नई दिल्ली: विधानसभा चुनावों के दौरान आदर्श आचार संहिता के पालन में ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ से लेकर ‘निर्वाचन आयोग के आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल पर एक मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल की सार्वजनिक निंदा’, मतदाताओं को ‘मतदान अधिकार से वंचित करने’ और दोषपूर्ण विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के आरोपों तक को लेकर राज्यसभा में विपक्ष के कुल 73 सदस्यों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग करते हुए एक नया नोटिस प्रस्तुत किया है, जिसमें उन पर ‘प्रमाणित कदाचार’ का आरोप लगाया गया है.
इस संबंध में द वायर को मिली जानकारी के अनुसार, शुक्रवार (24 अप्रैल) को राज्यसभा के महासचिव को सौंपे गए नोटिस में ज्ञानेश कुमार के खिलाफ नौ आरोप शामिल हैं.
इस नोटिस के बारे में कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने बताया, ‘राज्यसभा में विपक्ष के 73 सांसदों ने अभी-अभी राज्यसभा के महासचिव को एक नया प्रस्ताव प्रस्तुत किया है, जिसमें भारत के राष्ट्रपति को एक संबोधन प्रस्तुत करने की मांग की गई है. इस प्रस्ताव में भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त श्री ज्ञानेश कुमार को उनके पद से हटाने का आग्रह किया गया है.
उन्होंने आगे बताया कि यह कदाचार 15 मार्च 2026 को या उसके बाद किए गए कार्यों और चूक से संबंधित है. इस आरोप को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 (5) के साथ-साथ अनुच्छेद 124 (4) के तहत, मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 की धारा 11 (2) और न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के तहत वर्णित किया गया है.
73 Opposition MPs in the Rajya Sabha have just submitted to its Secretary General a fresh Notice of Motion for presenting an Address to the President of India praying for the removal of Shri Gyanesh Kumar, Chief Election Commissioner of India, on the ground of proven misbehaviour…
— Jairam Ramesh (@Jairam_Ramesh) April 24, 2026
द वायर को पता चला है कि कुमार के खिलाफ पहला आरोप आदर्श आचार संहिता के पालन में ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ का है और इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 18 अप्रैल के राष्ट्र के नाम संबोधन का जिक्र किया गया है. विपक्षी दलों ने संबोधन के बाद आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन का आरोप लगाया था, जबकि चुनाव आयोग ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को पीएम मोदी पर टिप्पणी संबंधित मामले में नोटिस भेजा है, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ अभी तक कोई कार्रवाई नहीं की है.
दूसरा आरोप निर्वाचन आयोग के आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल पर एक मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल की पक्षपातपूर्ण और सार्वजनिक निंदा से संबंधित है, जिसमें चुनाव आयोग द्वारा इस महीने की शुरुआत में तृणमूल कांग्रेस को दिए गए ‘स्पष्ट संदेश’ का जिक्र किया गया है.
आयोग ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर अपने पोस्ट में लिखा था, ‘तृणमूल कांग्रेस को चुनाव आयोग का स्पष्ट संदेश… इस बार पश्चिम बंगाल में चुनाव निश्चित रूप से भयमुक्त, हिंसामुक्त, धमकीमुक्त, प्रलोभनमुक्त और बिना किसी छापेमारी, बूथ जामिंग या स्रोत जामिंग के होंगे.’
तीसरा आरोप केरल में चुनाव दिशानिर्देशों से संबंधित चुनाव आयोग के दस्तावेज़ पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की मुहर से जुड़ा है, जिसमें ‘प्रशासनिक चूक’ का आरोप लगाया गया,जो सत्ताधारी पार्टी से संस्थागत निकटता को दर्शाती हैं.
चौथा आरोप 8 अप्रैल को टीएमसी प्रतिनिधिमंडल के साथ चुनाव आयोग के व्यवहार से संबंधित है और इसमें मुख्य चुनाव आयुक्त के ‘संवैधानिक पदाधिकारी के लिए अशोभनीय आचरण’ का उल्लेख किया गया है. बैठक के बाद टीएमसी ने आरोप लगाया था कि मुख्य चुनाव आयुक्त कुमार ने उन्हें ‘गेट लॉस्ट’ कहा था.
पांचवां आरोप पश्चिम बंगाल में मतदाता सूचियों के विशेष गहन संशोधन (एसआईआर) से संबंधित है और इसमें ‘सामूहिक मताधिकार से वंचित’ करने का आरोप लगाया गया है, जिसमें ‘लगभग 91 लाख मतदाताओं को हटा दिया गया और लगभग 34 लाख मतदाताओं को न्यायिक रूप से मताधिकार से वंचित कर दिया गया’ का उल्लेख किया गया है.
छठे आरोप में आधिकारिक पक्षपात की विशिष्ट और दस्तावेजी शिकायतों पर जानबूझकर कार्रवाई न करने की बात उठाते हुए भबानीपुर के रिटर्निंग अधिकारी तथा पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को लेकर की गई शिकायतें पर कोई कदम नहीं उठाने का जिक्र है.
मालूम हो कि भबानीपुर से निवर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अपने मुख्य प्रतिद्वंद्वी सुवेंदु अधिकारी के खिलाफ चुनाव लड़ रही हैं. टीएमसी ने पिछले महीने चुनाव आयोग को दी गई अपनी शिकायत में आरोप लगाया है कि रॉय अधिकारी के करीबी हैं.
कुमार के खिलाफ विपक्ष के नोटिस में सातवां आरोप राष्ट्रव्यापी एसआईआर का जिक्र करते हुए इसे ‘दोषपूर्ण’ बताया गया है, जबकि आठवां आरोप बार-बार ‘प्रतिकूल न्यायिक टिप्पणियों का कारण बनने’ और अनुच्छेद 142 लागू करते हुए सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप का जिक्र करता है.
नौवां और अंतिम आरोप तमिलनाडु में नौकरशाहों के तबादलों को निर्देशित करने के लिए ‘अवैध रूप से’ सत्ता का दुरुपयोग करने से संबंधित है.
उल्लेखनीय है कि यह नया नोटिस 12 मार्च को लोकसभा और राज्यसभा में पेश किए गए दो अलग-अलग नोटिसों के कुछ ही हफ्तों बाद आया है, जिनमें मुख्य चुनाव आयुक्त कुमार पर ‘कदाचार’ का आरोप लगाया गया था और जिन्हें 6 अप्रैल को खारिज कर दिया गया था. इस अभूतपूर्व कदम में राज्यसभा में पेश किए गए नोटिस पर 63 सांसदों के हस्ताक्षर थे, जबकि लोकसभा में पेश किए गए नोटिस पर 130 सांसदों के हस्ताक्षर थे.
गौरतलब है कि मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें एवं कार्यकाल) अधिनियम, 2023 के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान तरीके और समान आधारों पर ही पद से हटाया जा सकता है.
न्यायाधीश जांच अधिनियम, 1968 के अनुसार, संसद के किसी भी सदन में महाभियोग नोटिस दिए जाने पर सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जा सकता है. यदि नोटिस लोकसभा में दिया जाता है, तो उस पर कम से कम 100 सदस्यों के हस्ताक्षर आवश्यक हैं, और यदि राज्यसभा में दिया जाता है, तो उस पर कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर आवश्यक हैं. इसके बाद अध्यक्ष या सभापति यह निर्णय ले सकते हैं कि प्रस्ताव को स्वीकार किया जाए या अस्वीकार किया जाए.
(इस ख़बर को अंग्रज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)
