(यह लेख ‘लव जिहाद’ के नाम पर हो रही ज़्यादतियों को दर्ज करने वाले चार लेखों की श्रृंखला का तीसरा भाग है. पहला और दूसरा भाग यहां पढ़ सकते हैं.)
फरवरी 2020 में केंद्र सरकार ने संसद में गृह राज्य मंत्री जी. किशन रेड्डी के एक लिखित जवाब में साफ़ तौर पर कहा था कि ‘लव जिहाद’ शब्द क़ानून के तहत परिभाषित नहीं है, और किसी भी केंद्रीय एजेंसी ने ऐसा कोई मामला रिपोर्ट नहीं किया है. उन्होंने साथ ही कहा कि संविधान का अनुच्छेद 25, सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए किसी भी धर्म को मानने, उसका पालन करने और उसका प्रचार करने की आज़ादी देता है.
उन्होंने अपने लिखित जवाब में कहा, ‘केरल हाईकोर्ट सहित कई अदालतों ने इस विचार को सही ठहराया है.’
हालांकि, भाजपा नेतृत्व की ख़ासियत है कि वे दोहरी बातें करते हैं- भले ही यह साफ़ हो कि वे संविधान द्वारा तय की गई सीमाओं का उल्लंघन कर रहे हैं, फिर भी चुनावी रैलियों और अपने समर्थकों की जनसभाओं में वे ‘लव जिहाद’ की बात ऐसे करते हैं, मानो यह कोई असली और बड़ा ख़तरा हो, या बड़े पैमाने पर फैला हुआ कोई ख़तरनाक अपराध हो.
इस साज़िश वाली थ्योरी के इर्द-गिर्द शुरू में चल रही ‘मामूली’ चर्चा को कर्नाटक के तत्कालीन मुख्यमंत्री ने तुरंत लपक लिया था और उसे और ज़्यादा हवा दी. मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में आरोप लगाया था कि ‘लव जिहाद के नाम पर धर्मांतरण कराया जा रहा है. युवतियों को पैसे और प्यार का लालच देकर उनका धर्म-परिवर्तन कराया जा रहा है. हम कर्नाटक में इसे ख़त्म करने जा रहे हैं.’
उनके गृह मंत्री बसवराज बोम्मई ने भी कहा था कि लव जिहाद एक ‘सामाजिक बुराई है और हम (कर्नाटक) इससे कुछ सुरक्षा चाहते हैं.’ उन्हें इस बात की कोई परवाह नहीं थी कि उनकी सरकार में शादी के लिए जबरन धर्म-परिवर्तन कराए जाने का कोई मुक़दमा नहीं चल रहा था.
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने कथित ‘लव जिहाद’ से निपटने के लिए अपनी सरकार द्वारा क़ानून लाने से एक महीने पहले कहा था, ‘मैं उन लोगों को चेतावनी देता हूं जो अपनी पहचान छिपाते हैं और हमारी बहनों के सम्मान के साथ खिलवाड़ करते हैं. अगर तुम अपनी हरकतें नहीं सुधारोगे, तो तुम्हारी ‘राम नाम सत्य’ की यात्रा शुरू हो जाएगी.’ आमतौर पर हिंदुओं के अंतिम संस्कार के दौरान ‘राम नाम सत्य है’ कहा जाता है.
भाजपा के दूसरे मुख्यमंत्री भी इसी राह पर चलते हैं. उदाहरण के लिए, उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने 2023 में ऐलान किया था कि राज्य में ‘लव जिहाद जैसी चीज़ें’ बर्दाश्त नहीं की जाएंगी.
उन्होंने सीनियर पुलिस अधिकारियों को लव जिहाद के ख़िलाफ़ ‘सख़्त कार्रवाई’ करने और समय-समय पर वेरिफ़िकेशन अभियान चलाने का निर्देश दिया था, ताकि बाहर से आकर राज्य में बसने वाले लोगों के बैकग्राउंड की जांच की जा सके. उन्होंने दावा किया था कि लव जिहाद के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने वाले लोगों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन उन्होंने उन असली मामलों की कोई जानकारी नहीं दी थी जिनकी जांच चल रही है या जो कोर्ट में साबित हो चुके हैं.
गुजरात के उपमुख्यमंत्री हर्ष संघवी ने राज्य विधानसभा में कहा था, ‘प्यार से हमें कोई ऐतराज़ नहीं है. लेकिन अगर कोई सलीम, सुरेश बनकर किसी लड़की को अपने जाल में फंसाता है, तो हम उसे बख़्शेंगे नहीं.’
इसी तरह मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भरोसा दिलाया था कि उनकी सरकार ‘लव जिहाद के ख़िलाफ़ और भी सख़्त क़ानून’ लाएगी.
भाजपा विधायक यशपाल सिंह सिसोदिया ने मध्य प्रदेश विधानसभा में इस कथित साज़िश का ज़िक्र करते हुए कहा था: ‘…जब वह सोशल मीडिया पर उस भोली-भाली लड़की से, उस बेचारी लड़की से चैट करता है, तो वह उसकी बातों में आ जाती है और इस साज़िश का हिस्सा बन जाती है. रफ़ीक़, रवि बनकर बात करता है. जब कोर्ट में लव मैरिज होती है, तब भी इस बात को छिपाकर रखा जाता है. और जब कोर्ट में शादी नहीं होती, बल्कि निकाह होता है, तब जाकर शादी की प्रक्रिया सामने आती है; तब तक तो बेटी कुछ समझ ही नहीं पाती. इस तरह के मामले भी सामने आए हैं.’
महाराष्ट्र के तत्कालीन उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने भी ‘लव जिहाद’ के ख़िलाफ़ क़ानून की ज़रूरत पर बात की थी. मुंबई में एक बातचीत के दौरान उन्होंने दावा किया था कि ‘एक ख़ास समुदाय की मासूम लड़कियों’ के साथ दूसरे समुदाय के लड़कों द्वारा ज़्यादतियां की जा रही हैं.
उन्होंने कहा था, ‘ऐसी घटनाएं हुई हैं और बढ़ रही हैं. इससे गांवों में झड़पें हुई हैं, जिससे क़ानून-व्यवस्था की समस्याएं पैदा हुई हैं.’
उन्होंने आगे कहा था कि राज्य सरकार अंतर-जातीय या अंतरधार्मिक शादियों के ख़िलाफ़ नहीं है. लेकिन जहां शादी के नाम पर धोखा हो रहा है, वहां सरकार को दख़ल देना ही चाहिए.

‘लव जिहाद’ से संबंधित कोई आधिकारिक डेटा नहीं है
राष्ट्रीय महिला आयोग (एनसीडब्ल्यू) की पूर्व अध्यक्ष रेखा शर्मा ने केरल सरकार को चेतावनी दी थी कि ‘लव जिहाद’ एक ‘टिक-टिक करते टाइम बम’ जैसा है, अगर केरल सरकार ने इसके ख़िलाफ़ कार्रवाई नहीं की तो यह फट जाएगा. उन्होंने दावा किया था कि हिंदू और ईसाई, दोनों समुदायों की महिलाएं इसकी शिकार हैं.
शर्मा ने समाचार एजेंसी एएनआई को कहा था, ‘मैंने ज़बरदस्ती धर्म-परिवर्तन तथा लव जिहाद, और महिलाओं के देश छोड़कर जाने के मामलों की विस्तृत जांच की है. यह (‘लव जिहाद’) केरल में हो रहा है. लव जिहाद के नाम पर महिलाओं को ज़बरदस्ती अलग-अलग देशों में ले जाया जाता है और उन्हें सेक्स ऑब्जेक्ट के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है. दूसरे धर्म के व्यक्ति से शादी करना कोई समस्या नहीं है, लेकिन ज़बरदस्ती किसी का धर्म-परिवर्तन कराना एक समस्या है.’
फिर भी, जब आर्टिकल 14 ने एक आरटीआई याचिका दायर की, तो आयोग ने असल में यह मान लिया कि उसके पास पूरे भारत में कहीं से भी ऐसा कोई डेटा नहीं है जिससे शर्मा के तथाकथित ‘टिक-टिक करते टाइम बम’ यानी ‘लव जिहाद’ और ज़बरदस्ती धर्म परिवर्तन की पुष्टि होती हो.
उनकी ‘विस्तृत जांच’ 2017 में केरल की तीन दिन की यात्रा से ज़्यादा कुछ नहीं थी, और आयोग ने उस यात्रा की रिपोर्ट सार्वजनिक करने से इनकार कर दिया.
भाजपा शासित राज्यों में ‘लव जिहाद’ क़ानून
भारत ने ऐसे क़ानून पारित नहीं किए हैं जो स्पष्ट रूप से अलग-अलग धर्मों के लोगों के बीच शादी पर रोक लगाते हों, जैसा कि हिटलर के समय नाज़ियों ने 1935 में न्यूरेमबर्ग में किया था, या 1960 के दशक के नागरिक अधिकार आंदोलन से पहले नस्लीय रूप से अलग-थलग अमेरिकी राज्यों में और रंगभेद वाले दक्षिण अफ्रीका में किया गया था.
हालांकि, प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी के कार्यकाल के दौरान भाजपा-शासित कई राज्य सरकारों ने ऐसे क़ानून पारित किए हैं, जिनके बारे में मेरा तर्क है कि उन्हें अलग-अलग धर्म के लोगों के बीच बनने वाले संबंधों को रोकने के लिए और उन्हें डराने के लिए बनाया गया है. इन्हें आम बोलचाल की भाषा में ‘लव जिहाद’ क़ानून कहा जाता है.
व्यवहारिक रूप से मौजूदा धर्म परिवर्तन विरोधी क़ानूनों (जिन्हें क़ानूनी दांव-पेच वाली भाषा में ‘धर्म की स्वतंत्रता अधिनियम’ कहा जाता है) में संशोधन करके इन्हें नया रूप दिया गया है, जो शादी के मक़सद से किए गए धर्म परिवर्तन को अपराध घोषित करता है.
अपनी बात शुरू करते हुए यह तर्क दिया जा सकता है कि भारतीय क़ानून के तहत अलग-अलग धर्म के लोगों का आपस में शादी करना अब भी संभव है. आख़िरकार, 1954 में संसद ने ‘विशेष विवाह अधिनियम’ पारित किया था, जो क़ानूनी तौर पर अलग-अलग धर्म के लोगों को आपस में शादी की अनुमति देता है (जैसा कि हमने देखा था, ब्रिटिश भारत में ऐसा करना ग़ैर-क़ानूनी था, जो अजीब बात थी), और यह क़ानून सैद्धांतिक रूप से आज भी उन लोगों के लिए एक सुरक्षा कवच का काम करता है, जो किसी दूसरे धर्म के व्यक्ति से शादी करना चाहते हों.
इस अधिनियम के ‘उद्देश्यों और कारणों’ से इस बात की पुष्टि होती है कि इस क़ानून को बनाने के पीछे मुख्य सिद्धांत शादी से जुड़े पुराने क़ानूनों को औपनिवेशिक प्रभाव से मुक्त करना था. इस क़ानून ने ऐसे जोड़ों के बीच क़ानूनी शादी को संभव बनाया, जिनकी धार्मिक पहचान अलग-अलग थी और जो अपना धर्म बदलना नहीं चाहते थे.
21 साल से ज़्यादा उम्र का कोई भी पुरुष और 18 साल से ज़्यादा उम्र की कोई भी महिला जिनका कोई अन्य जीवित जीवनसाथी न हो और जो शादी के लिए अपनी सहमति देने में सक्षम हों, इस क़ानून के तहत क़ानूनी तौर पर शादी कर सकते हैं. अलग-अलग धर्मों की वजह से उन पर कोई रोक नहीं थी.
हालांकि, असल में यह क़ानून ऐसे अंतरधार्मिक जोड़ों को शादी करने की आज़ादी की गारंटी नहीं देता, जिन्हें उनके परिवार वाले परेशान करते हैं. वे किसी मजिस्ट्रेट के सामने जाकर सीधे-सीधे यह मांग नहीं कर सकते कि तुरंत क़ानूनी तौर पर उनकी शादी करवा दी जाए. इस क़ानून के तहत उन्हें अपनी शादी की तय तारीख़ से एक महीना पहले, अपने संबंधित मैरिज रजिस्ट्रार को सार्वजनिक नोटिस देना ज़रूरी होता है. इस एक महीने के दौरान कोई भी व्यक्ति इस शादी पर आपत्ति उठा सकता है.
अगर दो अलग धर्मों के लोग अपने परिवारों की मर्ज़ी के बिना गुपचुप तरीक़े से शादी करना चाहते हों, तो यह क़ानून उन्हें इसकी इजाज़त नहीं देता. कुछ राज्यों में, ऐसे नोटिस उस पते पर भेजे जाते हैं जो पहचान पत्र में दर्ज होते हैं, जो अक्सर उनके माता-पिता का ही पता होता है. अगर दोनों लोग अपनी शादी रजिस्टर करवाने के लिए भागकर किसी दूसरे राज्य में भी चले जाते हैं, तो भी इससे कोई मदद नहीं मिलती, क्योंकि शादी के रजिस्ट्रेशन के लिए आवेदन करते समय दोनों लोगों को उस राज्य में अपने रहने का सबूत देना ज़रूरी होता है.

हिंदुत्ववादी संगठनों का दख़ल
हाल के कुछ सालों में ये मुश्किलें और भी बढ़ गई हैं, क्योंकि हिंदुत्ववादी संगठन अक्सर ऐसी प्रस्तावित शादियों पर नज़र रखते हैं; वे माता-पिता को इसकी जानकारी देते हैं, जोड़े को डराते-धमकाते हैं, भीड़ इकट्ठा करते हैं और कभी-कभी तो जोड़े के साथ मारपीट भी करते हैं.
स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत एक महीने की पब्लिक नोटिस दिए जाने से पैदा होने वाले ख़तरों और रुकावटों की वजह से ही कई अलग-अलग धर्मों के जोड़े धार्मिक शादी क़ानूनों के तहत शादी करने का विकल्प चुनते हैं, भले ही इसके लिए उन्हें अपना धर्म बदलना पड़े.
भारत में शादी समेत निजी मामले धार्मिक क़ानूनों से नियंत्रित होते हैं, जो अलग-अलग धर्मों के लोगों-जैसे हिंदू, मुस्लिम, बौद्ध, जैन, सिख, ईसाई और पारसी-पर लागू होते हैं’ वे माता-पिता के विरोध, समाज से निकाले जाने और कभी-कभी हिंसा से बचने के लिए धार्मिक शादियां चुनते हैं.
मुंबई में ‘मजलिस लीगल सेंटर’ की वकील, एक्टिविस्ट और संस्थापक फ़्लाविया एग्नेस बताती हैं, ‘वे किसी दूसरे धर्म को इसलिए अपना लेते हैं ताकि वे हिंदू या मुस्लिम मैरिज एक्ट जैसे क़ानूनों के तहत जल्दी से अपनी शादी रजिस्टर करवा सकें.’
लखनऊ में महिलाओं के अधिकारों के लिए काम करने वाले ग़ैर-लाभकारी संगठन ‘एसोसिएशन फॉर एडवोकेसी एंड लीगल इनिशिएटिव’ की एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर रेनू मिश्रा कहती हैं कि इस तरह उनकी शादी की योजनाओं के बारे में उनके परिवारों को सूचना नहीं मिल पाती है.
लेकिन, भाजपा की राज्य सरकारों ने एक सोची-समझी रणनीति के तहत अलग-अलग धर्मों के जोड़ों के लिए शादी का यह रास्ता भी बंद कर दिया है. उन्होंने क़ानून में संशोधन करके ऐसा किया है. शादी के लिए धर्म बदलने को धोखाधड़ी, डराने-धमकाने या लालच देने का एक आपराधिक तरीक़ा घोषित कर दिया है, जिसे धर्म-परिवर्तन विरोधी क़ानून द्वारा प्रतिबंधित कर दिया गया है.
हाल ही में बने ‘लव जिहाद’ क़ानूनों के महत्व को समझने के लिए हमें धर्म-परिवर्तन विरोधी क़ानूनों की उत्पत्ति को संक्षेप में समझना होगा, 1960 के दशक में धर्म बदलने में रुकावटें पैदा करने वाले क़ानूनों से लेकर आज के उन क़ानूनों तक जिन्हें ‘लव जिहाद’ को रोकने के लिए बनाया गया है.
वरिष्ठ मानवाधिकार कार्यकर्ता मिहिर देसाई क़ानून की उत्पत्ति को बहुत ही सटीक ढंग से इन शब्दों में बयान करते हैं: ‘यह एक संकोची हिंदू दक्षिणपंथी राष्ट्रवाद से, आज के समय में दिखाई देने वाले, एक बेहद आक्रामक-और किसी भी हद तक जाने को तैयार-बदलाव को दर्शाता है.’
संविधान के मौलिक अधिकारों वाले अध्याय का अनुच्छेद 25(1) धार्मिक स्वतंत्रता की अपनी व्यापक व्याख्या में बिल्कुल स्पष्ट है, जिसमें ‘धर्म को मानने, उसका आचरण करने और उसका प्रचार करने का अधिकार’ शामिल है. ओडिशा पहला राज्य था जिसने 1967 में धर्मांतरण-विरोधी क़ानून बनाया. दूसरे राज्यों में बाद में ऐसे ही क़ानून बने, जिसे ‘धर्म की स्वतंत्रता अधिनियम’ कहा गया, जिसका अर्थ इसके मूल भाव से उलट जान पड़ता है.
इसके बाद 1968 में मध्य प्रदेश ने ऐसा क़ानून बनाया. दूसरे राज्यों ने भी इसका अनुसरण किया, जिनमें अरुणाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़ और तमिलनाडु (जहां बाद में इसे रद्द कर दिया गया), गुजरात, हिमाचल प्रदेश और राजस्थान शामिल हैं.
धर्मांतरण को अपराध घोषित किया गया
इन क़ानूनों ने ज़बरदस्ती, धोखाधड़ी, प्रलोभन या लालच के ज़रिए धर्मांतरण को अपराध घोषित कर दिया. सिद्धांत रूप में यह बात बिल्कुल सही है. समस्या यह है कि इन क़ानूनों में, और बाद में बने ऐसे ही अन्य क़ानूनों में, शब्दों को किस तरह परिभाषित और व्याख्यायित किया गया है.
कई क़ानूनों में, ‘ज़बरदस्ती’ में तो ‘ईश्वरीय शक्ति को नाराज़ करना’ भी शामिल है; ‘धोखाधड़ी’ में ग़लतबयानी और प्रलोभन शामिल हैं; और ‘लालच’ में नक़द या वस्तु के रूप में कोई भी उपहार या पारितोष, या यहां तक कि स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा जैसी सेवाएं भी शामिल हैं. ये व्यापक परिभाषाएं, असल में, धार्मिक स्वतंत्रता के उस मौलिक अधिकार को बहुत संकुचित कर देती हैं जिसकी गारंटी संविधान ने दी थी.
इन क़ानूनों में यह भी प्रावधान किया गया है कि कोई व्यक्ति धर्म-परिवर्तन करने से पहले जिलाधिकारी के सामने इसकी सार्वजनिक घोषणा करेगा-आमतौर पर धर्म-परिवर्तन से पहले ही; और कुछ राज्यों में तो इसके लिए सार्वजनिक नोटिस जारी करने की क़ानूनी बाध्यता भी है. कई क़ानूनों में धर्म-परिवर्तन करने वालों के लिए सज़ा का प्रावधान है, जिसमें जेल भी शामिल है; और कुछ क़ानून में तो धर्म-परिवर्तन करने वाले व्यक्ति को दंडित भी किया जाता है और उसके द्वारा किए गए धर्म-परिवर्तन को रद्द भी कर दिया जाता है.
पिछले बारह वर्षों से देश में मोदी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार है. इस दौरान भाजपा-शासित कई राज्य सरकारों ने न केवल अपने धर्म-परिवर्तन-विरोधी क़ानूनों को और अधिक कठोर बनाया है, बल्कि इससे भी कहीं अधिक गंभीर बात यह है कि इन क़ानूनों को एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया गया है, ताकि मुस्लिम पुरुषों और हिंदू महिलाओं के बीच होने वाली शादियों-और यहां तक कि लिव-इन संबंधों-को प्रभावी ढंग से हतोत्साहित किया जा सके और उन्हें अपराध की श्रेणी में रखा जा सके.
ये क़ानून विशेष रूप से उस मुस्लिम पुरुष को अपराधी मानते हैं जो किसी हिंदू महिला के साथ वैवाहिक बंधन में बंधना चाहता है.
झारखंड राज्य विधानसभा द्वारा 2017 में पारित ‘धर्म की स्वतंत्रता अधिनियम’ में धर्म परिवर्तन करने वाले व्यक्ति के लिए कारावास और जुर्माने का प्रावधान किया गया है. पहली बार इस अधिनियम के तहत आने वाले अपराधों को ग़ैर-ज़मानती बनाया गया’ इन नियमों के अनुसार, ज़िला मजिस्ट्रेट के लिए धार्मिक संस्थानों का रजिस्टर रखना अनिवार्य है. साथ ही, उन्हें उन संस्थानों का निरीक्षण करने तथा उन लोगों के रिकॉर्ड की जांच करने का अधिकार भी दिया गया, जिन्हें इन संस्थानों से लाभ मिला था.
वर्ष 2018 में उत्तराखंड पहला ऐसा राज्य बना, जिसने विवाह के उद्देश्य से किए जाने वाले धर्म परिवर्तन को अपने वैधानिक प्रतिबंधों के दायरे में शामिल किया. इसके क़ानून में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि, कोई भी व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति का धर्मांतरण नहीं करेगा, न ही ऐसा करने का प्रयास करेगा-चाहे वह प्रत्यक्ष रूप से हो या किसी अन्य माध्यम से-यदि ऐसा करने के लिए ग़लतबयानी, बल प्रयोग, अनुचित प्रभाव, ज़बरदस्ती, प्रलोभन, किसी भी प्रकार के कपटपूर्ण साधनों अथवा विवाह का सहारा लिया गया हो (मैं विवाह पर ज़ोर दे रहा हूं).
इस अधिनियम की शब्दावली को देखने पर ऐसा लगता है कि विवाह के लिए अलग-अलग धर्मों के दो वयस्क अपनी मर्ज़ी से धर्म परिवर्तन नहीं कर सकते, ऐसा करना एक अपराध की श्रेणी में रखा गया है.
हालांकि, नियमों के माध्यम से इस प्रावधान की कठोरता को कुछ हद तक कम किया गया; इन नियमों में यह स्पष्ट किया गया कि ‘एक धर्म को छोड़कर दूसरे धर्म को अपनाने के बाद किया गया विवाह’ केवल तभी अपराध माना जाएगा, यदि वह ‘ग़लतबयानी, बल प्रयोग, ज़बरदस्ती, प्रलोभन अथवा किसी अन्य कपटपूर्ण साधन के ज़रिए से किया गया हो.’
प्रलोभन की परिभाषा का विस्तार
इस क़ानून ने सबूत देने की ज़िम्मेदारी उसी व्यक्ति पर डाल दी है जिसका धर्म परिवर्तन हुआ है, उसे ही यह साबित करना होगा कि उसका धर्मांतरण क़ानूनी तौर पर सही है. इसने पहली बार न्यूनतम सज़ा भी तय की, इसके लिए एक साल की जेल की सज़ा होगी, अनुसूचित जाति या जनजाति के व्यक्ति के मामले में यह सज़ा बढ़कर दो साल की हो जाएगी.
इस क़ानून में प्रतिबंधित प्रलोभन की परिभाषा का विस्तार करते हुए इसमें ‘किसी भी धार्मिक संस्था द्वारा चलाए जा रहे किसी प्रतिष्ठित स्कूल में मुफ़्त शिक्षा, आसानी से पैसा मिलना, बेहतर जीवन शैली, आध्यात्मिक सुख या अन्य कोई चीज़’ को शामिल किया गया है.
दूसरी ओर, इसने हिंदू धर्म को अपनाने की प्रभावी रूप से छूट दे दी, इस शर्त के साथ कि अगर कोई व्यक्ति अपने पैतृक धर्म में वापस लौटता है, तो इस क़ानून के तहत इसे धर्म परिवर्तन नहीं माना जाएगा.
उत्तर प्रदेश अध्यादेश 2020 (जिसे मार्च 2021 में राज्य विधानसभा ने पास किया था) किसी भी व्यक्ति द्वारा ‘शादी के ज़रिए’ धर्म बदलने को अपराध बनाने के मामले में ज़्यादा स्पष्ट है, चाहे वह धर्म परिवर्तन अपनी मर्ज़ी से किया गया हो या नहीं. इसके अलावा, किसी को धर्म बदलने के लिए मनाने की कोशिश करना भी अपराध घोषित कर दिया गया.
ऐसी शादियों को अदालत द्वारा रद्द घोषित किया जा सकता है’ इस क़ानून में उत्तराखंड के प्रावधान भी शामिल हैं, जैसे कि सबूत जुटाने की ज़िम्मेदारी आरोपी पर डाल देना, अपराधों को ग़ैर-ज़मानती बनाना, न्यूनतम सज़ा तय करना, और किसी व्यक्ति को ‘ठीक पहले वाले धर्म’ में वापस लौटने की छूट देना.
भाजपा-शासित अन्य राज्यों-हिमाचल प्रदेश (2019), मध्य प्रदेश (2021), गुजरात (2021), कर्नाटक (2022), हरियाणा (2022) और महाराष्ट्र (2026)-ने भी मोदी के शासनकाल के दौरान इसी तरह अपने धर्म-परिवर्तन विरोधी क़ानूनों में संशोधन किए’ झारखंड को छोड़कर बाक़ी सभी राज्यों ने शादी के लिए ग़ैर-क़ानूनी धर्म-परिवर्तन को अपराध बनाया, जिसका मक़सद मुस्लिम पुरुषों द्वारा दूसरे धर्मों की महिलाओं से की जाने वाली शादियों को प्रभावी ढंग से अपराध घोषित करना था’ सज़ाएं ज़्यादा सख़्त थीं, न्यूनतम सज़ा तय की गई थीं, और अपराध को ग़ैर-ज़मानती बना दिया गया था.
महाराष्ट्र का क़ानून एक और नया प्रावधान पेश करता है जो संघ के वैचारिक एजेंडे और ‘लव जिहाद’ की उसकी मनगढ़ंत कहानी को आगे बढ़ाता है. इसमें यह तय किया गया है कि यदि किसी शादी या ‘शादी जैसे रिश्ते’ से कोई बच्चा पैदा होता है, और वह शादी ग़ैर-क़ानूनी है, तो क़ानून के अनुसार उस बच्चे का धर्म वही होगा जो शादी और धर्म-परिवर्तन से पहले उसकी मां का था.
ऐसा लगता है कि यह उस झूठी अफ़वाह का जवाब देने के लिए किया गया है कि मुस्लिम पुरुष हिंदू महिलाओं से शादी इसलिए करते हैं ताकि उनके ज़रिए अधिक संख्या में मुस्लिम बच्चे पैदा कर सकें. इस क़ानून के तहत, ऐसी शादी से पैदा होने वाले बच्चों की पहचान हिंदू होगी.
पहले के क़ानूनों में धर्म-परिवर्तन के बाद अधिकारियों को सिर्फ़ सूचना देना ज़रूरी होता था. नए क़ानूनों के तहत पहले से अनुमति लेना, जानकारी को सार्वजनिक करना और पुलिस की जांच करवाना ज़रूरी है. भारत में अलग-अलग धर्मों के लोगों के बीच होने वाली शादियों की सामाजिक हक़ीक़त को देखते हुए, यह क़ानून दोनों परिवारों और हिंदुत्ववादी गुंडों को यह मौक़ा देता है कि वे हिंसक तरीक़े से ऐसी शादियों को रोक सकें या उन जोड़ों को सज़ा दे सकें.
ये सभी बातें सुप्रीम कोर्ट के उन निर्देशों का उल्लंघन करती हैं, जिनमें कोर्ट ने अपने कई फ़ैसलों में दो वयस्क लोगों को आपसी सहमति से शादी करने या साथ रहने के अधिकार को सही ठहराया है. ‘लता सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य’ मामले में, जहां अलग-अलग जाति के एक जोड़े ने पुलिस तथा अपने रिश्तेदारों द्वारा परेशान किए जाने के बाद सुरक्षा की मांग की थी, सुप्रीम कोर्ट ने यह साफ़ किया था कि ‘एक बार कोई व्यक्ति बालिग़ हो जाता है, तो वह अपनी मर्ज़ी से किसी से भी शादी कर सकता है.
‘एस. ख़ुशबू बनाम कनियाम्मल’ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह फ़ैसला दिया था कि ‘अलग-अलग लिंग के दो बालिग़ लोगों का आपसी सहमति से ‘लिव-इन रिलेशनशिप’ में रहना कोई अपराध नहीं है’ ‘शफ़ीन जहां बनाम अशोकन केएम’ (हदिया मामला) में सुप्रीम कोर्ट ने एक लड़की द्वारा अपनी पसंद के व्यक्ति को चुनने के अधिकार को उसकी निजी आज़ादी और व्यक्तिगत अधिकार का हिस्सा मानते हुए यह घोषणा की थी कि, ‘शादी के भीतर हो या बाहर, हर व्यक्ति को अपना जीवनसाथी चुनने का पूरा अधिकार है.
भारत की सबसे बड़ी अदालत ने अपने फ़ैसले में बार-बार अलग-अलग धर्मों और जातियों के लोगों के द्वारा अपनी मर्ज़ी से जीवनसाथी चुनने के अधिकार की पुष्टि की है (बशर्ते कि पार्टनर अलग-अलग लिंग के हों). हालांकि, सच्चाई यह है कि अक्सर पुलिस और कभी-कभी निचली अदालतें भी इन अधिकारों को बनाए रखने में नाकाम रहती हैं या सीधे तौर पर मना कर देती हैं, ख़ासकर तब जब मामला दो अलग धर्मों का हो.
अब तक धर्मांतरण विरोधी क़ानूनों ने लिव-इन संबंधों को विनियमित करने की कोशिश नहीं की है. लेकिन 2024 में भाजपा-शासित उत्तराखंड सरकार द्वारा पेश किया गया ‘यूनिफॉर्म सिविल कोड’ वयस्कों द्वारा पार्टनर चुनने के उनके निजी अधिकार के लिए एक चिंताजनक घटनाक्रम है. इस कोड ने लिव-इन कपल के लिए राज्य के अधिकारियों के पास रजिस्ट्रेशन कराना अनिवार्य कर दिया है; ऐसा न करने पर उन्हें जेल हो सकती है.
हाल ही में ‘किरण रावत बनाम उत्तर प्रदेश राज्य’ के मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने लिव-इन संबंध में रह रहे अलग-अलग धर्मों के एक कपल को पुलिस सुरक्षा देने से मना कर दिया’ अदालत ने विवादित रूप से यह टिप्पणी की, ‘सुप्रीम कोर्ट केवल एक सामाजिक वास्तविकता को स्वीकार कर रहा है और उसका भारतीय पारिवारिक जीवन की बुनावट को तोड़ने का कोई इरादा नहीं है.
इन क़ानूनों और उनके लागू होने के सामाजिक प्रभाव
भारत के प्रमुख लॉ स्कूल, नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, बेंगलुरु की प्रोफ़ेसर सरसू एस्थर थॉमस का कहना है कि हाल ही में जो कई धर्मांतरण-विरोधी क़ानून आए उसका नतीजा यह हुआ है कि अलग-अलग धर्मों के जोड़ों को अब न केवल सामाजिक विरोध का, बल्कि उससे भी ज़्यादा, सरकार का डर सताने लगा है’ पहले ऐसा होता था कि जोड़ा अगर दो अलग लिंग का हो और बालिग़ हो तो शादी को व्यापक रूप से स्वीकार कर लिया जाता था; और अगर किसी जोड़े पर हिंसा होती थी या उन्हें जबरन अलग किया जा रहा होता था, तो उन्हें क़ानूनी सुरक्षा भी दी जाती थी. आज, इन नए क़ानूनों के आने के बाद, कई राज्यों में पारिवारिक अदालतें अलग-अलग धर्मों के बीच हुई शादी को अमान्य घोषित कर सकती हैं- भले ही वह जोड़ा बालिग़ हो और अपनी मर्ज़ी से एक-दूसरे के साथ रहना चाहता हो.’
थॉमस सवाल करती हैं, ‘अगर ‘शादियां अब सुरक्षित नहीं रहीं’, तो फिर उन लोगों का क्या होगा जो शादीशुदा नहीं हैं और ‘लिव-इन रिलेशनशिप’ में रह रहे हैं?’
इन क़ानूनों के पारित होने और लागू होने से अलग-अलग धर्मों के जोड़ों पर बहुत ही बुरा और डरावना असर पड़ा है’ ऐसे रिश्ते अब और भी ज़्यादा ख़तरनाक हो गए हैं, और इन क़ानूनों ने उन जोड़ों का दम घोंट दिया है जो अपने धर्म और जाति से बाहर शादी करना चाहते हैं, जिसकी वजह से उन्हें डर के साए में, और कभी-कभी तो भगोड़ों की तरह ज़िंदगी बिताने पर मजबूर होना पड़ रहा है’ समस्या सिर्फ़ यह नहीं है कि धर्मांतरण-विरोधी क़ानून अब और भी ज़्यादा सख़्त हो गए हैं, और उन्होंने शादी को धर्मांतरण का एक वैध आधार मानने के बजाय उसे एक ‘अपराध’ बना दिया है.’
असली समस्या तो यह है कि अब सिर्फ़ परिवार और स्थानीय समुदाय ही इन शादियों का विरोध नहीं करते (और कभी-कभी तो हिंसक विरोध भी करते हैं), बल्कि आज के समय में सरकारी अधिकारी भी अक्सर हिंदुत्ववादी गुंडों और शादी का विरोध करने वाले परिवारों के साथ मिलकर काम करते हैं’ वे ज़बरदस्ती ऐसी शादियों को रोकते हैं, पुरुषों को अपराधी घोषित करते हैं, और महिलाओं पर दबाव डालकर उनकी शादी उन्हीं के समुदाय के किसी पुरुष से करवा देते हैं.
पुलिस अधिकारियों तथा स्वयंभू रक्षकों (vigilantes) द्वारा इन क़ानूनों की व्याख्या भी की गई है और इन्हें हथियार के तौर पर इस्तेमाल भी किया गया है.
न्यूज़लॉन्ड्री ने 2022 में ‘हरियाणा ग़ैर-क़ानूनी धर्म परिवर्तन रोकथाम अधिनियम’ के पारित होने के बाद उसके परिणामों की जांच की’ न्यूज़लॉन्ड्री के रिपोर्टरों ने पुलिस अधिकारियों से बात की, जिन्होंने बताया कि इस नए क़ानून के पारित होने के बाद, अलग-अलग धर्मों के जोड़ों के परिवारों और स्वयंभू रक्षकों की ओर से जबरन धर्म परिवर्तन से ‘प्रेरित शिकायतों’ में भारी बढ़ोतरी हुई है. इसी तरह, बेतवा शर्मा और अहमर ख़ान ने भी ज़मीनी स्तर पर ‘उत्तर प्रदेश ग़ैर-क़ानूनी धर्म परिवर्तन अध्यादेश 2020′ के प्रभाव की बारीकी से जांच की.
इन दोनों रिपोर्ट ने एक बेहद डरावनी ज़मीनी हक़ीक़त को उजागर किया है जहां विचारधारा से प्रेरित और स्त्री-विरोधी हिंदुत्ववादी स्वयंभू रक्षक, मुस्लिम पुरुषों से शादी करने का चुनाव करने वाली हिंदू लड़कियों के परिवार, और पुलिस तथा राज्य प्रशासन के बीच साठगांठ साफ़ दिखती है.
शर्मा और ख़ान का कहना है कि भले ही उत्तर प्रदेश में हिंदू महिलाओं और मुस्लिम पुरुषों के बीच शादी पर कोई साफ़ रोक नहीं है, फिर भी “राज्य में हिंदू स्वयंभू रक्षक समूह पुलिस के साथ मिलकर बिना किसी रोक-टोक के ‘लव जिहाद’ की जांच करते हैं, और अक्सर इसके लिए हिंसा और धमकी का सहारा लेते हैं… ये स्वयंभू रक्षक समूह ‘लव जिहाद’ के कथित मामलों की जांच करते रहते हैं, जबकि केंद्र सरकार का साफ़ कहना है कि क़ानून की नज़र में ऐसा कोई अपराध मौजूद ही नहीं है.
ये स्वयंभू रक्षक समूह और पुलिस आम तौर पर एक-दूसरे के साथ मिलकर काम करते हैं’ जैसे ही इन स्वयंभू रक्षक समूहों को किसी अलग-अलग धर्म के जोड़े के रिश्ते के बारे में पता चलता है, वे तुरंत पुलिस को बुलाते हैं और उन जोड़ों के मोबाइल फ़ोन पर नज़र रखने, उन्हें डराने-धमकाने और उनसे पूछताछ करने में पुलिस की मदद लेते हैं.
न्यूज़लॉन्ड्री ने एक तनावपूर्ण मामले की जांच की जिसमें 22 साल की कामकाजी महिला संस्कृति शुक्ला ने 2023 में जावेद ख़ान से शादी करने से पहले इस्लाम अपना लिया था’ उसने अपने पिता को यह समझाने की कोशिश की कि वह अपने पति से प्यार करती है, जिसे उसने अपनी मर्ज़ी से चुना था. लेकिन शादी के दो महीने बाद उसके पिता ने नए धर्मांतरण विरोधी क़ानून के तहत जावेद के ख़िलाफ़ ज़बरदस्ती धर्मांतरण की शिकायत दर्ज करा दी. बजरंग दल और बिट्टू बजरंगी के नेतृत्व वाली गौ रक्षा बजरंग फ़ोर्स जैसे हिंदुत्ववादी गुंडों की धमकियों के कारण इस जोड़े को भागकर कहीं छिपना पड़ा.
एक और दुखद घटना हुई’ एक हिंदू महिला ट्विंकल ने अपने परिवार के विरोध के बावजूद एक मुस्लिम युवक शाहरुख़ से शादी कर ली, लेकिन तीन साल पहले उसके घर में उसका शव पंखे से लटका हुआ मिला.
आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में नहीं, बल्कि धर्मांतरण के आरोप में शाहरुख़ को गिरफ़्तार किया गया था. ट्विंकल का परिवार बिट्टू बजरंगी जैसे हिंदुत्ववादी स्वयंभू रक्षकों को इस बात का श्रेय देता है कि उनकी वजह से ‘नए क़ानूनों के तहत’ ये मामला दर्ज हो पाया. ट्विंकल के भाई सुमित ने पत्रकारों से कहा, ‘अगर बिट्टू हमारे साथ नहीं होता, तो शायद हम एफआईआर भी दर्ज नहीं करवा पाते.’
ये स्वयंभू रक्षक इस बात को मानते हैं कि वे महिलाओं को डराते-धमकाते हैं, जिसे वे ‘काउंसलिंग’ कहते हैं. इसमें महिला के साथ शारीरिक हिंसा करना, उसके चेहरे पर तेज़ाब फेंकने और उसकी नाक काट देने की धमकियां देना, और उसके मुस्लिम प्रेमी का पुलिस द्वारा ‘एनकाउंटर’ करवा देना शामिल है’ ग़ैर-क़ानूनी हत्या के लिए ही एनकाउंटर जैसे शब्द का प्रयोग किया जाता है.
माता-पिता को सलाह दी जाती है कि वे अपनी बेटी को भावनात्मक रूप से ब्लैकमेल करें; इसके लिए वे बेहोश होने का नाटक करें, दिल का दौरा पड़ने का बहाना करें, या ख़ुद ज़हर खा लेने की धमकियां दें’ एक बार जब लड़की दबाव में आकर मान जाती है, तो वे पूरी ज़िम्मेदारी के साथ उसकी शादी अपने किसी स्वयंसेवक से तय करवाने में जुट जाते हैं’ इसकेलिए वे लड़की की तस्वीर और उसका बायोडेटा अपने हिंदुत्ववादी वाट्सऐप ग्रुप्स में डाले देते हैं.
जैसा कि पहले चर्चा की गई है कि ‘विशेष विवाह अधिनियम’ के तहत शादी से पहले सार्वजनिक सूचना देने की जो शर्त है, वह ऐसे जोड़ों को ख़तरे में डाल देती है. न्यूज़लॉन्ड्री ने ऐसे कई मामलों की रिपोर्टिंग की है कि जब कोई मुस्लिम पुरुष और हिंदू महिला आपस में शादी करना चाहते हैं, तो इस सार्वजनिक सूचना का इस्तेमाल हिंदुत्ववादी भीड़ और उनके परिवारों के वे सदस्य करते हैं जो इस शादी के ख़िलाफ़ होते हैं.
वे इस सूचना का इस्तेमाल करके शादी को रुकवा देते हैं और उस जोड़े को ज़बरदस्ती अलग कर देते हैं. उदाहरण के तौर पर, एक रिपोर्ट में अब्दुल और ऋषिका नाम के एक जोड़े की दुर्दशा का वर्णन किया गया है, जिन्होंने पुणे में विवाह रजिस्ट्रार के पास अपनी शादी के लिए आवेदन दिया था. कुछ ही हफ़्तों के भीतर हिंदुत्ववादी संगठनों के लोग नासिक स्थित ऋषिका के घर पहुंच गए और उसके परिवार वालों को यह चेतावनी दी कि चूंकि अब्दुल एक मुस्लिम है, इसलिए उसके ‘इरादे ठीक नहीं हैं.

उन्होंने इस जोड़े को भी ख़ूब परेशान किया, जो पिछले चार सालों से एक-दूसरे के साथ थे’ किसी भी तरह की मुसीबत से बचने के लिए ऋषिका के परिवार ने शादी को रद्द कर दिया, हालांकि पहले वे इस शादी के लिए अपनी सहमति दे चुके थे.
उन्होंने पुलिस से मदद मांगी, लेकिन उसका कोई फ़ायदा नहीं हुआ’ लेकिन वह जोड़ा अपनी बात पर अड़ा रहा और वे किसी दूसरे रजिस्ट्रार के पास चले गए’ आख़िरकार शादी हो जाने के बाद भी उन्हें लगातार परेशान किया जा रहा है’ अब उन्हें यह महसूस होता है कि वे तभी सुरक्षित रह पाएंगे जब वे किसी दूसरे देश में जाकर बस जाएं.
‘पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज़’ की सदस्य और वकील लारा जेसानी ने कहा, ‘यह नोटिस पूरी तरह से नियमों का उल्लंघन करने वाला प्रावधान है. वयस्कों को अपनी निजी पसंद के लिए इतनी कड़ी जांच से क्यों गुज़रना चाहिए?’
उन्होंने आगे कहा, ‘यह कोई इत्तेफ़ाक़ नहीं है कि इस प्रावधान का दुरुपयोग हो रहा है’ शादी करने वाले जोड़े को शादी से एक महीना पहले बताना पड़ता है कि वे शादी करने जा रहे हैं, तो इससे दक्षिणपंथी समूहों को भी जोड़े को अलग करने के लिए एक महीने का समय मिल जाता है. केरल सरकार ने इन नोटिसों को ऑनलाइन अपलोड कर दिया है.’
‘राइट टू लव’ के सह-संस्थापक अभिजीत के. ने कहा, ‘अब जब ये नोटिस ऑनलाइन उपलब्ध हैं, तो आप घर बैठे ही पता लगा सकते हैं कि कितनी अंतरधार्मिक शादियां हो रही हैं’ निजता का अधिकार ख़त्म हो गया है, क्योंकि अब किसी भी व्यक्ति को लोगों की जानकारी मिल सकती है.’
यह बात ध्यान देने योग्य है कि व्यवहारिक रूप से सभी अंतरधार्मिक शादियों को इस भड़काऊ सांप्रदायिक दुष्प्रचार का निशाना नहीं बनाया जाता है. यदि कोई हिंदू पुरुष किसी मुस्लिम महिला से प्रेम करता है और उससे शादी करता है तो इसे वर्जित नहीं माना जाता है.
उत्तर प्रदेश में पुलिस मुस्लिम पुरुषों और हिंदू महिलाओं के बीच प्रेम और विवाह के मामलों की जांच अपराध के तौर पर कर रही है, और यदि आरोप सिद्ध हो जाते हैं, तो कड़ी जेल की सज़ा दी जाती है’ लेकिन, किसी मुस्लिम महिला से शादी करने वाले हिंदू पुरुष को पुलिस सुरक्षा प्रदान की जाती है.
पुलिस तथा स्वयंभू रक्षकों की कार्रवाई
इससे ‘लव जिहाद’ से जुड़ी बहस और पुलिस तथा स्वयंभू रक्षकों की कार्रवाई, दोनों ही और ज़्यादा पेचीदा हो जाती हैं. ‘लव जिहाद’ क़ानूनों के क्रियान्वयन की समीक्षा करने से पता चलता है कि असल में इनका इस्तेमाल चुनिंदा तरीक़े से सिर्फ़ उन मुस्लिम पुरुषों पर किया जाता है जो अपने धर्म से बाहर शादी करते हैं (या लिव-इन रिलेशनशिप में रहते हैं), जबकि उन हिंदू पुरुषों पर नहीं, जो अपने धर्म से बाहर किसी से प्यार करते हैं और शादी करते हैं.
यह क़ानून इस तरह का कोई साफ़-साफ़ फ़र्क़ नहीं करता, सिवाय इसके कि-जैसा कि उत्तर प्रदेश में है- यह किसी व्यक्ति को उस धर्म में वापस जाने का विकल्प देता है जिसे छोड़कर वह आया है. चूंकि ज़्यादातर भारतीय मुसलमानों के बारे में यह माना जाता है कि उनके पूर्वजों ने कभी-न-कभी हिंदू धर्म को छोड़कर इस्लाम अपनाया था, इसलिए असल में क़ानून की यह धारा इस्लाम से हिंदू धर्म में वापसी को इस क़ानून के दायरे से बाहर रखती है.
लेकिन असल में, अगर कोई मुस्लिम पुरुष किसी हिंदू महिला से शादी करता है, तो वह हिंदू ‘संपत्ति’ चुरा रहा होता है और इसलिए वह सज़ा का हक़दार होता है, उसके साथ हिंसा की जा सकती है और उसे जान से भी मारा जा सकता है’ दूसरी ओर, जब कोई हिंदू पुरुष किसी मुस्लिम महिला से शादी करता है, तो वह हिंदू ‘संपत्ति’ बढ़ा रहा होता है और यह जश्न मनाने वाली बात है.
बताया जाता है कि पुलिस ऐसी शादियों का स्वागत करती है, उन्हें सुरक्षा देती है और यहां तक कि शादी करने में मदद भी करती है! कभी-कभी, हिंदुत्व के स्वयंभू रक्षक समूह बिना बुलाए ही ऐसी शादियों में पहुंच जाते हैं, जहां वे अश्लील तरीक़े से नाचते हैं और ज़ोर-ज़ोर से संगीत बजाते हैं.
अब वह समय आ गया है जब एक ऐसा आंदोलन शुरू किया जाए जो हमारी संविधान सभा की संस्थापक माताओं- हंसा मेहता और राजकुमारी अमृत कौर-के काम को पूरा करे, जो जीवनसाथी चुनने के अधिकार को सभी महिलाओं के मौलिक अधिकार के तौर पर स्थापित करे, और जो परिवारों, समुदायों, राजनीतिक दलों और सरकार की कट्टरता के ख़िलाफ़ और इस अधिकार का पालन कराने के लिए आवाज़ उठाए.
(हर्ष मंदर सामाजिक कार्यकर्ता और लेखक हैं.)
(शोध सहायता के लिए सुमैय्या फ़ातिमा और सैयद रूबील हैदर ज़ैदी का आभार.)
(मूल अंग्रेज़ी से ज़फ़र इक़बाल द्वारा अनूदित. ज़फ़र भागलपुर में हैंडलूम बुनकरों की ‘कोलिका’ नामक संस्था से जुड़े हैं.)
