नॉर्थईस्ट डायरीः 2018 असम मॉब लिचिंग मामले में बीस लोगों को आजीवन कारावास की सज़ा

इस हफ्ते नॉर्थ ईस्ट डायरी में असम, मिज़ोरम, त्रिपुरा और मेघालय के प्रमुख समाचार.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

नई दिल्ली: असम के नगांव की एक विशेष अदालत ने शुक्रवार (24 अप्रैल) को कार्बी आंगलोंग ज़िले में हुई मॉब लिंचिंग की घटना के मामले में 20 लोगों आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई. यह मामला कार्बी आंगलोंग में एक व्यवसायी और एक संगीतकार की लिंचिंग से जुड़ा है, जिनकी हत्या बच्चा चोर होने के अफवाह के चलते कर दी गई थी.

अदालत ने बीते 20 अप्रैल इस मामले में 20 आरोपियों को दोषी ठहराया था और सबूतों की कमी के कारण 25 आरोपियों को बरी कर दिया था.

मालूम हो कि 8 जून, 2018 को एक भीड़, जो डंडों और धारदार हथियारों से लैस थी, ने अभिजीत नाथ (30) और नीलोत्पल दास (29) के वाहन को रोका. उन्हें बाहर घसीटकर पीटा गया और मौके पर ही उनकी हत्या कर दी गई. वे दोनों पिकनिक से लौट रहे थे. उस दौरान क्षेत्र में बच्चों के अपहरण की अफवाहों से दहशत फैली हुई थी, जिसके कारण यह घटना हुई. नीलोत्पल दास संगीतकार थे और अभिजीत नाथ उनके दोस्त थे.

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, जिला एवं सत्र न्यायाधीश दिव्यज्योति महंता ने फैसला सुनाते हुए कहा कि अदालत ने पाया कि 20 आरोपियों ने यह अपराध किया था और ‘उनका इरादा साफ़ था, क्योंकि उन्होंने दोनों युवकों को तब तक बेरहमी से पीटा जब तक उनकी मौत नहीं हो गई.’

हालांकि, अदालत ने अभियोजन पक्ष की मौत की सज़ा की अपील को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यह मामला ‘अत्यंत दुर्लभतम से दुर्लभ’ (rarest of rare) श्रेणी में नहीं आता.

आदेश में कहा गया, ‘इस निष्कर्ष पर पहुंचते हुए इस अदालत द्वारा दी जा सकने वाली एकमात्र सजा भारतीय दंड संहिता की धारा 302/149 के तहत अपराध के लिए जुर्माने सहित आजीवन कारावास है… प्रत्येक को कठोर आजीवन कारावास भुगतना होगा तथा 20,000 रुपये (बीस हजार रुपये) का जुर्माना देना होगा.’

पीड़ितों के परिवार वालों ने सजा की कठोरता पर असंतोष व्यक्त किया और कहा कि आरोपियों को मौत की सजा मिलनी चाहिए थी.

अखबार के अनुसार, नीलोत्पल के पिता गोपाल दास ने कहा, ‘हम यह नहीं कह रहे कि जान के बदले जान, लेकिन सज़ा अपराध की गंभीरता के हिसाब से होनी चाहिए.’

बचाव पक्ष की ओर से पेश हुए अधिवक्ता मानस सरानिया ने कहा कि वे इस आदेश को गुौहाटी हाईकोर्ट में चुनौती देंगे. उन्होंने कहा कि सुनवाई के दौरान पेश किए गए सबूत यह साबित करने में नाकाम रहे कि आरोपियों ने हत्या की थी.

उन्होंने कहा, ‘उन्हें ज़्यादा से ज़्यादा आईपीसी की धारा 304 (2) (गैर-इरादतन हत्या) के तहत दोषी ठहराया जा सकता है, न कि धारा 302 (हत्या) के तहत. इसे साबित करने के लिए कोई सबूत नहीं था.’

यह मामला भारतीय दंड संहिता की धारा 302 (हत्या), 143 (गैरकानूनी जमावड़ा), 147 (दंगा), 149 (गैरकानूनी जमावड़ा), 186 (सरकारी कर्मचारी को कर्तव्य पालन से रोकना) और 332 (सरकारी कर्मचारी को कर्तव्य से रोकने के लिए चोट पहुंचाना) के तहत दर्ज किया गया था.

सरानिया ने कहा कि 28 आरोपियों को, जिनमें तीन नाबालिग भी शामिल थे, बरी कर दिया गया क्योंकि उनके खिलाफ कोई सबूत नहीं था. उन्होंने आगे कहा, ‘उन्हें धारा 304 (2) के तहत ज़्यादा से ज़्यादा 10 साल की सज़ा दी जा सकती है, और वे पहले ही लगभग आठ साल जेल में बिता चुके हैं. हम इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती देंगे.’

परिवार के सदस्यों ने कहा कि निर्णय सुनाने में आठ वर्ष की देरी के कारण 25 आरोपी बरी हो गए और इसे भी हाईकोर्ट में चुनौती दी जाएगी.

मिज़ोरम: हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को खाली की गई असम राइफल्स की जमीन पर पेड़ कटाई रोकने का आदेश दिया

गौहाटी हाईकोर्ट की आइजोल पीठ ने मिजोरम सरकार को आइजोल के लाममुअल इलाके में पेड़ों की कटाई को अस्थायी रूप से रोकने का निर्देश दिया है. यह जमीन पहले असम राइफल्स के कब्जे में था.

प्रतीकात्मक तस्वीर. (फोटो साभार: फ्लिकर)

समाचार एजेंसी पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस माइकल जोथनखुमा और जस्टिस कौशिक गोस्वामी की पीठ ने हाल की मीडिया रिपोर्टों का संज्ञान लिया, जिनमें बताया गया था कि इस स्थल पर मौजूद 400 पेड़ों में से 174 पेड़ों को विकास परियोजनाओं के लिए काटा जा रहा है.

अदालत ने सोमवार (20 अप्रैल) को कहा कि इनमें से कई पेड़ एक सदी से भी अधिक पुराने माने जाते हैं.

अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि खाली कराई गई जमीन के बैरक क्षेत्र में मौजूद इमारतें वर्ष 1897 में बनाई गई थीं और उन्हें विरासत (हेरिटेज) का दर्जा दिया गया है.

साथ ही अदालत ने कहा कि राज्य सरकार को शहर के बीचों-बीच स्थित इन सदी पुराने पेड़ों की कटाई को लेकर स्पष्टीकरण देना होगा.

राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता पी. भट्टाचार्य और याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता टीजे महंता की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने अंतरिम आदेश जारी करते हुए पेड़ों की कटाई पर रोक लगा दी. मामले की अगली सुनवाई 18 मई को होगी.

यह जनहित याचिका पर्यावरण कार्यकर्ता सियाजामपुई सैलो ने दायर की थी, ‘सेंटर फॉर एनवायरनमेंट एंड सोशल जस्टिस’ का प्रतिनिधित्व कर रही हैं.

शहरी विकास एवं गरीबी उन्मूलन मंत्री के. सापडांगा ने पिछले महीने घोषणा की थी कि असम राइफल्स द्वारा खाली की गई इस जमीन पर बुनियादी ढांचा विकास कार्य जल्द शुरू किया जाएगा.

उन्होंने कहा था कि आइजोल के सबसे व्यस्त इलाकों में से एक, ट्रेजरी स्क्वायर और बाजार बुङकॉन के बीच लगभग 1 किलोमीटर लंबे मार्ग को चौड़ा करने का काम किया जाएगा, ताकि लगातार बने रहने वाले ट्रैफिक जाम की समस्या को दूर किया जा सके.

मुख्यमंत्री लालदुहोमा की अध्यक्षता में एक सलाहकार समिति भी बनाई गई है, जो इस भूमि के रणनीतिक उपयोग को सुनिश्चित करेगी. इस समिति में राजनीतिक दलों, गैर-सरकारी संगठनों, चर्च नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं को शामिल किया गया है.

सापडांगा ने यह भी बताया था कि खाली की गई जमीन और इमारतों को आधुनिक सार्वजनिक स्थल में बदलने की योजना है, जिसमें विरासत और उपयोगिता के बीच संतुलन रखा जाएगा.

उन्होंने कहा कि ‘क्वार्टर गार्ड’ और ‘लोच हाउस’ जैसी ऐतिहासिक महत्व की इमारतों को संरक्षित किया जाएगा, जबकि जिन इमारतों का कोई विरासत महत्व नहीं है, उन्हें ध्वस्त किया जाएगा.

हेच स्पीच याचिकाएं: याचिकाकर्ताओं का आरोप- कोर्ट के नोटिस के बाद भी असम के सीएम ने भड़काऊ बयान दिए

गुवाहाटी हाईकोर्ट ने मंगलवार (21 अप्रैल) को असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा के हेट स्पीच के खिलाफ दायर कई जनहित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए प्रतिवादियों को उत्तर देने के लिए अतिरिक्त चार सप्ताह का समय दिया.

लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, मुख्य न्यायाधीश आशुतोष कुमार और जस्टिस अरुण देव चौधरी की पीठ ने मामले की अगली सुनवाई 28 मई को निर्धारित की और राज्य सरकार तथा मुख्यमंत्री को निर्देश दिया कि वे अगली सुनवाई तक अपना हलफनामा दाखिल करें.

हिमंता बिस्वा शर्मा. (फोटो: पीटीआई)

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी, जो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) की असम इकाई की ओर से उपस्थित थे, ने कहा कि इस वर्ष फरवरी में अदालत द्वारा नोटिस जारी किए जाने के बाद भी मुख्यमंत्री ने कथित रूप से विवादित और भड़काऊ बयान देना जारी रखा है.

उन्होंने कहा कि धार्मिक रूप से भड़काने वाली, उकसाने वाली और अनावश्यक टिप्पणियां की जा रही हैं. उन्होंने कहा, ‘मुख्यमंत्री का पूरा ध्यान केवल एक अल्पसंख्यक समुदाय पर केंद्रित है, जबकि एक संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति का कर्तव्य शांति और संतुलन बनाए रखना होता है.’

सिंघवी ने पीठ के समक्ष एक लिखित टिप्पणी भी प्रस्तुत की, जिसमें 27 मार्च, 17, 18 और 20 अप्रैल को दिए गए कथित बयानों का उल्लेख किया गया. उन्होंने यह भी कहा कि मुख्यमंत्री अब भी ‘मियां’ जैसे शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं.

उन्होंने तर्क दिया कि जब मामला न्यायालय में विचाराधीन है, तब मुख्यमंत्री को ऐसे बयान देने की अनुमति नहीं दी जा सकती. उन्होंने कहा कि जब एक सामान्य व्यक्ति को भी ऐसा करने की अनुमति नहीं होनी चाहिए, तो एक संवैधानिक पदाधिकारी से अधिक जिम्मेदारी की अपेक्षा होती है.

इस आधार पर उन्होंने अदालत से अंतरिम आदेश देने का अनुरोध किया, जिसमें संयम बरतने की अपेक्षा व्यक्त की जाए. हालांकि, पीठ ने इस अनुरोध को स्वीकार नहीं किया.

मुख्य न्यायाधीश ने मौखिक रूप से कहा कि अदालत को पहले मुख्यमंत्री के जवाब की प्रतीक्षा करनी चाहिए और यह भी उल्लेख किया कि अब संवेदनशील समय बीत चुका है. इस पर सिंघवी ने हल्के अंदाज में कहा कि मुख्यमंत्री ऐसे बयानों के लिए किसी विशेष समय की प्रतीक्षा नहीं करते.

पीठ ने यह भी कहा कि अब तक जबाव दाखिल किया जाना चाहिए था और राज्य पक्ष को निर्देश दिया कि वह यह स्पष्ट करे कि क्या ऐसे बयान दिए गए और क्या वे उचित हैं.

पीठ ने कहा, ‘आप जवाब दाखिल करने से बच नहीं सकते… आपको जवाब देना होगा कि क्या यह सही है, क्या आपने वह बात (कथित टिप्पणी) कही थी.’

आखिर में अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 28 मई को निर्धारित करते हुए प्रतिवादियों को तब तक अपना जबाव पेश करने और याचिकाकर्ताओं को उसकी प्रति देने का निर्देश दिया.

त्रिपुरा: भाजपा के दफ़्तर में आग लगाई गई, पार्टी ने मोथा समर्थकों पर आरोप लगाया

मुख्यमंत्री माणिक साहा की इस घोषणा के बाद कि राज्य चुनाव के बाद हुई हिंसा में क्षतिग्रस्त संपत्ति की लागत ‘त्रिपुरा सार्वजनिक और निजी संपत्ति को नुकसान की वसूली अधिनियम, 2021’ के तहत वसूल करेगा, कथित तौर पर तिपरा मोथा के समर्थकों ने सोमवार (20 अप्रैल) रात दक्षिण त्रिपुरा के मनु बंकुल के नूतन बाज़ार में भाजपा के एक पार्टी दफ़्तर में आग लगा दी.

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, पार्टी ने बताया कि इस घटना के बाद भाजपा समर्थकों की कई संपत्तियों पर भी हमले हुए. भाजपा मंडल अध्यक्ष बिपुल भौमिक ने आरोप लगाया कि मोथा के कार्यकर्ता तीन दिनों से तोड़-फोड़ और आपराधिक गतिविधियों में शामिल थे, और कहा कि उन्होंने पुलिस में लिखित शिकायत दर्ज कराई है.

त्रिपुरा के खोवाई ज़िले में कथित चुनाव-बाद हिंसा में क्षतिग्रस्त हुए एक घर के पास महिलाएं. (फोटो: पीटीआई)

भौमिक ने यह भी बताया कि मनु बंकुल के पुराना बाज़ार इलाके में भाजपा के एक और दफ़्तर पर भी लगभग उसी समय हमला किया गया. भाजपा ने आरोप लगाया कि एक अलग घटना में, भाजपा युवा नेता सुशांत मोग के बागान में लगभग 20 रबड़ के पेड़ काट दिए गए.

17 अप्रैल को त्रिपुरा जनजातीय क्षेत्र स्वायत्त जिला परिषद (एडीसी) के चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद से इस इलाके में रुक-रुक कर हिंसा की खबरें आ रही हैं.

अखबार के अनुसार, तिपरा मोथा के नेताओं ने इन आरोपों पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया.

इस बीच, साहा ने मुख्य सचिव, गृह सचिव, डीजीपी और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के साथ मंगलवार (21 अप्रैल) को खोवाई जिले के हिंसा प्रभावित इलाकों का दौरा किया. उन्होंने कहा कि हिंसा में शामिल किसी भी आरोपी को बख्शा नहीं जाएगा और जो लोग इसके लिए ज़िम्मेदार हैं, उन्हें जवाबदेह ठहराया जाएगा.

मुख्यमंत्री ने कहा कि नुकसान की भरपाई दोषियों से ही की जाएगी और पीड़ितों को सहायता देने के निर्देश दिए.

साहा ने एडीसी चुनाव परिणामों के बाद हुई हिंसा से प्रभावित 258 परिवारों के लिए आर्थिक सहायता की घोषणा की. उन्होंने उन परिवारों से मुलाकात की, जिन्होंने कथित तौर पर तिपरा मोथा के कार्यकर्ताओं द्वारा किए गए हमलों के कारण विस्थापित होने के बाद भगत सिंह यूथ हॉस्टल में शरण ली थी.

तिपरा मोथा ने एडीसी की 28 में से 24 सीटें जीतीं. चुनाव परिणामों के बाद पश्चिम त्रिपुरा, सिपाहीजाला, खोवाई और दक्षिण त्रिपुरा जिलों में भाजपा के कई समर्थकों ने कथित तौर पर तोड़-फोड़, संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और चोट लगने की घटनाओं के बीच अपने घर छोड़ दिए.

राज्य सरकार ने प्रभावित परिवारों में से प्रत्येक के लिए 25,000 रुपये का तत्काल राहत पैकेज मंज़ूर किया है, और जिला मजिस्ट्रेटों तथा कलेक्टरों को यह सुनिश्चित करने का काम सौंपा गया है कि इसका वितरण शीघ्रता से हो. 64.5 लाख रुपये का प्रारंभिक आवंटन किया गया है.

मेघालय: विरोध प्रदर्शनों के बाद ताज उमियाम रिज़ॉर्ट परियोजना से लुम्पोंगडेंग द्वीप को हटाया गया

मेघालय सरकार ने री भोई ज़िले में स्थानीय समूहों और हितधारकों के लगातार विरोध के बाद उमियाम में प्रस्तावित पांच-सितारा रिज़ॉर्ट परियोजना से लुम्पोंगडेंग द्वीप को बाहर करने का फ़ैसला किया है.

अधिकारियों ने बताया कि ताज समूह से जुड़ी कंपनी, उमियाम होटल प्राइवेट लिमिटेड के साथ हुए समझौते में इस बदलाव को शामिल करने के लिए संशोधन किया जाएगा.

लुम्पोंगडेंग द्वीप. (फोटो साभार: यूट्यूब वीडियो स्क्रीनग्रैब)

यह निर्णय सरकार के प्रतिनिधियों और पारंपरिक गांव प्रमुखों के समूह ‘सिनजुक की रंगबह श्नोंग’ के बीच हुई बैठक के बाद लिया गया. अधिकारियों ने स्वीकार किया कि परियोजना में द्वीप को शामिल किए जाने को लेकर स्थानीय निवासियों ने चिंता जताई थी, और आगे अशांति से बचने के लिए इसे हटाने का विकल्प चुना गया.

अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि भले ही लुम्पोंगडेंग द्वीप अब विकास योजना का हिस्सा नहीं रहेगा, लेकिन व्यापक पर्यटन परियोजना मौजूदा उमियाम ऑर्किड लेक रिसॉर्ट स्थल पर जारी रहेगी. यह रिसॉर्ट लगभग 30 एकड़ क्षेत्र में विकसित किया जाएगा, जहां पहले से बुनियादी ढांचा मौजूद है, और इसका विस्तार किसी भी ऐसे क्षेत्र में नहीं किया जाएगा जो पारिस्थितिक या सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील हो.

सरकार ने अपने इस फ़ैसले की जानकारी उन विरोध करने वाले समूहों को भी दी, जिनमें नागरिक समाज संगठन भी शामिल थे जो इस परियोजना के ख़िलाफ़ आंदोलन कर रहे थे. इनमें से एक समूह तो लगभग दो हफ़्तों से भूख हड़ताल पर बैठा था और द्वीप को परियोजना से बाहर रखने की मांग कर रहा था.

अधिकारियों ने ज़ोर देकर कहा कि इस परियोजना की मूल परिकल्पना लुम्पोंगडेंग द्वीप पर बिना किसी स्थायी निर्माण के पर्यटन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से की गई थी, जिसमें मुख्य ज़ोर पर्यटकों को ऐसे अनुभव देने पर था जिनका पर्यावरण पर कम से कम प्रभाव पड़े. हालांकि, जनता की लगातार चिंताओं को देखते हुए सरकार ने द्वीप वाले हिस्से को पूरी तरह से परिजोयना से बाहर करने का फ़ैसला किया.

सरकार ने कहा कि यह फ़ैसला किसी दबाव में आकर नहीं, बल्कि जनभावनाओं का सम्मान करते हुए लिया गया है. सरकार ने यह भी कहा कि इस फ़ैसले पर अलग-अलग राजनीतिक प्रतिक्रियाएं आना अपेक्षित है, मुख्य रूप से ऐसे समय में जब शिलांग संसदीय उपचुनाव नज़दीक हैं.

इस संशोधन के बाद अब यह परियोजना केवल मौजूदा रिज़ॉर्ट क्षेत्र तक ही सीमित रहेगा, जबकि लुम्पोंगडेंग द्वीप व्यावसायिक पर्यटन विकास के दायरे से बाहर ही रहेगा.