्दकोशों से सीधा इन्हीं घरों के माथे पर चस्पां होता है. मगर संसद में कहा जा रहा है तो सच ही होगा कि किसी घर की जाति नहीं होती. जी नहीं होती. बस देश को उसे पहचानने का पुराना संस्कार है.

जाति और समाज के नियम

कितना सुंदर दृश्य है! एक सभ्य समाज, जो आदमी की जाति को मिटाने में नाकाम रहा, उसने घर की जाति मिटा दी. आदमी अभी भी कुएं से पानी नहीं भर सकता, मंदिर में घुसने पर पीटा जा सकता है, घोड़ी पर चढ़ने पर अपमानित हो सकता है, किराए पर मकान लेने जाए तो नाम पूछ लिया जाता है; मगर उसका घर.. वाह! वह तो भारतीय गणराज्य की तरह निष्पक्ष है. यह निष्पक्षता भी बड़ी कमाल की चीज़ है.

वही निष्पक्षता जिससे थानेदार शिकायत सुनता है, बैंक मैनेजर लोन देखता है, स्कूल इंटरव्यू करता है और रियल एस्टेट वाला कहता है, ‘देखिए, पर्सनली तो हमें कोई दिक्कत नहीं, पर सोसाइटी के कुछ नॉर्म्स हैं.’

सोसाइटी के नॉर्म्स! भारत की जाति-व्यवस्था का सबसे सुगंधित इत्र. पहले लोग खुलकर कहते थे कि हम तुम्हें अपने बीच नहीं बसने देंगे. अब वे कहते हैं, आप समझिए, यहां एक खास तरह का कल्चरल माहौल है. यानी जाति अब धोती छोड़कर ब्लेज़र पहन चुकी है. अब वह हाउसिंग सोसाइटी के बायलॉज़ में रहती है, वॉट्सऐप ग्रुप की भाषा में रहती है, गार्ड के प्रश्न में रहती है, रजिस्टर पर झुके हुए पेन की नोक में रहती है.

वहां कोई नहीं कहता कि घर की जाति होती है; वहां बस यह पूछा जाता है कि ‘फैमिली कैसी है?’ ‘फूड हैबिट क्या है?’ ‘कितने लोग आएंगे?’ और अंततः वह प्रश्न, जो भारत की सभ्यता का अंडरलाइन किया हुआ अपराध है, ‘कम्युनिटी?’

कहने वाले ने शायद यह भी सोच लिया होगा कि घर की जाति नहीं होती, इसलिए जाति जनगणना जैसी चीज़ें भी शायद हवा में की जाने वाली कोई शरारत हैं. मानो समाज में जाति एक दार्शनिक भ्रांति हो, ज़मीन की सच्चाई नहीं.

जैसे दलित बस्तियां अपने आप शहर के बाहर नहीं धकेली गईं, जैसे मुसलमान अपने मन की मौज में ‘उस पार’ बस गए, जैसे सफाईकर्मी, चमड़े का काम करने वाले, मज़दूर, रिक्शेवाले, ठेला खींचने वाले, दिहाड़ी करने वाले, सबने मिलकर किसी सौंदर्यबोध के कारण ऐसी जगहें चुन लीं जहां न सड़क ठीक, न सीवर, न सुरक्षा, न सम्मान. अरे साहब, यह इतिहास है, हाउसिंग डिज़ाइन नहीं.

और बुलडोज़र? वह तो आधुनिक भारत का सबसे नैतिक यंत्र है. उसे घर की जाति नहीं मालूम. उसे बस इतना मालूम रहता है कि किस घर तक पहुंचना आसान है, किसे गिराने पर तालियां मिलेंगी, किस मलबे पर टीवी बहस चलेगी, और किस ढहे हुए आंगन को ‘वैधानिक कार्रवाई’ कहकर राष्ट्रनिर्माण का नया पर्व घोषित किया जा सकता है.

बुलडोज़र बड़ा धर्मनिरपेक्ष प्राणी है; वह बहुत ही संस्कारी और कुलीन किस्म के कुनबे का सदस्य है. वह अक्सर वहीं जाता है, जहां प्रतिरोध कम हो, गरीबी अधिक हों और कैमरों को नायक मिल सके. महलों की अवैधताएं उसे दूर से ही वैध दिखने लगती हैं; झुग्गी की वैधता भी उसे अतिक्रमण लगती है. यही मशीन की निष्पक्षता है.

किसके घर की जाति नहीं?

इस देश में कुछ घर घर नहीं होते, निशान होते हैं. कुछ पते पते नहीं होते, पहचान होते हैं. कुछ मोहल्ले भूगोल नहीं होते, सामाजिक निर्णय होते हैं. किसी बच्चे से उसका पता पूछिए, उसके जीवन की आधी कहानी खुल जाती है. किसी लड़की से उसका इलाका पूछिए, समाज उसके लिए सुरक्षा का स्तर तय कर देगा. किसी लड़के के बायोडाटा पर उसका गांव देखिए, उसके लिए सम्मान या उपहास का अनुपात तय हो जाएगा. और फिर संसद में कोई कह देगा कि घर की जाति नहीं होती, और सत्तापक्ष की बेंचों पर बैठे लोग ऐसे मुस्कुराएंगे जैसे उन्होंने समाजशास्त्र को अभी-अभी मात दे दी हो.

घर की जाति नहीं होती! यह बात सबसे ज़्यादा उन्हें अच्छी लगती है जिनके घरों को कभी छापा, शक, नफ़रत, बहिष्कार या तिरस्कार की भाषा में नहीं पढ़ा गया. जिनके घरों के बाहर नामपट्टिका सम्मान का परिचय देती है, जोखिम का नहीं. जिन्हें कभी अपना उपनाम छिपाकर मकान नहीं ढूंढना पड़ा. जिन्हें यह नहीं सुनना पड़ा कि ‘मकान अभी-अभी दे दिया गया,’ जबकि ब्रोकर की आंखों में साफ़ लिखा था कि मकान नहीं, आपकी हैसियत रिजेक्ट हुई है.

जिनके लिए घर संपत्ति है; बाकी लोगों के लिए घर प्रार्थना है. कभी-कभी तो ऐसा होता है कि एक घर एक समय निडरता का एहसास करवाता है और अगले ही पल उसमें कुछ खास नाम या जाति वाला व्यक्ति आकर रहने लगता है कि सोसाइटी वालों को डर लगने लगता है.

और घर की जाति वाला यह वाक्य इतना चालाक है कि सुनने में दार्शनिक लगता है, पर काम में राजनीतिक है. यह एक झटके में सदियों की असमानता पर सफ़ेदी फेर देता है. यह कहता नहीं, इशारा करता है- देखिए, आप लोग ही तो हर चीज़ में जाति घुसेड़ देते हैं. मानो जाति किसी अखिलेश यादव की जेब में रखी चीज़ हो, न कि गांव के रास्तों, शादी-ब्याह, विद्यालयों, कुओं, दफ़्तरों, मुहल्लों और स्मृतियों में जमी हुई संरचना.

जैसे दलित बस्ती का नाम लोगों ने कविता के लिए रखा हो. जैसे मुस्लिम मोहल्ले दंगों से बचने की विवशता से नहीं, किसी सांस्कृतिक प्रयोग से बने हों. फुले साहब या पेरियार साहब ही नहीं, बाबा नानक साहब भी होते तो शायद हंसते-हंसते कहते- भारत में आदमी को जाति से मुक्ति नहीं मिली, इसलिए उसने घर को ही निर्वाण दे दिया.

कुछ घर नगर का हिस्सा माने गए तो कुछ बोझ

आदमी अभी भी नीचा है, घर ऊंचा हो गया. आदमी अभी भी अपमानित है, घर सम्मानित घोषित कर दिया गया. यह वैसा ही न्याय है जैसे मालिक नौकर को मारकर कहे: देखो, डंडे की कोई निजी दुश्मनी नहीं थी.

सच यह है कि घर की जाति नहीं होती, मगर घरों की किस्मत जातिबद्ध होती है. कुछ घरों पर बैंकों का भरोसा उतरता है, कुछ पर नोटिस. कुछ घरों में शादी का कार्ड पहुंचता है, कुछ में सफ़ाई का ठेका. कुछ घरों को नगर का हिस्सा माना जाता है, कुछ को नगर पर बोझ.

कुछ घरों के उजड़ने पर अख़बार लिखते हैं ‘विरासत चली गई,’ कुछ के उजड़ने पर लिखा जाता है ‘अवैध कब्ज़ा हटाया गया.’ यानी भाषा भी घरों के साथ अलग व्यवहार करती है. ईंट तो एक है, शब्द अलग हैं.

तो जनाब, घर की जाति नहीं होती- यह कहिए, बार-बार कहिए, ऊंची आवाज़ में कहिए, संसद में कहिए, टीवी पर कहिए, स्कूल की किताब में छपवाइए. मगर एक बार उन गलियों में भी जाकर कहिए जहां बच्चे आज भी यह सीखते हैं कि उनका पता ही उनकी पहली पहचान है.

उन बस्तियों में भी कहिए जहां लोग जानते हैं कि उनका घर किसी नक्शे का हिस्सा कम, किसी व्यवस्था की उपेक्षा का परिणाम ज़्यादा है. उन परिवारों के सामने भी कहिए जिनके घर पर बुलडोज़र चला और फिर उन्हें समझाया गया कि कानून सबके लिए बराबर है.

भारत में घर की जाति नहीं होती. भारत में बस इतना होता है कि कुछ घरों को घर माना जाता है और कुछ को हटाने योग्य वस्तु. कुछ घरों में नागरिक रहते हैं, कुछ में संदिग्ध. कुछ घरों पर नेमप्लेट लगती है, कुछ पर नंबर भी नहीं. और यही इस वाक्य का ज़हर है- यह झूठ को इतना विनम्र बनाकर पेश करता है कि सच अचानक बदतमीज़ लगने लगता है.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)