बंगनामा: रण हुंकार में बदलता चुनावी प्रचार

2011 के पूर्व पश्चिम बंगाल में विचारधारा की राजनीति प्रबल थी और वर्ग राजनीति, भूमि सुधार, मज़दूरों के मुद्दे ही चुनावी प्रचार विषय होते थे, मुद्दे अब भी हैं पर जिस तरह बंगाल में विचारधारा की राजनीति भावनात्मक और प्रतीकात्मक राजनीति में परिवर्तित हुई है, उसी तरह चुनावी संदेश और छवियां भी अब दिमाग और तर्कों से अधिक भावनाओं को अपील करते हैं. बंगनामा की चवालीसवीं क़िस्त.

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'टीएमसी और भाजपा दोनों ही पार्टियों को इस चुनाव में युद्ध का चेहरा ही दिख रहा है तथा उनके प्रचार गीत, गीत नहीं रण हुंकार हैं.' (फोटो: पीटीआई)

बंगनामा की पिछली कड़ी में हमने देखा कि किस तरह गत 35-40 वर्षों में प्रौद्योगिकी के त्वरित विकास के कारण चुनावी प्रचार के रूप, रंग और रफ़्तार में आमूल अंतर आ गया है. पिछले कुछ चुनावों से पार्टियों ने सोशल मीडिया पर, जैसे वॉट्सऐप, फेसबुक, यूट्यूब और इंस्टाग्राम, वीडियो और रीलों का व्यवहार बड़े पैमाने पर असरदार ढंग से किया है. आइए 2021 तथा 2026 के कुछ वीडियो को ज़रा ग़ौर से देखें.

अगर हम पश्चिम बंगाल में 2021 में हुए विधानसभा चुनाव के वक्त के कुछ वीडियो या रील देखें, तो शायद समझ पाएं कि उस घड़ी राज्य के तीन मुख्य राजनीतिक दलों का चुनाव तथा मतदाताओं के प्रति क्या मनोभाव था: ‘बांग्ला निजेर मेए के चाई (बंगाल अपनी बेटी को ही चाहता है)’ बता रहा था तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) क्षेत्रीय सत्ताधारी पार्टी है जो बंगाल को बनाने-संवारने के कार्य में जुटी हुई है तथा बंगालवासी इस कार्य का दायित्व फिर से भूमि-पुत्री ममता बनर्जी को ही देना चाहते हैं.

इसका उद्देश्य मतदाताओं में क्षेत्रीय पहचान तथा अभिमान को मज़बूत बनाना तथा दिखाना था कि बंगाल में ममता बनर्जी का कोई विकल्प नहीं हो सकता है, और राज्य से बाहर का कोई नेता तो कदापि नहीं.

टीएमसी द्वारा पिछले 2021 विधानसभा चुनाव में बनाया गया वीडियो. (फोटो साभार: यूट्यूब)

उसी वर्ष भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का मुख्य प्रचार गीत (और नारा) था ‘एबार आशोल परिबर्तन, एबार बीजेपी’ (इस बार असली परिवर्तन, इस बार भाजपा), जिसमें क्रमशः बाउल तथा आधुनिक बांग्ला गानों के रमणीय माध्यम से भाजपा को पश्चिम बंगाल के ही दल तथा नरेंद्र मोदी को वैकल्पिक नेता के रूप में प्रस्तुत किया गया था जो बंगाल को फिर से ‘सोनार बांग्ला’ या स्वर्णिम बंगाल बनाने के लिए वचन बद्ध दिखाए गए थे. जबकि मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का नारा ‘लाल फेराओ, हाल फेराओ (लाल को वापस लाओ, अच्छे हालात वापस लाओ)’ उनके बीते हुए सत्तासीन काल का अनुस्मारक भर रह गया था.

पश्चिम बंगाल में इस वक्त चल रहे 2026 के विधानसभा चुनावों में दोनों मुख्य प्रतिद्वंद्वी दलों भाजपा तथा टीएमसी ने कई वीडियो बनाए हैं जिनमें से अगर हम वायरल हुए एक-दो वीडियो देखें तो पाएंगे कि उनकी शैली व सार में बहुत अंतर है, अब वे कहीं अधिक ऊर्जा पूर्ण और आक्रामक हैं.

भाजपा का सबसे लोकप्रिय वीडियो ‘पाल्टानो दरकार, चाई बीजेपी सरकार’ (ज़रूरत है बदलाव की, चाहिए सरकार भाजपा की) है. पहले भाग में यह वीडियो बताता है कि टीएमसी का शासन अराजकता, भ्रष्टाचार और दुराचरण से ग्रस्त रहा है राज्य पर भय की काली छाया है. दूसरे भाग में यह वीडियो पिछले कुछ वर्षों में पश्चिम बंगाल में घटे कुछ बहु प्रचारित भयानक अपराधों और विवादित घटनाओं की याद दिलाता है, जैसे आर जी कर मेडिकल कॉलेज और हाजरा विधि महाविद्यालय में क्रमशः छात्रा का बलात्कार, प्राइमरी स्कूल में अध्यापकों की नियुक्ति में भ्रष्टाचार, अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण इत्यादि.

तीसरे भाग में वह ये बताता है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा पश्चिम बंगाल तथा यहां के नागरिकों के उत्थान के लिए प्रतिबद्ध है तथा मां बांग्ला को उसकी खोई प्रतिष्ठा और वैभव के सिंहासन पर बिठाने के लिए समर्पित है. इन्हीं कारणों से भाजपा बंगाल के लोगों को इस बार सरकार बदलने के लिए प्रेरित कर रही है.

भाजपा के और भी वीडियो हैं लेकिन ‘पाल्टानो दरकार’ के स्तर का वीडियो तो नहीं दिखा. एक प्रचलित गीत है ‘देखी केमोन राखे राम (देखें राम कैसे रखते हैं)’. इस गीत में भाजपा के अनुसार, बंगाल की जनता कह रही है कि हमने 34 साल एक दल को शासन का दायित्व दिया और 15 वर्ष एक और दल को, अब राम के दल को आजमाकर देखें कि हमें क्या मिलता है. स्पष्ट है कि भाजपा ‘राम की पार्टी’ के रूप में बंगाल की जनता से सरकार बनाने का अवसर एक मांग रही है.

तृणमूल कांग्रेस के सबसे लोकप्रिय वीडियो ‘जे लोडचे शोबार डाके, शेई जेताबे बांग्ला मां के (जो सबके पुकार को सुनकर लड़ रही हैं, वही मां बंगाल को जिताएगी)’जोतोई कोरो हामला, आबार जीतबे बांग्ला (कितना भी करो हमला, फिर बंगाल ही जीतेगा)’ से तीन संदेश निकलकर आते हैं : एक, ममता बनर्जी बंगाल के हर वर्ग, हर श्रेणी, हर धर्म व जाति के लोगों के विकास के लिए अथक परिश्रम कर रही हैं ,जबकि भाजपा उन्हें लगातार काम करने से रोक रही है.

दो, भाजपा बाहर का हमलावर दल है और टीएमसी बंगाल का, उनका अपना दल है. तीन, यह इंगित है कि नरेंद्र मोदी तथा अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा पश्चिम बंगाल और यहां के वासियों, उनकी संस्कृति, तथा उनके अधिकारों को कुंठित कर रहा है- मसला नागरिकता का हो या केंद्रीय विकास निधि का या फिर उन्हें धर्म के नाम पर विभाजित करने का.

इसके जवाब में ममता बनर्जी जमकर बंगाल के लोगों की तथा उनके हितों की रक्षा करने के लिए लड़ रही हैं. साथ ही ये दोनों वीडियो हर बांग्लाभाषी का आह्वान भी कर रहे हैं कि आगे बढ़कर ममता बनर्जी के साथ मिलकर इन आक्रमणकारियों को पराजित करें.

आपने ध्यान दिया होगा कि दोनों दलों के वीडियो में विषय-वस्तु में कुछ परिवर्तन हैं तो समानताएं भी हैं. 2021 के वीडियो की तुलना में इस चुनाव में दोनों ही पार्टियां अपने सकारात्मक विकास कार्यक्रम के बारे में कहीं कम बातें कर रही हैं. दोनों ही अपने वीडियो में विरोधी दल को अक्षरशः काले रंग में रंग रही हैं. संग-संग जब भी दोनों दलों के वीडियो में विरोधी दल के कथित कुकर्म तथा ग़लतियां उजागर होती हैं तब उन्हें काले रंग में सना या काली-सफ़ेद छवियों में दिखाया जाता है. इस तरह दोनों दलों की रणनीति मूलतः नकारात्मक है.

मुद्दों पर नहीं शीर्ष नेता की लोकप्रियता पर निर्भरता

2021 में दोनों ही दलों के वीडियो का संगीत लोक संगीत से अधिक प्रभावित था. 2026 में उनके वीडियो के गीत और संगीत तीव्रगति युद्ध-गीत की लय और धुन से लैस हैं. यूं लगता है जैसे दोनों ही पार्टियों को इस चुनाव में युद्ध का चेहरा ही दिख रहा है तथा उनके प्रचार गीत, गीत नहीं रण हुंकार हैं.

सबसे महत्वपूर्ण समानता यह है कि दोनों ही दलों के वीडियो यह साफ़ कर देते हैं कि दोनों दल अपनी सफलता के लिए विचारधारा और मुद्दों पर नहीं बल्कि अपने-अपने शीर्ष नेता की लोकप्रियता पर ही निर्भर हैं-  भाजपा के वीडियो में नरेंद्र मोदी तथा टीएमसी के वीडियो में ममता बनर्जी हर कुछ क्षणों में दर्शन देते रहते हैं.

यह कहा जा सकता है कि 2011 के पूर्व पश्चिम बंगाल में विचारधारा की राजनीति प्रबल थी और यहां वर्ग राजनीति, भूमि सुधार, मज़दूरों के मुद्दों इत्यादि का अहम स्थान था. यह मुद्दे ही चुनावी प्रचार के भी विषय होते थे, उन्हीं को प्रतिबिंबित करते थे. लेकिन 2011 विधानसभा चुनावों के बाद की राजनीति व चुनावों को देखने से नहीं लगता कि अब पश्चिम बंगाल में विचारधाराओं का टकराव बचा है. मुद्दे अब भी हैं लेकिन अब उन्हें किसी विचारधारा के वाहन का सहारा नहीं है, बल्कि अब उन्हें व्यक्तित्वों, चिह्नों और भावनाओं ने ठेल कर पीछे कर दिया है.

अगर चुनावी प्रचार वह आईना है जो राजनीति को प्रतिबिंबित करता है तो आजकल इस आईने में व्यक्ति विशेष अधिक दिखते हैं, विचार और मुद्दे कभी-कभार. जिस तरह पश्चिम बंगाल में विचारधारा की राजनीति भावनात्मक और प्रतीकात्मक राजनीति में परिवर्तित हुई है, उसी तरह चुनावी संदेश और छवियां भी अब दिमाग और तर्कों से अधिक भावनाओं को अपील करते हैं.

(चन्दन सिन्हा पूर्व भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी, लेखक और अनुवादक हैं.)

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