मैं 17 सालों से पत्रकारिता कर रही हूं. इन सालों में मैंने ऐसे लोगों के बारे में लिखा है जिनकी छवि बहुत ख़राब रही है; मुझ पर चिल्लाया गया है, झूठ बोला गया और मेरे काम में कई रुकावटें आई. लेकिन, 20 अगस्त को जादवपुर विश्वविद्यालय के बाहर इतने सालों में ऐसा पहली बार हुआ कि एक सवाल के जवाब में मुझे यौन उत्पीड़न की धमकी दी गई.
मुझे आगे बढ़ने से पहले कुछ बातें कह देनी चाहिए, क्योंकि यह इस बात से जुड़ी है कि उस दिन कैसा महसूस हुआ. मैं जादवपुर विश्वविद्यालय में 5 साल पढ़ी हूं. मैंने अपनी स्नातक और स्नातकोत्तर की पढ़ाई वही से पूरी की है. गेट नंबर 4, यह वही जगह है, जहां से मैं सालों बिना कुछ सोचे-समझे गुजरती रही. उस गुरुवार मैं इसी गेट के बाहर खड़ी रही, और उन लोगों, जिन्हें मैंने पहले कभी कैंपस में नहीं देखा था, को गेट पर चढ़ते और उस पर बने प्रतीक चिह्न पर जूते रखते हुए देखा.
मैं ये ढोंग नहीं करूंगी कि मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ा, मुझे फर्क पड़ा. लेकिन बतौर पत्रकार उस दिन जो मैंने किया, उसमें इस बात से कोई बदलाव नहीं आया- ये एकमात्र बात मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकती हूं.
जादवपुर विश्वविद्यालय की ओर जाने से पहले एबीवीपी के समर्थक कोलकाता के गोलपार्क एरिया के पास एकत्रित हुए. हाथ में भगवा झंडे लिए वे नारे लगा रहे थे ‘वीर सावरकर ज़िंदाबाद’, ‘भारत माता की जय’, ‘नक्सलियों की यहां कोई जगह नहीं है’ और ‘एसएफआई-एर-चामरा, गुटिये नेबो आमरा (हम एसएफआई को देख लेंगे.)
मैंने उनसे पूछा कि वे एबीवीपी की जाधवपुर यूनिवर्सिटी इकाई के अध्यक्ष निखिल दास से जुड़े उत्पीड़न के मामले के बारे में क्या सोचते हैं- दास वही शख्स हैं, जिनकी कथित चोटों की वजह से ही ये लोग सड़कों पर उतरे थे.
दास पर 2014 में एक जूनियर छात्र का उत्पीड़न करने का आरोप लगा था, जब वह यूनिवर्सिटी में तीसरे साल का छात्र था. उन्हें गिरफ्तारकिया गया था और वो हिरासत में भी रखे गए थे. यह घटना, यूनिवर्सिटी प्रशासन का इस मामले को संभालने का तरीका और इसके बाद प्रदर्शन कर रहे छात्रों के ख़िलाफ़ पुलिस की कार्रवाई- ये सब उस तनाव का हिस्सा बन गए, जिससे ‘होक कोलोरोब’ आंदोलन शुरू हुआ था.
मेरे सवाल पर पहली प्रतिक्रिया देते हुए उन लोगों ने सबसे पहले मुझे प्रश्न पूछने से रोका. समर्थक मेरी बात के बीच में काटने, उसे टालने की कोशिश करते रहे और यह निश्चित करने का प्रयास किया कि यह सवाल दोबारा न पूछा जाए.
फिर, भीड़ में से दो आदमियों ने कहा: ‘नाम की ममानि? राते देखा कोरी?’ (तुम्हारा नाम क्या है, डियर? क्या हम रात को मिले?)
मैंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. कुछ सौ आदमियों की भीड़ में, जो पहले से ही इसके मूड में हैं, किसी अकेली औरत के लिए कुछ कहना-सुनना अच्छा नहीं होता. इसलिए, मैंने एक लाइन कही और आगे बढ़ गई: ‘मुझे उत्पीड़न के आरोपों पर मेरा जवाब मिल गया.’
और मुझे मिल ही गया था. मैंने जो सवाल पूछा था, उसके जवाब में एबीवीपी की राजनीतिक संस्कृति के बारे में किसी भी आधिकारिक बयान से ज़्यादा समझ आ रहा था.
आप स्थिति समझिये- भीड़ में मौजूद एक समूह से जब मैंने यौन उत्पीड़न के आरोपों के बारे में पूछा, तो दिन-दहाड़े सबके सामने- उनका पहला रिएक्शन सवाल पूछने वाली महिला का ही यौन उत्पीड़न करना था. भीड़ में किसी ने उन्हें रोका भी नहीं. किसी को भी शर्मिंदगी महसूस नहीं हुई. यह किसी आपा खोये व्यक्ति ने नहीं कहा था. यह भीड़ की स्वाभाविक प्रतिक्रिया थी, जिसका मकसद सवाल का जवाब देने के बजाय उसे दबाना था.
बात यहीं खत्म नहीं हुई.
बाद में, जादवपुर थाने के बाहर मैं पुलिस की तैयारियों की तस्वीरें ले रही थी, एक फ्रेम में मैंने दो आदमियों को कुछ अधिकारियों के साथ गंभीर बातचीत करते हुए देखा. मुझे नहीं पता था कि वे कौन थे. मुझे अब भी नहीं पता.
कुछ ही सेकेंड बाद एक व्यक्ति गुस्से में मेरी तरफ़ झपटा और यह जानने की ज़िद करने लगा कि मैंने क्या रिकॉर्ड किया है.
मैंने उससे पूछा कि वह किस अधिकार से पूछ रहा है. मैंने पूछा कि क्या फोटोग्राफी पर रोक लगी है. मैंने उससे आधिकारिक आदेश दिखाने को कहा.
वह ऐसा नहीं कर सका, लेकिन वह मुझे डराने-धमकाने की कोशिश करता रहा.
इसलिए मैंने उससे कहा, ‘अगर तुम मुझे कोई आदेश नहीं दिखा सकते, तो मैं यही मानूंगी कि तुम कुछ गलत बात छिपा रहे हो. जिसने तुम्हें मुझे डराने के लिए भेजा है, उसे यहां भेजो या मुझे उसके पास ले चलो. सड़क पर हो रही गतिविधियों की फोटो लेने के लिए तुम किसी अनजान महिला से इस आक्रामक ढंग से पेश नहीं आ सकते. अगर तुमने दोबारा ऐसा किया, तो मैं तुम्हारे खिलाफ़ एफआईआर करवा दूंगी.’
इसके बाद वो वह चला गया. यही होता है जब आप दबने से इनकार कर देते हैं.
ये दोनों घटनाएं एक-दूसरे से कुछ मीटर और कुछ मिनटों के फ़ासले पर हुईं. दोनों का संदेश एक ही था: असुविधाजनक सवाल मत पूछो. जो हो रहा है, उसकी तस्वीरें मत लो. जवाबदेही मत मांगो. और अगर पत्रकार महिला है, तो उसे याद दिलाओ कि ऐसी धमकी कभी भी यौन उत्पीड़न की धमकी का रूप ले सकती है.
मैंने उसी रात अपनी रिपोर्ट फाइल कर दी. मैं निखिल दास के बारे में सवाल पूछती रहूंगी. गेट नंबर 4 के बाहर मुझे जो जवाब मिला, उससे मुझे वो जवाब भी मिल गए, जो शायद एबीवीपी के साथ बात करके भी न पता चलते, और मुझे लगता है कि पाठकों को पता होना चाहिए कि वह बातचीत असल में कैसी थी.
मैं एक और बात जोड़ना चाहूंगी- एक रिपोर्टर के तौर पर नहीं, बल्कि यूनिवर्सिटी की पूर्व छात्रा के तौर पर- और बस, मेरी बात यहीं खत्म होती है.
मैंने इसी कैंपस में सालों तक, अक्सर अकेले और देर रात तक आना-जाना किया है. मुझे कभी ऐसा नहीं लगा कि इस बारे में मुझे सोचने की ज़रूरत है. यह आज़ादी जादवपुर यूनिवर्सिटी के लिए कोई मामूली बात नहीं है, बल्कि यह उन चीज़ों में से एक है जिनके लिए यह जगह जानी जाती है; और जो महिलाएं कहीं और पढ़ी हैं, वे आपको बताएंगी कि यह कितनी दुर्लभ बात है.
जादवपुर में भी सब कुछ एकदम परफेक्ट नहीं है. इसके प्रशासन ने पहले भी छात्रों को निराश किया है. लेकिन जब अतीत में ऐसा हुआ, तो कैंपस ने इसे नज़रअंदाज़ नहीं किया. वहां ज़बरदस्त विरोध हुआ. ‘होक कोलोरोब’ आंदोलन एक महिला को न्याय दिलाने की मांग के तौर पर ही शुरू हुआ था, और इसके कारण उस समय के कुलपति (वीसी) को अपनी नौकरी गंवानी पड़ी थी.
यह वही यूनिवर्सिटी है जहां इन लोगों ने मार्च किया और तोड़-फोड़ की. और जब बाहर खड़ी एक महिला ने उनसे पिछले मामले के बारे में पूछा, तो जवाब में उन्हें यहकहा गया कि वे उनसे रात में मिलें.
मेरा आख़िर में बस यही कहना है कि वे अपनी यह सलाह अपने पास ही रखें!
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