‘हिंदूविरोधी’ छवि से पीछा छुड़ाने के फेर में ‘सॉफ्ट’ होना सपा को कितना रास आएगा?

बीते दिनों अयोध्या में ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के पहुंचने पर सपा के नेता सभा-समारोहों में उत्साह से भाग लेते दिखे, उससे पहले पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने लखनऊ में शंकराचार्य से मिलने के बाद एक्स पर 'जो सनातन है, वही समाजवाद है' लिखा था. ये सब घटनाक्रम मिलकर इस धारणा को बल दे रहे हैं कि आगामी चुनाव से पहले अखिलेश भाजपा द्वारा बनाई पार्टी की 'हिंदूविरोधी' छवि बदल देना चाहते हैं.

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जुलाई के पहले सप्ताह में द्वारका शारदा पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के साथ सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव. (फोटो साभार: समाजवादी पार्टी)

ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती गोमाता को राष्ट्रमाता घोषित करने की मांग को लेकर अपनी बहुप्रचारित ‘गविष्टि’ यात्रा के साथ गत सत्रह जुलाई को अयोध्या पहुंचे तो खूब सुर्खियां बटोरीं. इसके बावजूद कि देश की राजधानी दिल्ली में स्थित जंतर-मंतर पर चल रहे कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन (और सोनम वांगचुक व आइसा के तीन कार्यकर्ताओं के अनशन) ने लोगों की चेतना पर कब्जा कर रखा था.

अलबत्ता, इन सुर्खियों का गविष्टि यात्रा से कहीं बड़ा कारण उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी विपक्षी समाजवादी पार्टी (सपा) द्वारा आश्चर्यजनक रूप से शंकराचार्य के लिए बिछाए गए पलक-पांवड़े थे. प्रदेश के अन्य जिलों में भी उनकी सभाओं व स्वागत समारोहों में सपा के सांसद-विधायक, पदाधिकारी तथा कार्यकर्ता उत्साहपूर्वक भाग लेते दिखे थे.

दरअसल, सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव ने गत 9 जुलाई को प्रदेश की राजधानी लखनऊ में शंकराचार्य से भेंटकर आशीर्वाद लेने और गोसंरक्षण, सनातन परंपराओं व सामाजिक सरोकारों वगैरह पर चर्चा करने के बाद एक्स पर ‘जो सनातन है, वही समाजवाद है‘ जैसी अप्रत्याशित पोस्ट करके जिन सुगबुगाहटों को जन्म दिया था, उनके मद्देनजर गविष्टि यात्रा के अयोध्या पहुंचने को अनेक हल्कों में बड़ी उत्सुकता से देखा जा रहा था.

इस कारण और कि अखिलेश की उक्त पोस्ट के बाद जहां सपा के प्रदेश कार्यालय पर उसी ‘जो सनातन है, वही समाजवाद है’ आशय वाले बड़े-बड़े पोस्टर लगाए गए थे और भारतीय जनता पार्टी ने उन पर बिफरने में कुछ भी उठा नहीं रखा था.

वहीं, खुद को सपा का स्वाभाविक समर्थक या सहयोगी कहने वाले अनेक लोग भौंचक थे. उनको समझ में नहीं आ रहा था (अभी भी नहीं आ रहा) कि यह सपा की समाजवाद की कैसी व्याख्या है, जो कभी भारतीय समाजवाद के पितामह आचार्य नरेंद्र देव और सपा के राजनीतिक आराध्य डॉ. राममनोहर लोहिया की जुबान पर नहीं आई.

डॉ. लोहिया का कहना था कि धर्म और राजनीति के अविवेकी मिलन से दोनों भ्रष्ट होते हैं, इसलिए किसी एक धर्म को किसी एक राजनीति से नहीं मिलाना चाहिए, क्योंकि इसी से सांप्रदायिकता व कट्टरता जन्मती हैं. वे धर्म और राजनीति दोनों की अच्छाइयों को ग्रहण करने तथा बुरे धर्म व बुरी राजनीति दोनों से बचने की बात भी कह गए हैं.

कौन सा सनातन?

इसलिए कई लोग चुटकी लेते हुए यह भी कह रहे थे कि सपा सुप्रीमो अपनी पोस्ट में अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा 1998 में एक साक्षात्कार में कही गई इतनी बात और जोड़ देते कि विभिन्न विचारों और रास्तों को एक साथ जीने की जगह देने वाले हिंदू स्वभाव से ही बहुलतावादी व धर्मनिरपेक्ष हैं और उनके कारण ही देश भी धर्मनिरपेक्ष है तो सारा बखेड़ा ही खत्म हो जाता.

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता सूर्यकांत पांडेय कह रहे थे कि सपा को साफ करना चाहिए कि सनातन से उसका आशय धम्मपद के ‘एस धम्मो सनंतनो’ वाला है, जिसके मुताबिक वैर से वैर कभी शांत नहीं होता, वह केवल अवैर (प्रेम और करुणा) से शांत होता है- यही शाश्वत नियम है या जिसकी आड़ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार पारंपरिक वर्ण व्यवस्था व हिंदू पहचान को राजनीतिक रूप से एकजुट करने में लगा है और नाना प्रकार की समस्याएं खड़ी कर रहा है.

दूसरी ओर कई लोग अखिलेश की पोस्ट को एक समय धर्मनिरपेक्षता की चैंपियन रही उनकी पार्टी की सेकुलर से सनातन की ओर यात्रा का प्रस्थान बिंदु मान रहे थे और उनको उम्मीद थी कि स्वामी की अयोध्या यात्रा में भी इसका अक्स दिखेगा. वे तब सही सिद्ध हुए, जब शंकराचार्य ने एक सपा नेता के राष्ट्रीय राजमार्ग पर अयोध्या के बस स्टेशन के निकट स्थित पैलेस में निर्माणाधीन होटल का शिलान्यास किया और उनके साथ के लोगों ने इस पैलेस में ही रात्रि विश्राम किया.

सुबह नित्यक्रियाओं के बाद और हनुमानगढ़ी, कनक भवन व जानकी मंदिर में पूजा-अर्चना से पहले पत्रकारों से बात करते हुए यह पूछे जाने पर कि वे राम मंदिर क्यों नहीं गए, शंकराचार्य ने उत्तर दिया कि अभी वह मंदिर ‘बना’ ही कहां है, अभी तो वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कार्यालय बना हुआ है, जिस दिन मंदिर बन जाएगा, हम जहां भी रहेंगे, दौड़कर वहां पहुंच जाएंगे.

इस पर कुछ लोग उनके इस उत्तर को भी अखिलेश के इसी प्रश्न के दिए पुराने उत्तर से मिलाकर देखने लगे. पहले अखिलेश कहते थे कि वे भाजपा नेताओं से बड़े हिंदू हैं और जब भगवान राम का बुलावा आएगा, वे राम मंदिर जरूर जाएंगे. लेकिन अब कहते हैं कि इटावा में वे खुद जो केदारेश्वर महादेव मंदिर बनवा रहे हैं, उसका निर्माण पूरा होते ही अयोध्या में राम मंदिर जाएंगे.

लोग यह भी याद करने लगे कि पत्रकार शंकराचार्य से अखिलेश व सपा से उनकी निकटता के बारे में सवाल पूछ लेते हैं तो वे प्रति प्रश्न पूछने लग जाते हैं कि क्या अखिलेश भारतीय और हिंदू नहीं हैं? फिर कहने लगते हैं कि मैं तो चाहता हूं कि सभी पार्टियों के लोग अपनी पहचान के साथ गविष्टि यात्रा में आएं, क्यों नहीं आते वे?

यह पूछने पर कि सितंबर, 2015 में इन्हीं अखिलेश की सरकार द्वारा वाराणसी में कराए गए पुलिस लाठीचार्ज में उन्हें और उनके कई अनुयायियों को चोटें आई थीं, शंकराचार्य कह देते हैं कि 2021 में अखिलेश ने उस लाठीचार्ज के लिए माफी मांग ली थी. फिर गत बारह मार्च को भी वे उनसे मिले थे.

जो भी हो, इस सबसे लोगों में यह सामान्य धारणा बन रही है कि उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव से पहले अखिलेश सपा को इतनी बदल देना चाहते हैं कि भाजपा द्वारा उस पर लगाए जाने वाले ‘राम विरोधी’ या ‘हिंदूविरोधी’ और 1990 में कारसेवकों पर गोली चलवाने की गुनहगार होने के आरोपों की धार पूरी तरह कुंद हो जाए.

किसका अखाड़ा, किसके रेफरी?

राजनीतिक विश्लेषक डॉ. रामबहादुर वर्मा की मानें तो सपा की नई समझदारी यह है कि इस बदलाव से राम मंदिर में चढ़ावा चोरी से भाजपा से मोहभंग के शिकार रामभक्तों के वोट उसकी झोली में आ गिरेंगे और उसकी बल्ले-बल्ले हो जाएगी. लेकिन क्या वाकई ऐसा होगा?

डॉ. वर्मा के अनुसार अभी यह तय होना बाकी है कि इससे भाजपा सपा के बनाए जाल में फंस जाएगी या सपा भाजपा के बनाए जाल में? अखिलेश जिस अखाड़े में उतरकर भाजपा के विरुद्ध ताल ठोंकना चाहते हैं, वह अखाड़ा भी भाजपा का है और रेफरी भी उसी के हैं. इसलिए बहुत कुछ इस पर निर्भर करेगा कि वे एक अच्छे पहलवान की तरह विरोधी के अखाड़े में जाकर उसे चित कर सकते हैं या नहीं.

अभी तक तो देश में एक भी ऐसी मिसाल नहीं है जिसमें हार्ड हिंदुत्व से भिड़ंत में सॉफ्ट हिंदुत्व की जीत हुई हो. तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने एक फरवरी, 1986 को विवादित बाबरी मस्जिद के ताले खुलवाकर विश्व हिंदू परिषद व भारतीय जनता पार्टी के हार्ड हिंदुत्व को पराजित करने के लिए सॉफ्ट हिंदुत्व की जो रणनीति अपनाई थी, उसके धक्के से कांग्रेस आज तक नहीं उबर सकी है.

दूसरी ओर कई अन्य प्रेक्षकों का कहना है कि सपा को इतना तो समझना ही चाहिए कि हिंदुत्व को लेकर भाजपा जिस सीमा तक जा सकती है, वह नहीं जा सकती. इसलिए उसे सोचना चाहिए कि मुस्लिम शासकों के कथित अत्याचारों का शोर मचाकर मुस्लिम आक्रामकता के भय और मुसलमानों के प्रति घृणा व अविश्वास के प्रचार के रास्ते हिंदू वोटों के अपने पक्ष में ध्रुवीकरण की भाजपाई कवायदों से वह कैसे निपटेगी.

भाजपा तो आदर्श चुनाव आचार संहिता की धज्जियां उड़ाकर और घुसपैठियों का भय दिखाकर भी धर्म के आधार पर मतदाताओं का ध्रुवीकरण कर सकती है.

सपा उसकी राह जाएगी तो उसके पीडीए (पिछड़े, दलित, अल्पसंख्यक और आधी आबादी) के नारे और बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर, डॉ. लोहिया, शाहूजी महाराज, ललई सिंह यादव, राम स्वरूप वर्मा जैसे सामाजिक क्रांतिकारियों के रास्ते पर चलकर सामाजिक न्याय पाने की इन तबकों की लालसा का क्या होगा? क्या उनमें सपा के प्रति असंतोष व निराशा नहीं पैदा होगी? फिर तो उसके पैरों के नीचे की जमीन ही सरकने लगेगी.

ख़ासकर तब, जब अभी तक वह पीडीए को ही अपनी असली ताकत बताती रही है और 2024 के लोकसभा चुनाव में उसी को एकजुट करके उसी के बल पर उसने प्रदेश में भाजपा के विजय रथ को रोक दिया था.

खुद से को धोखा या हालात की मांग?

एक बार फिर डॉ. राम बहादुर वर्मा के पास जाएं तो उनके मुताबिक शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद तथा भाजपा समेत समूचा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार एक ही वृक्ष की अलग-अलग शाखाएं हैं और समाजवादी पार्टी का उनके कथित मतभेदों में आश्रय तलाशना अपने आपको ही धोखा देना है.

लेकिन समाजवादी पार्टी के कुछ कार्यकर्ता देश व प्रदेश की जटिल स्थिति के हवाले से अपनी पार्टी के बदलते तेवर का समर्थन कर रहे हैं.

वे कहते हैं कि वर्तमान हालात में मुस्लिम संगठनों और धर्मगुरुओं द्वारा भी गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग की जा रही है. क्योंकि वे समझते हैं कि इससे बहुसंख्यक समाज की आस्था का सम्मान होगा, गाय के नाम पर सांप्रदायिक व धार्मिक तनाव व विवाद समाप्त हो सकेंगे और हिंदू-मुस्लिम समुदायों के बीच सौहार्द बढ़ेगा, जिससे गाय के नाम पर होने वाली बयानबाजी और राजनीति खत्म होकर रह जाएगी.

वे पूछते हैं कि ऐसे में अखिलेश ने लखनऊ में शंकराचार्य से मुलाकात के दौरान 2027 में प्रदेश की सत्ता में आने पर गोमाता को राष्ट्रीय सम्मान दिलाने और गोसेवा करने की बात कहकर भला क्या बुरा किया है. वे आएंगे और अपने कर्मयोग से अधर्मियों व चढ़ावा चोरों के सर्वनाश के साथ गोमाता और प्रदेश दोनों को बचाएंगे.

लेकिन असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन इस सबको भाजपा और सपा के बीच सबसे बड़ा हिंदू बनने के लिए हो रहे मुकाबले के रूप में देख रही है. उसके अनुसार, भाजपा का ‘प्लान-ए’ हिंदुत्व कार्ड खेलना है और सपा भी उसी पिच पर आकर खेल रही है. दोनों पार्टियां इस होड़ में मुस्लिम नेतृत्व को पूरी तरह हाशिए पर धकेलना चाहती हैं.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)