नॉर्थईस्ट डायरी: असम-मेघालय सीमा पर कुलसी बांध परियोजना के ख़िलाफ़ प्रदर्शन, रद्द करने की मांग

इस हफ्ते नॉर्थ ईस्ट डायरी में असम, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश, मिज़ोरम और मेघालय के प्रमुख समाचार.

कुलसी बांध के खिलाफ विरोध प्रदर्शन. (फोटो साभार: असम ट्रिब्यून)

नई दिल्ली: असम के बोको-छायगांव विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले सीमावर्ती गांव उकियाम में प्रस्तावित कुलसी नदी बांध परियोजना के विरोध में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुआ.

असम ट्रिब्यून की रिपोर्ट के मुताबिक, यह आंदोलन असम-मेघालय संयुक्त संरक्षण समिति के नेतृत्व में आयोजित किया गया, जहां प्रदर्शनकारियों ने सरकार की योजना के खिलाफ जोरदार नारेबाजी की.

उकियाम में तीन नदियों के संगम से बनने वाली कुलसी नदी पर असम और मेघालय सरकारें जलविद्युत एवं सिंचाई परियोजना विकसित करने की योजना बना रही हैं. इस परियोजना की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार करने की जिम्मेदारी ब्रह्मपुत्र बोर्ड को सौंपी गई थी.

हालांकि, मेघालय के खासी समुदाय और असम के गारो, बोडो और राभा समुदाय लंबे समय से इस परियोजना का विरोध करते रहे हैं. उनका कहना है कि इससे क्षेत्र पर गंभीर और विनाशकारी प्रभाव पड़ेंगे.

शनिवार को सैकड़ों लोग कुलसी नदी के तट पर एकत्र हुए और अपनी चिंताएं व्यक्त कीं. समिति के अध्यक्ष बिस्वजीत राभा ने कहा कि असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा ने पहले आश्वासन दिया था कि अगर स्थानीय लोग विरोध करेंगे तो कुलसी नदी पर बांध नहीं बनाया जाएगा. लेकिन 30 जुलाई को कथित तौर पर इस परियोजना की डीपीआर असम पावर जेनरेशन कॉरपोरेशन लिमिटेड को सौंप दी गई, जिससे स्थानीय लोगों की आशंकाएं फिर बढ़ गई हैं.

बिस्वजीत राभा ने आरोप लगाया कि दोनों राज्य सरकारें इस बांध के जरिए ‘जल बम’ बनाकर लोगों की जान जोखिम में डालने की साजिश कर रही हैं.

प्रदर्शन में राभा और गारो छात्र संगठनों सहित कई स्थानीय संगठनों ने भी भाग लिया और परियोजना का विरोध किया. अखबार के अनुसार, प्रदर्शन में शामिल एक स्थानीय महिला ने कहा, ‘हमने विकास की उम्मीद में वोट दिया था, लेकिन अब सरकार हमें इस बांध के जरिए डुबोने की योजना बना रही है.’

कामरूप जिला राभा छात्र संघ ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा कि प्रस्तावित बांध स्थल भारत के सबसे अधिक भूकंपीय रूप से सक्रिय क्षेत्रों में स्थित है. संगठन ने चेतावनी दी कि यहां बांध निर्माण से गंभीर और विनाशकारी खतरे पैदा हो सकते हैं.

संघ के अध्यक्ष आनंद राभा ने बताया कि पिछले वर्ष असम और मेघालय के मुख्यमंत्रियों को ज्ञापन सौंपकर परियोजना पर पुनर्विचार करने का अनुरोध किया गया था. हालांकि सरकारों ने स्थानीय लोगों से परामर्श का आश्वासन दिया था, लेकिन अब तक कोई सार्थक संवाद नहीं हुआ है.

संयुक्त संरक्षण समिति के महासचिव अशोक नोंगबक ने हाल ही में ऊपरी असम में आई बाढ़ का उल्लेख करते हुए कहा कि यह घटना बताती है कि इस क्षेत्र के लोग जल संबंधी आपदाओं के प्रति कितने संवेदनशील हैं. डीपीआर सौंपे जाने की खबर से सीमावर्ती गांवों के लोग गहरी चिंता में हैं.

प्रदर्शनकारियों ने सरकारों से कुलसी बांध परियोजना को तत्काल रद्द करने की मांग की. उन्होंने चेतावनी दी कि अगर सरकारें परियोजना को आगे बढ़ाती हैं तो आंदोलन और तेज होगा.

मणिपुर टेप्स: केंद्र का दावा- बीरेन सिंह की ऑडियो क्लिप में छेड़छाड़; कोर्ट ने नागरिक संगठन को रिपोर्ट देखने की अनुमति दी

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (7 अगस्त) को केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह राष्ट्रीय फॉरेंसिक विज्ञान विश्वविद्यालय (एनएफएसयू) की ताजा रिपोर्ट याचिकाकर्ता एनजीओ कुकी ऑर्गनाइजेशन फॉर ह्यूमन राइट्स के साथ साझा करे.

यह मामला मणिपुर के पूर्व मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह की पूर्वोत्तर राज्य में हुई जातीय हिंसा में कथित संलिप्तता की जांच की मांग से जुड़ा है.

द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस संजय कुमार की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष केंद्र और मणिपुर सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि एक व्हिसलब्लोअर द्वारा सार्वजनिक की गई ऑडियो क्लिप की मूल रिकॉर्डिंग की पहली कॉपी में भी छेड़छाड़ के संकेत मिले हैं.

मणिपुर के पूर्व मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह और पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट. (फोटो: पीटीआई और एक्स)

भाटी ने शीर्ष अदालत से याचिका खारिज करने का आग्रह किया.

याचिकाकर्ता एनजीओ की ओर से पेश अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने रिपोर्ट पर कड़ी आपत्ति जताई. उन्होंने कहा कि ट्रुथ लैब्स में ऑडियो क्लिप की गई जांच में बीरेन सिंह की आवाज से 93 प्रतिशत समानता पाई गई थी. रिपोर्ट को गोपनीय रखने पर सहमति जताते हुए भूषण ने कहा कि वह अगली सुनवाई में अदालत के समक्ष रिपोर्ट के निष्कर्षों का जवाब देंगे.

इससे पहले हुई सुनवाई में अदालत ने याचिकाकर्ता एनजीओ को निर्देश दिया था कि वह पूरी ऑडियो रिकॉर्डिंग की ‘मूल रिकॉर्डिंग की पहली कॉपी’ राष्ट्रीय फॉरेंसिक प्रयोगशाला को सौंपे.

पिछले साल 15 दिसंबर को अदालत ने सवाल किया था कि उपलब्ध पूरी लीक हुई ऑडियो क्लिप को फॉरेंसिक जांच के लिए क्यों नहीं भेजा गया. अदालत ने 20 नवंबर, 2025 को याचिकाकर्ताओं की ओर से दाखिल हलफनामे पर भी चिंता जताई थी, जिसमें कहा गया था कि फॉरेंसिक जांच के लिए ‘केवल चुनिंदा क्लिप भेजी गई थीं.’

याचिकाकर्ता ने इस मामले में स्वतंत्र विशेष जांच दल (एसआईटी) से जांच कराने की मांग की है.

मई 2023 में इंफाल घाटी में रहने वाले मेईतेई समुदाय और पड़ोसी पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले कुकी समुदायों के बीच जातीय हिंसा शुरू होने के बाद से 260 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं और हजारों लोग विस्थापित हुए हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 5 अक्टूबर की तारीख तय की है.

अरुणाचल के मुख्यमंत्री का चीनी घुसपैठ से इनकार किया, कहा- लेकिन चिंताओं का सत्यापन ज़रूरी

अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने शुक्रवार (7 अगस्त) को ऊपरी सुबनसिरी जिले के तक्सिंग इलाके में चीनी घुसपैठ की खबरों से इनकार किया.

द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, हालांकि उन्होंने कहा कि भारत-चीन सीमा के पास रहने वाले एक समुदाय के संगठन द्वारा उठाई गई चिंताओं को सुना जाना चाहिए और मौके पर जाकर उनका सत्यापन किया जाना चाहिए.

उन्होंने कहा, ‘हमें नहीं लगता कि कोई घुसपैठ हुई है, क्योंकि सीमा क्षेत्र में तैनात भारतीय सेना इलाके की बहुत अच्छी तरह से निगरानी और सुरक्षा कर रही है.’

खांडू ने कहा, ‘हालांकि, हमने तक्सिंग सर्किल में रहने वाली नाह वेलफेयर सोसाइटी (एनडब्ल्यूएस) के प्रतिनिधियों को उनकी चिंताओं को समझने और यह पता लगाने के लिए बुलाया है कि असल में क्या हुआ है.’

अरुणाचल प्रदेश का नक्शा, जिसमें चीन के साथ इसकी सीमा दिखाई गई है. (फोटो: गूगल मैप्स)

उन्होंने कहा कि सरकार कथित घटना से जुड़े तथ्यों को स्थापित करने के लिए जमीनी स्तर पर स्थिति का आकलन करेगी.

एनडब्ल्यूएस ने आरोप लगाया था कि चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के जवान दोनों देशों को अलग करने वाली वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) को पार कर तक्सिंग सर्किल के याजा और टोगो गांवों के पास के इलाकों पर कब्जा कर चुके हैं.

उनका दावा है कि पिछले छह सालों में पीएलए (चीनी सेना) ने उनके पशु चराने, शिकार करने और खेती करने वाली ज़मीन के एक बड़े हिस्से पर कब्ज़ा कर लिया है.

सेना ने इससे पहले इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा था कि इनमें सच्चाई नही हैं.

अरुणाचल: सीएम खांडू से जुड़े ठेकों की सीबीआई जांच में असहयोग का आरोप, कोर्ट ने शीर्ष अधिकारियों को किया तलब

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (3 अगस्त) को अरुणाचल प्रदेश के मुख्य सचिव और प्रधान सचिव (गृह) को तलब किया, जब केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने अदालत को बताया कि मुख्यमंत्री पेमा खांडू के परिजनों के स्वामित्व वाली या उनसे कथित रूप से जुड़ी कंपनियों को सार्वजनिक निर्माण कार्यों के ठेके दिए जाने के आरोपों की प्रारंभिक जांच के दौरान राज्य सरकार आवश्यक रिकॉर्ड उपलब्ध कराने में ‘असहयोग’ कर रही है.

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने सीबीआई की स्थिति रिपोर्ट पर संज्ञान लेते हुए अरुणाचल प्रदेश सरकार के मुख्य सचिव और प्रधान सचिव (गृह) को नोटिस जारी किया और उनसे जवाब मांगा.

मुख्यमंत्री पेमा खांडू. (फोटो साभार: फेसबुक/PemaKhanduBJP)

पीठ ने कहा कि ये दोनों अधिकारी 24 अगस्त को कोर्ट के सामने पेश हों और बताएं कि सहयोग क्यों नहीं किया गया और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन क्यों नहीं हुआ.

पीठ ने कहा कि सीबीआई की स्थिति रिपोर्ट से यह स्पष्ट होता है कि ‘ज़रूरी रिकॉर्ड उपलब्ध कराने के मामले में राज्य सरकार की ओर से असहयोग किया जा रहा है.’

इस घटनाक्रम पर कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर प्रतिक्रिया देते हुए लिखा, ‘ऐसा होना तो अपेक्षित ही था. 6 अप्रैल 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) के ठेकों की सीबीआई जांच का आदेश दिया था, जिन्हें पीडब्ल्यूडी मंत्री ने अपने परिवार के सदस्यों को दिए जाने के आरोप हैं. अरुणाचल प्रदेश में पीडब्ल्यूडी मंत्री स्वयं मुख्यमंत्री हैं. इसके बावजूद वे पद पर बने हुए हैं, जो सार्वजनिक जीवन में जवाबदेही और ईमानदारी के प्रति प्रधानमंत्री के के झूठे वादे को दिखाता है.’

सुप्रीम कोर्ट ने 6 अप्रैल के अपने फैसले में कहा था कि राज्य और उसकी संस्थाएं किसी भी राजनीतिक या प्रशासनिक पदाधिकारी की ‘मनमर्जी’ के आधार पर लाभ नहीं बांट सकतीं. अदालत ने माना था कि यह ऐसा मामला है, जिसमें ‘स्वतंत्र जांच’ जरूरी है.

अपने फैसले में अदालत ने यह भी निर्देश दिया था कि प्रारंभिक जांच और उसके बाद जरूरी होने पर होने वाली विस्तृत जांच में 1 जनवरी 2015 से 31 दिसंबर 2025 के बीच अरुणाचल प्रदेश में सार्वजनिक निर्माण कार्यों से संबंधित सभी ठेकों, वर्क ऑर्डर और उनके क्रियान्वयन की जांच की जाएगी. साथ ही, अदालत के समक्ष प्रस्तुत सभी संबंधित दस्तावेजों और रिकॉर्ड्स को भी जांच के दायरे में शामिल किया जाएगा.

यह फैसला सेव मोन रीजन फेडरेशन और वॉलंटरी अरुणाचल सेना नामक गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) द्वारा दायर उस याचिका पर दिया गया था, जिसमें मामले की जांच सीबीआई या विशेष जांच दल (एसआईटी) से कराने की मांग की गई थी.

वहीं, ठेकों से जुड़े आरोपों के मुद्दे पर मुख्यमंत्री ने कहा कि केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के साथ कथित असहयोग को लेकर अरुणाचल प्रदेश के मुख्य सचिव और गृह विभाग के प्रधान सचिव को सुप्रीम कोर्ट द्वारा तलब किया जाना ‘एकतरफा सुनवाई’ का परिणाम था. उन्होंने कहा कि ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि राज्य के स्थायी वकील शीर्ष अदालत के समक्ष राज्य का पक्ष रखने के लिए मौजूद नहीं थे.

मिज़ोरम: मिजो नेशनल फ्रंट ने मुख्यमंत्री से शांति समझौते और आईएलपी संबंधी टिप्पणियों पर माफी की मांग की

विपक्षी मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) ने मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा से मिजोरम शांति समझौते और इनर लाइन परमिट (आईएलपी) को लेकर हाल में की गई टिप्पणियों पर सार्वजनिक रूप से माफी मांगने और अपने बयान वापस लेने की मांग की है.

पार्टी का आरोप है कि मुख्यमंत्री के बयान तथ्यात्मक रूप से गलत हैं और मिजोरम और वहां के लोगों के हितों के लिए नुकसानदेह हैं.

नॉर्थईस्ट टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, यह मांग एमएनएफ की प्रमुख निर्णय लेने वाली इकाइयों – नेशनल कोर कमेटी, पॉलिटिकल अफेयर्स कमेटी और पार्टी के विधायकों – की संयुक्त बैठक के बाद सामने आई.

बैठक में 31 जुलाई को मिजोरम लॉ कॉलेज में मुख्यमंत्री लालदुहोमा द्वारा दिए गए भाषण की समीक्षा की गई.

मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा. (फोटो साभार: X @Lal_Duhoma)

बैठक में पारित प्रस्ताव में एमएनएफ ने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री ने मिजोरम शांति समझौते और इनर लाइन परमिट के संबंध में ‘झूठे बयान’ दिए हैं. पार्टी का कहना है कि ऐसे बयान जनता को गुमराह कर सकते हैं और इन ऐतिहासिक मुद्दों के महत्व को कमज़ोर कर सकते हैं.

एमएनएफ ने अपने बयान में कहा कि लालदुहोमा की टिप्पणियां स्वीकार्य नहीं हैं और उनसे आग्रह किया कि वे मिजो समुदाय के हितों की रक्षा के लिए अपने रुख को स्पष्ट करें और अपने बयान वापस लेते हुए सार्वजनिक रूप से माफी मांगें.

यह विवाद लालदुहोमा के उस बयान से शुरू हुआ जो उन्होंने मिज़ोरम लॉ कॉलेज में अपने संबोधन के दौरान दिया था. उन्होंने कहा था कि आईएलपी सिस्टम को जारी रखने का फ़ैसला आख़िरकार केंद्र सरकार पर निर्भर करता है, जिसके पास इसे रद्द करने का अधिकार है.

मुख्यमंत्री ने चेतावनी दी थी कि परमिट सिस्टम को ‘उचित संयम’ और कानूनी संतुलन के साथ लागू किया जाना चाहिए. उन्होंने आगाह किया कि बाहरी लोगों के ख़िलाफ़ मनमाने ढंग से इसे लागू करने पर न्यायिक जांच हो सकती है और अदालत इस सिस्टम को रद्द भी कर सकती है.

लालदुहोमा ने आम तौर पर इस्तेमाल किए जाने वाले शब्द ‘मिज़ोरम समझौता’ (Mizoram Accord) पर भी सवाल उठाए. उन्होंने तर्क दिया कि 1986 का शांति समझौता तकनीकी रूप से भारत सरकार और मिज़ोरम राज्य के बीच नहीं हुआ था. उनके अनुसार, यह समझौता केंद्रीय गृह मंत्रालय और मिज़ोरम के एक राजनीतिक संगठन के बीच हुआ था.

समझौते की शर्तों का ज़िक्र करते हुए लालदुहोमा ने कहा था कि हालांकि आईएलपी सिस्टम में बदलाव करने से पहले केंद्र के लिए मिज़ोरम सरकार से सलाह-मशविरा करना ज़रूरी है, लेकिन समझौते में राज्य सरकार की सहमति को अनिवार्य नहीं बनाया गया है.

इस बीच, मिज़ोरम कांग्रेस की युवा शाखा ने मंगलवार को मुख्यमंत्री के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया. उन्होंने मुख्यमंत्री पर आईएलपी और ऐतिहासिक शांति समझौते के महत्व को कम करके आंकने का आरोप लगाया.

प्रदर्शनकारियों का आरोप था कि लालदुहोमा के बयानों से मिज़ोरम की क्षेत्रीय सुरक्षा कमज़ोर हो सकती है और राज्य में बड़ी मुश्किल से हासिल की गई शांति और ऐतिहासिक समझौते को नुकसान पहुंच सकता है.

मेघालय: एसआईआर की ड्राफ्ट सूची से 1.8 लाख मतदाताओं के नाम बाहर

मेघालय में बुधवार (5 अगस्त) को प्रकाशित ड्राफ्ट मतदाता सूची से करीब 1.8 लाख मतदाताओं के नाम बाहर कर दिए गए हैं. अधिकारियों के अनुसार, विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान इन मतदाताओं को मृत, कहीं चले गए, लापता या डुप्लीकेट वोटर के तौर पर पाया गया.

समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार, सभी 60 विधानसभा क्षेत्रों के लिए प्रकाशित ड्राफ्ट मतदाता सूची में 21,69,243 मतदाता हैं. पुनरीक्षण से पहले मतदाताओं की संख्या 23,49,645 थी. आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, राज्यभर में घर-घर जाकर किए गए सत्यापन के बाद मतदाताओं की संख्या में 1,80,402 की कमी हुई है.

(फोटो: पीटीआई)

मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) बीडीआर तिवारी ने बताया कि बाहर किए गए मतदाताओं में 81,490 मृत, 45,011 ऐसे मतदाता जिन्हें खोजा नहीं जा सका या जो अनुपस्थित थे, 42,532 लोग जो स्थायी रूप से कहीं और चले गए, 6,701 दोहरे नाम वाली प्रविष्टियां और 4,668 ऐसे मामले शामिल हैं, जिनमें मतदाताओं ने गणना फॉर्म देने से इनकार किया या जो अन्य श्रेणियों में आते हैं.

एसआईआर प्रक्रिया के तहत राज्य के सभी 23,49,645 मतदाताओं को गणना फॉर्म वितरित किए गए और उनका डिजिटलीकरण किया गया. अधिकारियों के अनुसार, इस प्रक्रिया में 100 प्रतिशत वितरण और डिजिटलीकरण पूरा किया गया.

एसआईआर के दौरान 7,75,665 मतदाताओं (33.01 प्रतिशत) को सीधे वर्ष 2005 के एसआईआर डेटाबेस से जोड़ा गया, जबकि 11,70,792 मतदाताओं (49.83 प्रतिशत) का मिलान उनके माता-पिता या दादा-दादी के पुराने मतदाता रिकॉर्ड के माध्यम से किया गया.

वहीं, 2,22,786 मतदाताओं (9.48 प्रतिशत) का 2005 के रिकॉर्ड से मिलान नहीं हो सका. इन्हें ‘नो मैपिंग’ श्रेणी में रखा गया है.

अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि इन मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए नहीं गए हैं. उनके मामलों की दावे और आपत्तियां दर्ज कराने की प्रक्रिया के दौरान व्यक्तिगत रूप से जांच की जाएगी. इसके लिए संबंधित लोगों को नोटिस जारी किया जाएगा और अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाएगा.

ड्राफ्ट मतदाता सूची के प्रकाशन के साथ ही दावे और आपत्तियां दर्ज कराने की कानूनी अवधि शुरू हो गई है, जो 4 सितंबर तक जारी रहेगी.

मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने कहा कि जिन मतदाताओं के नाम ड्राफ्ट मतदाता सूची में हैं और जिनका 2005 के रिकॉर्ड से मिलान हो चुका है, उन्हें आगे कोई कार्रवाई करने की जरूरत नहीं है.

जिन मतदाताओं के नाम पुराने रिकॉर्ड से मैप नहीं हुए हैं, उन्हें सत्यापन के लिए नोटिस भेजे जाएंगे. वहीं, पात्र नागरिकों का नाम अगर ड्राफ्ट मतदाता सूची में नहीं है, तो वे निर्धारित घोषणा के साथ फॉर्म 6 जमा करके अपना नाम मतदाता सूची में शामिल कराने के लिए आवेदन कर सकते हैं.