2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों के छह साल बाद अगर पीछे मुड़कर देखा जाए, तो यह सांप्रदायिक नरसंहार सबसे अलग है. केंद्र और प्रदेश सरकारों ने अपने नागरिकों को हिंसा से बचाने, उनकी ज़िंदगी फिर से पटरी पर लाने और न्याय दिलाने में मदद करने की अपनी ज़िम्मेदारियों से ख़ुद को अलग कर लिया.
योगी आदित्यनाथ के शासन काल में उत्तर प्रदेश में बुलडोज़र निर्माण कार्य में इस्तेमाल होने वाले औज़ार से बदलकर मुसलमानों को सामूहिक रूप से दंडित करने वाला हथियार और राजनीतिक नाटक का हिस्सा बन गया. यह तरीका एक राष्ट्रीय मॉडल बन गया, जिसे भाजपा ने सराहा और दूसरे भाजपा शासित राज्यों तथा कांग्रेस शासित कर्नाटक में भी अपनाया गया.
हिमंता बिस्वा शर्मा भाजपा में शामिल होने के बाद कई कट्टर आरएसएस कार्यकर्ताओं से भी ज़्यादा आक्रामक और मुस्लिम विरोधी हो चले है. उन्होंने अपने संवैधानिक पद का इस्तेमाल नफ़रती भाषणों के लिए किया है.
बीते कुछ सालों में बुलडोज़र को दंडात्मक तौर पर इस्तेमाल करने की घटनाओं में वृद्धि हुई है. इस कार्रवाई में अधिकतर मुसलमानों को निशाना बनाया गया है. साल 2022 और 2023 में गिराए गए घरों में से 44% घर मुसलमानों के थे. यह पैटर्न बन गया है कि लगातार क़ानूनी प्रक्रिया को नज़रअंदाज़, और संवैधानिक सुरक्षा का उल्लंघन करके ऐसी कार्रवाई की जाती है.
उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रयागराज के एक एक्टिविस्ट के परिवार के घर को गिरा दिया, जिन्होंने बिना किसी जुर्म के 21 महीने जेल में बिताए. जब वे पुलिस हिरासत में अस्पताल में थे, तब बुलडोज़र से उनका वो घर तोड़ा गया, जो असल में उनकी पत्नी के नाम पर था.
हम सभी जिस नफ़रत, अन्याय और डर के ज़हरीले धुंध में घिरे हुए हैं, उसे चीरते हुए 2025 में कुछ बेहतरीन फिल्में आईं, जिन्होंने मानवता का संदेश दिया. इन फ़िल्मों ने अन्याय, दुख तथा विरोध का प्रतिकार किया और जोखिम उठाते हुए सच बोलने की हिम्मत दिखाई. प्रस्तुत है हर्ष मंदर की 2025 की पसंदीदा भारतीय फिल्में.
जब संसद ने एक ऐसा क़ानून ख़त्म कर दिया जो दस साल से ज़्यादा समय तक मज़दूरी करने वाले लोगों के संघर्षों का नतीजा था, तो मुझे उस समय की याद आ गई जब मुझे एक दिन मनरेगा कार्यस्थल पर ख़ुद काम करने का अनोखा अनुभव मिला था. उन कुछ घंटों ने मुझे यह समझने में मदद की कि दुनिया का सबसे बड़ा सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम उन लाखों लोगों के लिए असल में क्या मायने रखता है, जो इसके अंतर्गत
प्रभात पटनायक की नई पुस्तक 'सोशलिज़्म एंड द इंडियन कॉन्स्टिट्यूशन' के ज़रिए हर्ष मंदर भारत के उत्तर-औपनिवेशिक समाजवाद, नव-उदारवाद के संकट और नव-फ़ासीवाद के उभार का गहन विश्लेषण करते हैं. यह लेख संविधान में निहित समतावादी मूल्यों को पुनः हासिल करने की ज़रूरत पर ज़ोर देता है.
नेल्ली के पीड़ितों का दर्द हमें याद दिलाता है कि जो लोग बड़े पैमाने पर हिंसा झेल चुके हैं, उनमें से कई लोग अब भी इंसाफ़ का इंतज़ार कर रहे हैं. लेकिन सरकार ने आज तक किसी को भी इस हद तक बेसहारा नहीं छोड़ा है, जैसा इन लोगों के साथ हुआ है.
इस बरस भारत सरकार ने देश में रह रहे रोहिंग्या शरणार्थियों को जबरन देश से बाहर करने के लिये उन्हें समुद्र में फेंक दिया. इस अमानवीय कृत्य की कथा कुछ बचे रह गये रोहिंग्या मुसलमानों ने हर्ष मंदर को सुनायी. पढ़िए इस त्रासदी की आपबीती...
कई दशक पहले हर्ष मंदर ने मध्य भारत के ग्रामीण तथा आदिवासी इलाक़ों में कई बरस प्रशासनिक अधिकारी बतौर काम किया था. इस संस्मरण में वे उन बरसों को याद करते हैं जब उन्होंने तमाम किस्म के आर्थिक स्वास्थ्य संकटों से जूझ रहे लोगों को क़रीब से देखा था, और दयालुता व करुणा के मूल्य को पहचाना था.
डीवाई चंद्रचूड़ का तर्क कि सैकड़ों वर्ष पहले बाबरी मस्जिद का निर्माण 'अपवित्र कृत्य' था, आरएसएस और भाजपा के हिंदुत्व के प्रति उनकी अडिग निष्ठा को दर्शाता है.
उस पत्नी के बारे में सोचिए जो अपने पति के लौटने का 19 साल तक इंतज़ार करती है. उस बेटी के बारे में सोचिए जो अपने पिता के जेल जाने के बाद पैदा हुई. उसने कभी अपने पिता का चेहरा नहीं देखा. वह पढ़ाई करके डॉक्टर या इंजीनियर बन सकती थी. लेकिन उसके पिता के जेल में होने के कारण, यह संभव नहीं था.
एक वक्त देश में कई आतंकी हमले हुए थे. हर हमले के बाद कुछ अपवादों को छोड़कर, मुस्लिम पुरुषों पर जघन्य आरोप लगाये गये और उन्हें सालों तक जेल में रखा गया. उनके परिवार ग़रीबी और अपमान में जीते रहे. और फिर ये मामले निराधार साबित होने लगे. अदालतों ने आरोपियों को निर्दोष घोषित कर दिया. लेकिन उनका खोया जीवन कौन लौटाएगा?
मोदी युग का हिंदुत्व सिनेमा एक नया अवतार है. नाज़ी युग के सिनेमा की तरह, हिंदुत्व फ़िल्में न केवल अपनी कट्टरता को पूरी तरह से उजागर करती हैं, बल्कि उसका भौंडा प्रदर्शन भी करती हैं.