बांकुड़ा कई साम्राज्यों के अधीन रहा, अंग्रेज़ों ने भी यहां शासन किया और राजस्व भी बटोरा लेकिन ग्रामीण समाज तथा रीति रिवाज़ों पर कोई छाप नहीं छोड़ पाए. यहां के वासियों के जीवन पर ऋतुओं, कृषि चक्र, चैतन्य महाप्रभु और वैष्णव पंथ, तथा स्थानीय देवी-देवताओं का प्रभाव बना रहा.
अगर बंदर टोपी और मफ़लर पश्चिम बंगाल में शीतकाल के प्रतीक हैं तो खजूर का गुड़ सर्दियों का स्वाद. बंगाल के लोग-बाग बाज़ार में खजूर के गुड़ के आने का इंतज़ार करते हैं. बंगाल के इस स्वाद को जानिए बंगनामा की इस क़िस्त में.
1993 में अलीपुरद्वार में एकाएक आई बाढ़ ने सब कुछ बदलकर रख दिया था. देर से पहुंची राहत, अन्न की लूटपाट व दंगे स्थिति को और भयावह बना रहे थे. ऐसे में सबडिवीज़न के प्रशासन को सेना का ही सहारा था, पर क्या सेना के लिए यह मदद करना संभव था? पढ़िए बंगनामा की पैंतीसवीं क़िस्त.
एकाएक आई बाढ़ के अगले दिन अलीपुरद्वार से कालजानी का पानी उतरने लगा, और पीछे छोड़ गया कीचड़ से भरे घर, मवेशियों के शव और मटमैले पानी से भरी सड़कें और क्रुद्ध शहरवासी. इन सबसे निपटने का क्या रास्ता था? क्या सरकार को इसकी ख़बर थी? पढ़िए बंगनामा की चौंतीसवीं क़िस्त.
20 जुलाई 1993 को अलीपुरद्वार सबडिवीज़न में भीषण वर्षा हुई— नदी किनारे बसे इस शहर की रक्षा के लिए बना बांध कई स्थानों से टूटने लगा और पानी तेज़ी से नगर में घुसा. लेकिन बांध कैसे टूटा और पूरे शहर में पानी इतनी जल्दी क्यों भर गया? बंगनामा की तैंतीसवीं क़िस्त.
20 जुलाई 1993 को अलीपुरद्वार सबडिवीज़न के उत्तरी भाग में कालजानी नदी के जल ग्रहण क्षेत्र में भीषण वर्षा हुई— 24 घंटों में 99 सेंटीमीटर. फलस्वरूप अगले दिन नदी किनारे बसे इस शहर की रक्षा के लिए बना बांध कई जगहों पर टूट गया... बंगनामा की बत्तीसवीं क़िस्त.
हम अपनी मां की अस्थियों को गंगासागर में विसर्जित करने आए थे. असीम व्यथा के शोर में केवल खोने का आर्तनाद नहीं होता; और भी स्वर मिले होते हैं— एक संसार के टूटने की निष्ठुर प्रतिध्वनि, एक अंग के विच्छिन्न हो जाने की अनंत चीख, सैकड़ों अधूरी मुरादों और अफ़सोस. लहरें इन सबको समेट ले जाती हैं. बंगनामा की इकत्तीसवीं क़िस्त.
कुछ कवि सचमुच पूरे विश्व के होते हैं. शेक्सपियर के जन्म स्थान के एक शांत स्थल पर रबींद्रनाथ टैगोर की मूर्ति को देखकर मुझे लगा कि गुरुदेव को भी यह जगह पसंद आती. बंगनामा की तीसवीं क़िस्त.
एक बार बंगाल के एक जंगल में एक वृद्ध रास्ता भटक जाने पर किसी जंगली पौधे के सहारे जीवित रहा, और लौटकर धीरे-धीरे युवा होता गया. उसके बाद कई लोग उन पहाड़ी ढलानों पर भटके, कई झाड़ियों के पत्तों को चबाकर मुंह कड़वा किया, लेकिन किसी को भी वह पौधा हाथ न लगा. बंगनामा की 29वीं क़िस्त.
श्रम विभाग द्वारा बनाई गई नियमावली इतनी औपचारिक थी कि अगर कर्मचारी संगठन अधिकारियों का घेराव भी करना चाहता हो तो उसे नियमानुसार उसकी अग्रिम सूचना देनी पड़ती थी. बंगनामा की 28वीं क़िस्त.
उन दिनों बिजली की बहुत कमी रहा करती थी. आए-दिन बिजली कट जाती थी, जिसे लोडशेडिंग कहा जाता था. असलियत यह थी कि औद्योगिक क्षेत्रों के मुक़ाबले ग्रामीण क्षेत्र में इसका प्रभाव अधिक होता था, और लोग मानते थे कि लोड शेडिंग की अवधि का कलकत्ता से दूरी से सीधा संबंध है. पढ़ें, बंगनामा की सत्ताईसवीं क़िस्त.
डेढ़ बजे से चार बजे तक कोई भी अफ़सर या कर्मचारी टिफिन करने के लिए अपनी कुर्सी से ग़ैरहाज़िर हो सकता है. यह हर कर्मचारी का गणतांत्रिक अधिकार है. बंगनामा की इस क़िस्त में पढ़िए बंगाल में कर्मचारियों के लंच ब्रेक का क़िस्सा.
उत्तर और दक्षिण बंगाल के ज़िलों में काम करते हुए मैंने पाया कि फ़रवरी-मार्च के महीनों में सरकारी कर्मचारी बच्चों की परीक्षाओं के समय दफ़्तर से छुट्टी लिया करते थे. बंगाली समाज में शिक्षा की महत्ता और प्रतिष्ठा की वजह से ही बच्चों की परीक्षाओं का इतना अधिक महत्व है.
पश्चिम बंगाल के ग्रामीण इलाक़ों में वैन रिक्शा बहुउद्देशीय वाहन है. ऋतुओं के अनुसार वैन रिक्शे की सवारी भी बदलती रहती है, जहां कभी आलू की बोरियों से लेकर नव-विवाहित दंपत्ति और दुर्गा मां की प्रतिमाएं तक सफ़र करते हैं. बंगनामा की चौबीसवीं क़िस्त.
1992 के अप्रैल महीने में ख़बर छपी कि ‘दीघा में मत्स्य कन्या’ मिली है. ख़बर पाते ही सरकारी महकमों सहित आम लोग भी समुद्र तट की ओर उमड़ने लगे, पर बाद में समझ आया कि माजरा कुछ और ही था. बंगनामा की तेइसवीं क़िस्त.