नई दिल्ली: असम विधानसभा ने 27 मई को विपक्षी दलों के कड़े विरोध के बीच विवादास्पद समान नागरिक संहिता (यूसीसी) विधेयक पारित कर दिया.
असम सरकार ने इस सप्ताह की शुरुआत में यूसीसी विधेयक पेश किया था. कागज़ों पर यह कानून बहुविवाह पर रोक लगाने का दावा करता है, लेकिन व्यापक रूप से इसे सांप्रदायिक प्रकृति का माना जा रहा है. असम में यह कानून लिव-इन संबंधों के पंजीकरण को भी अनिवार्य बना देगा.
विधेयक पारित होने के बाद असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा ने एक्स पर लिखा, ‘यह सबसे अधिक धर्मनिरपेक्ष, समान और प्रगतिशील कानून है, जो विशेष रूप से असम की नारीशक्ति को बहुविवाह और ‘लव जिहाद’ से सुरक्षा देकर लाभान्वित करेगा. यह इन अपराधों को दंडनीय बनाता है और महिलाओं को विरासत, तलाक तथा परित्याग के मामलों में पूर्ण अधिकार सुनिश्चित करता है.’
‘लव जिहाद’ हिंदुत्व की राजनीति द्वारा फैलाया गया एक मनगढ़ंत डर है, जिसमें यह दावा किया जाता है कि मुस्लिम पुरुष शादी के ज़रिए हिंदू महिलाओं का धर्म परिवर्तन कराने की कोशिश करते हैं.
यह विधेयक असम में रहने वाले अनुसूचित जनजाति (एसटी) समुदायों पर लागू नहीं होगा. इससे यह सवाल उठ रहा है कि महिलाओं को दिए जाने वाले कानूनी संरक्षण एसटी महिलाओं तक क्यों नहीं बढ़ाए गए.
विधानसभा और एक्स पर मुख्यमंत्री ने इस कदम का बचाव करते हुए कहा, ‘हमारे आदिवासी समुदायों ने लंबे समय से मजबूत पारंपरिक व्यवस्थाओं और सामूहिक सामाजिक जिम्मेदारी के माध्यम से महिलाओं की गरिमा की रक्षा की है. उनसे बहुत कुछ सीखा जा सकता है.’
विधेयक का विरोध
हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, कांग्रेस विधायक दल के नेता वाज़िद अली चौधरी ने कहा कि यूसीसी व्यक्तिगत आज़ादी का हनन करेगा और भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में सामाजिक और धार्मिक तनाव पैदा करेगा.
कांग्रेस विधायकों ने अनुसूचित जनजाति की महिलाओं को कानून के दायरे से बाहर रखने के फैसले पर भी सवाल उठाए. कांग्रेस विधायक जाकिर हुसैन सिकदर ने कहा कि विधेयक पेश करने से पहले पर्याप्त परामर्श नहीं किया गया.
सिकदर ने कहा: ‘यह कानून राजनीतिक दलों, सामाजिक समूहों, धार्मिक निकायों, संगठनों और आम जनता से व्यापक विचार-विमर्श किए बिना सदन में पेश किया गया.’
उन्होंने आगे कहा, ‘असम में पहले से ही बहुविवाह, बाल विवाह पर रोक तथा विवाह और तलाक के अनिवार्य पंजीकरण के कानून मौजूद हैं. फिर यूसीसी की आवश्यकता ही क्या है?’
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) के विधायक मजीबुर रहमान और तृणमूल कांग्रेस के विधायक शेरमैन अली अहमद ने भी विधेयक पर आपत्तियां जताईं.
रायजोर दल के अखिल गोगोई ने कहा कि यह विधेयक उत्पीड़न का रास्ता खोलेगा. उन्होंने कहा, ‘इस विधेयक का मकसद निजी संबंधों को सरकारी नियंत्रण में लाना है. इसमें लिव-इन संबंधों और उनसे जुड़े मामलों के पंजीकरण को अनिवार्य बनाया गया है. इसके लिए एक सब-रजिस्ट्रार नियुक्त किया जाएगा, जो स्थानीय पुलिस थाने को ऐसे संबंधों की जानकारी देगा.’
विधेयक के समर्थन में विधायक
असम विधानसभा में सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के विधायकों ने कहा कि यह विधेयक महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए है और किसी धर्म या धार्मिक प्रथा के खिलाफ नहीं है.
पीटीआई के अनुसार, उन्होंने और मुख्यमंत्री शर्मा ने इसे ‘ऐतिहासिक कदम’ बताया.
विधेयक में कई दंडात्मक प्रावधान प्रस्तावित किए गए हैं, जिनके दुरुपयोग की आशंका जताई जा रही है. इनमें दो या उससे ज़्यादा शादियां करने पर सात साल की जेल और लिव-इन रिश्ते का रजिस्ट्रेशन न करवाने पर तीन महीने की जेल शामिल है.
भाजपा विधायक पीयूष हजारिका ने कहा, ‘अगर एक खास तबके के पुरुषों को अपनी पिछली पत्नियों की सहमति के बिना चार बार शादी करने की अनुमति है, तो इसे न्याय व्यवस्था कैसे कहा जा सकता है?’
उन्होंने किसी धर्म का नाम लिए बिना कहा, ‘अगर हम सभी धर्मों की समानता की बात करते हैं, तो उस समुदाय के ऐसे पुरुषों को जेल भेजा जाना चाहिए.’
उन्होंने यह भी दावा किया कि प्रस्तावित कानून लिव-इन संबंधों पर प्रतिबंध नहीं लगाता, बल्कि केवल उनका पंजीकरण अनिवार्य करता है.
विधेयक के समर्थन में बोलने वालों में असम गण परिषद (एजीपी) के विधायक पृथ्वीराज रावा भी शामिल थे. उन्होंने कहा कि यूसीसी कानून राज्य में बदलते जनसांख्यिकीय स्वरूप से निपटने में मदद करेगा.
पीटीआई के अनुसार, उन्होंने कहा, ‘एक से ज्यादा बार शादी मुख्य समस्या नहीं है. असली मुद्दा कई शादियों से होने वाले कई बच्चे हैं, जिससे जनसंख्या विस्फोट हो रहा है और जनसांख्यिकीय पैटर्न में बदलाव आ रहा है.’
बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट के विधायक रबीराम नारजरी ने भी विधेयक का समर्थन किया.
