दहेज से जुड़ी मौतों में यूपी, बिहार सबसे आगे; देश में रोज़ाना सोलह महिलाओं की जान ले रही कुप्रथा

भारत में 1961 से दहेज प्रथा अवैध है, लेकिन आज भी इस कुरीति के चलते सलाना हज़ारों लड़कियां अपनी जान गंवा रही हैं. एनसीआरबी की रिपोर्ट बताती है कि देशभर में साल 2024 में दहेज ने करीब 5,737 जानें ली है, यानी हर दिन औसतन 15 से 16 मौत. राज्यवार डेटा देखें, तो 2024 में दहेज प्रताड़ना के कारण उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा 2,038 मौतें हुईं, वहीं दूसरे नंबर पर बिहार रहा, जहां 1,078 ऐसे मामले सामने आए.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रबर्ती/द वायर)

नई दिल्ली: भोपाल की त्विषा शर्मा, ग्रेटर नोएडा की दीपिका नागर, ग्वालियर की पलक रजक और कर्नाटक की ऐश्वर्या के नाम इन दिनों सोशल मीडिया से लेकर मेनस्ट्रीम मीडिया तक चर्चा का विषय बने हुए हैं. इन लड़कियों की मौत ने एक बार फिर दहेज हत्या और घरेलू हिंसा और उत्पीड़न को बहस का मुद्दा बना दिया है. हालांकि हमारे देश में न तो दहेज की प्रथा नई है और न ही इसके नाम पर होने वाली मौतें या हत्याएं.

भारत में 1961 से दहेज प्रथा अवैध है, लेकिन आज भी इस कुरीति के चलते सालाना हज़ारों लड़कियां अपनी जान गंवा रही हैं. अखबार की सुर्खियों के अलावा नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े भी इस बात की गवाही देते हैं.

एनसीआरबी की हालिया जारी रिपोर्ट बताती है कि देशभर में साल 2024 में दहेज ने करीब 5,737 जानें ली है, यानी हर दिन औसतन 15 से 16 मौत.

यह डेटा राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के दिए गए आधिकारिक आंकड़ों पर आधारित है. इसमें भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 80 और भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 304बी, दोनों के तहत दर्ज मामले शामिल हैं.

राज्यवार डेटा देखें, तो 2024 में दहेज प्रताड़ना के कारण उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा 2,038 मौतें हुई हैं. दूसरे नंबर पर बिहार है, जहां 1,078 ऐसे मामले सामने आए. साथ ही, इन राज्यों में दहेज से होने वाली मौतों की दर भी सबसे ज्यादा रही. उत्तर प्रदेश में प्रति एक लाख महिला आबादी पर 1.8 मौतें और बिहार में प्रति एक लाख महिला आबादी पर 1.7 मौतें.

इनके बाद तीसरे नंबर पर मध्य प्रदेश है, जहां 450 मौत के मामले सामने आए हैं. वहीं चौथे नंबर पर राजस्थान में 386 मौतें दर्ज की गई हैं. जबकि पांचवें पर पश्चिम बंगाल है, जहां इस कुप्रथा के चलते 337 जानें गई हैं.

आंकड़ों के अनुसार, 2017 से 2022 के बीच दहेज की वजह से होने वाले उत्पीड़न के कारण हर साल औसतन सात हजार महिलाओं ने अपनी जान दे दी या फिर उनकी हत्या कर दी गई. वर्ष 2022 में यह आंकड़ा 6,450 था. यानी रोजाना 18 महिलाओं की मौत हुई थी.

इसी तरह 2023 और 2024 के बीच ‘भारत में आकस्मिक मौतें और आत्महत्याएं’ (ADSI) रिपोर्ट में दहेज से जुड़ी आत्महत्या के मामलों में लगभग 6.7 प्रतिशत की बढ़ोतरी देखने को मिली. ये मामले 2023 में 1,587 से बढ़कर 2024 में 1,693 हो गए, जो देश में दहेज उत्पीड़न और दुर्व्यवहार के लगातार जारी असर की ओर इशारा करता है.

वहीं,  2023 में ‘महिलाओं के खिलाफ अपराध’ से जुड़े एक अध्ययन में पाया गया कि घरेलू हिंसा की शिकायत दर्ज कराने वाली हर पांच में से तीन महिलाओं ने दहेज उत्पीड़न की भी शिकायत की थी.

यह तो सरकारी आंकड़े हैं. लेकिन महिला संगठनों और इस क्षेत्र में काम करने वाले लोग अक्सर ये दावा करते हैं कि कई मामले तो पुलिस के पास तक नहीं पहुंचते. महिला की मौत के बाद समाज के दबाव में दोनों पक्षों के बीच अदालत से बाहर ही समझौता हो जाता है. अगर उन मामलों को ध्यान में रखा जाए तो यह संख्या दोगुनी हो सकती है.

दहेज हत्या को लेकर हाल में सामने आए मामले

उल्लेखनीय है कि हाल ही में अपनी शादी के सत्रह महीने बाद 24 साल की दीपिका नागर की ग्रेटर नोएडा के एक अस्पताल में 17 मई की रात मौत हो गई. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार उनकी तिल्ली फट गई थी, दिमाग में खून जम गया था (ब्रेन हेमेटोमा), शरीर के अंदरूनी हिस्सों से खून बह रहा था और पूरे शरीर पर कई जगह चोट के निशान थे. इस रिपोर्ट ने उनके पति और ससुराल वालों पर दहेज के लिए हिंसा करने के आरोपों को और भी गंभीर बना दिया है.

पुलिस ने उनके पति और ससुर को गिरफ्तार कर लिया है. उनके परिवार का आरोप है कि फॉर्च्यूनर गाड़ी और लगभग 50 लाख रुपये नकद की मांग को लेकर महीनों तक उन्हें प्रताड़ित किया गया, और अंत में उन्हें छत से नीचे धकेल दिया गया.

पोस्टमॉर्टम की रिपोर्ट में गंभीर चोटों का पता चला है. डॉक्टरों ने चेहरे पर सूजन, पेट में चोटें, कान से खून बहना, अंदरूनी अंगों का फटना और शरीर पर कई जगह गहरे घाव होने की बात दर्ज की है. जांचकर्ता इस बात की जांच कर रहे हैं कि क्या गिरने से पहले उनके साथ कोई मारपीट हुई थी.

हालांकि, दीपिका की मौत कोई इकलौती घटना नहीं है. इसके कुछ ही दिन पहले ही 33 साल की एमबीए ग्रेजुएट और ‘पूर्व मिस पुणे’ त्विषा शर्मा भोपाल के कटारा हिल्स स्थित अपने ससुराल में फंदे से लटकी मिली थीं; उनकी शादी वकील समर्थ सिंह से हुए अभी मुश्किल से पांच महीने ही बीते थे.

पुलिस ने इस मामले में दहेज के लिए प्रताड़ना और आत्महत्या के लिए उकसाने संबंधित धाराओं में केस दर्ज किया है. त्विषा के पति, जो खुद एक वकील हैं, इस घटना के बाद से ही फरार हैं और उनकी सास जो एक सेवानिवृत्त जज हैं, अंतरिम ज़मानत पर बाहर हैं. जबकि त्विषा के माता-पिता और भाई लगातार शासन प्रशासन से मदद की गुहार लगा रहे हैं.

इससे पहले इस साल की शुरुआत में जनवरी 2026 में दिल्ली पुलिस की स्पेशल वेपन्स एंड टैक्टिक्स (स्वाट) कमांडो काजल चौधरी की कथित तौर पर अपने पति द्वारा किए गए हमले के बाद मौत हो गई थी. उसके परिवार ने भी पति पर लगातार दहेज के लिए प्रताड़ित करने का आरोप लगाया था.

कुछ इसी तरह अगस्त 2025 में ग्रेटर नोएडा की 28 साल की निक्की भाटी के मामले के बाद आक्रोश देखने को मिला था. निक्की को कथित तौर पर दहेज के लिए ज़िंदा जला दिया गया था. यह घटना तब हुई थी, जब उसके ससुराल वालों ने पहले ही दहेज के तौर पर नकद, गहने और एक स्कॉर्पियो गाड़ी लेने के बावजूद 36 लाख रुपये की अतिरिक्त मांग की थी.

पुलिस शिकायत के अनुसार, निक्की के छोटे से बच्चे ने इस हमले को अपनी आंखों से देखा था.

कानून कितना सहायक

गौरतलब है कि देश में दहेज प्रथा पर अंकुश लगाने के लिए कई कानून मौजूद हैं. बावजूद इसके यह प्रथा धड़ल्ले से जारी है. वर्ष 1961 में बने दहेज निषेध अधिनियम के मुताबिक, दहेज के लेन-देन या इसमें सहयोग करने वालों को पांच साल की सजा और 15 हजार तक के जुर्माने का प्रावधान है. दहेज उत्पीड़न से जुड़े कई दूसरे भी कानून हैं जिनके तहत अभियुक्त को सात साल से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा हो सकती है.

भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) में भी दहेज हत्या और उत्पीड़न से निपटने के प्रावधानों को जस का तस रखा गया है. बीएनएस की धारा 80 (1) के तहत शादी के सात साल के भीतर अस्वाभाविक परिस्थिति में किसी महिला की मौत को दहेज हत्या की श्रेणी में रखा जा सकता है. धारा 80 (2) के तहत ऐसे मामले में दोषियों को सात साल से लेकर उम्रकैद तक की सजा का प्रावधान है.

बीएनएस की धारा 86 के तहत जानबूझकर किए गए किसी भी ऐसी कार्रवाई को क्रूरता की श्रेणी में रखा गया है, जिससे किसी महिला को आत्महत्या करने के लिए प्रेरित किया जा सकता हो या फिर उसे गंभीर शारीरिक या मानसिक नुकसान का अंदेशा हो.

हालांंकि तमाम कानूनों के बावजूद अदालत में न्याय मिलने में होने वाली असामान्य देरी से दहेज मांगने वालों को मनोबल बढ़ता है. कई मामलों में सबूत के अभाव में दोषी बेदाग बच निकलते हैं. इसके अलावा शुरुआत में अक्सर पुलिस पर भी ऐसे मामले को गंभीरता से नहीं लेने के आरोप लगते रहे हैं. ऐसे में दहेज एक ऐसी समस्या बना हुआ है, जिसका इलाज होने के बावजूद ये सालों से लाइलाज़ है.