ईरान पर इज़रायली हमले और ट्रंप की धमकी से बेनकाब अंतरराष्ट्रीय राजनीति का असली चेहरा

इज़रायल ईरान पर यह कहकर हमला करता है कि उसके वजूद के लिए वह ख़तरा है. एक मुल्क जिसके पास परमाणु बम हैं, एक पड़ोसी मुल्क पर हमला करता है यह कहकर कि वह परमाणु बम बनाने के क़रीब है.

हिंदुत्ववादियों का प्रिय शगल: बक़रीद पर शाकाहारी मुसलमानों की खोज

पिछले कई वर्षों से बक़रीद के नज़दीक आते ही हिंदुओं की तरफ़ से क़ुर्बानी के ख़िलाफ़ शोर बढ़ने लगता है. कई जगह क़ुर्बानी को मुश्किल बनाने के लिए राजकीय नियम कड़े कर किए जाते हैं. सार्वजनिक जगहों पर क़ुर्बानी की मनाही से लेकर दूसरी तरह की पाबंदियां लगाई जाती हैं.

महमूदाबाद के बहाने अब अशोका यूनिवर्सिटी पर प्रहार

महमूदाबाद के बहाने अब अशोका विश्वविद्यालय पर हमला हो रहा है. क्या हम इस प्रख्यात संस्थान से उम्मीद कर सकते हैं कि वह हॉर्वर्ड की तरह सरकार के सामने सिर उठाकर खड़ा हो जाए? शायद वह परंपरा हमारे यहां नहीं है. संभावना यह है कि इस बार फिर इस संस्थान के आका भाजपा को संतुष्ट करने के लिए कोई बलि दे देंगे.

ऑपरेशन सिंदूर: संकट के समय राष्ट्रवाद और सामाजिक विवेक की परीक्षा

22 अप्रैल के बाद के हफ़्तों में साबित हुआ कि एक समाज के तौर पर हम परिपक्व नहीं हैं. कोई भी असाधारण घटना हमें जड़ से हिला दे सकती है. इस पूरी परिस्थिति में दहशतगर्दी और पाकिस्तान विरोध के बहाने जो नया उबाल दिखा उसने फिर साबित किया कि भारत की सबसे बड़ी समस्या मुस्लिम समुदाय के प्रति घृणा है.

मुस्लिम सेना अधिकारी महज़ सफल प्रतीक, इससे समुदाय के प्रति सरकार की बेरुख़ी नहीं धुल पाएगी

जिस सरकार ने अब सोफ़िया कुरैशी को अपना चेहरा बनाकर खड़ा किया है, वह एक फ़ौजी की पत्नी के साथ नहीं खड़ी हुई. सिर्फ़ इसलिए उसे अकेला छोड़ दिया गया कि वह अपनी तकलीफ़ के साथ और उसके बावजूद मुसलमानों के साथ खड़ी हुई थी.

पहलगाम हमला: हिमांशी की नैतिकता का सामना कैसे करेंगे उग्र ट्रोल

हिमांशी नरवाल के बयान में इंसानियत जगाने की जो ताक़त थी, उससे घबराकर हिंदुत्ववादी गिरोह उनकी साख ख़त्म करने के लिए कुत्सा अभियान चलाए हुए हैं. एक साधारण हिंदू के लिए यह परीक्षा की घड़ी है: वह हिमांशी के साथ खड़ा होगा या उस पर हमलावर हिंदुत्ववादियों के साथ?

जीवन के तमाम फैसले जाति के आधार पर, फिर क्यों जाति जनगणना का विरोध?

जाति जनगणना की घोषणा पहलगाम में आतंकवादी हिंसा की उत्तेजना के बीच की गई है. लोग पूछ रहे हैं कि पांच साल तक कश्मीर को अपने क़ब्ज़े में रखने के बाद भी भाजपा सरकार क्यों सैलानियों की हिफ़ाज़त नहीं कर पाई? इस सवाल से ध्यान हटाने के लिए सरकार ने जातिगत जनगणना का ऐलान किया, अख़बारों और टीवी चैनलों को एक विषय दे दिया.

जेएनयू छात्रावास में उत्तर पूर्वी छात्रों के आरक्षण की मांग पूर्वाग्रह से पोषित

जेएनयू के उत्तर पूर्व के विद्यार्थियों के अनुसार उन्हें अलग सुरक्षित जगह चाहिए, या ऐसी जगह जहां वे बहुसंख्या में हों. क्या अब मान लिया जाए कि बहुसंख्या ही सुरक्षा की गारंटी है? जो मांग दिल्ली में वे अपने लिए उठा रहे हैं, क्या वही दूसरे इलाक़ों में वहां बाहर से आये लोग कर सकते हैं?

बस्तर: क्या राज्य और माओवादियों के बीच चल रहा युद्ध बस एक ‘भ्रम’ है?

माओवादियों और राज्य के इस खेल में पड़े बिना हमें सरकार से सशस्त्र कार्रवाई बंद करने की मांग करनी चाहिए. माओवादियों को घोषणा करनी चाहिए कि वे हिंसा रोक रहे हैं. राज्य के लिए बस्तर सिर्फ़ संसाधनों का भंडार है. माओवादियों के लिए यह सिर्फ़ एक आधार है जहां से वे अपनी 'क्रांति' का विस्तार करेंगे. लेकिन बस्तर वास्तव में वहां रहने वाले लोग मिलकर बनाते हैं. वे आदिवासी ही प्राथमिक हैं. न राज्य, न माओवादी.

नरेंद्र मोदी आरएसएस के असली ‘सपूत’ हैं और संघ मोदी का सबसे बड़ा लाभार्थी

आरएसएस के जिस विचार को ढांक-तोपकर अटल बिहारी या लालकृष्ण आडवाणी व्यक्त करते थे, उसे मोदी के मुंह से बिना किसी संकोच के सुना जा सकता है. और मोदी के कारण ढेर सारे बुद्धिजीवी और उद्योगपति आरएसएस को सलामी बजाते हैं. आरएसएस को और क्या चाहिए?

भारतीय राज्य मुसलमानों की हर गतिविधि को अपराधी कृत्य की तरह पेश कर रहा है

पहले हम हिंदुत्ववादियों को मुसलमान विरोधी घृणा फैलाते और हिंसा करते देखते थे, अब पुलिस व प्रशासन को ऐसा करते देख रहे हैं. पुलिस सक्रिय रूप से मुसलमानों को अंधेरे में धकेल रही है. भारत के हिंदुत्ववादीकरण का यह अंतिम चरण है जहां सरकारी मशीनरी मुसलमानों के अपराधीकरण के नए तरीक़े खोज रही है.

सौगात-ए-मोदी: खून से लिथड़ा हाथ अपने शिकार के मुंह में ठूंस रहा मिठाई

मुसलमानों के ख़िलाफ़ घृणा और हिंसा को हिंदू समाज के स्वभाव का अनिवार्य तत्त्व बनाने का अभियान नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में कामयाब हुआ है. क़ातिल को मक़तूल का अभिभावक बनाकर पेश करने से बड़ी अश्लीलता क्या हो सकती है?

त्योहार की नयी परिभाषा: मुसलमान विरोधी हिंदू सामूहिकता का जश्न

सद्भाव का बीज दिखलाई पड़ते ही उस पर घृणा का तेज़ाब डाल दिया जाता है. यह नहीं कि सद्भाव की संभावना नहीं है लेकिन उसे यथार्थ करने की इच्छा और मनोबल का अभाव है.

विश्वविद्यालय सत्ता के वाहक और प्रचारक नहीं हैं: अपूर्वानंद का डीयू वीसी योगेश सिंह को पत्र

विश्वविद्यालय के अधिकारी जब मानदंडों का उल्लंघन करते हैं, तो अध्यापक समुदाय पर इसका भयानक असर होता है. नौजवान अध्यापकों को विशेष रूप से यह डर रहने लगेगा कि उन्हें उनकी स्वतंत्र राय के लिए दंडित किया जा सकता है.

होली और मुसलमान: क्या घृणा की बातों का बुरा न मानें, जैसे होली की गालियों का नहीं मानते!

अनुज चौधरी ने जुमे का ज़िक्र कर इशारा किया कि मुसलमानों को होली के रंग से ऐतराज़ है. कुछ लोगों ने कहा कि ऐतराज़ औरों को भी हो सकता है- कुछ को रंग से एलर्जी हो सकती है, कुछ को रंग पसंद न हों. वे सब मुसलमान हों, ज़रूरी नहीं. जो अनिच्छुक हैं, उन्हें रंग लगाने की ज़िद ही क्यों!