नई दिल्ली: लैंगिक समानता को बढ़ावा देने वाले एक अहम फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (2 जून) को कहा कि अगर कोई बेटी किसी कल्याणकारी योजना के लिए अन्य सभी शर्तों को पूरा करती है, तो उसकी शादीशुदा स्थिति को आधार बनाकर उसे उस योजना के फ़ायदों से वंचित नहीं किया जा सकता है.
डेक्कन हेराल्ड की ख़बर के मुताबिक, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने कहा कि यह मानना कि शादीशुदा बेटी अपने माता-पिता के परिवार का हिस्सा नहीं रहती या अपने माता-पिता पर उसकी निर्भरता खत्म हो जाती है, ‘संवैधानिक रूप से गलत’ है.
इस संबंध में पीठ ने कहा, ‘शादी न तो बेटी और उसके माता-पिता के परिवार के बीच के बंधन को खत्म करती है, और न ही इस परिवार पर निर्भरता न होने को लेकर कोई वैध आधार देती है.’
इसमें यह बात नोट की गई कि आज की सामाजिक हकीकत में कई शादीशुदा बेटियां अपने माता-पिता के साथ ही रहती हैं, उनकी देखभाल करती हैं, या उन पर ही निर्भर रहती हैं.
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के अमेठी की रहने वाली एक महिलाकी आवंटन अनुकंपा की अपील मंज़ूर कर ली. दरअसल, महिला को उनकी मां की मौत के बाद सिर्फ़ इस आधार पर कि वह शादीशुदा हैं, अनुकंपा के तहत ‘उचित मूल्य की दुकान’ (राशन की दुकान) का लाइसेंस देने से मना कर दिया गया था.
साल 2013 में उक्त दुकान महिला की माता को आवंटित की गई थी. मार्च 2024 में उनकी मौत के बाद इन महिला- जो अपनी मां को दुकान चलाने में मदद करती थी और अपनी चार बहनों (जिनमें से एक दृष्टिबाधित है) का सहारा बनने वाली अकेली कमाने वाली सदस्य थी, ने दुकान के आवंटन के लिए आवेदन किया.
अधिकारियों और इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उनकी अर्जी इस आधार पर खारिज कर दी थी कि संबंधित सरकारी आदेश के तहत शादीशुदा बेटी ‘परिवार’ की परिभाषा में नहीं आती.
हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए शीर्ष अदालत ने अनुकंपा आवंटन के लिए ‘परिवार’ की परिभाषा से विवाहित बेटियों को बाहर रखने को असंवैधानिक बताया.
इसमें कहा गया कि इस तरह का बहिष्कार लैंगिक रूढ़ियों पर आधारित था और इसका योजना के उद्देश्य से कोई तार्किक संबंध नहीं था.
उल्लेखनीय है कि अदालत के इस फ़ैसले के पूरे देश में महिलाओं की कल्याणकारी योजनाओं तक पहुंच पर दूरगामी असर पड़ने की उम्मीद है, जिससे यह बात और मज़बूत होती है कि रूढ़ीवादी लिंग-आधारित मान्यताओं के आधार पर किसी को भी लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता.
बेंच ने इस बात पर ज़ोर दिया कि निर्भरता को एक तथ्यात्मक प्रश्न के रूप में निर्धारित किया जाना चाहिए, न कि केवल वैवाहिक स्थिति के आधार पर मान लिया जाना चाहिए.
इसमें यह भी बताया गया कि कुछ बेटे भी परिवार पर निर्भर नहीं हो सकते हैं, वहीं कई शादीशुदा बेटियां अपने माता-पिता को आर्थिक मदद देना जारी रखती हैं.
इस संबंध में अदालत ने टिप्पणी की, ‘आश्रित कोटे के तहत आवंटन का उद्देश्य किसी दिवंगत डीलर के परिवार को तत्काल सहायता प्रदान करना है, जो आर्थिक कठिनाई का सामना कर रहा हो. इससे जुड़े मुख्य पहलू हैं: निर्भरता, आर्थिक ज़रूरत, निवास स्थान, और आवेदक की डीलरशिप से जुड़ी ज़िम्मेदारियों को निभाने की क्षमता. ‘वैवाहिक स्थिति का इनमें से किसी भी बात से कोई तार्किक संबंध नहीं है.’
बेंच ने आगे कहा कि यह धारणा कि शादी के बाद बेटी दूसरे परिवार का हिस्सा बन जाती है और अपने मायके से रिश्ते तोड़ लेती है, लैंगिक असमानता की उस पुरानी सोच को बढ़ावा देती है, जिन्हें संविधान खत्म करना चाहता है.
अदालत ने इस दलील को भी खारिज कर दिया कि शादीशुदा बेटियां स्थानीय निवास की शर्त पूरी नहीं कर सकतीं. अदालत ने कहा कि निवास एक स्वतंत्र पात्रता मानदंड है, जिसकी जांच हर मामले के तथ्यों के आधार पर की जानी चाहिए, और इसके आधार पर सभी को एक साथ बाहर करना सही नहीं ठहराया जा सकता.
आवश्यक वस्तुएं (बिक्री और वितरण नियंत्रण का विनियमन) आदेश, 2016 के खंड 2(पी) का हवाला देते हुए, बेंच ने फैसला सुनाया कि ‘बेटी’ शब्द में शादीशुदा बेटी को भी शामिल माना जाना चाहिए, बशर्ते वह यह साबित कर दे कि वह मृतक डीलर पर निर्भर थी और स्थानीय निवास सहित अन्य सभी पात्रता शर्तें पूरी करती है.
अदालत ने सक्षम प्राधिकारी को निर्देश दिया कि वह चार हफ़्तों के भीतर याची महिला के पक्ष में आवंटन आदेश जारी करे.
अदालत ने इस मुद्दे पर इलाहाबाद, बॉम्बे, कर्नाटक और कलकत्ता हाईकोर्ट द्वारा अपनाए गए प्रगतिशील विचारों से सहमति जताई और इसके विपरीत दिए गए फैसलों को रद्द कर दिया.
