नई दिल्ली: अरुणाचल प्रदेश में बीते बुधवार (29 अप्रैल) को बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए, जहां अरुणाचल प्रदेश धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम (एपीएफआरए), 1978 को रद्द करने की मांग की गई. अरुणाचल क्रिश्चियन फोरम (एसीएफ) ने लोअर दिबांग वैली, वेस्ट सियांग, ईस्ट कामेंग और कामले सहित कई जिलों में रैलियां और धरने आयोजित किए.
राज्य के विभिन्न हिस्सों में सैकड़ों प्रदर्शनकारी एकत्र हुए, जिन्होंने नारे लगाए और तख्तियां लेकर विरोध जताया. यह आंदोलन शहरी क्षेत्रों के साथ-साथ दूरदराज इलाकों में भी तेज़ी से फैलता दिखा. ईटानगर में बड़ी संख्या में लोग इकट्ठा हुए और इस दशकों पुराने कानून के खिलाफ अपनी चिंताएं व्यक्त कीं. उनका दावा है कि यह कानून धार्मिक स्वतंत्रता को सीमित करता है.
1978 में पारित अरुणाचल प्रदेश धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम का उद्देश्य मूल रूप से प्रलोभन या जबरदस्ती के माध्यम से होने वाले धर्मांतरण को रोकना था. हालांकि, समय के साथ यह कानून विवाद और बहस का विषय बना रहा है, खासकर ईसाई समुदाय के बीच, जो इसे पुराना और दुरुपयोग की संभावना वाला मानते हैं.
हालांकि इस अधिनियम के तहत नियम लंबे समय तक नहीं बनाए गए थे, लेकिन हाल के वर्षों में इसके क्रियान्वयन को लेकर फिर से चर्चा शुरू होने से समाज के विभिन्न वर्गों में चिंता बढ़ गई है.
नागरिक समाज संगठनों और धार्मिक समूहों ने इसको रद्द करने की मांग तेज कर दी है, यह कहते हुए कि संविधान द्वारा प्रदत्त धर्मनिरपेक्ष मूल्यों और व्यक्तिगत स्वतंत्रताओं की रक्षा के लिए यह जरूरी है.
राज्य सरकार ने इस मुद्दे पर विभिन्न पक्षों के साथ विचार-विमर्श किया है, लेकिन अब तक कोई सर्वसम्मति नहीं बन पाई है.
एसीएफ के अध्यक्ष जेम्स तेची तारा ने राज्य की राजधानी में एक रैली को संबोधित करते हुए कहा, ‘एपीएफआरए को समाप्त करने की मांग पिछले 50 वर्षों से जारी है और हमारी आवाज आज भी वैसी ही है.’
उन्होंने आरोप लगाया कि यह कानून संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन करता है. तारा ने कहा, ‘यह एक लोकतांत्रिक देश में किसी भी धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता का हनन करता है. हमें लगता है कि यह कानून विशेष रूप से ईसाइयों को निशाना बनाता है.’
उन्होंने सरकार के साथ हुई बैठकों में ठोस प्रगति न होने पर भी असंतोष जताया. उन्होंने कहा, ‘हमने अब तक सरकार के साथ कई बैठकों में भाग लिया है, लेकिन कोई ठोस परिणाम नहीं निकला.’
विभिन्न धरना स्थलों पर वक्ताओं ने इसी तरह के विचार व्यक्त करते हुए कहा कि जब तक इस कानून को समाप्त नहीं किया जाता, आंदोलन जारी रहेगा.
एक प्रदर्शनकारी ने कहा, ‘यह एक लोकतांत्रिक विरोध है और जब तक सरकार हमारी बात नहीं सुनती, हम शांतिपूर्वक अपनी आवाज उठाते रहेंगे.’
ईस्ट सियांग जिले में, ईस्ट सियांग क्रिश्चियन फोरम (ईएससीएफ) ने गुरुवार को पासीघाट के फार्म यार्ड में एक शांतिपूर्ण धरना आयोजित किया. इस कार्यक्रम में सैकड़ों लोग शामिल हुए और एपीएफआरए के तहत नियम बनाए जाने के विरोध में अपनी आवाज उठाई.
मणिपुर: ताज़ा हिंसा के बीच ईसाई फोरम ने की शांति की अपील
एक सर्वधर्मसमभाव (इक्यूमेनिकल) ईसाई संगठन ने मणिपुर में जारी हिंसा के बीच प्रशासन और प्रतिद्वंद्वी जातीय समूहों से संवाद शुरू कर शांति बहाल करने की अपील की है. संगठन ने चेतावनी दी कि नई हिंसा पहले से गंभीर मानवीय संकट को और गहरा कर रही है.
नई दिल्ली स्थित यूनाइटेड क्रिश्चियन फोरम (यूसीएफ), जो कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट समुदायों का प्रतिनिधित्व करता है, ने मणिपुर सरकार और संघर्षरत समूहों के नेताओं से राज्य में बढ़ती झड़पों, हत्याओं और विरोध प्रदर्शनों के बीच हस्तक्षेप करने का आग्रह किया.
25 अप्रैल को मुख्यमंत्री युमनाम खेमेंचंद सिंह को लिखे पत्र में संगठन ने कहा, ‘हम जो देख रहे हैं वह कोई अस्थायी अशांति नहीं, बल्कि एक गंभीर और बढ़ता हुआ मानवीय संकट है.’
क्षेत्रीय प्रवक्ता टोको तेकी द्वारा हस्ताक्षरित इस पत्र में स्थिति के लगातार बिगड़ने पर ‘गहरी चिंता’ व्यक्त की गई.
इसमें कहा गया है कि स्थानीय चर्च नेताओं ने बताया कि अप्रैल की शुरुआत में तनाव में आई अस्थायी शांति टूट गई, जिससे तीन प्रमुख समुदायों – खासकर हिंदू मेईतेई तथा बड़े पैमाने पर ईसाई कुकी और नगा जनजातीय समूहों – के बीच नए सिरे से टकराव शुरू हो गए.
स्थानीय मीडिया के अनुसार, हाल के हफ्तों में हिंसा, विरोध और सुरक्षा बलों के साथ झड़पों में कम से कम 10 लोगों की मौत हो चुकी है.
तनाव 7 अप्रैल को बिष्णुपुर जिले में हुए एक विस्फोट के बाद और बढ़ गया, जिसमें दो मेईतेई बच्चों – एक पांच वर्षीय लड़का और उसकी बहन की मौत हो गई और उनकी मां घायल हो गई. मेईतेई समूहों ने इस हमले के लिए कुकी उग्रवादियों को जिम्मेदार ठहराया, जिसे कुकी नेताओं ने नकार दिया और इसके लिए मेईतेई भूमिगत समूहों की संभावित संलिप्तता की बात कही.
इस घटना के बाद इंफाल घाटी सहित राज्य की राजधानी में व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए, जहां प्रदर्शनकारियों ने न्याय की मांग की. इस दौरान अशांति और सुरक्षा बलों के साथ झड़पों में कम से कम तीन और लोगों की मौत हुई और सैकड़ों लोग घायल हुए.
हिंसा अन्य क्षेत्रों में भी फैल गई. 18 अप्रैल को उखरूल जिले में एक घात लगाकर किए गए हमले में दो नगा पुरुषों की हत्या कर दी गई. नगा समूहों ने इसके लिए कुकी उग्रवादियों को जिम्मेदार ठहराया, हालांकि उन्होंने इस आरोप से इनकार किया.
अपील में यूसीएफ ने प्रमुख संगठनों – जैसे यूनाइटेड नगा काउंसिल, कुकी इनपी मणिपुर और मेईतेई समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाली कोऑर्डिनेटिंग कमेटी ऑन मणिपुर इंटीग्रिटी – के नेताओं से हस्तक्षेप कर तनाव कम करने में मदद करने का आग्रह किया.
संगठन ने सभी पक्षों से ‘समुदाय, धर्म और पहचान के मतभेदों से ऊपर उठकर’ राज्य के लोगों के हित में बातचीत के जरिए समाधान की दिशा में काम करने का आह्वान किया.
मणिपुर में मई 2023 से जातीय हिंसा जारी है, जब मेईतेई और कुकी-ज़ो समुदायों के बीच उस प्रस्ताव के खिलाफ विरोध के बाद झड़पें शुरू हुई थीं, जिसमें मेईतेई समुदाय को जनजातीय दर्जा देने की मांग की गई थी.
कुकी-ज़ो समूहों को डर है कि ऐसा दर्जा मिलने से उनके मौजूदा संरक्षण – जैसे आरक्षित राजनीतिक प्रतिनिधित्व, आरक्षण के लाभ और जनजातीय क्षेत्रों में भूमि स्वामित्व पर प्रतिबंध – कमज़ोर हो सकते हैं. इस संघर्ष में अब तक 260 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है, 60,000 से ज्यादा लोग विस्थापित हुए हैं और 11,000 से अधिक घर नष्ट हो चुके हैं.
चर्च सूत्रों के अनुसार, 360 से अधिक चर्च और ईसाई संस्थान भी क्षतिग्रस्त या जला दिए गए हैं, और लगभग 41 प्रतिशत आबादी वाले आदिवासी ईसाई समुदाय सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं.
चर्च नेताओं ने चेतावनी दी है कि यदि तत्काल हस्तक्षेप और संवाद नहीं हुआ, तो नई हिंसा क्षेत्र को और अस्थिर कर सकती है और सामुदायिक विभाजन को और गहरा कर सकती है.
मणिपुर: कांग्रेस ने एनआरसी पर सीएम की टिप्पणियों की आलोचना की
मणिपुर में विपक्षी कांग्रेस ने सोमवार (27 अप्रैल) को मुख्यमंत्री युमनाम खेमेंचंद सिंह की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि राष्ट्रीय नागरिक पंजी (एनआरसी) की प्रक्रिया को जनगणना से जोड़ने से जनता के बीच भ्रम पैदा हुआ है.
मणिपुर प्रदेश कांग्रेस समिति के उपाध्यक्ष हरेश्वर गोस्वामी ने मुख्यमंत्री की हालिया टिप्पणियों की निंदा करते हुए उन्हें ‘भ्रामक’ बताया और कहा कि एनआरसी अपडेट करने के लिए जनगणना कराना कोई पूर्व-शर्त नहीं है.
गोस्वामी ने स्पष्ट किया कि एनआरसी को नागरिकता अधिनियम, 1955 के प्रावधानों के तहत अपडेट किया जाता है, जबकि जनगणना जनगणना अधिनियम, 1948 के तहत कराई जाती है. उन्होंने जोर देकर कहा कि दोनों प्रक्रियाएं अलग-अलग कानूनी ढांचे और प्राधिकरणों के अधीन संचालित होती हैं.
मुख्यमंत्री पर तीखा हमला करते हुए वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने कहा कि संवैधानिक या उच्च सार्वजनिक पदों पर आसीन व्यक्तियों को ऐसे बयान देने से बचना चाहिए, जो महत्वपूर्ण नीतिगत मुद्दों पर नागरिकों को गुमराह या भ्रमित कर सकते हों.
पड़ोसी राज्य असम के अनुभव का हवाला देते हुए गोस्वामी ने कहा कि वहां एनआरसी को 1951 की जनगणना को आधार दस्तावेज मानकर, अन्य स्वीकार्य अभिलेखों के साथ अपडेट किया गया था, जिससे यह स्पष्ट होता है कि इस प्रक्रिया के लिए नई जनगणना कराना अनिवार्य नहीं है.
उन्होंने एनआरसी के मुद्दे पर सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के भीतर भी असंगति का आरोप लगाया.
राज्य कांग्रेस के उपाध्यक्ष ने दावा किया कि नवंबर 2019 में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में घोषणा की थी कि एनआरसी को पूरे देश में अपडेट किया जाएगा.
हालांकि, गोस्वामी ने इसकी तुलना दिसंबर 2019 में नई दिल्ली के प्रगति मैदान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक बयान से की, जिसमें उन्होंने कथित तौर पर कहा था कि देशभर में एनआरसी लागू करने पर कोई चर्चा नहीं हुई है.
कांग्रेस नेता ने आगे फरवरी 2019 में पूर्व मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह द्वारा विधानसभा सत्र के दौरान दिए गए एक बयान का भी उल्लेख किया, जिसमें उन्होंने कहा था कि एनआरसी को अपडेट करने की सिफारिश केंद्र सरकार को भेजी गई थी.
गोस्वामी ने सवाल उठाया कि उस समय एनआरसी से पहले जनगणना कराने का मुद्दा क्यों नहीं उठाया गया और वर्तमान रुख को विरोधाभासी बताया, खासकर इसलिए क्योंकि राज्य में पूर्व और वर्तमान दोनों नेतृत्व एक ही राजनीतिक दल से संबंधित हैं.
इस बीच, मणिपुर में विपक्षी कांग्रेस ने राज्य में आगामी जनगणना को स्थगित करने की भी मांग की है.
पार्टी का कहना है कि जब तक सामान्य स्थिति पूरी तरह बहाल नहीं हो जाती और जातीय हिंसा से प्रभावित सभी आंतरिक रूप से विस्थापित लोग अपने मूल स्थानों पर लौट नहीं जाते, तब तक इस प्रक्रिया को टाल दिया जाना चाहिए.
इस महीने की शुरुआत में मणिपुर के राज्यपाल अजय कुमार भल्ला को सौंपे गए एक ज्ञापन में मणिपुर कांग्रेस अध्यक्ष ओक्रम इबोबी सिंह ने राज्य में कानून-व्यवस्था की मौजूदा स्थिति पर चिंता जताई.
उन्होंने बताया कि 8 फरवरी से 10 अप्रैल के बीच राज्य के विभिन्न जिलों में अलग-अलग हिंसक घटनाओं में कम से कम आठ लोगों की मौत हुई, जिनमें दो बच्चे और सीमा सुरक्षा बल का एक जवान भी शामिल है.
सिंह, जो 2001 से 2017 तक तीन कार्यकाल के लिए मुख्यमंत्री रहे, ने 7 अप्रैल को बिष्णुपुर जिले के त्रोंगलाओबी गांव में दो नाबालिग बच्चों की हत्या की जांच में तेजी लाने और दोषियों को निर्धारित समयसीमा के भीतर न्याय के कटघरे में लाने की भी मांग की.
मिजोरम: ज़ोरम पीपुल्स मूवमेंट ने आइजोल नगर निकाय चुनाव में 19 में से 17 वार्ड जीते
मिजोरम के 2026 नगर निकाय चुनावों में सत्तारूढ़ ज़ोरम पीपुल्स मूवमेंट (जेडपीएम) ने आइजोल नगर निगम (एएमसी) के 19 में से 17 वार्ड जीत लिए और राज्य की राजधानी में अपनी राजनीतिक पकड़ और मजबूत कर ली.
राज्य चुनाव कार्यालय द्वारा सोमवार को घोषित अंतिम नतीजों के अनुसार, मुख्य विपक्षी मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) और कांग्रेस को एक-एक सीट मिली.
2026 के इन चुनावों में महिला उम्मीदवारों की सफलता भी उल्लेखनीय रही. कुल नौ महिलाएं चुनी गईं, जिनमें से छह ने महिलाओं के लिए आरक्षित वार्डों से और तीन ने सामान्य वार्डों से जीत हासिल की.
एमएनएफ की एकमात्र विजेता उम्मीदवार बी. लालावम्पुई ने नगर निकाय चुनावों में अपनी तीसरी जीत दर्ज की. वह 2015 में वार्ड 9 से आरक्षित महिला सीट पर पहली बार चुनी गई थीं और बाद में सामान्य श्रेणी से लगातार दो बार जीत हासिल की.
पिछली एएमसी परिषद का नेतृत्व एमएनएफ के पास था, जिसने 2021 के चुनावों में बहुमत हासिल किया था. इस बार के चुनावों में महिला मतदाताओं की संख्या पुरुषों से 19,000 से अधिक रही.
इस चुनाव में पहली बार होम वोटिंग की सुविधा भी शुरू की गई. 13 से 16 अप्रैल के बीच वरिष्ठ नागरिकों और दिव्यांगजनों के लिए आयोजित इस प्रक्रिया में पंजीकृत मतदाताओं में 93.71 प्रतिशत मतदान हुआ.
मुख्यमंत्री के सलाहकार और विधायक टीबीसी लालवेंछुंगा ने कहा, ‘हमने मिजोरम को बदलने और विकास के नए दौर में ले जाने के लिए हर संभव प्रयास किया है; यह स्पष्ट है कि आइजोल की शहरी आबादी ने हमें अपने जनादेश से धन्यवाद दिया है.’
भारत में स्कूल जाने वाले लगभग 7% बच्चे मोटापे से ग्रस्त हैं; अरुणाचल प्रदेश सबसे ज़्यादा प्रभावित: अध्ययन
एक ताजा अध्ययन के मुताबिक, भारत में लगभग 7% बच्चे मोटापे के शिकार हैं, और पूरे देश में यह संख्या तेज़ी से बढ़ रही है. यह रिसर्च ‘इंडियन जर्नल ऑफ़ कम्युनिटी मेडिसिन’ में पब्लिश हुई थी. इसमें 125 अध्ययनों के 510,605 प्रतिभागियों के डेटा का विश्लेषण किया गया.
आईसीएमआर-राष्ट्रीय पारंपरिक चिकित्सा संस्थान के वैज्ञानिकों तथा भारत और ब्रिटेन के शोधकर्ताओं ने यह भी बताया कि मध्य भारत में मोटापे की दर सबसे कम 5.63% रही, जबकि उत्तर भारत में यह सबसे अधिक 8.58% दर्ज की गई.
1995 से 2023 के बीच किए गए इस अध्ययन में पाया गया कि भारत के 6.97% स्कूली बच्चे मोटापे से ग्रस्त हैं.
लड़कों में मोटापे की दर लगभग 6.37% पाई गई, जबकि लड़कियों में यह 6.38% रही. दोनों लिंगों को मिलाकर किए गए अध्ययनों में यह दर थोड़ी अधिक, 7.74% दर्ज की गई.
राज्यवार आंकड़ों में अरुणाचल प्रदेश में सबसे अधिक 17.92% बच्चे मोटापे से ग्रस्त पाए गए, इसके बाद दिल्ली में 13.57% की दर रही. वहीं मणिपुर में यह दर सबसे कम, मात्र 0.80% दर्ज की गई.
अधिकांश शोध दक्षिण भारत से आए, जहां से 37.6% अध्ययन किए गए थे. इसके बाद उत्तर भारत से 18.4%, पश्चिम भारत से 12.8% और पूर्वोत्तर भारत से 10.4% अध्ययन शामिल थे.
पूर्वी भारत और जिन क्षेत्रों का स्पष्ट उल्लेख नहीं था, दोनों का योगदान 7.2% रहा, जबकि मध्य भारत से सबसे कम 6.4% अध्ययन शामिल हुए.
बचपन में बढ़ते मोटापे को देश की तेज़ आर्थिक वृद्धि, बदलती जीवनशैली और खानपान की आदतों में बदलाव से जोड़ा गया है. बच्चों की शारीरिक गतिविधियां घट रही हैं, जबकि उनका भोजन अधिक प्रोसेस्ड और उच्च कैलोरी वाला होता जा रहा है.
अमेरिका और चीन के बाद भारत अब दुनिया का तीसरा सबसे अधिक मोटापे वाला देश बन चुका है.
राष्ट्रीय आंकड़े, जिनमें राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-4, 2015-16) भी शामिल है, दिखाते हैं कि पिछले एक दशक में भारत में मोटापे का स्तर लगातार बढ़ रहा है.
पिछले 30 वर्षों में विभिन्न क्षेत्रों और जनसंख्या समूहों में मोटापे की दर में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है.
अध्ययनों से पता चलता है कि अब 10% से 30% किशोर अधिक वजन (ओवरवेट) की श्रेणी में आते हैं. भारत में बचपन का मोटापा 2006 में 9.8% से बढ़कर 2009 में 11.7% हो गया.
