नोएडा मज़दूर आंदोलन: कार्यकर्ताओं के वकील बोले- बिना ठोस सबूत लगाया रासुका; आवाज़ दबाने का प्रयास

यूपी पुलिस ने नोएडा मज़दूर आंदोलन मामले में छात्र कार्यकर्ता आकृति चौधरी और वरिष्ठ पत्रकार सत्यम वर्मा पर रासुका लगाया है. आकृति के वकील का कहना है कि पुलिस कोर्ट में ऐसा कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर सकी है, जिससे हिंसा में उनकी भूमिका साबित हो. वहीं, वर्मा के वकील का कहना है कि पुलिस गुमराह करने के लिए आर्थिक लेनदेन के निराधार आरोप लगा रही है क्योंकि उनके पास हिरासत में लिए लोगों के ख़िलाफ़ कोई सबूत नहीं हैं. 

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वरिष्ठ पत्रकार सत्यम वर्मा और छात्र कार्यकर्ता आकृति चौधरी पर एनएसए लगाए जाने के ख़िलाफ़ इलाहाबाद हाईकोर्ट के अधिवक्ताओं का विरोध प्रदर्शन. (फोटो साभार: सत्यम वर्मा रिहाई मंच)

ग्रेटर नोएडा: 25 वर्षीय आकृति चौधरी आधुनिक इतिहास विषय में दिल्ली यूनिवर्सिटी से मास्टर्स की पढ़ाई कर चुकी हैं और नेट क्वालिफाइड हैं. वह पीएचडी में दाखिले की तैयारी कर रही थीं. मूल रूप से पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर की रहने वाली आकृति पिछले कुछ साल से दिल्ली में रह रही थीं. अप्रैल में नोएडा में हुए मजदूर आंदोलन के मामले में 12 मई को वरिष्ठ पत्रकार सत्यम वर्मा के साथ उनके ऊपर भी उत्तर प्रदेश पुलिस ने राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) लगाया है. यानी, इस 25 वर्षीय छात्रा से राष्ट्रीय सुरक्षा को कथित तौर पर खतरा है.

अप्रैल के महीने में नोएडा में हुए मजदूर आंदोलन के दौरान नोएडा के फैक्ट्री मजदूर वेतन बढ़ाने, बेहतर कामकाजी परिस्थितियों और श्रम अधिकारों की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे. 13 अप्रैल को प्रदर्शन के दौरान हिंसा भड़क गई थी. प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया था कि पुलिस ने बिना उकसावे के बल प्रयोग किया, जबकि पुलिस का कहना है कि भीड़ हिंसक हो गई थी और हालात काबू करने के लिए कार्रवाई करनी पड़ी.

अब इस मामले में पुलिस ‘साजिश’, ‘हिंसा’ और हिंसा के ‘मास्टरमाइंड’ जैसे आरोप लगाते हुए कार्रवाई कर रही है. पुलिस का कहना है कि ‘मजदूर आंदोलन के दौरान हुई हिंसा एक सुनियोजित साजिश का हिस्सा था.’

आकृति, अन्य मजदूरों और कार्यकर्ताओं के साथ पहले से ही पुलिस की हिरासत में हैं. 

‘कोई ठोस सबूत नहीं’ 

आकृति के वकील रजनीश यादव का कहना है कि पुलिस अब तक अदालत में ऐसा कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर पाई है जिससे हिंसा में आकृति की भूमिका साबित हो सके.

उनके मुताबिक, ‘पुलिस केवल वॉट्सऐप ग्रुप के कुछ स्क्रीनशॉट कोर्ट में सबूत के तौर पर पेश कर रही है, और उनके पास कोई भी ऐसा सबूत नहीं है जिससे वह साबित कर सकें की आकृति ने कथित हिंसा भड़काने की साजिश की थी या हिंसा में शामिल थीं.’

यादव कहते हैं, ‘इन ग्रुप्स में सिर्फ इतना लिखा है कि जिन लोगों को गिरफ्तार किया गया है, उनके समर्थन में आवाज उठाइए. आवाज उठाना हमारा मौलिक अधिकार है.’

आकृति के वकील रजनीश यादव. (फोटो: श्रुति शर्मा/द वायर हिंदी)

उन्होंने दावा किया कि अभियोजन पक्ष अब तक ऐसा कोई वीडियो, फुटेज या दस्तावेज पेश नहीं कर पाया है जिसमें आकृति या अन्य आरोपियों को तोड़फोड़, आगजनी या सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाते देखा गया हो.

उन्होंने कहा, ‘आज तक किसी भी कार्यकर्ता या मजदूर के द्वारा कोई आगजनी या सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने का वीडियो नहीं दिखाया गया है.’ 

वकील के मुताबिक, अदालत में पुलिस लगातार समय मांग रही है.

यादव कहते हैं, ‘जब हम पूछते हैं कि साजिश का सबूत क्या है, तब वे कहते हैं कि यह ट्रायल का विषय है. अभी तक पुलिस के पास ऐसा कोई पेपर नहीं है जिससे इन लोगों को जेल में रखने का आधार बन सके.’

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि पुलिस ने अभी तक गिरफ्तारी मेमो भी उपलब्ध नहीं कराया है.

‘आज तक हमें गिरफ्तारी का मेमो तक नहीं दिया गया कि गिरफ्तारी के समय आकृति के पास क्या मिला था और उसे कहां से गिरफ्तार किया गया था, हालांकि सोशल मीडिया पर उसकी गिरफ्तारी के वीडियो मौजूद हैं.’

यादव बताते हैं कि आकृति के ऊपर रासुका लगाने का आधार क्या है, इससे जुड़ा कोई भी कागजात उन्हें पुलिस द्वारा नहीं दिया गया है.

आकृति के पिता अरुण चौधरी को सिर्फ़ एक सूचना पत्र दिया गया है, जिसमें उन पर रासुका लगाए जाने की सूचना दर्ज है.

आकृति के पिता को यह सूचना पत्र दिया गया, जिसमे आकृति के ऊपर रासुका लगाए जाने की बात कही गई है.

कानूनी कार्रवाई और आरोप

वे कहते हैं कि आकृति केवल एक एफआईआर में नामजद आरोपी हैं, जबकि बाकी मामलों में उनका नाम सीधे तौर पर शामिल नहीं है.

रजनीश यादव के अनुसार, ‘163 एफआईआर 12 तारीख को दर्ज हुई है, जिसमें 10 तारीख की घटना का जिक्र है. जबकि हिंसा 13 तारीख को हुई थी.’

बचाव पक्ष का कहना है कि शुरुआती धाराएं जमानती थीं और अदालत ने राहत भी दी थी. लेकिन बाद में नई धाराएं जोड़ दी गईं, ‘ताकि जमानत ना मिल सके.’

आकृति के पिता अरुण चौधरी बताते हैं, ‘15 तारीख को जज साहब ने जमानत दे दी थी. लेकिन जैसे ही बेल की प्रक्रिया आगे बढ़ी, पुलिस ने और धाराएं जोड़ दीं, और बेल रुक गई.’

छात्र कार्यकर्ता आकृति चौधरी. (फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट)

यादव कहते हैं, ‘अब पुलिस प्रशासन अपनी जान बचाने के लिए इन लोगों पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लगा रहा है. हम पूछना चाहते हैं कि क्या मजदूरों के अधिकारों के लिए आवाज उठाना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा है?’

दूसरी ओर, पुलिस और प्रशासन का कहना है कि प्रदर्शन के दौरान हिंसा हुई, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचा और कुछ लोग इसके पीछे ‘संगठित साजिश’ के तहत काम कर रहे थे. इसी आधार पर सख्त धाराओं और रासुका की कार्रवाई की गई है.

हालांकि बचाव पक्ष का कहना है कि यह मामला केवल कानून और व्यवस्था का नहीं, बल्कि असहमति और विरोध की आवाजों को दबाने का भी है.

आकृति के पिता कहते हैं, ‘हमारे संविधान ने अधिकार दिया है कि आप प्रतिरोध कर सकते हैं. विरोध करने का अधिकार सबको है.’

उनके मुताबिक, आकृति को इसलिए निशाना बनाया जा रहा है क्योंकि वह गरीबों और मजदूरों के मुद्दों पर बोलती थीं. ‘गरीबों की आवाज बन रही थी.. गरीबों के लिए लड़ाई लड़ना सरकार चाहती नहीं है. ये आवाज दबाने की कोशिश है.’

‘गरीब बच्चों को पढ़ाती थी, मजदूरों के लिए काम करती थी’

आकृति के पिता अरुण चौधरी अपनी बेटी के बारे में बताते हुए कहते हैं कि वह पढ़ाई में बेहद अच्छी रही हैं.

‘दसवीं में उसके 95 प्रतिशत से ऊपर मार्क्स थे. बारहवीं में भी 95 प्रतिशत से ऊपर थे. ग्रेजुएशन में कॉलेज टॉपर में से एक रही है. इतिहास में नेट क्वालीफाई किया है.’

परिवार मूल रूप से दुर्गापुर का रहने वाला है. पिता अरुण एक अखबार में काम करते हैं, जबकि बड़ा भाई इंजीनियर है और चेन्नई में नौकरी करता है.

आकृति के पिता अरुण चौधरी. (फोटो: श्रुति शर्मा/द वायर हिंदी)

अरुण चौधरी कहते हैं कि आकृति लंबे समय से सामाजिक कामों से जुड़ी रही हैं.

‘वो मजदूरों, आंगनवाड़ी वर्करों के लिए काम करती थी. गरीब मोहल्लों में जाकर बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना, बुक डिस्ट्रिब्यूट करना, ऐसे सोशल वर्क से जुड़ी रही है.’

नोएडा मजदूर प्रदर्शन में उनकी भूमिका को लेकर वे कहते हैं, ‘11 तारीख को वो विरोध प्रदर्शन में गई थी. वहां उसने गाना गाया और लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की. उसके बाद जब वो बॉटनिकल गार्डन मेट्रो स्टेशन पहुंची तब वहीं से उनको गिरफ्तार कर लिया गया.’

आकृति के वकील का आरोप है कि गिरफ्तारी के समय कोई महिला पुलिसकर्मी मौजूद नहीं थी और परिवार को लंबे समय तक यह तक नहीं बताया गया कि आकृति को कहां ले जाया गया है.

अरुण चौधरी कहते हैं, ‘हमें सोमवार (13 अप्रैल) को पता चला. मोबाइल लगातार स्विच ऑफ आ रहा था. फिर उसके दोस्तों ने बताया कि उसकी गिरफ्तारी हो गई है.’

रासुका लगाए जाने के बाद भी परिवार के हौसले टूटे नहीं हैं. आकृति के पिता कहते हैं, ‘मुझे अपनी बेटी पर फख्र है. कोई घबराहट नहीं है. वो जब जेल में मिलती है तो कहती है- पापा घबराना मत, एकदम डटे रहना.’

अरुण यह भी कहते हैं कि उनके घर से कई पीढ़ियों से लोग भारतीय सेना में सेवा देते आए हैं. उनके पूर्वज 1962 के भारत-चीन और 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में लड़ाई लड़ चुके हैं. वह बताते हैं कि आज उनके कई रिश्तेदार भारतीय सेना में सेवा दे रहे हैं.’

वह कहते हैं, ‘ऐसे परिवार की लड़की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरा कैसे हो सकती है.’

क्या वामपंथी होना अपराध है?

मामले में पुलिस की ओर से अदालत में दाखिल कुछ दस्तावेज़ों में आरोपियों की ‘वामपंथी विचारधारा’, उनके ‘नेटवर्क’ और अलग-अलग संगठनों से जुड़ाव का ज़िक्र किया गया है. बचाव पक्ष का कहना है कि यही इस पूरे मामले का सबसे चिंताजनक पहलू है.

यादव के मुताबिक, आकृति मजदूर आंदोलन से इसलिए जुड़ीं क्योंकि वे मजदूरों की रोजमर्रा की मुश्किलों से रूबरू थीं. 

उन्होंने एक मजदूर का उदाहरण देते हुए कहा, ‘एक कामगार ने बताया कि उसे गैस सिलेंडर लेने के लिए छुट्टी चाहिए थी, लेकिन मालिक ने छुट्टी देने से मना कर दिया. जब वह अगले दिन काम पर नहीं पहुंची तब फैक्ट्री में उसका प्रवेश बंद कर दिया गया. आंदोलन की नींव ऐसी ही रोजमर्रा की जरूरतों और परेशानियों से जुड़ी हुई थी.’

वकील का कहना है कि यह विवाद मजदूरों की बुनियादी जरूरतों और ठेका प्रथा से जुड़े शोषण से पैदा हुआ. ‘श्रम आयुक्त ने भी माना है कि ठेकेदारी प्रथा का दुरुपयोग हो रहा है. अगर सरकार पहले जाग जाती, तो शायद यह आंदोलन ही नहीं होता.’

लेकिन अब, बचाव पक्ष के अनुसार, पुलिस अदालत में आरोपियों की ‘वामपंथी विचारधारा’ का हवाला दे रही है.

रजनीश यादव कहते हैं, ‘पुलिस बताती है कि इसकी विचारधारा वामपंथी विचारधारा है. क्या आपने कभी वामपंथियों को बैन किया? भारतीय जनता पार्टी से पहले वाम पार्टियां अस्तित्व में हैं. अगर मेरी विचारधारा वामपंथी है, या भाजपा की है, या समाजवादी है, तो क्या मुझे बैन कर देंगे?’

वे आगे कहते हैं, ‘पुलिस कह रही है कि ये लोग मज़दूर बिगुल के सदस्य हैं. अगर मज़दूर बिगुल गैरकानूनी संगठन है तो सरकार ने उस पर बैन क्यों नहीं लगाया? क्या मजदूरों और गरीबों की आवाज उठाने वाले हर संगठन को अब राष्ट्रीय सुरक्षा के खिलाफ माना जाएगा?’

यादव का दावा है कि उनके पास ऐसा पत्र मौजूद है जिसमें पुलिस ने अदालत से कहा है कि ‘वामपंथी विचारधारा के लोग हैं, इन्हें जेल से रिहा न किया जाए.’

आकृति के पिता इसी सवाल को दूसरे तरीके से उठाते हैं. वे कहते हैं कि उनका परिवार लंबे समय से ट्रेड यूनियन और वामपंथी राजनीति को करीब से देखता रहा है. ‘मैं एक अखबार में काम करता हूं.. वो सीपीआई (एम) का मुखपत्र है. अगर मजदूरों और गरीबों की बात करना अपराध है, तो फिर क्या हर वामपंथी विचार रखने वाले को अपराधी माना जाएगा?’

इसी मामले में गिरफ्तार एक्टिविस्ट आदित्य आनंद के भाई केशव आनंद कहते हैं, ‘ये लोग (आकृति, आदित्य और अन्य) मजदूरों पिछड़ों के लिए काम करते हैं.. एक्टिविस्ट हैं और इसमें हमें कोई संकोच नहीं है. हम भगत सिंह के रास्ते पर चलने वाले लोग हैं, लोगों की बुनियादी जरूरतों की बात करना अपराध नहीं हो सकता.

वह बताते हैं कि आंदोलन में शामिल लोग मजदूरों, बिजली, शिक्षा और युवाओं के मुद्दों पर काम करने वाले अलग-अलग पृष्ठभूमि के लोग थे. कोई छात्र था, कोई कलाकार, कोई टेक्सटाइल वर्कर और कोई सामाजिक कार्यकर्ता.

मजदूर आंदोलन क्या था?

नोएडा के फैक्ट्री मजदूर अप्रैल के मध्य से वेतन वृद्धि और बेहतर कामकाजी परिस्थितियों की मांग कर रहे थे. 11 और 12 अप्रैल को हुआ आंदोलन शांतिपूर्ण था. लेकिन 13 अप्रैल को वहां हिंसा हुई, जिसके बाद पुलिस ने कई एफआईआर दर्ज कीं और गिरफ़्तारियां की.

आकृति के वकील कहते हैं, ‘हिंसा की जो भी घटना हुई वो 13 तारीख को हुई. आकृति उस समय जिला कारागार गौतम बुद्ध नगर में बंद थीं. जिस व्यक्ति को 11 अप्रैल को गिरफ्तार कर लिया गया हो, उसके मोबाइल जब्त कर लिए गए हों, वह 13 अप्रैल की हिंसा में कैसे शामिल हो सकता है?’

केशव का कहना है कि सरकार मजदूर आंदोलन को दबाने का संदेश देना चाहती है. उन्होंने कहा, ‘योगी सरकार मजदूरों को एक साफ संदेश देना चाह रही है.. कि उनकी हिम्मत नहीं होनी चाहिए कि वो उठकर विरोध प्रदर्शन करें और बोलें कि हमारे इतने में गुजारा नहीं हो रहा है.’

पत्रकार सत्यम वर्मा और इस मामले में नामजद अन्य कार्यकर्ताओं, मजदूरों का केस देख रहे सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता अली जिया कबीर चौधरी का आरोप है कि मजदूर आंदोलन को ‘राष्ट्र-विरोधी साजिश’ की तरह पेश करने की कोशिश की जा रही है, जबकि असल मुद्दा मजदूरों के शोषण और कामकाजी परिस्थितियों का है.

उन्होंने कहा, ‘सरकार के लिए यह बेहद शर्मनाक स्थिति है. आने वाले महीनों में इन्वेस्टर समिट होने वाली है और उद्योगों को आकर्षित करने के लिए उनके पास सबसे बड़ा दावा सस्ती और शोषणकारी श्रम शक्ति का ही होता है. यह आंदोलन उस छवि को नुकसान पहुंचाता है, क्योंकि मजदूरों ने दिखाया कि वे अपने अधिकारों के लिए खड़े हो सकते हैं.’

वकील के मुताबिक, प्रदर्शन को ‘साजिश’ बताना मजदूरों की अपनी राजनीतिक और सामाजिक चेतना को कमतर करके देखने जैसा है. उन्होंने कहा, ‘अगर हर विरोध को किसी नेटवर्क या साजिश का हिस्सा बताया जाएगा, तो इसका मतलब यह हुआ कि मजदूर अपने अधिकारों के लिए खुद कभी खड़े नहीं हो सकते.’ 

रासुका लगाने को लेकर पुलिस ने क्या कहा?

गौतमबुद्धनगर पुलिस कमिश्नरेट की मीडिया सेल की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है, ‘मजदूरों के प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा के संबंध में दो आरोपियों के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) के तहत कार्रवाई की गई है. दोनों आरोपी मज़दूर बिगुल दस्ता से जुड़े थे और उन्होंने मजदूर आंदोलन के दौरान हुई हिंसा और आगजनी में प्रमुख भूमिका निभाई थी.’

गौतमबुद्धनगर पुलिस कमिश्नरेट की मीडिया सेल की ओर से 14 मई को जारी एक अन्य प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया कि ‘आरोपी सत्यम वर्मा के निजी बैंक खाते में एक करोड़ रुपये से अधिक की राशि थी, जो अलग-अलग देशों से डॉलर, पाउंड और यूरो में भेजी गई थी.’

पुलिस के अनुसार, ‘यह राशि कई मौकों पर सत्यम वर्मा द्वारा उनके अन्य बैंक खातों में ट्रांसफर की गई थी.’

पत्रकार सत्यम वर्मा के बैंक खाते में एक करोड़ रुपये से अधिक राशि होने के पुलिस के दावे पर उनके वकील अली जिया कबीर चौधरी ने कहा कि वर्मा के परिवार ने इस आरोप को पूरी तरह खारिज किया है.

वकील ने कहा कि पुलिस का बयान सामने आने के बाद उन्होंने सत्यम वर्मा के परिवार से विस्तार से बात की. वह बताते हैं, ‘परिवार पूरी तरह आश्वस्त है कि सत्यम के खाते में ऐसी कोई रकम नहीं है. उन्होंने मुझसे कहा कि आप देख सकते हैं कि वो कैसे रहते हैं और हम कैसे रहते हैं. हमारे पास लाखों रुपये नहीं हैं, करोड़ों तो बहुत दूर की बात है.’

उन्होंने पुलिस के दावों की अस्पष्टता पर भी सवाल उठाया. उन्होंने कहा, ‘पुलिस यह तक स्पष्ट नहीं कर रही कि रकम कितनी है. क्या वह एक करोड़ है, एक करोड़ चार हजार है, या एक करोड़ चालीस हजार? जानबूझकर बातें अस्पष्ट रखी जा रही हैं.’

उन्होंने कहा कि इस तरह के आरोप जानबूझकर गुमराह करने के लिए लगाए जा रहे हैं, क्योंकि राज्य के पास जितने भी लोग हिरासत में हैं, उनके ख़िलाफ़ कोई भी सबूत नहीं हैं.

रासुका लगाए जाने पर सवाल उठाते हुए चौधरी ने कहा, ‘रासुका एक प्रिवेंटिव डिटेंशन कानून है. अगर कोई व्यक्ति पहले से जेल में है, तो फिर रासुका की जरूरत क्या है? राज्य नियमित कानूनी प्रक्रिया के जरिए भी जमानत का विरोध कर सकता था.’

वहीं, वर्मा पर रासुका लगाए जाने से पांच दिन पहले, 8 मई को उनकी पत्नी शाकंभरी की ओर से इलाहाबाद हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका दाखिल की गई थी. याचिका में कहा गया, ‘याचिकाकर्ता/बंदी 60 वर्षीय वरिष्ठ नागरिक, वरिष्ठ पत्रकार और सार्वजनिक बुद्धिजीवी हैं, जिन्हें जबरन उठाया गया, अवैध हिरासत में रखा गया और गैरकानूनी तरीके से स्थानांतरित किया गया.’

याचिका में यह भी दावा किया गया कि वर्मा को 17 अप्रैल को उत्तर प्रदेश पुलिस ने लखनऊ स्थित जन चेतना बुकस्टोर से उठाया था, लेकिन नोएडा पुलिस ने ‘आधिकारिक तौर पर उनकी फर्जी गिरफ्तारी पुलिस स्टेशन फेज-2 नोएडा से दिखाई.’

लखनऊ के जिस जन चेतना बुकस्टोर से वर्मा को हिरासत में लिया गया था, वहां की सीसीटीवी फुटेज भी हाईकोर्ट में साक्ष्य के तौर पर प्रस्तुत की गई थी.