सही है कि देश में युवाओं की संख्या करोड़ों में है और उनमें से कुछ करोड़ नीट आदि परीक्षाओं में अपना भाग्य आज़माते हैं- ये परीक्षाएं तो लगभग नियमित रूप से आज के निज़ाम के अंतर्गत पेपर लीक आदि होने के कारण विफल हो रही हैं.
वे उस अक्षमता, बेईमानी, भ्रष्टाचार, लापरवाही का हिस्सा हैं जिसके कारण पूंजी कुछ हाथों में सिमट रही है, पुल और सड़कें उद्घाटन के बाद टूट और धंस रहे हैं, करोड़ों बच्चे स्कूलों से बाहर हैं, सरकारी स्कूल हज़ारों की संख्या में बंद किए जा रहे हैं, बेरोज़गारी ऐतिहासिक रूप से चरम पर है, न्यायालयों-संवैधानिक अधिकरणों से राम मंदिर तक हर जगह चोरी-चकारी हो रही है. एक आज्ञाकारी अधचोर समाज बनाना शुरू हो चुका है.
जंतर-मंतर दिल्ली और भारत के अनेक शहरों में कुछ लाख युवा अहिंसक प्रदर्शन कर रहे थे और प्रायः हर जगह पुलिस और अन्य सुरक्षा दल उन पर भौतिक हिंसा कर रही थी. छात्र और युवा पीटे-मारे जाने के बावजूद अपने मोर्चे पर डटे हुए थे और उनकी संख्या हर रोज़, सत्ता और पुलिस द्वारा फैलाए जा रहे डर के बावजूद, लगातार बढ़ रही है.
सत्ता अपनी जवाबदेही से मुकर रही थी पर उस पर दबाव बढ़ रहा था. देश के मुख्य न्यायाधीश ने पुलिस ज़्यादतियों का वीडियो देखने और इस मुद्दे पर ध्यान देने से साफ़ इनकार कर दिया था. लगता यह है कि भले उनका अंतिम राजनीतिक लक्ष्य इस मुक़ाम पर स्पष्ट न हो, युवा दशकों बाद अपनी सच्ची नागरिकता और उसकी ज़िम्मेदारियों को पहचान कर प्रतिरोध कर रहे थे और उसे पुलसिया डंडेबाज़ी और हिंसा से दबाया या समाप्त नहीं किया जा सका.
हर आततायी शासक या संगठन को यह आत्मविश्वास होता है कि क्रूरता-हिंसा-घृणा-झूठ से वे अपराजेय रहेंगे. इस युवा प्रतिरोध ने यह साबित कर दिया है कि वे वेध्य हैं. नागरिकों के और वर्ग देर-सबेर सत्ता से हिसाब मांगेंगे और जवाबदेही पर इसरार करेंगे. उन्हें भी यह प्रतिरोध सिखा रहा है कि हम सबका, संविधान और लोकतंत्र का भविष्य ख़तरे में है और अगर व्यापक नागरिक उन्हें नहीं बचाएंगे तो हम अपने भारतीय होने, एक महान परंपरा का उत्ताधिकारी होने, एक उजली और प्रश्नवाचक भारतीयता का हिस्सा होने का सारा अर्थ गंवा देंगे.
बड़े परिवर्तनों के पीछे हमेशा युवा रहे हैं. आज वे ही हमें ऐसे किसी बड़े परिवर्तन की ओर ठेल रहे हैं. सत्ता उनकी आवाज़ कितनी ही क्यों न दबाए, हम नागरिक उस आवाज़ को, उसमें जो आह्वान है सकर्मकता का, उसे अनसुना नहीं कर सकते. यह सकर्मकता उन्हें समर्थन देने तक महदूद नहीं हो सकती. यह व्यापक नागरिक सक्रियता की मांग और अपेक्षा करती है.
भारतीय समाज के और वर्गों के यह जागने और कुछ ठोस और कारगर, अहिंसक और निश्चयात्मक ढंग से, करने का समय है. जैसे निडर और साहसी ये युवा हैं वैसे हम अगर हो सकें तो परिस्थिति बदल सकती है. उन्होंने अपने को डर के घेरे बाहर निकाल लिया है और हमको बताया है कि अगर हम कोशिश करें तो डर से बाहर निकल सकते हैं. एक डराती हुई सत्ता है और हममें से बहुत लोग डरे हुए हैं. इस डर से मुक्त होना आसान नहीं है पर, युवाओं ने दिखाया है, असंभव नहीं है.
हो सकता है कि हमारे त्रस्त, टूटे-बिखरे समय में यह नई सविनय अवज्ञा, एक नए सत्याग्रह की शुरुआत हो. शाहीन बाग़ और किसान आंदोलन के बाद तीसरा गांधी-क्षण, जो अगर हम उसे ठीक से पकड़ और समझ पाएं तो हमें कई तरह के डरों से मुक्त करने आया है- पुलिस और सुरक्षा दलों के, सीबीआई और ईडी, चुनाव आयोग और अन्य संवैधानिक संस्थाओं, पूंछहिलाऊ मीडिया, अभद्र प्रवक्ताओं, बिकाऊ चुने प्रतिनिधियों, चमकते-दमकते बड़ी पूंजी के अश्लील प्रदर्शनों, मंदिर-मस्जिद आदि के पक्षपाती डरों से मुक्ति और उनके विरुद्ध सत्याग्रह करने की प्रेरणा देनेवाला क्षण. निर्भय, लोकतांत्रिक, नैतिक, स्वतंत्रता-समता-न्याय-बंधुता में अपनी आस्था का सत्यापन करने का क्षण.
‘महाभारत’ में शरशय्या पर लेटे भीष्म पितामह ने युधिष्ठर और दुर्योधन के प्रश्न पूछने पर कि राजधर्म क्या है, यह बताया था कि राजा का कर्तव्य है कि वह अपनी प्रजा को हर प्रकार के भय से मुक्त करे और रखे.
भारत में, इस समय, राजा नहीं युवा आंदोलनकारियों ने यानी प्रजा के ही एक हिस्से ने प्रजा को भयमुक्त करने का काम किया है. अब भयमुक्ति राजधर्म नहीं, प्रजाधर्म है.
असग़र से मिले लेकिन…
यह बात अब लगभग सत्तर बरस पहले की है. सागर में हम कुछ मित्र मिलकर ‘समवेत’ नाम से एक पुस्तक-पत्रिका निकाल रहे थे. उसके दूसरे और अंतिम अंक में शमशेर बहादुर सिंह का एक लेख प्रकाशित हुआ ‘लेखक के चारों ओर’ शीर्षक से जिसमें उन्होंने उर्दू कविता की एक पंक्ति उद्धृत की: ‘असग़र से मिले लेकिन असग़र को नहीं देखा’.
इस अधशेर का इस्तेमाल में कई बार याद में कभी साहित्य, कभी शास्त्रीय संगीत, कभी चित्रकला आदि के संदर्भ में करता रहा हूं. उसका बचा अधशेर यों है: ‘अशआर में सुनते हैं कुछ कुछ वो नुमायां है’.
यह पूरा शेर मुझे हाल ही में प्रकाशित सुषमा भटनागर की पुस्तक ‘सब तर्ज़े-नज़र है’ में मिला जो 90 साल पहले दिवंगत असग़र गोंडवी का देवनागरी में समग्र ग़ज़ल-संग्रह है और जिसे हंस प्रकाशन दिल्ली ने प्रकाशित किया है. हिंदी में उर्दू के इस बड़े शायर की सारी ग़ज़लों का आना एक उल्लेखनीय घटना है.
यह जानना दिलचस्प है कि आलोचक मजनूं गोरखपुरी ने कहा कि ‘हमको शरीफ़ इंसान बनाने की जैसी ग़ैर-शरई (धर्मशास्त्र से अलग) कोशिश असग़र ने अपनी शायरी में की है शायद अर्से जदीद (आधुनिक काल) का कोई दूसरा शायर नहीं कर सका’.
तो दूसरी ओर फ़िराक गोरखपुरी ने उन्हें सूफ़ी अधिक, शायर कम बताकर उनकी लंबी चली दुर्व्याख्या की शुरुआत की.
असग़र के यहां, दरअसल, रूमान और रूहानियत की बीच जो द्वैत है वह ध्वस्त ढह जाता है. वे अगर सूफ़ी हैं तो उतने ही शायर भी. कुछ दिनों पहले असग़र की शायरी के कई पहलुओं पर उर्दू विशेषज्ञों ने गहराई से विचार-विमर्श किया. यह प्रभाव पड़ा कि उर्दू में अपनी अधिक समावेशी और बहुल विरासत की शिनाख़्त करने की कोशिश होती रहती है.
असग़र गोंडवी के कुछ अशआर जो ध्यान में आए यों हैं:
सुनता हूं बड़े शौक़ से अफ़साना-ए-हस्ती
कुछ ख़्वाब है कुछ अस्ल है कुछ तर्ज़े अदा है
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शेवा-ए-मंसूर था अह्ले-नज़र पर भी गिरां
फिर भी किस हसरत से सब दार-ओ-रसन देखा किए
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बहुत लतीफ़ इशारे थे चश्मे-साक़ी के
न मैं हुआ कभी बेखुद, न होशियार हुआ
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जिस पे मेरी जुस्तुजू ने डाल रखे थे हिजाब
बे-खुदी ने अब उसे महसूस-ओ-उर्यां कर दिया
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सह्न-हरम नहीं है, ये कू-ए-बुतां नहीं
अब कुछ न पूछिए कि, कहा हूं कहां नहीं
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तस्लीम मुझको ख़ाना-ए-काबा की मज़िलत
सब कुछ सही, मगर वो तेरा आस्तां नहीं
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ऐ काश मैं हक़ीक़ते-हस्ती न जानता
अब लुत्फ़े-ख़्वाब भी नहीं एहसासे-ख़्वाब में
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यहां मस्तों के सर इल्ज़ामे-हस्ती ही नहीं असग़र
फिर उसके बाद हर इल्ज़ाम बे-बुनियाद होता है
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सुना करता हूं रातों को बराबर नारा-ए-मस्ती
तेरी आवाज़ है या खुद मेरी आवाज़ है साक़ी
(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)
